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बिना बचपन के यंग हो जाती है लड़की

Posted On 3:55 am by विनीत कुमार |

एक लड़की का सवाल है कि रामायण या फिर महाभारत में राम को, कृष्ण को या फिर दूसरे पुरुषों के बचपन को खूब दिखाया-बताया गया है। वो कैसे चलते हैं, कैसे झूठ बोलते हैं, कैसे रुठते हैं आदि-आदि। लेकिन उसी समय सीता भी है, द्रौपदी भी है, राधा भी है लेकिन उसका कोई बचपन नहीं, उसे सीधे-सीधे युवती के रुप में दिखा दिया गया, ऐसा क्यों। बड़ी से बड़ी और महान से महान रचनाओं में लडकियों का बचपन गायब क्यों है। वो लड़की के तौर पर हमारे साहित्य से नदारद है और एकाएक युवती के रुप में शामिल है, ऐसा क्यों।
जिस लड़की ने ये सवाल उठाया वो बार-बार विश्वविद्यालय में मध्यकाल यानि भक्तिकाल पर बोलने आए डॉ।रमेशचन्द्र मिश्र को इसे हिन्दी की खोट के रुप में बताना चाह रही थी। उसका साफ इशारा था कि आप जिस काल के साहित्य को महान रचना करार दे रहे हैं, दरअसल उसमें भारी गड़बड़ी है। मुझे भी लगा कि सारे रचनाकारों को लड़की की जरुरत युवती हो जाने पर ही होती है ताकि उसके नख-शिख वर्णन करने में काम आ सके। क्या जब तक लड़कियों की छातियों के उभार नहीं आते वो किसी कवि या रचनाकार के काम की नहीं होती। क्या लड़कियों को सिर्फ विरह रोग ही लगता है और वो भी जब वो बालिग हो जाती है। उसके पहले उसे कोई दूसरी बीमारी नहीं होती, उसे और कोई तकलीफ नहीं होती। जिस मसले को लड़की ने उठाया उससे जुड़े न जाने कितने सवाल उठते हैं और उठ सकते हैं लेकिन सवालों की गिनती के मुकाबले किसी के पास जबाब एकाध भी हो जाए तो बहुत है।
मेरे एम।ए के समय में नित्यानंद तिवारी सर हुआ करते थे और वो हमलोगों को पद्मावत पढ़ाया करते थे। स्त्रियों की दशा पर बात करते हुए अक्सर कहते-मध्यकाल में स्त्रियां सम्पत्ति के रुप में समझी जाती थी। सम्पत्ति, जिस पर कि कब्जा किया जा सके और उस समय ऐसा ही होता था। मेरी समझ बनी कि सम्पत्ति को लेकर मालिक बहुत कॉन्शस रहा करता है। लड़कियां जो कि बालिग नहीं होती वो तो सम्पत्ति भी नहीं होती, वो किसी के क्या काम आ सकती है। तो क्या दशा रही होगी इनकी। इस पर हिन्दी में कहीं कुछ नहीं है। हिन्दी में कमोवेश वही लड़कियां मतलब की रही है जिसे प्रेमी ने छोड़ दिया और विरह में डूबी है या फिर वो स्त्रियां जो हम पुरुषों को रिझाने की कला में निष्णात है। बाकी का कोई भी मतलब नहीं है। पूछने को ये भी पूछा जा सकता है कि साहित्य अगर मानवीय संवेदनाओं की भाषिक प्रस्तुति है तो क्या इन लड़कियों के प्रति किसी को संवेदना पैदा ही नहीं हुई और उससे पहले भी एक सवाल कि क्या लड़कियां भी संवेदना पैदा करने की वस्तु हो सकती है, इस पर हिन्दी के किसी रचनाकारों ने सोचा होगा।
लड़की का जोर रहा कि जब राम और कृष्ण को चलते हुए, माखन या मिट्टी मुंह में लगाए हुए दिखाया तो फिर सीता या फिर राधा को क्यों नहीं। लेकिन मेरा सवाल उससे थोड़ा आगे का है कि अगर राधा या सीता को भी ऐसा ही कुछ दिखा देते तो हिन्दी के रचनाकार कौन-सा एहसान कर देते। बल्कि अब तक( जितना मैंने हिन्दी साहित्य को पढ़ा है, वाकई बहुत कम पढ़ा है, उसी आधार पर) हिन्दी के रचनाकारों को एक भी बच्ची नहीं मिली जिसके बारे में लगे कि कुछ लिखा जाना चाहिए। इसे आप क्या मानते हैं। आप ये भी तर्क दे सकते हैं कि हिन्दी साहित्य में तो बहुत कुछ नहीं लिखा गया इसका मतलब क्या है कि जो कुछ भी लिखा गया है उसे इसके अभाव में साहित्य मानने से इन्कार कर दें।
मत इन्कार करिए, सबको साहित्य मानिए लेकिन आगे से बिना लड़कियों की दशा और नायिका के अलावे भी स्त्री के रुप होते हैं, को दरकिनार करके लिखा और बार-बार कालजयी और महान बताने की कोशिश की तो ऐसे ही कोई लड़की सवाल कर देगी और आपको हकलाना पड़ जाएगा। सुजाता के शब्दों में कहें तो समाज की चोखेरबाली से टकराना होगा....
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21 Response to 'बिना बचपन के यंग हो जाती है लड़की'
  1. राकेश
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/02/blog-post_18.html?showComment=1203327240000#c1476868474453478941'> 18 फ़रवरी 2008 को 3:04 pm

    जिस किसी ने भी उठाया हो, सवाल महत्त्वपूर्ण है. वैसे आजकल एक ब्लॉग शुरू हुआ है http://daughtersclub.blogspot.com
    मालूम नहीं उस पर लिखी सामग्री साहित्य की श्रेणी में शामिल हो पाएगी कि नहीं. दृष्टांत के तौर पर देखा जा सकता है. विषय अच्छा उठाया आपने बंधु. बधाई.

     

  2. आशीष
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/02/blog-post_18.html?showComment=1203327960000#c2496280863720838823'> 18 फ़रवरी 2008 को 3:16 pm

    आपने तो एक नई बहस को जन्‍म दे दिया भाई

     

  3. रचना
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/02/blog-post_18.html?showComment=1203328140000#c1937177577044956923'> 18 फ़रवरी 2008 को 3:19 pm

    kyaa aapke blog post jo ek uttam aur sadhii hui haen kaa taaital badalla nahin jaa sakta ? kuch cheezay haen jineh badlnaey mae abhi samay lag rahaa haen per kuch haen jineh hm suvidha sae badl sakte haen , jaise naari kii sharir sanrachna sae hat kar usii baat ko bhi vyakt kiya jaayae
    aasha haen is kament ko ek healthy trend kee shuruvat samjh kar laegae . naari sharir ko bhul kar bhi baat ho toh shayaad kam log padeh per jo padhegaye woh sach mae padhegae

     

  4. मनीषा पांडेय
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/02/blog-post_18.html?showComment=1203328260000#c5752851253082731211'> 18 फ़रवरी 2008 को 3:21 pm

    हिंदी साहित्‍य के लिए कालजयी और महान जैसी विशेषणों-आभूषणों का इस्‍तेमाल मत करिए, क्‍योंकि ऐसा कुछ है ही नहीं। उसके बहुत सारे दूसरे कारण हैं, लेकिन जहां तक स्‍त्री के प्रति नजरिए का सवाल है, तो सिर्फ हिंदुस्‍तान ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया का इतिहास पितृसत्‍तात्‍मक रहा है, जहां स्‍त्री एक देह, पुरुष के आनंद और वंशवृद्धि की मशीन से ज्‍यादा कुछ नहीं रही। हिंदी ही नहीं, पूरी दुनिया के प्राचीन साहित्‍य में इसके उदाहरण मिल जाएंगे। केट मिलेट की किताब 'सेक्‍चुअल पॉलिटिक्‍स' इसी डिस्‍कोर्स पर बात करती है। यूरोप के लेखकों और साहित्‍य की भाषा और कंटेंट में जेंडर विभेद और पूर्वाग्रहों का सवाल। आप बर्गमैन, तारकोवस्‍की, बेर्तोलुच्‍ची और फेलिनी समेत सिनेमा के लीजेंड्स का काम भी उठाकर देखिए। एक बेहद गहरी, सरल, दैहिक उन्‍मुक्‍तता में भी देह सिर्फ स्‍त्री की ही होती है। पूंजीवादी बाजार में सजी औरत की देह जैसी वितृष्‍णा और अमानवीयता तो वहां नहीं है, लेकिन दिखाई गई देह सिर्फ स्‍त्री की ही है, पुरुष की नहीं। कितने तो सवाल हैं।

     

  5. काकेश
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/02/blog-post_18.html?showComment=1203328500000#c2471148306395942017'> 18 फ़रवरी 2008 को 3:25 pm

    आपने बात तो बहुत खरी और अच्छी उठाई है लेकिन शीर्षक सनसनी वाला है. इससे आपको अच्छे हिट मिल जायेंगे लेकिन एक स्त्री का तो अनादर ही होगा. मैं रचना जी सहमत हूँ. यदि हो सके तो शीर्षक बदल दें.आपके विचारों से सहमति है.

     

  6. masijeevi
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/02/blog-post_18.html?showComment=1203329820000#c2229870670992514786'> 18 फ़रवरी 2008 को 3:47 pm

    इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

     

  7. masijeevi
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/02/blog-post_18.html?showComment=1203330240000#c8696666222098797926'> 18 फ़रवरी 2008 को 3:54 pm

    सही ही तो है विनीत, बेचारे मध्‍यकाल के लेखकों के पास तो ब्लॉग- स्‍लॉग भी नहीं था कि दिन भर में चाहे तो 50 पोस्ट ठेल दो। अब जब तुम ब्‍लॉग दौर में ही पोस्‍ट भर के लिए 'उभरी छातियों' के इस्तेमाल से नहीं बच पाए तो उन्हें क्‍या दोष देना..क्‍यों ?

     

  8. Sanjeet Tripathi
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/02/blog-post_18.html?showComment=1203330300000#c4352757329858689529'> 18 फ़रवरी 2008 को 3:55 pm

    बात पते की, सवाल सटीक!!
    पर शीर्षक मुझे भी पसंद नही आया!!

     

  9. प्रशांत तिवारी
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/02/blog-post_18.html?showComment=1203332460000#c8660976098450398166'> 18 फ़रवरी 2008 को 4:31 pm

    भाई आपके विचार से तो हम सहमत है .लेकिन शीर्षक आपको बदलना चाहिए .

     

  10. विनीत कुमार
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/02/blog-post_18.html?showComment=1203337020000#c3527129073990772562'> 18 फ़रवरी 2008 को 5:47 pm

    aap sabki tippani padkar yahi laga ki shirkshak badal deni chaahiyae, takleef hui ho to maaf karange.

     

  11. काकेश
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/02/blog-post_18.html?showComment=1203337740000#c1292180749385317772'> 18 फ़रवरी 2008 को 5:59 pm

    धन्यवाद.

     

  12. Amar
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/02/blog-post_18.html?showComment=1203338280000#c8261425535755302785'> 18 फ़रवरी 2008 को 6:08 pm

    Sounds good,Motive Good..,but need to change the title,,,as per me.....

     

  13. रचना
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/02/blog-post_18.html?showComment=1203342060000#c6771671402962995053'> 18 फ़रवरी 2008 को 7:11 pm

    kanya ka safar aurat tak bina yuvtii banae kuch adhura saa lagtaa hae ??

    ek heading maeri soch kii aap kii post ko
    heading badle kae liyae dhynavaad
    tak emy word pl repost this post again so that more people can read a sensibly written arugument

     

  14. Mired Mirage
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/02/blog-post_18.html?showComment=1203364260000#c8625622033793905562'> 19 फ़रवरी 2008 को 1:21 am

    बहुत विचारोत्तेजक पोस्ट ! देखिये पोस्ट का नाम बदला तो हम चले आए, नहीं तो देखकर चले जा गए थे पहले ।
    घुघूती बासूती

     

  15. anuradha srivastav
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/02/blog-post_18.html?showComment=1203409320000#c5122911567718948222'> 19 फ़रवरी 2008 को 1:52 pm

    मुद्दा सही उठाया है।

     

  16. मुन्ना पांडेय
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/02/blog-post_18.html?showComment=1203412260000#c1982038954779008605'> 19 फ़रवरी 2008 को 2:41 pm

    acchi baat uthai aapne magar jitni gambhir ye baat hai shirshak ushe chota kar raha hai .ish vishay ke layk shirshak de phir \ye bahas aapne shuru kar hi di hai..

     

  17. gautam yadav
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/02/blog-post_18.html?showComment=1203686520000#c8147683060442358221'> 22 फ़रवरी 2008 को 6:52 pm

    are sahab aapne to dimag me hal chla diya.
    is bat par to kabhi dhyan hi nahi diya tha.

     

  18. हर्षवर्धन
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/02/blog-post_18.html?showComment=1203741960000#c1681725425538933701'> 23 फ़रवरी 2008 को 10:16 am

    इस मारके की बात पर तो कभी ध्यान ही नहीं गया। सही सवाल उठाया है।

     

  19. uma shankar choudhary
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/02/blog-post_18.html?showComment=1203918960000#c2185285943865192767'> 25 फ़रवरी 2008 को 11:26 am

    vineet tumne baat pate ki kahi is par to bahut logon ne dhyan hi nahi diya hai.yah hamara fudal samaj hai jo ladkion ke bachpan ko glorify nahi kar paata hai.

     

  20. dilip uttam
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/02/blog-post_18.html?showComment=1205392860000#c5111406115098693257'> 13 मार्च 2008 को 12:51 pm

    hiiiiiiiiiiiiiiiiiiiii my aim worldpeace is a my life my dream&concentration as a breath to me.it is not a side of money/selfbenifit.i want do socialwork with honesty;not a only working for it but more harderwork.my book A NAI YUG KI GEETA..is completed.This is in hindi languages .nowadays im suffering many problems like.1.publishers says that u have no enough degree&b.tech students is not a enough for it.&who know you in your country/world so they advice me firstly you concentrate for degree because of at this stage nobody read your book but they also said that your book is good. 2.publishers wants to data for publishing the book.means from where points did you write your book but i have no data because of my book is based on my research.book chapter name is. 1.MAHILA AAJ BHI ABLA HAI KYO . 2. AIM PROJECT {AAP APNA AIM KA % NIKAL SAKTE HO }. 3. MY PHILOSPHEY 4.MERA AIM VISHVSHANTI. 5.POETRY. 6.NAYE YUG KI GITA VASTAV MAY KYA HAI. 7. WORLD {SAMAJ} KI BURAIYA. 8. VISHV RAJ-NITE. ALL THESE CHAPTER COVERD BY ME. 3.max. people told me that firstly u shudro than worry others. they told me now a days all lives for own .why u take tansen for world . i cant understands thease philoshpy. according to my philoshpy in human been charcter; huminity; honesty; worlrpeace &do good work. i have two problem 1. DEGREE. 2. LACK OF MONEY because my parents told me your aim is not any aim &u tents to many difficulties. PLEASE ADVICE ME. IF U CAN GIVE ME YOUR POSYAL ADDRESS &PHONE NO. THAT WILL BE GOOD . THANKS. " JAI HINDAM JAI VISHVATTAM " THANKS.

    my e-mail id worldpeace9990006381@gmail.com

     

  21. upasana
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/02/blog-post_18.html?showComment=1222444320000#c1370033430819311179'> 26 सितंबर 2008 को 9:22 pm

    betiyon ke blog me betiyon ke baare me bhut kuch jaanne ko milta hai.lekin adhiktar baaten chhoti betiyon ke kirya-kalapon ke baare me likha hota hai,lekin aaj me aap sabon se un badi betiyon ke baare me puchhna chahti hun ki aaj ke zamane me apne pairon par khare hone ke baad unki zimmewariyon ke baare me aapki kiya rai hai,kyonki aaj zamana badal raha hai aur log apne mata-pita ko bhul rahe hai.kirpaya is baat par apne vichar prakat karen.

     

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