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दो दिनों बाद ब्लॉग की दुनिया में वापस आया तो देखा कि जनसत्ता से जुड़े लोगों पर मैंने जो पोस्ट लिखी और जिसको लेकर विवाद हुआ, सब मामला रफा दफा हो गया और मंगल गान गाए जा रहे हैं॥शुभ हो, सब कुशल रहे। ये अलग बात है कि ब्लॉग से निकली बात को लेकर अब फोन करने,पर्सनल मेल करने, सुझाव देने और कुछ हद तक अलग-अलग माध्यमों से दबाव बनाने की कोशिशें जारी है। भड़ास का मेन मॉडरेटर होने के नाते यशवंतदा ने डॉ मान्धाता सिंह के सुझाव को मान लिया और लिखा -
विनीत कुमार की जिस पोस्ट पर गर्मागर्म बहस चल रही है, उसके बारे में मेरा अपना निजी खयाल यही है कि भड़ास पर किसी मीडिया हाउस का नाम लेकर उसे कोसने के बजाय जिस सज्जन से दिक्कत है, पीड़ा है, उनका नाम कोटकर लिखा जाए तो शायद ज्यादा ठीक रहेगा क्योंकि किसी मीडिया हाउस को किसी एक दो खराब टाइप के सज्जनों के कारण गरियाना, नाम उछालना, बदनाम करना उचित नहीं। ........उम्मीद है इस विवाद को यहीं खत्म समझा जाएगा। अगर फिर भी किसी को कुछ कहना है तो उसका स्वागत है।
यशवंतदा की इस घोषणा के बाद डॉ मान्धाता सिंहजी ने इसे गंगा में नहाने का असर बताते हुए जुग-जुग जीने का आशीर्वाद दिया-
यशवंतजी यही आप से उम्मीद थी। जनसत्ता वाले मामले में अब आपने एक सतर्क माडरेटर जैसा जबाव दिया है। गंगा में जो नहा के आए हैं। जुग-जुग जिएं आप, खूब तरक्की करे
लेकिन क्या आज के इस पोस्ट मार्डन कंडिशन में वाकई किसी बहस की उम्र दो या तीन दिन से ज्यादा नहीं होगी। थोड़ी देर तक हलचल के बाद सब खत्म और फिर सब पहले की करह ही मौजा-मौजा। हम मंगल-मंगल के लिए इतने उतावले क्यों हैं।
विवाद मेरी पोस्ट से ही शुरु हुई थी इसलिए जरुरी समझा कि समापन की विधिवत घोषणा के बाद भी कुछ लिखूं। ब्लॉगिंग को कचहरी की शक्ल में बदलना हो तो हर बात के पीछे तर्क खड़ी करने में कोई परेशानी नहीं होगी। ब्लॉग लिखते-लिखते तो इतना माद्दा सबमें आ ही गया है लेकिन अभी इसे कचहरी नहीं होना है। हां इतना जरुर है कि एक बात को देर तक, दूर तक न भी खींचे तो भी जितना कुछ हुआ, उसके ऑटपुट पर एक नजर जरुर डाल लिया जाए।
जनसत्ता पर पोस्ट लिखने के बाद जो सबसे तीखी प्रतिक्रिया हुई वो मेरी भाषा को लेकर। एक सभ्य समाज इस तरह की भाषा सुनने को अभ्यस्त नहीं है। सो इस सभ्य समाज के लोगों ने मेरी इस भाषा को अकादमिक हलको तक पहुंचाया। भाषा की नारको टेस्टिंग वहीं होनी है। लेकिन उन्हें रिपोर्ट मेरी भाषा की नहीं, मेरी चाहिए थी। कुछ का मानना था कि इसमें कई चीजें अनर्गल है। कुछ को पोस्ट ही ढीली लगी,कुछ ने कहा कि इस पर और मेहनत की जरुरत थी तो कुछ ने ये भी कहा...और फाडो सालों को, वगैरह॥वगैरह।मैं अपनी भाषा को लेकर कोई तर्क नहीं देना चाहता हूं, आपको कभी एसी कार में बैठे इंसान ने आपके पैदल चलने पर ठोक दिया हो और वहां आपके मुंह से क्या निकलता है, आप सब जानते हैं। सिर्फ अकादमिक योग्यता हमारी भाषा तय नहीं करती, एक खास परिस्थिति में हर आदमी वही बोलता या लिखता है जो भाषा आप और हम किसी से ठुकने पर इस्तेमाल करते हैं।
इस पूरे प्रकरण को मैं थोड़ा दूसरे ढ़ंग से ले रहा हूं। पहला तो ये कि भाषा यहां कोई मसला ही नहीं है।
सीधे-सीधे आउटपुट को लेकर बात करुं तो कुछ सवाल और कुछ नए तथ्य हमारे सामने आए हैं-
सबसे पहले तो इसके जरिए अखबार का दोहरा चरित्र उभरकर सामने आया है। आपको सुप्रीम कोर्ट से तुरंत फैसला चाहिए, सरकार से जबाब चाहिए, शोषण और भ्रष्टाचार को लेकर आप कुछ करना चाहते हैं, खत्म करना चाहते हैं। लेकिन आप खुद एक रिज्यूमे भेजने वाले को पचासों बार दौड़ाएंगे, तब तक जब तक वो फोन या मेल करना न छोड़ दे। आप उससे कभी न नहीं बोलेंगे और समझने पर मजबूर करेंगे कि देख लेंगे का मतलब नजरअंदाज करना होता है। आप समाज को सिखाएंगे कि निडर बनो, विरोध करो और आपने पत्रकारिता को एक व्यवस्थित पेशा बनाने के क्रम में खुद इसके दरवाजे इतने छोटे कर दिए कि निहुरकर( झुककर) अंदर घुसना पड़े और इस क्रम में हम बिना रीढ़ के आदमी हो जाएं। ये तो हमने लिखा तो बात अकादमिक हलकों तक घसीटकर ले गए, क्योंकि आपने मेरी बातों का मेल या ब्ल़ॉग के जरिए बात करने से ज्यादा जरुरी समझा। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि अखबार में काम करनेवाला बंदा कितना निडर होकर लिख सकता है, मेरे जैसे को तो आपको निकालने में घंटा भर भी नहीं लगेगा। कुल मिलाकर आप समाज को समझाते रहिए व्यवस्था से लड़ना और विरोध करना और आपके हाउस में काम करने वाला बंदा पालतू बनता चला जाए और देखते-देखते इसकी एक फौज खड़ी हो जाए जो कि आपके मुताबिक काम करें अनुकूलित हो जाए, आपके हिसाब से। इसी के बूते क्रांति करेंगे आप। आपकी इस मान्यता को ब्लॉग ध्वस्त करता है आगे भी करेगा।
अखबार के मनमानेपन को हमने ट्रेस करना शुरु कर दिया है , उसकी मानसिकता से रुबरु हो रहा हूं और अब बेचारा पाठक की हैसियत से नहीं एक ब्लॉगर की हैसियत से लिख रहा हूं क्योंकि आपने खुद इसकी ताकत को हौसला दिया है। अनसुनी आवाजों को रोने की जरुरत नहीं कि वे कहां जाएं, हमें अपनी अभिव्यक्ति का औजार मिल गया है।
दबाब बनेंगें हमारे उपर, ये दबाब सत्ता की नहीं होगी, उस अखबार की होगी जो गलत के लिए लड़ता आया है लेकिन ब्लॉगिंग करते हुए इसे भी झेलना होगा, कई दबाब एक साथ लेकिन अब कीपैड भला कहां रुकनेवाला।
यशवंतदा सहित सारे ब्लॉगर साथियों से एक वादा कि अब ये कीपैड किसी मीडिया संस्था के नाम को लेकर नहीं । आप गारंटी देगें कि सारे लोग अपनी पहचान के पहले गर्व से बताना छोड़ देंगे कि मैं फलां हाउस में काम करता हूं।खैर., इसका मतलब ये भी नहीं कि भाषा उसकी जो सड़ी मानसिकता है, का समर्थन करेगी। माफ कीजिएगा, मैं कोई बड़ा बुद्धिजीवी आदमी नहीं कि भाषा में परिष्कार के नाम पर कूटनीति की भाषा ईजाद कर लूं। भाषा में कच्चापन होगा, हमेशा परिष्कृत ही हो , इसकी कोई गारंटी नहीं लेकिन मठाधीशी मानसिकता के खिलाफ होगी, इसकी सौ फीसदी की गारंटी है। रिसर्च फेलो हूं, क्रांति की शुरुआत जंतर-मंतर के पास चिल्लाने के लिए नारे लिखने से पहले डाटा कलेक्शन, आइडिंटीफिकेशन से होकर गुजरुंगा। हममें उन बुद्धिजीवियों की शक्ल न हीं देखें तो मेरे उपर एहसान होगा जो बदलाव तो चाहते हैं लेकिन शुरुआत दूसरों के घरों से करना चाहते हैं, शाकाहारी क्रांति में विश्वास रखते हैं। बड़े-बड़े मुद्दों पर बात करने से अपने घरेलू मुद्दे गायब हो जाते हैं जिसका कि अपने से सीधा सरोकार होता है। मैं बड़े मुद्दों पर गोलमोल लिख नहीं सकता।....लिखते हुए याद आ गया-
या तो अ ब स की तरह जीना है
या सुकरात की तरह जहर पीना है।।
कीपैड से लिखना बिजली चले जाने पर बंद भले ही हो जाए लेकिन वैसे तो कभी नहीं........
| edit post
5 Response to 'ब्लॉगर की भाषा की होगी नारको टेस्टिंग'
  1. आशीष महर्षि
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/02/blog-post.html?showComment=1201940640000#c3521129749039683596'> 2 फ़रवरी 2008 को 1:54 pm

    विनीत जी हम लोगों के साथ दिक्‍कत यही है कि हम प्रेस की आजादी की बात करते हैं लेकिन हम खुद ही इस पर कोई न कोई अंकुश लगाने से भी गुरेज नहीं करते हैं और जहां तक ब्‍लॉग की बात है, उसमें भाषा का कोई प्रश्‍न ही नहीं होना चाहिए। यदि हम किसी दूसरे मीडिया संस्‍थान या जहां हम कार्य कर रहे हैं, उसकी खामियां को सामने नहीं ला सकते हैं तो हमें ब्‍लॉग ही बंद कर देना चाहिए

     

  2. Sanjeet Tripathi
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/02/blog-post.html?showComment=1201951680000#c8750657185094779776'> 2 फ़रवरी 2008 को 4:58 pm

    आमीन!!!
    (अखबारी/मीडिया) व्यवस्था के प्रति आक्रोश झलक रहा है, एकदम एंग्री यंग मैन के माफिक।

     

  3. मुन्ना पांडेय
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/02/blog-post.html?showComment=1202009460000#c8515113431634221112'> 3 फ़रवरी 2008 को 9:01 am

    saathi vineet ji
    jansatta ke log ho ya aur kisi medium ke in range- siyaaron ki shakle ek jaisi hai jo
    apni safedposhi ke ujagar hone par
    natikta ki aad aur duhai dete hai.janvaadi mulyon ki baat aap sin mathadhisho ya chola odhe samanto se hi payenge....
    par jab maidan mein kude hi hai to ye safed baal bawasir kitarah thodi si kulbulahat jarur denge
    ...bahut accha likha hai ..likhte rahiye..inki tilmilahat jahir karti hai ki sachchai kadwi hoti hi hai
    all the best

     

  4. राकेश
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/02/blog-post.html?showComment=1202113620000#c4336913652686313209'> 4 फ़रवरी 2008 को 1:57 pm

    तो अब भाषा-वाषा भी तय कर लेना चाहते हैं अखबार वाले! विनींत के तर्कों को हवा में तो नहीं ही उड़ाया जा सकता है. बहस छिड़ी है तो शामिल हुआ जाए. बढिया लिखा.

     

  5. dilip uttam
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/02/blog-post.html?showComment=1205393340000#c7170880052948929006'> 13 मार्च 2008 को 12:59 pm

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