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बिना भड़ासी, मोहल्ला सूना

Posted On 4:05 pm by विनीत कुमार |

कल तक आपने पढ़ा कि भड़ास और मोहल्ला के बीच हुए बतकुच्चन के करीब एक महीने बाद अविनाश भाई ने अनिल रघुराज और भड़ासियों को डेडीकेट करते हुए लिखा कि-

कही अनकही बातों की अदा है दोस्ती

हर रंजो-ग़म की दवा है दस्ती अब आगे पढ़िए-

आप सोच रहे होगें कि इस पूरी घटना के हुए करीब महीना भर होने जा रहा है और उस पर लिख अब रहा हूं, कहीं कोई मुद्दा तो नहीं सुलगा रहा। तब तो अविनाश भाई के बारे में भी आप कुछ ऐसा ही सोच रहे होंगे क्योंकि उन्होंने भड़ासियों और अनिल रघुराज को शेर डेडीकेट करके फिर से मुद्दा जिलाने का काम कर रहे हैं। लेकिन नहीं यहां पर आप मेरे बारे में और अविनाश भाई दोनों के बारे में गलत सोच रहे हैं। हम जो लिख रहे हैं औऱ अविनाश भाई ने डेडीकेट किया उसे मेरी मां की भाषा में रह-रहकर जुंगार छूटना कहते हैं। जुंगार छूटने का मतलब है कि किसी चीज को लेकर बार-बार परेशान होना, याद करना, उसके लिए बेचैन होना, चाहकर भी भुला नहीं पाना। जैसे मैं चाहकर भी मोहल्ला के साथ अपनी यादें, अविनाश भाई की हौसला आफ़जाई भुला नहीं पा रहा हूं। बार-बार मन मथता है कि आखिर क्यों किया अविनाश भाई ने ऐसा मेरे साथ और अगर उनका भाई भी मोहल्ला छोड़कर भड़ास में ही बना है तो क्या उससे मुझे रिलीफ मिल जाती है और अविनाश भाई की ओर से तर्कपूर्ण जबाब...ब्ला ब्ला, ब्ला।

उसी तरह अविनाश भाई को भी मन मथता है। अच्छा तो था कि इधर भड़ास घर-फूंक मस्ती में लिख रहा था और इधर मोहल्ला पर हम एक इलीट संतुलन बनाए हुए थे। कुछ इधर के लोग उधर लिख रहे थे और कुछ उधर के लोग इधर लिख रहे थे। बीच-बीच में आर्थिक नगरी से अनिल रघुराजजी के यहां से भी मटेरियल आ जाता। ये सारा झमेला उनलोगों का खड़ा किया हुआ है जो भड़ास और मोहल्ला की तुलना करने लग गए। सिर्फ तुलना ही नहीं करने लग गए बल्कि मोहल्ला को भड़ास जैसा ही कुछ बताने लगे। भड़ास बुरी चीज है, वो लोगों को पॉलिटिकली करेक्ट करने के चक्कर में माय-बहिन पर भी उतर आते हैं जबकि मोहल्ला तर्क से लोगों को दुरुस्त करने का पक्षधर रहा है। अगर लोग मोहल्ला को भड़ास जैसा समझने लगें तो इसमें न केवल बदनामी है बल्कि इससे भी बुरी बात है कि लोगों की नजर में मोहल्ला पर जो गंभीर मनन-चिंतन चलता है उसका भी प्रभाव खत्म हो जाता है। ये तो सीधे-सीधे ऑडियोलॉजी पर हमला है इसलिए इनसे दूर रहना ही बेहतर होगा। इतना दूर कि भड़ास की ओर से चलनेवाली हवा मोहल्ला तक पहुंच ही नहीं पाए। और इसके लिए जरुरी है कि मोहल्ला के चारो ओर बाड़ लगाए जाएं।

मोहल्ला ने बाड़ लगाने शुरु कर दिए। एक-एक घर को ठोक-बजाकर देखा कि कहीं ये आनेवाले समय में भड़ासी तो नहीं हो जाएगा और जहां लगा कि हां ये हो सकता है, उसे निकाल बाहर किया। ये अलग बात है कि उसमें कुछ लोग अब भी रह गए जो भड़ास में रहते हुए भी मोहल्ला के मिजाज के हैं। यानि निकाल-बाहर करने में मिजाज को खास वरीयता दी गयी। लेकिन बाड़ लगाने के चक्कर में मोहल्ला ने अपनी चौखट इतनी छोटी कर ली कि लोगों को निहुरकर( झुककर) जाना पड़ता है और जो निहुर नहीं पाता है वो मोहल्ला के चारो ओर चक्कर लगाकर लौट आता है और इधर आप देख रहे होंगे कि मोहल्ला तो सेफ हो गया लेकिन मोहल्ला की चहल-पहल मोहल्ला की बांडरी वॉल के बाहर आ गयी।

अविनाश भाई चहल-पहल के बीच रहने वाले इंसान हैं। उन्हें आदमी से बहुत प्यार है। प्यार करने के लिए भी और मन नहीं लगने पर, प्यार करते-करते उब जाने पर लड़ने के लिए भी। इसलिए वो सेफ मोहल्ला से बाहर आकर चहल-पहल के बीच अनिल रघुराज को याद करते हैं, भड़ासियों पर व्यंग्य करते हैं। ये भी अपने तरह का, अलग किस्म का प्यार है। अब आपको हमसे खुन्नस हो रही होगी। जो लोग इस पोस्ट को इस मिजाज से पढ़ना शुरु किया होगा कि आज भी अविनाश के खिलाफ पढ़ने को मिलेगा वो थोड़े मायूस भी हो रहे होंगे। लेकिन आप मायूस न हों, मैं कह रहा हूं न कि अविनाश भाई ये सारे काम भी अपने स्वार्थ के लिए ही कर रहे हैं। वो बिना लड़े रह नहीं सकते, बिना मुद्दा छेड़े रह नहीं सकते, बिना बतकुच्चन किए जी नहीं सकते। नहीं तो क्या जरुरत पड़ी थी भड़ासियों को शेर डेडीकेट करने की। एक तो भड़ासी अपने आप में ऐसा आइटम है जिसे भड़भड़ाने के लिए बस हवा की जरुरत होती है और अविनाश भाई की तरफ से हवा मुहैया हो जाए तो फिर सेफ मोहल्ला के बाहर के लोगों के दम पर गुलजार है।

एक बात पर और गौर करिए। लोगों ने जब मोहल्ला को भड़ास जैसा ही कहना शुरु कर दिया तो अविनाश भाई को मोहल्ला का दामन मसकता नजर आने लगा। उन्हें लगने लगा कि अरे, इतने मजबूत फैब्रिक से बनी विचारधारा और उससे बना ब्लॉग कैसे मसक सकता है। इसलिए उन्होंने तुरंत उसका कलेवर बदला और गाजा को सलाम करने लगे, तिब्बत के मसले पर बात होने लगी, कुछ संगीत भी पेश किए गए जिसे पेश करना भड़ासियों के संस्कार में ही नहीं है। जिस दिन वो ऐसा करने लग गए उस दिन से वो अपनी पहचान खो देंगे, भड़ासी रह ही नहीं जाएंगे। इसलिए भड़ासी सबकुछ जानते हुए भी चाहकर भी मोहल्ला का मुकाबला नहीं कर सकते। इस स्तर पर मोहल्ला को अलग दिखाने में भड़ासियों का भी योगदान कबूला जाना चाहिए।... तो मामला साफ हो गया। भड़ासी रहेगा उसी टपोरी, अघोरी और भड़भडिया अंदाज में और मोहल्ला गंभीर, संतुलित अंदाज में।

लेकिन जब मुझे जुंगार छूटा और निकाल दिए जाने पर भी मोहल्ला पर गया तो देखा कि अविनाश भाई को पहले से जुंगार छूटा हुआ है। और पोस्ट लिखी है-

ऑटो के पीछे क्‍या है
उर्फ बेनाम कवियों की लोकप्रिय शाइरी अनिल रघुराज और भड़ासियों के लिए

यानि भड़ासियों को दुत्कार भी दिया तो भी उनकी बातें, उनकी याद आती रहती है और मन करता है कि कभी हम भी भड़ासी बन जाएं। तब मन की स्वाभाविक इच्छाएं प्रयासजन्य विचारों को बहुत पीछे धकेल देती है।... और वैसे भी हम लाख कोशिश कर लें, फर्श पर से जूतों के निशान मिटाए जा सकते हैं लेकिन जिंदगी से इतिहास के निशान नहीं। ये निशान बार-बार बयां करता है कि भड़ास और मोहल्ला दो जरुरी ब्लॉग हैं और ये दोनों इतिहास के निशान हैं। दोनों के लिए एक-दूसरे के मन में जुंगार छूटता रहता है तो बेहतर ही है, सुखद भी है और हिन्दी ब्लॉगिगं के लिए जरुरी भी।

दलील और अंत में एक अपील-

अविनाश भाई, मोहल्ला, भड़ास और अपनी भावनाओं को आपके सामने रखने के पीछे कोई खेमेबाजी करना मेरा मकसद नहीं रहा है। न ही अविनाश भाई को गलत साबित कर अपने हाथ में होलीस्टिक थामने का इरादा। कुछ साथियों की टिप्पणियों से लगा कि वो मेरे प्रति सहानुभूति रखते हैं। उनके शब्दों को पढ़कर लगता है कि अगर मैं मिल जाउं तो मेरी पीठ सहलाकर कहेंगे कि जाने दो, हौसला रखो। ये कोई इस तरह का मसला नहीं था। मेरे प्रति प्लीज बेचारा नजरों से न देखें। मैंने अपने मन को बहुत कड़ा करके ऐसा लिखा है और वो भी अगर अविनाश भाई भड़ासियों के लिए ऑटो के पीछे क्या है, नहीं लिखते तो बात आयी गयी हो गयी थी। मैं इस पूरे मसले को राइटिंग प्रैक्टिस के तौर पर लिख रहा हूं और प्रयोग कर रहा हूं कि मैं घटनाओं को लेकर कितना तटस्थ रह पाता हूं। अविनाश भाई के प्रति मेरे मन में कोई कड़ुवाहट नहीं और स्वाभिमान के साथ सम्मान का भाव बना हुआ है। पीछे की पोस्ट के लिंक्स नहीं दे रहा क्योंकि इसके बाद लिंक आगे की होनी चाहिए, पीछे के नहीं, हमेशा पीछे लौटना फायदेमंद नहीं होता।.....

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3 Response to 'बिना भड़ासी, मोहल्ला सूना'
  1. भुवनेश शर्मा
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/04/blog-post_06.html?showComment=1207457460000#c5806398773355270638'> 6 अप्रैल 2008 को 10:21 am

    भैया ई का अगड़म-बगड़म ठेले जा रहे हो आजकल.

    तबीयत तो ठीक है ?

     

  2. कमलेश प्रसाद
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/04/blog-post_06.html?showComment=1207468740000#c2826938042217717384'> 6 अप्रैल 2008 को 1:29 pm

    aapke vicharo aur santulan se mai bhi sahmat hu

     

  3. आनंद
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/04/blog-post_06.html?showComment=1207483500000#c8259040185650400970'> 6 अप्रैल 2008 को 5:35 pm

    आपके लेखों की सिरीज बड़ी तन्‍मयता से पढ़ रहे हैं। बधाई हो, आप अपनी राइटिंग प्रैक्टिस बड़ी सफलता से कर रहे हैं। आपने लिखने में पूरी तटस्‍थता बरती है। आपके लेख जुंगार के रिश्‍तों को समझने की दिशा में महत्‍वपूर्ण दस्‍तावेज हैं। निश्चिंत रहें। हम समझते हैं कि आप किसी पर आक्षेप नहीं लगा रहे हैं, बल्कि क्रमबद्ध विश्‍लेषण कर ब्‍लॉग के आपसी स्‍वभावों और मज़बूरियों को पकड़ने की कोशिश कर रहे हैं। - आनंद

     

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