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अगर कन्‍या चलते समय मिट्टी को ऊपर की ओर उडाती है तो पिता, पति अथवा माता के परिवार को कष्‍ट देने वाली होती है। लीजिए भाई साहब एक बात और साबित हो गई कि धूल उड़ाकर मस्ती में चलने का अधिकार सिर्फ हम पुरुषों को ही है। दिनभर तरोताजा और हेकड़ी भरने के लिए एक ठोस वजह। तब तो स्त्रियों के लिए, हम दीवानों की क्या हस्ती, हैं आज यहां कल वहां चले, मस्ती का आलम साथ चला, हम धूल उड़ाते जहां चले का कोई मतलब ही नहीं है और न ही इसमें इसकी कोई हिस्सेदारी है। अभी देखते जाइए न जितने मानक इस समाज और उससे उपजे ज्ञान ने तैयार किए हैं उसमें कितना बड़ा हिस्सा हम पुरुषों का है।
आज सुबह-सुबह सुजाता ने एक लिंक ठेला और कहा पढ़ो। आमतौर लोग अपनी लिंक ठेलते हैं लेकिन ज्ञान बढ़ाने या फिर जानकारी को आपस में शेयर करने के लिए कुछ और भी भेजते हैं जो कि ब्लॉग की दुनिया के लिए बेहतर चीज है। लिंक हैं-http://allastrology.blogspot.com/2008/02/blog-post_27.html जिसमें सिद्धार्थ जोशी ने बताया है कि ज्योतिष के हिसाब से कौन-सी लड़की सुंदर होती है। जाहिर है जो सिर्फ देखने में सुंदर है वो नहीं बल्कि जो ज्योतिष के पैमाने पर खरी उतरती है वो लड़की। जिन्हें शादी करनी हो और लड़की के साथ रहते हुए भी अमन-चैन की जिंदगी बितानी हो उनके लिए काम की चीज हो सकती है। क्योंकि मजाक में ही सही और वैसे तो निश्चित तौर पर लड़कियों के साथ जिंदगी बिताना परेशानी का सबब बताया जाता रहा है। खासतौर से ये उनके काम की है जो परिवार की मर्जी से शादी करना चाहते हैं जिन्हें परिवार संस्था पर भरोसा है और जिन्हें लगता है गांव का पंडित उससे और उसके मां-बाप से ज्यादा बेहतर लड़की खोज सकता है।
आज न हो गया शादी डॉट कॉम और मेटरोमोनियल। नहीं तो ये काम पंडितों के जिम्मे था कि किस लड़के को किसके साथ फिट करना है। अभी भी किसी लड़के या लड़की की शादी होनी होती है तो वो पंडित से सम्पर्क करता है। इसकी एक वजह तो है कि वो जहां-तहां विजिट करते रहते हैं और उन्हें आइडिया होता है कि कौन कुंवारा या फिर कुंवारी है। लेकिन उससे भी बड़ी वजह जो मुझे समझ में आती है वो यह कि- लड़की पढ़ी-लिखी है कि नहीं, खाना बनाना जानती है कि नहीं दाल-भात से लेकर कॉन्टिनेंटल और चाइनिज तक, सिलाई-कढ़ाई आती है कि नहीं, पर पुरुषों से कहीं संबंध तो नहीं, कंगले घर की तो नहीं है, माल-पानी तो मिलेगा न...आदि-आदि बातें तो कोई भी पता कर लेगा कोई बड़ी बात नहीं है लेकिन असल चीज तो सिर्फ पंडितजी ही बता सकते हैं वो यह कि- जब लड़की आएगी तो हमारे घर में बरकत तो होगी, पैसा और प्रोमोशन तो बढ़ेगा न। घर की दशा कैसी रहेगी, ये सारी बातें पंडितजी को छोड़कर भला और कौन बता सकता है।
इन पंडितों और इनके ज्योतिष के हिसाब से लड़कियों का भले ही अपना कोई भाग्य नहीं होता, पति के चरणों में बैठकर जो कुछ मिल जाए वो सब प्रसाद है लेकिन इसी पंडित के हिसाब से पुरुषों का भाग्य वामा यानि पत्नी यानि लड़की यानि चरणों की दासी के आने पर तय होती है। कई बार तो मैंने खुद देखा है कि लड़का मारा-मारा फिर रहा है, पंडित से जब उसकी कुंडली दिखाई गई तो बताया कि इसका स्त्री योग के बाद भाग्य उदय है। और आनन-फानन में शादी तय कर दी जाती है। भइया एक बेरोजगार लड़के को भी अगर पांच लाख कैश मिल जाए तो भाग्य तो चमकेगा ही।
लेकिन पंडित लड़की की सुंदरता और योग्य वधू की परिभाषा देता है उसमें ये सारी बातें शामिल नहीं है। उसमें तो शामिल है कि- मुस्‍कुराने पर मसूडे दिखाई दें तो स्‍त्री भाग्‍यहीन होती है। यानि जिस बंदे को अरेंज मैरज करनी हो जो कि दुर्भाग्य से अभी भी आदर्श स्थिति माना जाता है उसे झटके में शादी नहीं करनी चाहिए। पंडितजी की मदद से लड़की के एक-एक अंग की जानकारी लेनी चाहिए कि वो हर तरह से उसके मान-सम्मान को बढ़ाएगी कि नहीं।
अच्छा, एरेंज मैरेज में जो दूसरी बात जरुरी है वो ये कि वो शादी के बाद कब जल्द-से-जल्द खुशखबरी सुनाएगी। अगर देर होती है तो वो बुजुर्गों के हिसाब से कुलनाशिनी है। जब बच्चा ही नहीं तो फिर शादी किस बात की। लड़की बच्चे को जन्म देगी या नहीं इसे कैसे पता करें। ज्योतिष के हिसाब से-किसी स्‍त्री की एडी गोल, गदराई हुई और सुंदर हो तो उसके गुप्‍तांग भी बिल्‍कुल सही काम करने वाले होते हैं।
आप जब लड़की को देखने लड़केवाले के साथ पंडित आते हैं तो देखिए- आगे चलाएंगे,पीछे, हाथ दिखाओ, आखें बंद करो, खोलो, एडी उठाओ, पैर सटाकर दिखाओ, दोनों हाथें बंद करो...पता नहीं क्या-क्या। शरीर के एक-एक हिस्से की नुमाइश। मेरी चचेरी बहन तो फफक-फफककर रोने लगी थी और हमें पकड़कर कहती-सारा पढ़ा-लिखा बेकार चला गया विनीत।...और शादी के नाम से नफरत है उसे। लड़की को बुरा लगे तो बला से। पंडित को तो अपनी एजेंटी करनी है न और लड़केवाले किसी नसपीटी को कैसे ले आएं, ठोक-बजाकर ही तो लाएंगे।
मतलब ये कि ज्योतिष जिस रुप में सुंदर लड़की की व्याख्या करता है वो किसी कवि चित्रकार और हमारी-आपकी स्केल से बिल्कुल जुदा है। क्योंकि यहां आकर उसे पुरुष का भी भाग्य संवारना है।
सिद्धार्थजी ने तो पूरी बात बता दी कि कैसी होनी चाहिए कुंवारी लड़की(ज्योतिष के हिसाब से) लेकिन ये नहीं बताया कि अगर लड़की में कोई खोट है, शरीरी स्तर पर तो कैसे दूर करे या फिर उसका विकल्प क्या है। क्योंकि जब सारी बातें देह पर ही टिकी है तो समाधान भी देह के स्तर पर ही हो जाए।....लेकिन नहीं फिर पंडितों का चोर दरवाजा बंद हो जाएगा न- जब पुरुष अपने लंपटई के कारण कंगाल हो जाए तो बताने में कैसे बनेगा कि- इसकी पत्नी हंसती है तो मसूडे दिखते हैं, भाग्यहीन है, इसलिए लड़के की मति मारी जा रही है।
( इस पोस्ट को मैंने सिद्धार्थ जोशीजी की पोस्ट स्‍त्री की सुंदरता : ज्‍योतिषीय दृष्टिकोण को पढ़ने के बाद लिखा है। मेरी उनसे कोई व्यक्तिगत असहमति नहीं है क्योंकि उन्होंने व्यक्तिगत स्तर पर कुछ लिखा ही नहीं है शायद ज्योतिष में इसकी गुंजाइश न हो। मैं तो बस इतना ही समझता हूं ये पोस्ट उनके काम की है जो अपने सारे परिणामों को स्त्री पर लादने में कुशल हैं और लड़की से शादी कर घर लाने और कार खरीदकर घर लाने में कोई अंतर नहीं समझते।....वैसे पढ़-लिखकर अपना भाग्य बनाने और धूल- धुआं उड़ाकर चलनेवाली लड़कियों के लिए कोरा गप्प, यू नो गॉशिप।
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ए लड़की- नानी नहीं, दादी बोल

Posted On 6:39 am by विनीत कुमार | 2 comments

कल किलकारी के यहां खाने पर गया था। वहां एक और बेटी मिल गई सारा। किलकारी यानि कारी से तीन महीने छोटी लेकिन समझदार। अब इंडियन फैमिली में जैसा होता आया है कि दो बच्चे मिलते ही उनकी मम्मियां अपने बच्चे के बारे में बताने लग जाती है कि मेरे बच्चे को क्या पसंद है क्या नहीं और वो कैसे हमें तबाह करते रहते हैं, कैसे परेशान करते है, ब्ला॥ब्ला।
किलकारी को अचार पसंद है, मैं कहूं तो नाश्ते और डिनर में अचार सिर्फ दे दो, टेंशन फ्री हो जाओ। सारा को सिर्फ सादा भात यानि चावल पसंद है बिना दाल के, कोई सब्जी भी नहीं।....
सारा किस्सा सारा और कारी के आसपास घूमता रहा। उसी क्रम में सारा के पापा ने बताया कि एक बार की बात है- सारा अपने घर के अंदर थी और सामने की पुलिया पर एक बूढ़ी औरत बैठी थी। सारा ने चिल्लाया- नानी। बुढिया ने मुंह बिचकाते हुए गुस्से में बोली- मैं कब से तुम्हारी नानी हो गई। पता नहीं सारा को क्या सूझा, उसने फिर चिल्लाया-दादी। और अबकि बार बुढिया उसके पास आई और सारा को पुचकारा।....
बुढिया अपने को नानी के रुप में देखना नहीं चाहती है, हां कोई दादी कह दे तो अच्छा लगता है। क्यों॥
ये बात मुझे एकदम से समझ में नहीं आयी कि बुढिया ने ऐसा क्यों किया। शायद इसलिए कि पोती होने पर वो उसके साथ ज्यादा समय तक रह पाएगी और बुढापे का सहारा बनेगी और नतिनी बनने पर नहीं।॥कुछ समझ ही नहीं पा रहा हूं और जबरदस्ती कोई लॉजिक भिड़ाकर स्त्री-विमर्श शुरु करना नहीं चाहता, आप ही कुछ बताएं, जरा....
वैसे मैं तो मां के साथ जब भी सब्जी लाने जाता और सब्जी बेचनेवाली को नानी कहता तो मां भड़क जाती। मैं पूछता,तुम भड़क क्यों जाती हो मां नानी बोलने पर तो मां का जबाब होता- मेरे मायके में कोई ऐसा फटेहाल नहीं है जिसको कि सब्जी बेचनी पड़ जाए,तुमको ज्यादा इज्जत देनी है तो दादी बोलो। तो क्या पापा के खानदान में कोई.....खैर अब तो सामने रिलांयस लाले बी सब्जी बेच रहे हैं और वो उससे टक्कर ले रही है इसलिए मैं धड़ल्ले से दादी बोलता हूं लेकिन यहां का चक्कर आप बताएं। क्या ऐसा इसी केस में हुआ है या फिर महिलाएं नानी से ज्यादा दादी कहलाना पसंद करतीं हैं।....
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मेरी बीमारी का इलाज शादी है ?

Posted On 5:26 am by विनीत कुमार | 19 comments

सारे शादीशुदा ब्लॉगरों लेडिज और जेन्ट्स दोनों से राय मांग रहा हूं, इमानदारी से बताइएगा। मुझे नहीं लगता कि आप भी मेरे साथ छल करेंगे जैसा कि मेरे घरवालों ने करना शुरु कर दिया है।
मैं अक्सर बीमार तो नहीं रहता लेकिन होता रहता हूं। चार दिनों के बाद बीमारी से उठा हूं। बीमारी भी कोई खास नहीं ज्यादातर इन्फेक्शनल डीजिजेज। एलर्जी वाली बीमारी, धूल से, असमय जागने और खाने से। दिल्ली में कोई अपना है भी नहीं कि जिसके यहां जाकर आराम से जाकर रहा जाए। क्योंकि इस मामले में मेरा मानना है कि आधी बीमारी तोघर के खाने से हो जाती है। ले देकर एक किलकारी का घर है जिसके यहां जाने से खाने और किलकारी के साथ खेलने का भी मौका मिल जाता है लेकिन वो भी तो दिनभर क्रैश में रहती है।
बीमारी में दिनभर पड़े-पड़े थक- हारकर घर ही फोन मिला लेता हूं। पहले तो मेरी आवाज बदली-बदली होने पर मां की चिंता बढ़ जाती है। डॉ से दस गुना ज्यादा सलाह और दुनिया भर की हाय-हाय। बस चले तो कभी भी ट्रेन पकड़कर दिल्ली आ जाए। एक ही लाइन की रट कि जरुर खाने-पीने में दिक्कत होती होगी।
भाभी से बात होती है तो मजे लेने लगती है कि इस उम्र में ऐसा ही होता है भाई साहब, कभी भूख नहीं लगती है तो कभी कमजोरी सताती है, कभी लगेगा खूब सोएं और कभी तो रात-रात भर नींद ही नहीं आती। और जब मैं बताता कि ऐसा ही होता तो कहने लगती-बस, समझ गए...क्या हो रहा है आपको।
पापा को हमेशा भय सताए रहता है, एक बार पूछ भी बैठे कि- दिल्ली में कोई लड़की ध्यान में है। अपने से करोगो या फिर हमलोगों की मर्जी से। मैं तो समझ ही नहीं पाया कि क्या बोल रहे हैं। दीदी ने भी कहना शुरु कर दिया है कि आज नहीं तो कल, करना तो पड़ेगा ही। घरवालों के हिसाब से मेरी बीमारी का एक ही इलाज है कि आज नहीं तो कल करना ही पड़ेगा कर लो। घर का खाना मिलेगा तो दुरुस्त रहोगे।
मेरे मामा और कजिन लोग यही बोलकर कि खाने-पीने में दिक्कत होती है, बोलकर कर ली लेकिन मामा को तो सर्दी-खांसी अब भी होती है और कजिन लोग को भी तो कभी पीठ में दर्द तो कभी एलर्जी।
मैं आपलोगों से सिर्फ ये ही जानना चाहता हूं कि मुझे जो अक्सर सर्दी, सिरदर्द, एलर्जी हो जाती है उसका क्या एकमात्र इलाज कर लेनी है, और कोई दूसरा कोई उपाय नहीं है और दूसरा ये कि क्या शादी कर लेने से मुझे कोई बीमारी नहीं होती। मजाक मत करिएगा, जबाब दीजिए, मैं तो सुन-सुनकर इरिटेट हो गया हूं कि॥कर लो आज नहीं तो कल तो करनी ही है।
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लड़कों के पास सेनेटरी नैपकिन

Posted On 3:32 am by विनीत कुमार | 6 comments

आप सोचेंगे, उस बंदे पर क्या बीतती है जब कोई लड़की उससे सेनेटरी नेपकिन उधार मांगती है, बस में वो हमेशा बच के चलता है कि कहीं उसकी इज्जत से कोई खिलवाड़ न कर बैठे। बार-बार शर्ट के उपरे हिस्से के बटन को चेक करता है कि कहीं खुली तो नहीं रह गई, टाई से आगे के पोर्शन को ढंकता है कि कहीं देख न ले कोई। बार-बार अपने को सिकोड़ने की कोशिश करता है। फ्रेश होने के लिए लेडिज टॉयलेट जाता है।
टीवी पर ये एड मैं पिछले तीन-चार दिनों से लगातार देख रहा हूं। सहारा का फिरंगी नाम से कोई नया प्रोमो शायद चैनल आ रहा है जिसमें दुनिया भर की ऐसी कहानियों को दिखाने का दावा है। एक लड़के की वो तमाम हरकतें लड़कियों जैसी है जिसे कि अब लड़कियां भी छोड़ने लगी है। उस बंदे से लड़की एक्सट्रा नेपकिन होने पर उधार लेने की बात करती है। पुरुषों के इस रुप को देखकर आपको गुस्सा आए तो आपकी बला से लेकिन जोर-शोर से इसका प्रचार जारी है।
इधर दूसरी तरफ उसी एड में लड़की खड़ी होकर जेन्ट्स टॉयलेट में.....करती है औऱ लोगों को अजूबा लगता है। आज इसका ऑनएयर होना है। चैनल क्या मैसेज देना चाहता है इतना तो मुझे भी नहीं पता लेकिन संकेत के रुप में जो मैंने समझा वो ये कि-
एक घड़ी के लिए आपको हंसी आ सकती है कि जो बात किसी लड़की में होनी चाहिए वो लड़के में दिखाया जा रहा है और जो बात लड़के में होनी चाहिए वो लड़की में दिखाया जा रहा है। शायद ऐसा इसलिए कि चैनल लड़की को थोड़ा मैसकुलिन टच देना चाह रहा हो और लड़के को थोड़ा शॉफ्ट, शर्मिला और इन्सिक्योर। पौरुष की गाथा गाने वाले लोगों, संस्थाओं, राजनीतिक पार्टियों या फिर संगठनों को ये बात नागावार गुजर सकती है लेकिन इसे मैं लोगों के एप्रोच में बदलाव और स्त्री-पुरुष को लेकर बायनरी थॉट की जो अवधारणा विकसित की गई है कि एक पुरुष स्त्री की जगह अपने को रखकर सोच ही नहीं सकता, इसे दरकने का संकेत मान रहा हूं।
पता नहीं क्यों, जब भी मैं जूते,कपड़े या फिर एसेशरीज खरीदने जाता हूं तो लड़को की शेल्फ से ज्यादा लड़कियों की शेल्फ, उनके रंग और डिजाइन की तरफ खींचता हूं। अक्सर सेल्समैन कहा करते, सर ये लेडिज शू है और मैं मन मारकर रह जाता। ऐसी डिजाइन हम लड़कों के लिए क्यों नहीं बनाते। मुझे शॉफ्ट और छोटी लुक की चीजें पसंद आती है। लेकिन इधर मैं करीब सालभर से देख रहा हूं कि लगभग सारे अच्छे शो रुम में यूनिसेक्स का फंडा आ गया है। एक तो पिंक, पर्पल या फिर वो सारे रंग जो कभी लड़कियों के लिए पेटेंट माने जाते हैं उनमें लड़कों की शर्ट या फिर टीशर्ट आसानी से मिल जाएंगे और दूसरा जूते भी उऩकी तरह। यूनिसेक्स माने दोनों में चलेगा। पहले इन चीजों की भारी कमी थी। अब तो लगभग सारी चीजें यूनिसेक्स यानि लड़के-लड़की दोनों के लिए।
कानों में बालियां या फिर नग लड़कों के बीच कॉमन हो गया है लेकिन इधर एमटीवी पर एक गाना लगातार आ रहा है-हीपॉपर प्यार तो कर ले...ए हिप्पॉपर। ये जो हिप्पॉपर है न वो नाक में नग पहनता है और हाथ भी लड़कियों की तरह लहराता है।
ऐसा हम जब छोटे थे,तब अपनी दीदी को पापा के मार से बचाने के लिए करते थे जब वो अपना होमवर्क किए बिना सो जाती। मेरी छोटी दीदी को पढ़ने में बिल्कुल मन नहीं लगता। हम दीदी का फ्रॉक पहन लेते और सो जाते। पापा सिर्फ फ्रॉक देखकर ही, जल्दी सोया देखकर पीट देते और बाद में जब देखते कि मैं हूं तो और गुस्सा होते और हमें पीटते कि भांड बनने का शौक होता है। इसमें मैं तो ठीक-ठाक से पिट ही जाता लेकिन पापा का ध्यान दीदी की ओर से हट जाता और सुबह मुझे इसके दीदी की तरफ से दो रुपये मिलते।
लेकिन अब फैशन और गेटअप में लड़के खुलेआम लड़कीनुमा दिखने लगे हैं। महिलाओं की पता नहीं इस पर क्या प्रतिक्रियाएं होंगी लेकिन इस यूनिसेक्स के कॉन्सेप्ट को सिर्फ फैशन के स्तर पर नहीं बल्कि मानसिकता के बदलने के स्तर पर भी देख रहा हूं।
आज का जो यूथ जेनरेशन है वो पहले के मुकाबले एग्रेसिव नहीं है,हिंसा में विश्वास नहीं रखता। एक तबका कह सकता है कि अब के लड़के दब्बू होते हैं लेकिन मुझे तो पहले से ज्यादा संवेदनशील और समझदार नजर आते हैं। समाजशास्त्रियों और साहित्यकारों को इस मान्यता को स्वीकार करने में हो सके थोड़ा वक्त लगे लेकिन बाजार ने इसे हमसे पहले समझ लिया है। शॉफ्ट लुक और यूनिसेक्स की चीजें बिक रहीं है तो इसकी वजह सिर्फ फैशन नहीं है, इसका संबंध साइको से भी है। स्त्रीवादी रचनाकार भी इसे फेमिनिज्म की डिस्टॉर्टेड होती इमेज मान सकती हैं। लेकिन थोड़ी देर के लिए स्त्री-पुरुष की पहचान और अस्मिता की राजनीति में न जाएं तो ये हैप्पीयर जेनेरेशन के चिन्ह हैं।
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एक लड़की का सवाल है कि रामायण या फिर महाभारत में राम को, कृष्ण को या फिर दूसरे पुरुषों के बचपन को खूब दिखाया-बताया गया है। वो कैसे चलते हैं, कैसे झूठ बोलते हैं, कैसे रुठते हैं आदि-आदि। लेकिन उसी समय सीता भी है, द्रौपदी भी है, राधा भी है लेकिन उसका कोई बचपन नहीं, उसे सीधे-सीधे युवती के रुप में दिखा दिया गया, ऐसा क्यों। बड़ी से बड़ी और महान से महान रचनाओं में लडकियों का बचपन गायब क्यों है। वो लड़की के तौर पर हमारे साहित्य से नदारद है और एकाएक युवती के रुप में शामिल है, ऐसा क्यों।
जिस लड़की ने ये सवाल उठाया वो बार-बार विश्वविद्यालय में मध्यकाल यानि भक्तिकाल पर बोलने आए डॉ।रमेशचन्द्र मिश्र को इसे हिन्दी की खोट के रुप में बताना चाह रही थी। उसका साफ इशारा था कि आप जिस काल के साहित्य को महान रचना करार दे रहे हैं, दरअसल उसमें भारी गड़बड़ी है। मुझे भी लगा कि सारे रचनाकारों को लड़की की जरुरत युवती हो जाने पर ही होती है ताकि उसके नख-शिख वर्णन करने में काम आ सके। क्या जब तक लड़कियों की छातियों के उभार नहीं आते वो किसी कवि या रचनाकार के काम की नहीं होती। क्या लड़कियों को सिर्फ विरह रोग ही लगता है और वो भी जब वो बालिग हो जाती है। उसके पहले उसे कोई दूसरी बीमारी नहीं होती, उसे और कोई तकलीफ नहीं होती। जिस मसले को लड़की ने उठाया उससे जुड़े न जाने कितने सवाल उठते हैं और उठ सकते हैं लेकिन सवालों की गिनती के मुकाबले किसी के पास जबाब एकाध भी हो जाए तो बहुत है।
मेरे एम।ए के समय में नित्यानंद तिवारी सर हुआ करते थे और वो हमलोगों को पद्मावत पढ़ाया करते थे। स्त्रियों की दशा पर बात करते हुए अक्सर कहते-मध्यकाल में स्त्रियां सम्पत्ति के रुप में समझी जाती थी। सम्पत्ति, जिस पर कि कब्जा किया जा सके और उस समय ऐसा ही होता था। मेरी समझ बनी कि सम्पत्ति को लेकर मालिक बहुत कॉन्शस रहा करता है। लड़कियां जो कि बालिग नहीं होती वो तो सम्पत्ति भी नहीं होती, वो किसी के क्या काम आ सकती है। तो क्या दशा रही होगी इनकी। इस पर हिन्दी में कहीं कुछ नहीं है। हिन्दी में कमोवेश वही लड़कियां मतलब की रही है जिसे प्रेमी ने छोड़ दिया और विरह में डूबी है या फिर वो स्त्रियां जो हम पुरुषों को रिझाने की कला में निष्णात है। बाकी का कोई भी मतलब नहीं है। पूछने को ये भी पूछा जा सकता है कि साहित्य अगर मानवीय संवेदनाओं की भाषिक प्रस्तुति है तो क्या इन लड़कियों के प्रति किसी को संवेदना पैदा ही नहीं हुई और उससे पहले भी एक सवाल कि क्या लड़कियां भी संवेदना पैदा करने की वस्तु हो सकती है, इस पर हिन्दी के किसी रचनाकारों ने सोचा होगा।
लड़की का जोर रहा कि जब राम और कृष्ण को चलते हुए, माखन या मिट्टी मुंह में लगाए हुए दिखाया तो फिर सीता या फिर राधा को क्यों नहीं। लेकिन मेरा सवाल उससे थोड़ा आगे का है कि अगर राधा या सीता को भी ऐसा ही कुछ दिखा देते तो हिन्दी के रचनाकार कौन-सा एहसान कर देते। बल्कि अब तक( जितना मैंने हिन्दी साहित्य को पढ़ा है, वाकई बहुत कम पढ़ा है, उसी आधार पर) हिन्दी के रचनाकारों को एक भी बच्ची नहीं मिली जिसके बारे में लगे कि कुछ लिखा जाना चाहिए। इसे आप क्या मानते हैं। आप ये भी तर्क दे सकते हैं कि हिन्दी साहित्य में तो बहुत कुछ नहीं लिखा गया इसका मतलब क्या है कि जो कुछ भी लिखा गया है उसे इसके अभाव में साहित्य मानने से इन्कार कर दें।
मत इन्कार करिए, सबको साहित्य मानिए लेकिन आगे से बिना लड़कियों की दशा और नायिका के अलावे भी स्त्री के रुप होते हैं, को दरकिनार करके लिखा और बार-बार कालजयी और महान बताने की कोशिश की तो ऐसे ही कोई लड़की सवाल कर देगी और आपको हकलाना पड़ जाएगा। सुजाता के शब्दों में कहें तो समाज की चोखेरबाली से टकराना होगा....
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लकड़ी करने वाले लोगों की कमी नहीं है,हर बात में बस थोड़ा सा उपर उठा दो, अपने आप हो जाएगा। कल के ब्लॉग संगत से लौटकर जब अपनी पोस्ट का शेयर सूचकांक जानने के लिए डेस्कटॉप खोला तो देखा कि अफलातून सरजी ने टिप्पणी छोड़ी है कि 'चोखेर बाली'का 'सराय' जैसी दुकान से क्‍या सम्बन्ध है और टिप्‍पणीकार साहब ने झट से लपक लिया। ४०-५० पुरुष ब्लॉगरों के बीच अकेले मोर्चा ताने हुए थी उसकी कोई बात नहीं कर रहा, किस जिंदादिली से पूरी परिचर्चा में शामिल रही उस पर कोई बात नहीं तो बात आ गयी सीधे चोखेरबाली के एजेंडे और सराय की आइडियोलॉजी पर।
मतलब साफ है कि ब्लॉगर, ब्लॉग लेखन के जरिए अपनी बात कहने और मेनस्ट्रीम की मीडिया जहां असमर्थ हो जा रही है वहां अपनी मौजूदगी दर्ज करने के लिए नहीं लिख रहे बल्कि यहां भी वे अखबार या चैनल की तरह हर जगह पॉलिटिकली करेक्टनेस खोजने लग जाते हैं। इस प्रतिक्रया से हमने जो आशय लगाया है वो ये कि ब्लॉग के स्तर पर, उसके कार्यक्रम के जरिए नहीं जुड़ेंगे, जब तक कि वो पॉलिटकली करेक्ट न हो। तो भइया, ब्लॉग को फिर किस मुंह से सेक्यूलर और ज्यादा प्रोडेमोक्रेटिक माध्यम होने का दावा करने लग जाते हो।
अब अगर सुजाताजी नहीं आती तो उस पर भी मसाला मारते कि-वो तो सिर्फ इंटरनेट पर ही क्रांति मचा सकती है। जैसे टीसर्ट क्रांति, झोला क्रांति, वैसे ही कीबोर्ड क्रांति। तब भी आप कहते कि अजी अविनाश का संयोजन था तो भला क्यों कर आने लगी। चोखेरबाली आएगी, इसकी सूचना तो अविनाश भाई ने बहुत पहले ही नेट पर डाल दिया था,तब किसी ने सुजाताजी के पक्ष में ही खड़े होकर राय नहीं दी कि भाई, अच्छा-खासा क्रांति कर रही है उसे क्यों विदेशी फंडेड संस्था में ला रहे हो। गोया आप ताक में थे कि आए तो सही और लपेट लेंगे। माफ करेंगे, आपकी इस टिप्पणी से ये भी लगता है कि आप अब भी उसी मानसिकता का समर्थन करते हैं कि स्त्रियां कहां जाएंगी, कहां नहीं, पुरुष तय करेगा।....और क्या चोखेरवाली को सराय अगर दूकान भी है तो उसकी जरुरत नहीं है,बाजार में सिर्फ पुरुष का ही कब्जा होगा। कबसे सरजी...
टीवी चैनल वाली लत धीरे-धीरे यहां भी लगने लगी है कि जो कुछ भी हो बस मसाला मार के थाली आगे बढ़ा दो, जनता तो चटकारे मारने के लिए पहले से तो तैयार बैठी है ही। आप सारे ब्लॉगरों से अपील है कि प्लीज ब्लॉग को भी मेनस्ट्रीम की मीडिया की सड़ांध में मत धकेलिए जहां सच के पहले आइडियोलॉजी हावी हो जाती है। हिन्दी की दुनिया के लिए ब्लॉग नया माध्यम है, उसे अभी ही मत फंसाइए, इस तरह के पचड़ों में। आप देखेंगे कि कई सारी चीजें खुद ही रेगुलेट होती चली जाएंगी।
आपको इस बात में कोई इंटरेस्ट नहीं है कि वहां जाकर चोखेरबाली ने क्या कहा। आप बैठे ही बैठे मान कर चल लेते हैं कि वहां इन्होंने सराय के पक्ष में खूब तेल मालिश की होगी। आप इस एंग्ल से सोच ही नहीं पा रहे होंगे कि कोई किसी के यहां जाकर उसके खिलाफ बोल भी सकता है। इसका क्या मतलब निकाला जाए कि ब्लॉगर की एक खेप ऐसी भी है जो कि ब्लॉग के मुद्दे पर तभी जाते हैं जब उनकी आइडियोलॉजी के मुताबिक स्पेस,लोग और कार्यक्रम तय किए जाते हैं।...तो फिर इंटरनेट के जरिए ग्लोबल होने का सपना भूल जाइए।
सरजी, आपको क्या लगता है कि सराय अगर दूकान है (आपके मुताबिक, हमारे हिसाब से एक तो लगता ही नहीं और थोड़ी देर के लिए लग भी जाए तो खरीद-बिक्री और शोषण के स्तर पर नहीं, वार्टर सिस्टम के तहत कि तुम हमें टाइम दो, हम तुम्हें स्किल देंगे, खैर) और सुजाता वहां के ब्लॉग संगत में जाती है तो इसका मतलब है, साम्राज्यवाद का समर्थन करती है। तो बाकी के उन चालीस-पैंतालिस लोगों के बारे में आपकी क्या राय है। अविनाश भाई को आप जानते हैं इसलिए उनका भी नाम ले लिया कि भाई बाहर क्रांति रहे हैं तो ब्लॉग में आकर इसके समर्थक कैसे हो गए। आपको नहीं लगता कि आपने भी उसी तर्ज पर सोचना शुरु कर दिया है जिस तर्ज पर कम आंकडों या फिर जानकारी के अभाव में चैनल अपने पोल का रिजल्ट देती है।
आप ब्लॉग की चिंता से ज्यादा पर्सनल आइडियोलॉजी को लेकर परेशान नजर आते हैं जो कि ब्लॉग के भविष्य के लिए ठीक नहीं है। ये जानते हुए कि जो रवैया बन रहा है, आनेवाले समय में ब्लॉग के उपर पार्टी, आइडियोलॉजी,लिक्स,सेडिंग्स और वो सब कुछ हावी हो जाएंगे जो कि अखबारों और टीवी की दुनिया में हावी हैं। बावजूद इसके मैं फिर से अपील करना चाहता हूं कि ब्लॉग लेखन काफी हद तक हमारी वैयक्तिक इच्छा, अभिरुचि, संवेदना और समझ पर आधारित है। इस पर न तो बाजार का दबाब है और न ही यहां संपादक और सठिआए प्रोड्यूसर की कैंची चलती है। इसलिए हम चाहेंगे कि इसे तार्किक, प्रोडेमोक्रेटिक और स्पेसियस बनाए। ये अकेली दुनिया हो जहां किसी को लाल सलाम बोलने पर मांस के लोथड़े का ध्यान न आए और न ही किसी को श्रीराम बोल देने से गोधरा के पिशाच होने की आशंका पैदा हो जाए।
....और हां अबकि दिल्ली में ब्लॉग संगत हुआ तो अपनी और हम सब कि कोशिश रहे कि अकेले चोखेरबाली ही नहीं....इतनी चोखेरवाली आए कि पुरुषों को ऐसी अनर्गल बातें बोलने का मौका ही न मिले। ऐसा रहम खाकर नहीं बल्कि ये समझने के लिए कि जब सारी स्त्रियां कांव-कांव करेंगी ( पितृसत्तात्मक समाज में स्त्रियां कांव-कांव ही करती है) तो हम पुरुषों पर क्या गुजरती है, ये सबकुछ जानने के लिए।
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कैम्पस में ये खबर आग की तरह फैल गई है कि ब्लॉगर लोगों को अब डॉलर में माल मिलने लगा है। गूगल वाले डेली के हिसाब से डॉलर में पेमेंट करने लगे हैं। मुझे इस बारे में कोई जानकारी नहीं थी, मैं तो आप ही सरकारी पैसे के चक्कर में तीन दिनों से दौड़ रहा हूं, पहले रुपया में कुछ आ जाए तो फिर डॉलर-वॉलर के बारे में सोचेंगे।

ये तो कल मास्टरजी से साइन कराने विभाग गया तो एक बंदे ने जो कि लगभग फ्रशटियाया हुआ है उसने बताया कि सुना है कि तुम्हारे मोहल्ला वाले अविनाश को रोज चार डॉलर मिलने लगे हैं, पेमेंट गूगल वाले कर रहे हैं। मैंने कहा कि मुझे तो कोई जानकारी नहीं । हां करीब तीन दिन पहले यशंवतदा की एक पोस्ट पढ़ी थी भड़ास कमाऊ बच्चा बन गया, बाप की आंखें भर आईं । यशवंतदा भड़ास के बाप हैं और हम उसके चाचू जो हमने उसी समय कमाई पर अपना हक जता दिया था लेकिन अविनाश भाई मनमारु किस्म के आदमी ठहरे, उत्साह होने पर भी भाव पचा जाते है। शेयर करने के मामले में आलसी आदमी हैं। अभी तक उन्होंने कोई औपचारिक घोषणा नहीं की है। खैर अगर ऐसा है तो आज न कल बता ही देंगे और कहीं ढंग की जगह पर हलाल कर ही देंगे अपन। उस बंदे का कहना था कि हो न हो कल तुम्हें भी गूगल वाले देने लग जाएं। मैंने मन ही मन सोचा कि आप फिर मेरी लेने लग जाएं। अच्छी खबर तो हैं ही कि ब्लॉग लिखने पर डॉलर मिल रहे हैं लेकिन अपने साथ तो फजीहत है। एक जगह से फेलोशिप मिल रहा है और इधर से मिलने भी लगा तो लोचा हो जाएगा। मैं तो अपने ब्लॉग के आगे लिखने वाला हूं गाहे-बगाहे, अवैतनिक।

एक समय था जब मैं सिर्फ पढ़ता था और पढ़ने में मन भी बहुत लगता था और मैं अक्सर लोगों से कहता कि अगर कोई मुझे रहने-खाने लायक पैसे देता रहे तब मैं जिन्दगी भर पढ़ता रहूंगा, कोई दूसरा काम ही नहीं करुंगा। बार-बार जेआरएफ की परीक्षा देता रहा और आज सचमुच में पढ़ने-लिखने के पैसे मिलने लगे हैं तो मैं वही करता हूं, अपने मन की लिखना और अपने मन की पढ़ना। लेकिन इधर जब से ब्लॉग लिखने लगा हूं तो लगता है कि अब बस ब्लॉग लिखूं और कोई रोज इसके लिए जीने लायक पैसे दे। हो न हो रिसर्च पूरी हो जाने के बाद यही करूं, फुलटाइम ब्लॉगिंग।

बातचीत के क्रम में मैंने कई दोस्तों के मन को टटोला है तो पाया है कि इन्हें अगर सैलरी से थोड़े कम भी पैसे मिल जाएं और अपने मनमुताबिक लिखने का मौका मिले तो ये मीडिया की नौकरी छोड़ देंगे, समाज को अपना आउटपुट ज्यादा देंगे। इनके लिए तो वाकई खुशखबरी है। प्रोड्यूसर की मांग से हटकर वो ज्यादा बेहतर लिख पाएंगे। इधर मीडिया पढ़कर निकले बच्चे जो कि इस लाइन में एकदम खिच्चे( नए-नए) हैं उनको भी एक बेहतर विकल्प मिलेगा। ऐसा होने से ब्लॉगिंग एक मजबूत, सार्थक और मेनस्ट्रीम की मीडिया से कहीं अच्छा माध्यम बन सकेगा। कर्मचारी बन चुका मीडियाकर्मी फिर से पत्रकार होने लगेगा।......

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बिंदास चैनल पर एक टैलेंट हंट कमीना नं-१ जिसमें सबसे ज्यादा कौन कमीना है या हो सकता है उसकी खोज चल रही है। कई कंटेस्टेंट पार्टिसिपेट करने आए। सबके मन में आस थी कि चैनल और उसके जज मिलकर देश का कमीना नं वन घोषित कर दें। सब अपने को कमीनों का बादशाह कहलाने के लिए बेताब हुए जा रहे थे। ऐसी कमीनगी देखी नहीं के बाद बारी आयी कि जज उनके नंबर बताएं। जज के पैनल में शेखर सुमन भी हैं। एक बंदे को ६ नंबर देते हुए कहा कि तुममें और कमीना होने की गुंजाइश थी लेकिन कम्बख्त हो नहीं पाए औऱ इसलिए वो कमीना नं वन नहीं हो पाया। लेकिन जिस बंदे को उससे ज्यादा नं मिले वो हो गया कमीना नं-वन।
जिन लोगों को नैतिकता की बीमारी लगी है और जो कहते-फिरते हैं कि ये गलत है ऐसा नहीं होना चाहिए, हो सकता है कि वो स्टूडियों में जाकर तोड़-फोड़ मचाएं,धरना प्रदर्शन करें, वो सब कुछ करें जो देश की गौरवशाली संस्कृति बचाने वाले लोग करते हैं, जिन मां-बाप को लगता है कि अगर मेरे बच्चे ने स्साला बोला है तो वो गाली है, वो तो इस टैलेंट हंट शो में पिछड़ जाएगा। बुद्धिजीवी समाज ये भी सोच सकता है कि जो सबसे ज्यादा कमीना होगा, चैनल उसे इनाम देगा। अब सब नं वन कमीने तो हो नहीं सकते लेकिन कोशिश तो लाखों में करेंगे और थोड़े-बहुत तो हो ही जाएंगे, ऐसे में समाज खड्डे में चला जाएगा। जिन्हें लगता है हमारी संस्कृति सबसे उम्दा संस्कृति रही है और हमारी भाषा तो देववाणी रही है, जहां हिन्दी बोल देने से भी छूत लग जाती है वे भड़क सकते हैं। लेकिन जो लोग प्रोडक्शन में लगे हैं, चाहे वो किसी कल्चरल प्रोडक्शन में लगे हों या फिर सड़को से बिनी हुई प्लास्टिक की थैलियों को गलाकर खिलौने बनाने की फैक्ट्री है, उनके लिए ये शो एक अच्छी सीख है।
देश में जब औद्योगिक क्रांति आई तो साथ में इस तकनीक का भी विकास हुआ कि प्रोडक्शन के बाद जो कचरा पैदा होगा उसका क्या किया जाएगा और कमोवेश उसका हल निकाल लिया गया। मीडिया ने भी इस तकनीक को समझा और फाइनल प्रोडक्ट यानि लिटिल चैम्स, इंडियन ऑयडल, बाथरुम सिंगर वगैरह बना लेने और बाजार मे सप्लाय कर देने के बाद जो बच गए उसका क्या होगा उसके बारे में सोचने लगे। एक बात तो समझना होगा कि ग्लैमर की दुनिया में तकदीर जितनी तेजी से बदलती है, असफल होने पर फ्रशटेशन भी उतनी ही जल्दी आती है। ये कोई रेलवे, बैंकिग या सिविल की कंपटिशन तो है नहीं कि इस बार नहीं तो अगले साल। इसमें तो नहीं नं वन हुए कि आप कूडा मान लिए गए, आप खुद ही अपने को समझने लगे। ये और बात है कि आपका एलबम निकलता रहेगा और शादी-ब्याह में रौनक लगाने के लिए आपको बुलाया जाता रहेगा। फिर भी नं वन न होने की टीस तो बनी रहती है। उसका क्या करें। आप दारु पीते हैं, मां-बहन की गालियां देते हैं, कभी जजेज को गरियाते हैं, कभी चैनल को जिसने सपने दिखाए तो कभी हम जनता को जिसने आपको तंगी की हालत में जीतने लायक एसएमएस नहीं किए। यानि आप कल्चरल वेस्टेज या कचरा हो गए।
इस कल्चरल कचरे को ठिकाने लगाने का काम चैनल को है क्योंकि पैदा भी उसने ही किया। चैनल भी अपनी इस जिम्मेवारी को बखूबी समझ रहा है इसलिए आपकी खपत कहां हो इसे लेकर सचेत हैं। बाथरुम सिंगर ने इसकी शुरुआत कर दी थी जहां कोई जरुरी नहीं कि आप मो।रफी बन जाएं, बस राग-झाग में वैलेंस बनाए रखना है। हो न हो आने वाले समय में कल्चरल वेस्टेज को ठिकाने लगाने के लिए ऐसे और प्रोग्राम आए। लेकिन इसमें चक्कर ये है कि सबसे ज्यादा फ्रस्टियाया और कमीना आदमी ही जीत सकेगा इसलिए रोज पीना, पीकर मां-बहन करना और कमीनेपन के नए नुस्खे आजमाते रहना जरुरी है। क्योंकि इसमें भी आपको नं-वन होने पर ही मामला बनेगा, अधूरा कमीना होने पर आप पिछड़ जाएंगे।
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पिछले बुक फेयर के मुकाबले इस बुक फेयर में अपने को लेकर फर्क साफ देख रहा हूं और ऐसा हमारे दूसरे ब्लॉगर कम हिन्दी के साथी भी जरुर देख रहे होगें। लोगों के बीच ये मैसेज जा रहा है कि हिन्दी के रिसर्चर मास्टरों का झोला ढोने और पीछे-पीढे चलने का काम छोड़ रहे हैं।और बड़ी शिद्दत से अपनी पहचान बनाने में लगे हैं।
कल ही की तो बात है। मिहिर, मेरे लिए दोस्त और मास्टरजी के लिए विनीत का जूनियर ( कई बार टोक चुका हूं, उसकी पहचान मेरा जूनियर होने से नहीं है मिहिर होने से है, खैर) ने फोन किया कि चार बजे एक पत्रिका का लोकार्पण है और आप आएं। और बताया कि वो इस पत्रिका का सह-संपादक है।
पत्रिका के लोकार्पण हो जाने के बाद औपचारिक बातचीत के दौरान एक-दूसरे से परिचय का दौर शुरु हुआ। मेरे दो-तीन दोस्तों को साहित्यिक हलकों में लोग मेरे से ज्यादा जानते हैं सो मेरा परिचय कराने की जिम्मेवारी उन्होंने अपने उपर ले ली। ये है विनीत, डीयू से पीएचडी कर रहा है...मीडिया में विशेष रुचि है....और भी कुछ-कुछ ब्ला॥ब्ला॥। कुछ स्थापित साहित्यकारों को मेरी जाति की भनक लग गई थी मीडिया बोलते ही, मेरा नक्शा मेरे पूर्वजों से मिलाते इससे पहले ही मैं कट जाना उचित समझा।
एक साथी ने कोहनी से मारते हुए कहा कि अरे बताओ न अपने बारे में ...ऐसे सोचोगे कि कोई तुमको बुलाकर छाप दे तो कैसे होगा। उधर अखबार में नहीं छपे तो हॉय-हॉ कर रहे थे और इधर बातचीत से मामला बनना है तो इन्टरेस्ट ही नहीं ले रहे हो।
खैर, मेरे दोस्तों के पास बताने के लिए बहुत था कि सर आपने पिछला ज्ञानोदय का अंक देखा, पहल में भी ठीक मामला बन गया है सर। मेरी एक दोस्त को तो अशोक वाजपेयी ने वाकायदा कोट( अंग्रेजी के हिसाब से पढ़ें) किया है और हरिद्वार से अजीतजी का एसएमएस आया था। ये हैं .......एम।फिल् कर रहे हैं डीयू से। अरुण कमल ने इसकी कविता की नोटिस ली है और संदर्भ के तौर पर इस्तेमाल किया है। इनसे मिलिए आधुनिकता पर अच्छा काम किया है, इंगलिशवालों से भी बढ़िया। मैं क्या बताता, जो बताता उन्हें चूतियापा लगता। जब मास्टरजी चालीस साल से लिख रहे हैं तो इन्हें लग रहा है तो हमारी लिखी बात की क्या बिसात। सच कहूं तो हिन्दी समाज में अपने लिए ऑक्सीजन की कमी होने लगती है।
अब तक आलम ये था कि बाबाओं के बीच अपना परिचय कराने का सीधा फंड़ा था कि ये फलां है डीयू से एम।फिल् कर रहे हैं ये फलां जेएनयू से पीएच।डी कर रहे हैं। बहुत हुआ तो टॉपिक पूछकर बाबा लोग बख्स देते। लेकिन इन दो सालों में कुच्छ दोस्तों ने लिखना शुरु कर दिया और छपने के लिए जी-जीन से लगे हुए तो मेरे प्रति भी बाबाओं की एक्सपेक्टेशन बढ़ गई है। सीधे पूछ बैठते हैं, इधर आपने क्या लिखा है। मेरा मन करता है कहूं कि- अजी उधर कब लिखा था कि इधर लिखने लगूं। ले देकर दो लेख छपी है जिसके बारे में लोगों की राय है कि एक तो एम।फिल् का ही काम है और दूसरा सेटिंग से छप गई है। एम।फिल का काम अगर छप जाए तो वो आर्टिकल नहीं होता और सेटिंग से छप जाने पर कुछ भी पढ़ने लायक नहीं रहता। सो अब मैंने उसकी चर्चा ही करनी छोड़ दी है। लेकिन एक बाबजी ने जब खोदकर पूछा कि पीएच।डी में आ गए हो और अभी तक कुछ लिखा ही नहीं तो बताना पड़ा कि लिखा है सरजी। उनका जबाब था कि लेकिन कहीं देखा नहीं। मैंने कहा-सरजी जिस मैगजीन में छपी है उसकी कीमत ४०० रुपये है और सब स्टॉल वाले रखते नहीं। संपादक सरजी जहां-तहां रिव्यू के नाम पर फ्री में नहीं भेजते। एक सेमिनार करायी थी इस पर औऱ अपील की थी कि सब लोग आएं। लोग आएं और वहीं पर इसका मूल्यांकन हो गया। इसलिए आपको दिखा नहीं, वैसे वाणी के स्टॉल पर है।
एक दोस्त ने गरिआया कि स्साले लिखते भी वहां हो जिसे लोग आसानी से( आसानी माने फ्री या कम दाम में) लोग खरीद न सकें। भाई लोगों को गुरुर था कि उन्हें साहित्य के तोप लोग जानते हैं। पानी के प्राचीर वाले लेखक जानते हैं, मतवाले की चक्की वाले संपादक जानते हैं और महान घोषित करने वाले आलोचक जानते हैं। एक ने तो कहा कि चार साल से डीयू में रहकर क्या उखाड़ रहे हो जी। किसी से परिचय नहीं।
पहले दिन भी वही हुआ था। सबको सबलोग जान रहे हैं। भाई लोग लेख का आर्डर ले रहे हैं, संपादक से समझ रहे हैं कि इसमें किसकी लेनी हैं, किस आलोचक का खंभा खिसकाना है और किससे सागर वाली दुश्मनी निकालनी है और किसे फिर से कासिम दवाखाना भेजना है। मैं बोतू बना अंगूर टूंग रहा था। उनके साथ चल रहा था। मेरी चुप्पी से संपादकों को लग रहा था कि लड़का सीरियस है, सब सुन-समझ रहा है, सो और जोश में समझा रहे थे। उन्हें नहीं पता था कि यहां मसाले की स्टोरिंग चल रही है।
बढ़ते-बढ़ते एक स्टॉल से आवाज आई कि मोहल्ले वाली बहस पर तुम क्या सोचते हो दिलीप। मैं रुक गया और बोला- रिजेक्ट माल और तब क्या था एक ही साथ- मसीजीवी, कस्बा, भड़ास,लिंकित मन कई नाम बुक फेयर के हॉल में गूंज गए। मनीषा थी, दिलीपजी से मिलवाया, दिलीपजी ने इरफान भाई से और फिर ब्लॉगर का पूरा कुनबा। सब गले मिले और कहने लगे बहुत सही लिखते हो गुरु, जमे रहो। अपनी-अपनी पोस्ट को लेकर बातें। दिलीप भाई ने कहा ऐसे कैसे जाने देंगे,चला फिर फोटो सेशन। लोग सहला रहे थे, प्यार कर रहे थे और शुभकामनाएं दे रहे थे। पीछे पलटकर देखा तो नवोदित आलोचक साथी खड़े थे। एक ने गरिआया- तुम सब स्साले भोसड़ी के चलते-फिरते प्रकाशक बनते हो। नो डाउट इसमें जेलसी का भी भाव था।
आधे घंटे के भीतर कई लोग मिले जो मुझे अलग-अलग वजहों से नहीं अलग-अलग पोस्टों को लेकर जान रहे थे। मैं थोड़ा डरा भी कि ये पहचान एकेडमिक्स में काम तो नहीं आएगी। सिर्फ पोस्ट तो नहीं लिखता और भी तो पढ़ता-लिखता हूं। लेकिन फिर खुशी हुई कि जाने दो फलां का झोला ढोता है उससे तो लाख गुनी बढ़िया है ये पहचान। इधर कल कर्मेंन्दु शिशिरजी ने सब कुछ सुन लेने के बाद कहा कि ये तो मोहल्ला पर लिखता है। अपना भी कोई ब्लॉग है, लिंक दे दो।.....
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बोलते-बोलते हिन्दी के वरिष्ठ आलोचक विजयमोहन सिंहजी बोल गए कि- फेलोशिप किल्स दि टैलेंट। ये कोई नई बात नहीं है हिन्दी की दुनिया के लिए धन-दौलत माया है, ठगनी है। कोई बंदा हिन्दी में कालजयी होना चाहता है तो जरुरी है कि वो इन सबसे कोसों दूर रहे। लेखन के स्तर पर, असल जिंदगी में आपसे कौन हिसाब मांगने जा रहा है। लेकिन मुझे हैरानी विजयजी पर हुई कि जो विचार वो अब से चालीस-पचास साल पहले से देते आए हैं उसमें रत्ती-भर भी फेरबदल नहीं हुआ है।
मौका ज्ञानपीठ के नवलेखन पुरस्कार समारोह का था। २ फरवरी की गुलाबी ठंड में हम सब कुछ घंटों के लिए नेशनल म्यूजियम का हिस्सा बन गए। साहित्य के बड़े-बड़े धुर्नधरों का जमावड़ा। बारह नए कहानीकारों को सम्मानित किया जा रहा था। सम्मान समारोह के बाद एक विषय भी रखा गया- युवा लेखन की चुनौतियां जिस पर कि प्रसिद्ध कथाकार और तद्भव के संपादक अखिलेश और वरिष्ठ आलोचक विजयमोहन सिंह ने अपने विचार दिए। कटेंट तो कुछ नया नहीं था और सुनकर ऐसा नहीं लगा कि पहली बार कुछ अलग सुना जा रहा है लेकिन आलोचकों के मुंह से साक्षात सुनने का अपना ही महत्व है, कुल मिलाकर मजा आया। लेकिन विजयमोहन सिंहजी ने जैसे ही कहा कि फैलोशिप किल्स द टैलेंट तो मेरे पूरे बदन में झुरझुरी सी आ गयी। एकदम से मुंह से निकला- क्या बात करते हैं। अफसोस भी हुआ कि काश ये आज के सन्दर्भ को समझकर कुछ कह जाते। अब कौन कंगाली के हालत में लिखना-पढ़ना चाहेगा। कुछ नहीं होगा तो कॉल सेंटर की नौकरी कर लेगा लेकिन घोर अभाव की स्थिति में रचनाकर्म आज कोई बिरले ही कर लें।
हमें असहज देखकर पीछे से कुछ सीनियर्स ने राय दी कि पूछो न जो पूछना चाहते हो। मेरे दिमाग में सवाल भी तैयार था कि- सरजी अगर फेलोशिप से किसी साहित्यकर्मी का हुलिया सुधर जाता है तो उससे आपको क्या परेशानी है, अगर वो एमबीए और कोई दूसरे प्रोफेशन की तरह जिंदगी गुजारता है तो इसमें क्या बुराई है। और बताइए कि क्या हिंदी में इतना सबकुछ हो जाने के बाद भी ऐसी स्थिति बनी है कि कोई बंदा सिर्फ लिखकर ठीकठाक जिंदगी जी ले। लोग तो बताते हैं रचना छप जाने के बाद भी माल हाथ आने में दो से तीन महीने लग जाते हैं और वो भी इतना कम होता है कि काम ही न बने। बल्कि खर्चें में अब मोबाइल बिल भी जोड़ना होगा न। और अब बाबा नागार्जुन वाला जमाना रहा नहीं कि आपके घर में झोला रख दिए और तीन-तीन दिन तक गायब। हिन्दी प्रेमी खिला-पिला रहे हैं। अब तो खिलाना तो दूर चाय के लिए लोग कुनमुनाने लगते हैं।
अच्छा इस अभाव के बीच भी अगर कोई लिख भी दे तो अपने ही आलोचक उसे साफ करार देते हैं कि ये रचना निहायत ही आत्मकेन्द्रित होकर लिखी गयी है, फ्रसटेशन के अतिरिक्त कुछ भी नहीं। अभाव में अब राम की शक्तिपूजा नहीं लिखी जाती, पउवा पीकर आलोचकों को गरिया जाता है, देखा हूं कई बार ऐसा लोगों को करते हुए।
एक बात और कि अगर किसी को फेलोशिप जिससे थोड़ी और चौड़ी करके समझे कि आय का साधन मिल जाता है तो उसके लिखने की प्रतिभा खत्म हो जाती है, ये आप कैसे तय कर लेते हैं, ये भी ठीक-ठीक लिखते हैं, ठीक-ठाक क्या जी बिकने-पढ़ने और पुरस्कार पाने लायक तो लिखते ही हैं । आज इसके अलावे भी कोई पैमाना है क्या उत्कृष्ट साहित्य होने का। साहित्य अभी भी पार्टटाइम एक्टिविटी है, जो फुलटाइमर हैं भी तो सिर्फ कहानी लिखकर नहीं सांस ले रहे हैं। इसलिए ऐसे वक्त में विजयजी की बात बड़ी ही अविश्वसनीय लगती है।अच्छा अगर हम पैसे से उपर उठ भी जाएं तो क्या बाकी के दबाब हमारे उपर से खत्म हो जाएंगे। आलोचकों के बीच हमारी रचना पहुंचें इसके लिए तो हमें कई शर्तों के हिसाब से लिखना ही होगा॥जिसमें संपादक की शर्तें यानि बाजार की मांग शामिल है। इसलिए सरजी रचना के तार जाने-अनजाने बाजार और मांग से जुड़ ही जाते हैं। अब आप इसका नाम न लेना न चाहें तो अलग बात है। कोई बंदा खुद ही सुलगाने और खुद ही बुझाने के लिए नहीं लिखता। और अगर नहीं लिखता तो हमारे और आपके हिसाब को ध्यान में रखकर लिखता है। मैं तो समझता हूं कि अगर कोई अपने ढंग से सुलगाने और बुझाने के लिए लिखता है तो फेलोशिप मिलने से उसे आसानी होगी। फेलोशिप पाना भी एक योग्यता ही है इसे आप दरबारी हो जाने की प्रक्रिया के रुप में क्यों ले रहे हैंधन मिलता रहे तो वो सिर्फ कहानीकार या कवि नहीं बनेगा, पढ़कर, रिसर्च करके आपकी करह आपसे कम उम्र में आलोचक भी बनेगा। एक युना कहानीकार को एक युवा आलोचक मिल जाए, इससे बेहतर औऐऱ क्या हो सकता है। आप नहीं चाहते कि ऐसा हो। मैं सच कहूं तो मुझे सम्मानित बारहों कहानीकार हुलिए से बहुत अच्छे लगे और अगर भीड़ में चलें तो आप अलग से पहचान नहीं पाएंगे कि ये हिन्दी के हैं जिसकी शिकायत अक्सर उदय प्रकाश को रहती है। ऐसा इसलिए कि ये सारे जीविका के लिए अलग से कुछ न कुछ करते हैं और आप भी इनकी लेखनी के कायल हो चुके। तो फिर जबरदस्ती का अंर्तविरोध क्यों फैला रहे हैं, सरजी..
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ये झारखंड-फारखंड कहां से

Posted On 3:35 am by विनीत कुमार | 8 comments

कल वाणी प्रकाशन से प्रकाशित रणेन्द्रजी द्वारा संपादित किताब इन्साइक्लोपीडिया ऑफ झारखंड का लोकार्पण होना था। रणेन्द्रजी के साथ-साथ आसपास के लोग भी उत्साह में थे और इंतजार कर रहे थे कि नामवर सिंह आएं और किताब का लोकार्पण हो। मैं और मेरे एक-दो दोस्त स्टॉल पर पोस्टर लगाने में मदद कर रहे थे कि तभी दो लोग उधर से गुजरे और पोस्टर की सिर्फ पहली लाइन पढ़कर बोले- ये झारखंड-फारखंड के लोग वर्ल्ड बुक फेयर में कहां से। मतलब कि ये क्या करने आ गए। रणेन्द्रजी ने सुना और लोगों को बताया कि देखिए ये लोग क्या बोल कर गए। हमलोग भी थोड़े असहज हो गए। उन्हें बात लग गई कि कोई ऐसे कैसे बोल सकता है, वो भी सड़क पर नहीं विश्व पुस्तक मेले में, प्रगति मैंदान में और अपने को रोक नहीं पाए। इसलिए प्रकाशक अरुण माहेश्वरी ने जब उन्हें किताब और रचना प्रक्रिया के बारे में बोलने के लिए कहा तो सारी बातें बोलते हुए कि झारखंड के बिहार से अलग होने के बाद उसकी अपनी अलग पहचान बनी लेकिन इस पहचान को सामने लाने के लिए कोई मुकम्मल काम नहीं हुए, चार खंडों में झारखंड का ये इन्साइक्लोपीडिया लोगों को झारखंड के बदले परिदृश्य को समझने में मददगार होगें, साथ ही ये भी कह दिया कि अभी कुछ लोगों ने पोस्टर देखकर कहा कि वर्ल्ड बुक फेयर में झारखंड-फारखंड के लोग कैसे चले आते हैं। हम अपने को पहले देश का नागरिक मानते हैं लेकिन जहां से हम आते हैं वहां के बारे में कोई इस तरह के विचार रखे और प्रतिक्रिया देते हों तो बात दिल में लगनेवाली तो है ही।
दिल्ली में मैं देखता हूं कि एक बिहारी की पहचान कुली-कबाडी, रिक्शा चलानेवाले और मजदूरी करने वाले की और बिहार की इमेज एक भ्रष्ट राज्य के रुप है। इस पहचान के निशान लोगों के दिमाग में इतने गहरे हैं कि बाकी के पहचान पनप ही नहीं पाते, कई अच्छी चीजें सामने आ ही नहीं पाती, लोग उसकी नोटिस ही नहीं लेते। जहां भी गंदा या गंदगी है उसे बिहार और बिहारी का नाम दे देते हैं। ऐसा लिखकर बिहार की बाकी गंदगियों को, बुराइयों को नजरअंदाज नहीं कर रहा बल्कि मैं सिर्फ इतना ही कहना चाहता हूं कि जब भी हम दिल्ली के बारे में बात करते हैं तो ग्रेटर कैलाश, संसद, मेट्रो और चौबीसों घंटे बिजली ही दिमाग में क्यों आते हैं, सीलमपुर की गंदगी और भजनपुरा का नरक ध्यान में क्यों नहीं आता। क्या ऐसा नहीं है कि हम दिल्ली के बाहर इन राज्यों को लेकर कुछ ज्यादा ही निगेटिव एप्रोच रखते हैं।
ऐसी ही मानसिकता झारखंड को लेकर भी है। झारखंड माने दिल्ली के लोगों( सब नहीं लेकिन अधिकांश) में है कि ये जंगली इलाका है, यहां के लोग असभ्य होते हैं और इनकी लाइफ स्टाइल पाषाण युग की होती है।
मुझे कॉलेज के दिनों की याद आ गयी। मैं नया-नया दिल्ली में आया था, हिन्दू कॉलेज में एम.ए
करने। डर से क्लास शुरु होने के पांच दिनों तक गया ही नहीं। मामला थोड़ा ठंड़ा पड़ गया तो पहुंचा। लोगों ने मुझे घोर आश्चर्य से देखा और एक लड़की ने कहा- अरे ये तो जैसे टीवी में झारखंड के लोगों को दिखाते हैं वैसा नहीं है, इसका रंग तो साफ है, वहां के लोग तो काले होते हैं और देखो ये जींस पहनकर आया है। उनके लिए मैं अजूबा था। फिर बारी-बारी से लोग मेरी शर्ट का कॉलर उलटकर देखने लगे और कहा-झारखंड में एरो की शर्ट मिलती है। एक लड़के ने टोका- अरे तुम भी ली-कूपर के जूते पहनते हो। उन्हें इस बात पर बड़ी हैरानी हो रही थी कि ये वो सबकुछ वैसा ही पहना है जैसा कि हम दिल्ली में रहकर पहनते हैं। यहां जोड़ दूं कि मेरे साथ ऐसा करनेवाले सिर्फ दिल्ली के ही लोग नहीं थे, कई लोग नए-नए देहलाइट हुए थे।
आज रणेन्द्रजी की किताब की पोस्टर देखकर लोगों ने जिस तरह से रिएक्ट किया, मेरे दिमाग में ठनका कि लोगों की ये सोच कहीं योजना, कुरुक्षेत्र या फिर दूसरी झारखंड विशेषांक पत्रिकाओं को देखकर तो नहीं बनी जिसमें ज्यादातर तस्वीरें लड़की के सिर पर बोझा ढ़ोते हुए या बहुत हुआ तो मांदल बजाते हुए छपते हैं। या फिर ऐसा वहां की गरीबी के कारण हुआ है, वहां की संस्कृति का देश की मुख्यधारा में शामिल नहीं होने के कारण हुआ है, किसी भी फिल्म में वहां की सम्पन्नता को न दिखाए जाने के कारण हुआ है या फिर वाकई इसके लिए वहां के लोग ही जिम्मेवार हैं।
फिलहाल तो दो ही बातें लगती हैं कि संभव है रणेन्द्रजी के इस प्रयास से लोगों का नजरिया कुछ बदले और दूसरा कि आनेवाले समय में इंडस्ट्री और रीयल स्टेट के टेंडर के पेपर भरने जब लोग झारखंड जाएं तो कुछ अलग तरीके से सोच पाएं। बाकी अपनी तरफ से कोशिशें तो जारी है ही।....
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एक टेलीविजन शो ऐसा भी हो......

Posted On 9:26 pm by विनीत कुमार | 2 comments

टेलीविजन पर टैलेंट हंट शो की बाढ़-सी आई है जितने चैनल उतने टैलेंट हंट शो। कई चैनलों पर तो एक ही साथ कई शो, अलग-अलग मिजाज के बच्चों के लिए अलग-अलग हंट शो। मैं तो बस दो ही बातों का इंतजार कर रहा हूं। एक तो कि टेलीविजन पर इतने टैलेंट शो हो जाए और इतनी वरायटी की हो कि देश के सारे बच्चे उसमें शामिल हो सकें। जो रोज रियाज करता है वो भी और जिसने कभी रियाज नहीं किया वो भी, जो सबसे अच्छा गाता है वो भी और जो सबसे बेसुरा गाता है वो भी, जो फाइव स्टार स्कूल में पढ़ रहा है वो भी और जो सेंट बोरिस( जहां बैठने के लिए साथ में बोरी या दरी अपने साथ ले जाना पड़ता है) में पढ़ता है वो भी। टैलेंट की खोज और स्थापना तो हो। और दूसरी बात का जो इंतजार है वो इधर ही पनपा है, तारे जमीन पर देखने के बाद कि देश में जितने डिस्ऑर्डर बच्चे हैं उनके बीच टैलेंट हंट किया जाए और संभव हो आमिर को उस प्रोग्राम का हॉस्ट बनाया जाए। क्योंकि एक इशान अवस्थी तो उनका हीरो बन गया, अब क्यों न इसकी संख्या बढ़ायी जाए। मामला घाटे का नहीं होगा। देशभर के एनजीओ और सामाजिक कार्यकर्ता सामने आएंगे और बिना बड़े-बड़े बैनर के अच्छी पब्लिसिटी हो जाएगी। इसके लिए स्कूल के बच्चे सामने आएंगे और मुझे पूरा भरोसा है कि प्रोग्राम हिट रहेगा। ये एक ऐसा शो होगा जिसे जो भी चैनल कराएगा,उसकी ब्रांड इमेज बहुत ही बेहतर बनेगी। जिन चैनलों को लगातार गरिआया जाता है उनके लिए एक बेहतर मौका होगा।
सबसे बड़ी बात तो ये होगी कि लगे हाथ देशभर में इस तरह के बच्चों की खोज हो जाएगी और आगे उनके इलाज और सुधार में मदद मिल सकेगी। उनके बीच कुछ ऐसे इवेंट कराए जाएं जिसे कि एक सामान्य बच्चा नहीं कर सकता और अगर करे भी तो उसे बहुत मशक्कत करनी पड़ेगी। ये इवेंट सिर्फ गाने या नाचने तक सीमित नहीं होंगे। कई ऐसे इवेंट हैं जिसमें इन बच्चों को शामिल किया जा सकता है। आमिर ने तो अपने हिसाब से एक पेंटिंग आर्टिस्ट को खोज निकाला। क्या पता कोई बड़ा रंगकर्मी निकल आए, कोई अंच्छा डांसर, कोई अच्छा बांसुरी वादक, मंच का कवि या फिर वो कुछ जिसके होने और बनने की कल्पना एक सामान्य बच्चों में देखते हैं। ऑडिशन के लिए मनोचिकित्सक की मदद ली जा सकती है।
आगे ज्यादा क्या राय दूं जो भी चैनल इस ओर पहल करेंगे, उनकी पूरी टीम तो दिमाग लगाएगी ही। मेरे पास तो अचानक से आइडिया आया सो मैंने बता दिया। वैसे आइडिया बुरा नहीं है न.....
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दो दिनों बाद ब्लॉग की दुनिया में वापस आया तो देखा कि जनसत्ता से जुड़े लोगों पर मैंने जो पोस्ट लिखी और जिसको लेकर विवाद हुआ, सब मामला रफा दफा हो गया और मंगल गान गाए जा रहे हैं॥शुभ हो, सब कुशल रहे। ये अलग बात है कि ब्लॉग से निकली बात को लेकर अब फोन करने,पर्सनल मेल करने, सुझाव देने और कुछ हद तक अलग-अलग माध्यमों से दबाव बनाने की कोशिशें जारी है। भड़ास का मेन मॉडरेटर होने के नाते यशवंतदा ने डॉ मान्धाता सिंह के सुझाव को मान लिया और लिखा -
विनीत कुमार की जिस पोस्ट पर गर्मागर्म बहस चल रही है, उसके बारे में मेरा अपना निजी खयाल यही है कि भड़ास पर किसी मीडिया हाउस का नाम लेकर उसे कोसने के बजाय जिस सज्जन से दिक्कत है, पीड़ा है, उनका नाम कोटकर लिखा जाए तो शायद ज्यादा ठीक रहेगा क्योंकि किसी मीडिया हाउस को किसी एक दो खराब टाइप के सज्जनों के कारण गरियाना, नाम उछालना, बदनाम करना उचित नहीं। ........उम्मीद है इस विवाद को यहीं खत्म समझा जाएगा। अगर फिर भी किसी को कुछ कहना है तो उसका स्वागत है।
यशवंतदा की इस घोषणा के बाद डॉ मान्धाता सिंहजी ने इसे गंगा में नहाने का असर बताते हुए जुग-जुग जीने का आशीर्वाद दिया-
यशवंतजी यही आप से उम्मीद थी। जनसत्ता वाले मामले में अब आपने एक सतर्क माडरेटर जैसा जबाव दिया है। गंगा में जो नहा के आए हैं। जुग-जुग जिएं आप, खूब तरक्की करे
लेकिन क्या आज के इस पोस्ट मार्डन कंडिशन में वाकई किसी बहस की उम्र दो या तीन दिन से ज्यादा नहीं होगी। थोड़ी देर तक हलचल के बाद सब खत्म और फिर सब पहले की करह ही मौजा-मौजा। हम मंगल-मंगल के लिए इतने उतावले क्यों हैं।
विवाद मेरी पोस्ट से ही शुरु हुई थी इसलिए जरुरी समझा कि समापन की विधिवत घोषणा के बाद भी कुछ लिखूं। ब्लॉगिंग को कचहरी की शक्ल में बदलना हो तो हर बात के पीछे तर्क खड़ी करने में कोई परेशानी नहीं होगी। ब्लॉग लिखते-लिखते तो इतना माद्दा सबमें आ ही गया है लेकिन अभी इसे कचहरी नहीं होना है। हां इतना जरुर है कि एक बात को देर तक, दूर तक न भी खींचे तो भी जितना कुछ हुआ, उसके ऑटपुट पर एक नजर जरुर डाल लिया जाए।
जनसत्ता पर पोस्ट लिखने के बाद जो सबसे तीखी प्रतिक्रिया हुई वो मेरी भाषा को लेकर। एक सभ्य समाज इस तरह की भाषा सुनने को अभ्यस्त नहीं है। सो इस सभ्य समाज के लोगों ने मेरी इस भाषा को अकादमिक हलको तक पहुंचाया। भाषा की नारको टेस्टिंग वहीं होनी है। लेकिन उन्हें रिपोर्ट मेरी भाषा की नहीं, मेरी चाहिए थी। कुछ का मानना था कि इसमें कई चीजें अनर्गल है। कुछ को पोस्ट ही ढीली लगी,कुछ ने कहा कि इस पर और मेहनत की जरुरत थी तो कुछ ने ये भी कहा...और फाडो सालों को, वगैरह॥वगैरह।मैं अपनी भाषा को लेकर कोई तर्क नहीं देना चाहता हूं, आपको कभी एसी कार में बैठे इंसान ने आपके पैदल चलने पर ठोक दिया हो और वहां आपके मुंह से क्या निकलता है, आप सब जानते हैं। सिर्फ अकादमिक योग्यता हमारी भाषा तय नहीं करती, एक खास परिस्थिति में हर आदमी वही बोलता या लिखता है जो भाषा आप और हम किसी से ठुकने पर इस्तेमाल करते हैं।
इस पूरे प्रकरण को मैं थोड़ा दूसरे ढ़ंग से ले रहा हूं। पहला तो ये कि भाषा यहां कोई मसला ही नहीं है।
सीधे-सीधे आउटपुट को लेकर बात करुं तो कुछ सवाल और कुछ नए तथ्य हमारे सामने आए हैं-
सबसे पहले तो इसके जरिए अखबार का दोहरा चरित्र उभरकर सामने आया है। आपको सुप्रीम कोर्ट से तुरंत फैसला चाहिए, सरकार से जबाब चाहिए, शोषण और भ्रष्टाचार को लेकर आप कुछ करना चाहते हैं, खत्म करना चाहते हैं। लेकिन आप खुद एक रिज्यूमे भेजने वाले को पचासों बार दौड़ाएंगे, तब तक जब तक वो फोन या मेल करना न छोड़ दे। आप उससे कभी न नहीं बोलेंगे और समझने पर मजबूर करेंगे कि देख लेंगे का मतलब नजरअंदाज करना होता है। आप समाज को सिखाएंगे कि निडर बनो, विरोध करो और आपने पत्रकारिता को एक व्यवस्थित पेशा बनाने के क्रम में खुद इसके दरवाजे इतने छोटे कर दिए कि निहुरकर( झुककर) अंदर घुसना पड़े और इस क्रम में हम बिना रीढ़ के आदमी हो जाएं। ये तो हमने लिखा तो बात अकादमिक हलकों तक घसीटकर ले गए, क्योंकि आपने मेरी बातों का मेल या ब्ल़ॉग के जरिए बात करने से ज्यादा जरुरी समझा। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि अखबार में काम करनेवाला बंदा कितना निडर होकर लिख सकता है, मेरे जैसे को तो आपको निकालने में घंटा भर भी नहीं लगेगा। कुल मिलाकर आप समाज को समझाते रहिए व्यवस्था से लड़ना और विरोध करना और आपके हाउस में काम करने वाला बंदा पालतू बनता चला जाए और देखते-देखते इसकी एक फौज खड़ी हो जाए जो कि आपके मुताबिक काम करें अनुकूलित हो जाए, आपके हिसाब से। इसी के बूते क्रांति करेंगे आप। आपकी इस मान्यता को ब्लॉग ध्वस्त करता है आगे भी करेगा।
अखबार के मनमानेपन को हमने ट्रेस करना शुरु कर दिया है , उसकी मानसिकता से रुबरु हो रहा हूं और अब बेचारा पाठक की हैसियत से नहीं एक ब्लॉगर की हैसियत से लिख रहा हूं क्योंकि आपने खुद इसकी ताकत को हौसला दिया है। अनसुनी आवाजों को रोने की जरुरत नहीं कि वे कहां जाएं, हमें अपनी अभिव्यक्ति का औजार मिल गया है।
दबाब बनेंगें हमारे उपर, ये दबाब सत्ता की नहीं होगी, उस अखबार की होगी जो गलत के लिए लड़ता आया है लेकिन ब्लॉगिंग करते हुए इसे भी झेलना होगा, कई दबाब एक साथ लेकिन अब कीपैड भला कहां रुकनेवाला।
यशवंतदा सहित सारे ब्लॉगर साथियों से एक वादा कि अब ये कीपैड किसी मीडिया संस्था के नाम को लेकर नहीं । आप गारंटी देगें कि सारे लोग अपनी पहचान के पहले गर्व से बताना छोड़ देंगे कि मैं फलां हाउस में काम करता हूं।खैर., इसका मतलब ये भी नहीं कि भाषा उसकी जो सड़ी मानसिकता है, का समर्थन करेगी। माफ कीजिएगा, मैं कोई बड़ा बुद्धिजीवी आदमी नहीं कि भाषा में परिष्कार के नाम पर कूटनीति की भाषा ईजाद कर लूं। भाषा में कच्चापन होगा, हमेशा परिष्कृत ही हो , इसकी कोई गारंटी नहीं लेकिन मठाधीशी मानसिकता के खिलाफ होगी, इसकी सौ फीसदी की गारंटी है। रिसर्च फेलो हूं, क्रांति की शुरुआत जंतर-मंतर के पास चिल्लाने के लिए नारे लिखने से पहले डाटा कलेक्शन, आइडिंटीफिकेशन से होकर गुजरुंगा। हममें उन बुद्धिजीवियों की शक्ल न हीं देखें तो मेरे उपर एहसान होगा जो बदलाव तो चाहते हैं लेकिन शुरुआत दूसरों के घरों से करना चाहते हैं, शाकाहारी क्रांति में विश्वास रखते हैं। बड़े-बड़े मुद्दों पर बात करने से अपने घरेलू मुद्दे गायब हो जाते हैं जिसका कि अपने से सीधा सरोकार होता है। मैं बड़े मुद्दों पर गोलमोल लिख नहीं सकता।....लिखते हुए याद आ गया-
या तो अ ब स की तरह जीना है
या सुकरात की तरह जहर पीना है।।
कीपैड से लिखना बिजली चले जाने पर बंद भले ही हो जाए लेकिन वैसे तो कभी नहीं........
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