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लकड़ी करने वाले लोगों की कमी नहीं है,हर बात में बस थोड़ा सा उपर उठा दो, अपने आप हो जाएगा। कल के ब्लॉग संगत से लौटकर जब अपनी पोस्ट का शेयर सूचकांक जानने के लिए डेस्कटॉप खोला तो देखा कि अफलातून सरजी ने टिप्पणी छोड़ी है कि 'चोखेर बाली'का 'सराय' जैसी दुकान से क्‍या सम्बन्ध है और टिप्‍पणीकार साहब ने झट से लपक लिया। ४०-५० पुरुष ब्लॉगरों के बीच अकेले मोर्चा ताने हुए थी उसकी कोई बात नहीं कर रहा, किस जिंदादिली से पूरी परिचर्चा में शामिल रही उस पर कोई बात नहीं तो बात आ गयी सीधे चोखेरबाली के एजेंडे और सराय की आइडियोलॉजी पर।
मतलब साफ है कि ब्लॉगर, ब्लॉग लेखन के जरिए अपनी बात कहने और मेनस्ट्रीम की मीडिया जहां असमर्थ हो जा रही है वहां अपनी मौजूदगी दर्ज करने के लिए नहीं लिख रहे बल्कि यहां भी वे अखबार या चैनल की तरह हर जगह पॉलिटिकली करेक्टनेस खोजने लग जाते हैं। इस प्रतिक्रया से हमने जो आशय लगाया है वो ये कि ब्लॉग के स्तर पर, उसके कार्यक्रम के जरिए नहीं जुड़ेंगे, जब तक कि वो पॉलिटकली करेक्ट न हो। तो भइया, ब्लॉग को फिर किस मुंह से सेक्यूलर और ज्यादा प्रोडेमोक्रेटिक माध्यम होने का दावा करने लग जाते हो।
अब अगर सुजाताजी नहीं आती तो उस पर भी मसाला मारते कि-वो तो सिर्फ इंटरनेट पर ही क्रांति मचा सकती है। जैसे टीसर्ट क्रांति, झोला क्रांति, वैसे ही कीबोर्ड क्रांति। तब भी आप कहते कि अजी अविनाश का संयोजन था तो भला क्यों कर आने लगी। चोखेरबाली आएगी, इसकी सूचना तो अविनाश भाई ने बहुत पहले ही नेट पर डाल दिया था,तब किसी ने सुजाताजी के पक्ष में ही खड़े होकर राय नहीं दी कि भाई, अच्छा-खासा क्रांति कर रही है उसे क्यों विदेशी फंडेड संस्था में ला रहे हो। गोया आप ताक में थे कि आए तो सही और लपेट लेंगे। माफ करेंगे, आपकी इस टिप्पणी से ये भी लगता है कि आप अब भी उसी मानसिकता का समर्थन करते हैं कि स्त्रियां कहां जाएंगी, कहां नहीं, पुरुष तय करेगा।....और क्या चोखेरवाली को सराय अगर दूकान भी है तो उसकी जरुरत नहीं है,बाजार में सिर्फ पुरुष का ही कब्जा होगा। कबसे सरजी...
टीवी चैनल वाली लत धीरे-धीरे यहां भी लगने लगी है कि जो कुछ भी हो बस मसाला मार के थाली आगे बढ़ा दो, जनता तो चटकारे मारने के लिए पहले से तो तैयार बैठी है ही। आप सारे ब्लॉगरों से अपील है कि प्लीज ब्लॉग को भी मेनस्ट्रीम की मीडिया की सड़ांध में मत धकेलिए जहां सच के पहले आइडियोलॉजी हावी हो जाती है। हिन्दी की दुनिया के लिए ब्लॉग नया माध्यम है, उसे अभी ही मत फंसाइए, इस तरह के पचड़ों में। आप देखेंगे कि कई सारी चीजें खुद ही रेगुलेट होती चली जाएंगी।
आपको इस बात में कोई इंटरेस्ट नहीं है कि वहां जाकर चोखेरबाली ने क्या कहा। आप बैठे ही बैठे मान कर चल लेते हैं कि वहां इन्होंने सराय के पक्ष में खूब तेल मालिश की होगी। आप इस एंग्ल से सोच ही नहीं पा रहे होंगे कि कोई किसी के यहां जाकर उसके खिलाफ बोल भी सकता है। इसका क्या मतलब निकाला जाए कि ब्लॉगर की एक खेप ऐसी भी है जो कि ब्लॉग के मुद्दे पर तभी जाते हैं जब उनकी आइडियोलॉजी के मुताबिक स्पेस,लोग और कार्यक्रम तय किए जाते हैं।...तो फिर इंटरनेट के जरिए ग्लोबल होने का सपना भूल जाइए।
सरजी, आपको क्या लगता है कि सराय अगर दूकान है (आपके मुताबिक, हमारे हिसाब से एक तो लगता ही नहीं और थोड़ी देर के लिए लग भी जाए तो खरीद-बिक्री और शोषण के स्तर पर नहीं, वार्टर सिस्टम के तहत कि तुम हमें टाइम दो, हम तुम्हें स्किल देंगे, खैर) और सुजाता वहां के ब्लॉग संगत में जाती है तो इसका मतलब है, साम्राज्यवाद का समर्थन करती है। तो बाकी के उन चालीस-पैंतालिस लोगों के बारे में आपकी क्या राय है। अविनाश भाई को आप जानते हैं इसलिए उनका भी नाम ले लिया कि भाई बाहर क्रांति रहे हैं तो ब्लॉग में आकर इसके समर्थक कैसे हो गए। आपको नहीं लगता कि आपने भी उसी तर्ज पर सोचना शुरु कर दिया है जिस तर्ज पर कम आंकडों या फिर जानकारी के अभाव में चैनल अपने पोल का रिजल्ट देती है।
आप ब्लॉग की चिंता से ज्यादा पर्सनल आइडियोलॉजी को लेकर परेशान नजर आते हैं जो कि ब्लॉग के भविष्य के लिए ठीक नहीं है। ये जानते हुए कि जो रवैया बन रहा है, आनेवाले समय में ब्लॉग के उपर पार्टी, आइडियोलॉजी,लिक्स,सेडिंग्स और वो सब कुछ हावी हो जाएंगे जो कि अखबारों और टीवी की दुनिया में हावी हैं। बावजूद इसके मैं फिर से अपील करना चाहता हूं कि ब्लॉग लेखन काफी हद तक हमारी वैयक्तिक इच्छा, अभिरुचि, संवेदना और समझ पर आधारित है। इस पर न तो बाजार का दबाब है और न ही यहां संपादक और सठिआए प्रोड्यूसर की कैंची चलती है। इसलिए हम चाहेंगे कि इसे तार्किक, प्रोडेमोक्रेटिक और स्पेसियस बनाए। ये अकेली दुनिया हो जहां किसी को लाल सलाम बोलने पर मांस के लोथड़े का ध्यान न आए और न ही किसी को श्रीराम बोल देने से गोधरा के पिशाच होने की आशंका पैदा हो जाए।
....और हां अबकि दिल्ली में ब्लॉग संगत हुआ तो अपनी और हम सब कि कोशिश रहे कि अकेले चोखेरबाली ही नहीं....इतनी चोखेरवाली आए कि पुरुषों को ऐसी अनर्गल बातें बोलने का मौका ही न मिले। ऐसा रहम खाकर नहीं बल्कि ये समझने के लिए कि जब सारी स्त्रियां कांव-कांव करेंगी ( पितृसत्तात्मक समाज में स्त्रियां कांव-कांव ही करती है) तो हम पुरुषों पर क्या गुजरती है, ये सबकुछ जानने के लिए।
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5 Response to 'आओ मर्दों तय करें,कहां जाए चोखेरबाली कहां नहीं'
  1. Neelima
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/02/blog-post_14.html?showComment=1202972640000#c1138945201680532798'> 14 फ़रवरी 2008 को 12:34 pm

    स्त्री का विद्रोह और संघर्ष ऎसे ही अकेला कर दिया जाता है ! अफलातून जी अपने भीतर के मर्दवादी को कैसे दबाऎ और छिपाऎ - अब उन्हें इस बात की चिंता कर लेनी चाहिए ! ( वैसे मैं कल की संगत में सराय में नहीं थी इस पर अफलातून जी आपकी मेरे बारे में क्या राय है ?)

     

  2. आशीष
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/02/blog-post_14.html?showComment=1202973660000#c2262142992025635112'> 14 फ़रवरी 2008 को 12:51 pm

    इन सब पर खुलकर बात और बहस होनी जरुरी है

     

  3. Sanjeet Tripathi
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/02/blog-post_14.html?showComment=1202981100000#c2265166204019330831'> 14 फ़रवरी 2008 को 2:55 pm

    एक बात जो अक्सर कई ब्लॉग्स पर पढ़ता हूं वह यह कि "फलां साहित्यिक बीमारी या फलां टी वी चैनल वाली बीमारी अब ब्लॉगजगत में भी आ गई यह ठीक नही"

    भाई मेरे, ब्लॉग जगत में भी आखिर वही हैं जिनसे यह समय चल रहा है या जो इस समय में हैं वही ब्लॉग जगत में है, वही मनुज हैं जो साहित्य जगत में हैं या टी वी चैनल्स में तो फ़िर ब्लॉग जगत में भी वही सब बातें आएंगी ही न जो ब्लॉगजगत से बाहर मौजूद हैं।
    इसलिए यह अपेक्षा करना ही कि ब्लॉगजगत एक अलग ही दुनिया की भांति व्यवहार करे या एक अलग ही प्रजाति के मनुज जैसा व्यवहार करे,गलत है।

    यह तो हुई एक बात दूजी बात यह कि
    जब हम एक चश्मा पहन लेते हैं तो हम हर चीज/बात को उसी चश्में से देखने लगते हैं,फिर हम उस चश्मे को हटाकर अन्य कुछ देखना ही नही चाहते!!!!

     

  4. कमलेश प्रसाद
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/02/blog-post_14.html?showComment=1203058560000#c7765684530496705442'> 15 फ़रवरी 2008 को 12:26 pm

    kahi blogg jagat ko bachpan me he nimoniya naa ho jaye.
    aap jaise doctero ki jarurat hai isse

     

  5. dilip uttam
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/02/blog-post_14.html?showComment=1205393160000#c5839528377642336856'> 13 मार्च 2008 को 12:56 pm

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