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देखिए,बहस या सेमिनार का मुद्दा चाहे जो भी हो,वो किसी भी रुप में अकारथ नहीं जाता। ये सवाल अक्सर किसी के भी मन में आया करते हैं कि इन सेमिनारों और चर्चाओं से भला होता क्या है, जो जहां पत्थर तोड़ रही होती है,जो जहां कूड़े बीन रहा होता है,वो सालों से बीनता-तोड़ता चला आता है..तो फिर क्यों करते हो उनके नाम पर चर्चा या सेमिनार? यही सवाल यहां भी उठते हैं कि जब कोई आचार संहिता मानने को तैयार ही नहीं है,आचार संहिता जैसी बात पर सहमत ही नहीं है तो फिर क्यों करा रहे हैं इस पर विमर्श?
इस मामले में मेरी अपनी राय है-
इस तरह के मुद्दे पर विमर्श करने से न तो लिखने के चलन में कोई फर्क आनेवाला है और न ही इस संहिता को ध्यान में रखकर लिखना शुरु करेंगे। लिखेंगे वही जो महसूस करेंगे और जो महसूस करेंगे वो संहिता के सींकचे में ही हो,उनकी सहमति की मोहताज हो,जरुरी नहीं।..तब तो फिर हो गया वर्चुअल स्पेस पर लेखन भला।
तो फिर...

जैसा पहले भी कहा कि कोई भी सेमिनार न तो अकारथ जाती है और न इस नीयत से कराए जाते हैं। इस तरह के मुद्दे पर भी कराने से ऐसा ही होगा। कुछ लोग पंडितई की पांत में आगे बढ़ जाएंगे। कल को वो संहिता बनानेवाली कमेटी में घुस-घुसा दिए जाएंगे। उसके विशेषज्ञ करार दिए जाएंगे..कई और सभाओं में अपनी शक्ल चमकाएंगे और इस तरह अभी महज जो गैरजरुरी मुद्दा है वो कल को एक सांस्थानिक शक्ल के तौर पर हमारे सामने होगें। पेड न्यूज,आदिवासी अस्तिमता विमर्श,दलित औऱ स्त्री-विमर्श करने में माहिर लोग इसे बेहतर समझ सकते हैं।

संहिता के होने या न होने का संबंध सीधे वर्चुअल स्पेस पर लिखनेवाले लोगों से है। ये कोई एक राज्यकीय स्पेस नहीं है कि कोई खाप पंचायती करने बैठ जाए। ये खुली दुनिया है। ये अलग बात है कि हम तीस-चालीस ब्लॉगरों को शक्ल,नाम और पता ठिकाने को जान लेते हैं तो बस इसे ही दुनिया मान लेते हैं। अगर कन्सेप्चुअली वर्चुअल स्पेस को समझने की कोशिश करें तो आचार संहिता पूरी तरह वर्चुअल स्पेस की अवधारणा के खिलाफ बात करनेवाला मुद्दा है।

व्यावहारिक तौर पर देखें तो आपको कुछ ब्लॉगरों को नाम-पता सब ठीक-ठीक मालूम है तो आप लाद दें उन पर आचार संहिता और बाकियों के साथ आप क्या करेंगे? या फिर देर रात उस लेखक की नीयत बिगड़ जाए और बेनामी होकर कुछ लिख जाए तो आप क्या कर लेंगे? आप तकनीकी रुप से उसे आइडेंटिफाय भी कर लें तो फिर उससे ये कहां साबित हो सकेगा कि उसने ऐसा किस मनःस्थिति में रहकर किया? आप किसी की मनोदशा,उसकी चलन पर आचार संहिता लागू नहीं कर सकते। ये जब नागरिक संहिता के तहत जीनेवाले इंसान के बीच संभव नहीं हो पाता है तो आप मन की बारीकियों पर कैसे लागू कर सकेंगे?

ये एक ग्लोबल माध्यम हैं,जिसमें आए दिन रगड़े होंगे और ये रगड़े जरुरी नहीं कि बलिया, बक्सर, बनारस, दिल्ली का ही लेखक करे और जिसका निपटारा वर्धा,इलाहाबाद में किया जाए? ये अमेरिका की समस्या पर मुनिरका( दिल्ली में एक स्टूडेंट प्रो इलाका)में बैठकर ताल ठोंकने का काम होगा। इसलिए मेरी अपनी समझ है कि ये मुद्दा वर्चुअल स्पेस की पूरी अवधारणा को बहुत ही सीमित और फ्रैक्चरड तरीके से देखने की कोशिश करता है। मुझे तो यहा तक लगता है कि जो कोई भी बेबाक तरीके से ब्लॉगिंग करता आया है,उसके दिमाग में इस मुद्दे का आना ही उसके लिखने पर प्रश्नचिन्ह लगा देता है।..

मेरी बात पढ़कर आप कहेंगे कि मैं तब लिखने के नाम पर फुलटाइम,फुलटू,फुलस्पीड में आवारगी की डिमांड कर रहा हूं। नहीं,ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। कोई भी लेखक जब इस स्पेस पर लिखता है तो लिखने के साथ उसकी किसी न किसी रुप में प्रतिबद्धता होती है। बल्कि लिखना अपने आप में एक प्रतिबद्धता का काम है,खास तरीके की कमिटमेंट है। ये संहिता से कहीं आगे और बड़ी चीज है। संभव है कि ये प्रतिबद्धता हर किसी के लिखने में अलग-अलग तरीके और साइज के हो। कोई लिखकर किसी एक या दो शख्स की कनपटी गरम करना चाह रहा हो तो कोई अपने लेखन से पूरी सिस्टम को हिलाकर रख देने की मंशा रखता हो। ऐसे में मुझे लगता है कि हमें उसकी उस प्रतिबद्धता को लेकर बात करनी चाहिए,संहिता की नहीं।

संहिता वाली बात संभव है जिस किसी के दिमाग में उपजी है,संभव है कि वो कुछ अश्लील और गालियों के इस्तेमाल किए जानेवाले शब्द को लेकर भी पनपी हो। लेकिन आप इन गालियों को प्रोत्साहित न करते हुए भी इसके समाजशास्त्र और लिखनेवाले के एग्रेशन लेबल तक ले जाकर सोचेंगे तो पूरे विमर्श का आधार ही बदल जाएगा। संहिता की बात करना दरअसल ब्लॉगिंग के भीतर की बनती संभावित कॉम्प्लीकेटेड बहस को सतही तौर पर जेनरलाइज और सतही कर देना होगा।

हां इस पूरी बहस में एक चीज का जरुर पक्षधर हूं और वो भी किसी नियम के तहत नहीं,एक अपील भर कि लिखने के साथ-साथ अगर अकांउटबिलिटी आ जाए तो कुछ स्थिति और बेहतर हो सकती है। क्योंकि अनामी होकर हर कोई बहुत गहरी और व्यापक सरोकार की बात करेगा,जरुरी नहीं। अगर न भी अकांउटेबल होते हैं तो फिर बहुत दिक्कत नहीं है। हां बस अगर वो बम धमाके की तरह आतंकवादी संगठन जैसे जिम्मेदारी अपने-आप ले लेते हैं तो इससे व्यक्तिगत स्तर पर ब्लॉगरों की ताकत में जरुर इजाफा होगा और टेलीविजन के अतिरिक्त "वर्चुअल स्पेस पर स्टिंग ऑपरेशन" होते रहने का भय बना रहेगा।.

सिद्धार्थजी का मैं शुक्रिया अदा करने के साथ माफी मांगता हूं कि आ न सका। हम लाख तार्किक बातों के बीच रहते,करते हुए भी कुछ मामलों में अपने फैसले इमोशन के आधार पर ही लेते रहते हैं। मैं यूपीएससी पास करनेवाले उन लौंड़ों में से नहीं हूं जो कि इमोशन को अपने व्यक्तित्व की खोट मानते हैं। मैं इसे अपनी पूंजी के तौर पर लेता हूं और बची रहे,इसकी लगातार कोशिश रहती है। दिल्ली से यशवंत गए हैं,हम यहां बैठे-बैठे उम्मीद और भरोसा करते हैं कि वो अपनी बात में मेरा भी तेवर शामिल करेंगे। बाकी ब्लॉगर गुर्गे तो अपनी बात कह ही रहे हैं। उम्मीद करता हूं कि उनके मुंह से भी हमारी ही जुबान निकलेगी।

आप जितना महसूस करें,जैसा अनुभव रहे,उसके एक-एक रेशे को भाषिक रुप दें,इसी उम्मीद के साथ
आप सबका,
विनीत
( ये पीस दरअसल कमेंट के तौर पर चिठ्ठाचर्चा के बक्से में जाकर लिखा। लेकिन सेंटियाकर लंबा लिखता चला गया तो पोस्ट करने से मना कर दिया। लिहाजा बना हुआ भोजन और लिखा हुआ माल बेकार न चली जाए,पोस्ट की शक्ल में आपके सामने धर दिया )
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5 Response to 'शुक्र है, वर्धा में खाप पंचायती ब्लॉगर नहीं जुटे हैं'
  1. मनोज कुमार
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/10/blog-post_09.html?showComment=1286645868383#c8207767755975940379'> 9 अक्तूबर 2010 को 11:07 pm

    हम अपने लिए तो बना सकते हैं, कि हम इस तरह के ब्लोग पर नहीं जाएं, या हमे ये ये करना चाहिए, ये नहीं।
    जैसे अपनी आइडेंटिटी डिस्क्लोज़ करना, चित्र, नाम, फो.नं. आदि

    बहुत अच्छी प्रस्तुति।
    या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता।
    नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।
    नवरात्र के पावन अवसर पर आपको और आपके परिवार के सभी सदस्यों को हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई!

    फ़ुरसत में …बूट पॉलिश!, करते देखिए, “मनोज” पर, मनोज कुमार को!

     

  2. Kewal Ram
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/10/blog-post_09.html?showComment=1286677943925#c5007451650687727493'> 10 अक्तूबर 2010 को 8:02 am

    Veenet ji
    Blog ke bare main likha gaya yeh lekh kei maynon se gambhir tatha nispakshta ka parichye deta hai
    Sunder post

     

  3. PD
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/10/blog-post_09.html?showComment=1286736251135#c2576843977116277990'> 11 अक्तूबर 2010 को 12:14 am

    कोई कुछ भी कह ले.. कितने भी सेमिनार करा ले.. मगर मैं शर्त लगा सकता हूँ कि आचार संहिता कभी लागू नहीं होगी.. अगर कर सकते हैं तो जितने भी "मस्तराम" ब्लॉग कि शक्लें ले अंतरजाल पर है उस पर लगा कर दिखाएँ!! :)

     

  4. सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/10/blog-post_09.html?showComment=1286761070940#c8764556023017523135'> 11 अक्तूबर 2010 को 7:07 am

    इस आयोजन पर आपने अपनी लेखनी चलाई और अपने विचार सुव्यवस्थित तरीके से प्रस्तुत किया तो हम यहाँ आपकी उपस्थित दर्ज कर लेते हैं। बहुत-बहुत धन्यवाद।

    इस संगोष्ठी का भी निष्कर्ष कमोबेश यही रहा है कि कोई बाहरी एजेन्सी ब्लॉगर के ऊपर आचार-संहिता थोप नहीं सकती और न ही यह वांछित है। यहाँ लिखने वाले को अपने नियम खुद बनाने होंगे और खुद ही उनका पालन करना होगा।

    पवन दुग्गल ने साइबर कानून की कुछ मौलिक बातें बताकर इस माध्यम पर सम्भावित अंकुश के बारे में बताया। लेकिन उससे यह आश्वस्ति ही उपजी कि प्रिन्ट माध्यम की तुलना में नेट पर अधिक स्वतंत्रता है।

     

  5. उस्ताद जी
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/10/blog-post_09.html?showComment=1286777386246#c5386497968049780302'> 11 अक्तूबर 2010 को 11:39 am

    5/10

    बढ़िया

     

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