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कौन बनेगा करोड़पति की ओपनिंग यानी पहले ही शो में मनहूसियत-सी छा गयी। शो शुरु होते ही हम उत्साह के बजाय बहुत ही डार्क शॉरो में डूबते गए। स्टार प्लस को लांघकर केबीसी जिस सोनी इंटरटेन्मेंट पर पहुंचा है,उसमें कुछ अलग और बेहतर करने की तड़प तो साफ तौर पर दिखाई दिया। लेकिन हर अलग चीज ऑडिएंस को रास ही आए,इसकी गारंटी तो नहीं ही ली-दी जा सकती। लिहाजा,कौन बनेगा करोड़पति जितनी ग्रैबिटी के साथ और आम ऑडिएंस को जोड़नेवाला शो रहा है,बिना किसी अतिरिक्त ताम-झाम के भी अपने से बांधे रखनेवाला है,अबकी बार उसका कबाड़ा होते हमने देखा। अगले दस मिनट में ही मन उचट गया। पूरे एपीसोड को हमने बस इसलिए देखा कि जो कुछ बदलाव हुए हैं,उसे समझ भर लें। नहीं तो ये रेगुलर देखनेवाला शो तो नहीं बन पाएगा। इसके लिए अब रात नौ बजे तो सड़कें सूनी होने से रही। अमिताभ बच्चन ने इसे नौ हफ्ते तक चलने की बात कही है। ये नौ हफ्ते भी अपनी रोचकता के साथ,ऑडिएंस के बीच अपनी पकड़ बनाए रखेगा,इसमें मुझ शक है।शो में खेल शुरु होने से पहले अमिताभ बच्चन की बचपन से लेकर अब तक के सफर को दिखाया गया। जन्मदिन के मौक पर सुबह से ही हम वो सबकुछ देखते आए,इसलिए उसका हम पर खास असर होने के बजाय रिपीटेशन ही लगा।

कविताओं का वो मनहूस दौर

उसके बाद शो अमिताभ बच्चन के अपने बाबूजी यानी मधुशाला और हालावाद के कवि हरिवंश राय बच्चन की कविताओं के पाठ को लेकर आगे बढ़ता है। हिन्दी के कुछ मठाधीशों और फरमानी आलोचकों ने तमाम लोकप्रियता के वाबजूद हरिवंश राय बच्चन और उनकी कविताओं को जिस तरह से साहित्य की दुनिया से बेदखल किया, पिछले कुछ सालों से अमिताभ बाबूजी की उन्हीं कविताओं का लगातार पाठ करते आए हैं। शुरुआती दौर में तो ये उनके जीवन,कविता औऱ बाबूजी के प्रति संवेदना का हिस्सा रहा जिसे कि लोगों ने बहुत सराहा। पिछले दिनों जब उन्होंने,एश्वर्य राय बच्चन और अभिषेक बच्चन ने उनकी कविताओं का पाठ किया तो मुंबई में समा बंध गया। स्टार न्यूज ने इसे लगातार दिखाया और हमें एक न्यूज चैनल पर पहली बार कविता पाठ का आनंद मिला। टीआरपी चार्ट पलटकर देखें तो अंदाजा है कि उस शो को ठीक-ठाक टीआरपी मिली होगी। सोनी की क्रिएटिव टीम ने ओपनिंग शो के साथ कविता पाठ कराकर इसे इन्कैश कराने की कोशिश तो जरुर की लेकिन ये स्वाभाविक लगने के बजाय बहुत ही फूहड़ और उचाटने वाला साबित हुआ। अमिताभ की तरफ से कोशिशें जबरदस्त रही लेकिन कविताओं के पीछे जो बैग्ग्राउंड म्यूजिक चलते रहे- एक तो वो बहुत ही मातमी और दूसरा कि कविता और पंक्तियों के बदलते जाने के वाबजूद भी वही की वही धुने। मानों कोई धुन न होकर सिग्नेचर ट्यून बज रही हो।लड़कियों का सफेद पोशाक में लहराना और भी भारी लगा। सारा माहौल वहीं से खराब शुरु होता है।

अमिताभ के डायलॉग ने छोड़ दिया उनका साथ

कविता पाठ के बाद अमिताभ के डायलॉग बोलने का काम शुरु होता है। अमिताभ ने पिछले तीस-चालीस साल में जिन फिल्मों के जरिए,जिन संवादों को गली-कूचे के बच्चे-लौंडो को किताबी पाठ की तरह दुहराने को मजबूर किया,उसे वो 2010 में आकर एक बार फिर से डिलीवर करते हैं। जैसे खुश तो बहुत होगे कि जिसने आज दिन तक....। अमिताभ बच्चन के लिहाज से सोचें तो ये एक जरुर ऐतिहासिक नजारा बनता है कि जिस इंसान ने अलग-अलग दौर में संघर्ष करते हुए अलग-अलग किस्म की फिल्में बनायी। उस दौरान उसकी मनोदशा एक फिल्म की दूसरी फिल्म से बहुत अलग रही होगी,आज 2010 में आकर जबकि वो पा फिल्म के लिए नेशनल फिल्म अवार्ड विनर है, पार्कर,रीड एंड टेलर,बिमानी सीमेंट,कैडवरी जैसे उत्पादों का ब्रांड एम्बेस्डर और एश्वर्य का श्वसुर और अभिषेक का बाप है,वो सब फिर से एक ही मनोदशा में दुहरा रहा है। लेकिन उस एहसास के इतिहास का एक हिस्साभर हो जाने के बाद जब वो डॉयलॉग अमिताभ बोल रहे होते हैं तो वो सारी की साफी लाइनें अमिताभ से जुदा होती चली जाती है,उन लाइनों को कभी अमिताभ ने ही डिलीवर किया था-हमें भरोसा नहीं होता। केबीसी की फीस भी उनमें बहुत खनक पैदा नहीं करने पाती।

खईके पान बनारसवालाः कुली और हेलेन का एक बेहूदा फ्यूजन

तीसरा नजारा होता है जब खइके पान बनारस वाला गाने की पॉप और देशी का फ्यूजन बनाया जाता है जिसकी कोरियोग्राफी में नया करने की कोशिश की जाती है। इस फ्यूजन को गाते हुए अमिताभ हमें एक घड़ी को बंटी-बबली में मैडम,आय एम योर एडम बोलनेवाले अंदाज में बिंदास जरुर नजर आते हैं लेकिन ये गाना औऱ कोरियोग्राफी भी पूरी तरह संभल नहीं पाती। पूरी टीम के साथ जो विजुअल्स हमारे सामने आते हैं,उसमें लगता है कि इतनी भारी संख्या में सपोर्टिव डांसर कुछ क्रिएटिव करने के बजाय भीड़ बन गए हैं जिसे कि हमारा टेलीविजन संभाल नहीं पा रहा है। देखते हुए बार-बार लग रहा था,कुछ लोग साइड हो जाओ यार। लड़कों के कपड़े कुली बने अमिताभ की याद दिलाते हैं और लड़कियां हेलेन की। हां जब पगे घुंघरु बांधे,मीरा नाचती है लाइन आती है और सारी हेलेननुमा लड़कियां दो-दो,तीन-तीन बित्ते की घुंघुरी पट्टियां बांधे पैरों को उठाती है तो हाथ में वीणा लिए भक्तिकाल की मीरा और गहरे तौर पर याद आती है।

मेरे अपने से ज्यादा रीड एंड टेलर के लगे अमिताभ

इस पूरे कर्मकांड में अमिताभ के करीब छ सूट और पोशाक बदल जाते हैं। पगे घुघरुं बांधते में सफेद रंग डांस के खत्म होते-होते डार्क मैगनेटिक ब्लैक में तब्दील हो जाता है और वो पुराने अमिताभ बच्चन की शक्ल में हमारे सामने होते हैं। कल दि हिन्दू के दूसरे पन्ने पर केबीसी के लिए खासतौर पर अमिताभ बच्चन के जितने ड्रेस डिजाइन किए हैं रवि बजाज,उनकी बातें डीटेल में छापी गयी है। उनके मुताबिक अमिताभ ज्यादातर डार्क शेड की सूट में होंगे। वैसे भी कैडवरी को छोड़ दें तो रीड एंड टेलर में लगातार उन्हें इस शक्ल में देखने के हम पहले से अभ्यस्त हैं।

आवाज में खनक बरकरार है

अमिताभ की आवाज में पहले की तरह खनक बरकरार है। अपने पुराने अंदाज को उन्होंने बखूबी संभालकर रखा है। लेकिन खेल में कुछ बदलावों,नए शब्दों मसलन घड़ी की बदली आवाज और घड़ी के लिए घड़ियालजी, ऑप्शन में दो डुबकी और लाइफ लाइन के तौर पर अपने गांव-मोहल्ले के लोगों को फोन लगाने के बजाय सीधे स्टूडियो में ही एक्सपर्ट होने जैसी बातों के वाबजूद बुनियादी तौर पर हमें इसमें कुछ नया नहीं लगा। रकम पांच करोड़ भी अंत में जाकर ध्यान खींच पाती है। कैडवरी के प्रेशर में अमिताभ की पहलीवाली लाइन- तो आइए हम और आप शुरु करते हैं कौन बनेगा करोड़पति अब शुभारंभ हो जाता है। स्क्रीन पर कैडवरी और आइडिया के ब्रांड कलर हावी हैं। हमें जिन दो बातों से खुशी हुई वो पहली तो ये कि इसे इंडियाटाइम्स के बूते सीधे इंटरनेट के जरिए भी देखा जा सकता है औऱ दूसरा कि अगर किसी ने अमिताभ या इंडिया टाइम्स के ब्लॉग पर लिखा और वो रास आया तो उसे शो के दौरान पढ़ा जाएगा। दो नए उभरते माध्यमों की ताकत मेनस्ट्रीम मीडिया समझ रहा है,हमारे लिए ये खुशी की बात है। केबीसी का लोगो अंग्रेजी के रुपीज की जगह हिन्दी का रुपया हो गया,अच्छा लगा देखकर।

टेलीविजन से अब भी लोगों को हैं उम्मीदें

कल तो हमने दो ही प्रतिभागियों को देखा। शो में कुछ नया नहीं होने के वाबजूद और अगले दिन फिर देखेंगे जैसी टेम्पटेशन पैदा न होने के वाबजूद भी ये शो एक बार फिर गांव और दूरदराज के लोगों के चेहरे को टेलीविजन स्क्रीन पर जगह देता है जो कि इसका सबसे बड़ा उजला पक्ष है। नहीं तो दूरदराज और गांव के लोग न्यूज चैनलों पर या तो अपराध करते नजर आते हैं या फिर नाव बह जाने,बेटी के वहशी के हाथों पड़ जाने या बेटे के बेमौत मर जाने पर विलाप करते हुए। राजेश चौहान ने बताया कि वो पिछले दस सालों से इसकी तैयारी कर रहे थे। मास कॉम के स्टूडेंट आलोक कुमार ने कहा कि जब वो इसमें आना चाहते थे तो उनकी उम्र 18 साल नहीं हुई थी। इससे आप अंदाजा लगा सकते हैं कि अभी भी इंतजार करती हुई एक पीढ़ी मौजूद है जो कि केबीसी जैसे टेलीविजन कार्यक्रमों के बूते अपनी किस्मत को बदलने की उम्मीद रखते हैं। इनकी संख्या 60 लाख है। टेलीविजन के रियलिटी शो इसी उम्मीद से अपना खाद-पानी खींचते हैं। बहरहाल ऑडिएंस का मनोरंजन के स्तर पर ये शो हमें निराश करता है। अमिताभ बच्चन में रिपिटेशन वैल्यू खत्म हुआ है लेकिन जिन्हें उम्मीद हैं,उन उम्मीदों के दम पर सोनी कुछ अच्छा कर जाए।..और क्या कह सकते हैं।

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6 Response to 'गया वो जमाना, केबीसी के लिए अब सड़के सूनी नहीं होगी'
  1. manish joshi
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/10/blog-post_713.html?showComment=1286867922879#c4257886600277703969'> 12 अक्तूबर 2010 को 12:48 pm

    आपने जो कुछ लिखा है आपकी व्‍यक्तिगत राय दिखाई दे रही है। अमिताभ की नई फिल्‍मो में उनके अभिनय में जो दुहराव आ रहा था वो यहां नहीं दिखा। पहले एपिसोड करंट था। दर्शको को बांधे रखने में सफल रहा। अधिकांश घरो में 11 अक्‍टुबर को रात 9 बजे केबीसी ही देखा गया। शो में ताजगी लगी । शो अन्‍य रियाल्‍टी शोज से आगे निकलता नजर आया। आगाज को अच्‍छा ही कहा जायेगा।

     

  2. amitesh
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/10/blog-post_713.html?showComment=1286876047879#c3599558858800119511'> 12 अक्तूबर 2010 को 3:04 pm

    एक ही एपिसोड देख कर निर्णय देना, समीक्षकों की पुरानी आदत है. एक आध और देख लीजिए तब ये फतवा दीजियेगा.

     

  3. डॉ महेश सिन्हा
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/10/blog-post_713.html?showComment=1286878008743#c5687589769773622446'> 12 अक्तूबर 2010 को 3:36 pm

    पसंद अपनी अपनी । मैंने थोड़े देर से देखा जब प्रतियोगिता प्रारम्भ हुई । मुझे तो अच्छा लगा । यस शो स्टार में आए या सोनी में, इससे फर्क क्या पड़ता है !! ?

     

  4. सागर
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/10/blog-post_713.html?showComment=1286888727598#c8357855075173931762'> 12 अक्तूबर 2010 को 6:35 pm

    समझ नहीं आ रहा कहाँ से शुरुआत करूँ... चलिए कोशिश करते हैं

    पहले तो आपकी तेज़ निगाहों की तारीफ करूँगा... जो कम समय में ही कई चीज़ देख लेती हैं... अमूमन आपने सबकुछ गौर से देख ही लिया...

    दूसरा, आपके बेबाक बयानी से काफी प्रभावित हूँ, इसे बचाए रखियेगा... बातें दुनिया में चाहे जितनी मीठी हो जाये... ब्लॉग तो और भी विनम्र जगत है ऐसे में आपका तेवर काफी विद्रोही है और इससे निकलती है अपनी शैली जो की ब्लॉग कम उँगलियों पर गिनी जा सकने वाली है...

    अच्छा लगा, अमिताभ ने आपको डिगा नही पाया...

    तीसरा, उभरते माध्यमों की ताकत मेनस्ट्रीम मीडिया समझ रहा है,हमारे लिए ये खुशी की बात है। केबीसी का लोगो अंग्रेजी के रुपीज की जगह हिन्दी का रुपया हो गया,अच्छा लगा देखकर। --- इसके लिए धन्यवाद.


    अमिताभ के आंसू आज भी भावुक करते हैं... बांकी आपकी सारी बातों से मैं सहमत हूँ.

    यह दोहराता हूँ. आपके बेबाक बयानी से काफी प्रभावित हूँ, इसे बचाए/बनाये रखियेगा...

     

  5. काजल कुमार Kajal Kumar
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/10/blog-post_713.html?showComment=1287010715021#c1334871563382622245'> 14 अक्तूबर 2010 को 4:28 am

    काठ की हांडी है..

     

  6. अनूप शुक्ल
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/10/blog-post_713.html?showComment=1287306423850#c1995531365485891766'> 17 अक्तूबर 2010 को 2:37 pm

    के बी सी देखा नहीं अभी लेख लेख शानदार है।

     

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