.

और एक बार फिर एक दलित भारतीय का सिस्टम से मोह भंग हुआ।..देश के और बेटियों के बाप की तरह एक और दलित लड़की के पिता को लगने लगा कि दलित के नाम पर जो कुछ भी किया जा रहा है वो सब पाखंड है। अगर वाकई दलितों की भलाई, समाज में दर्जा दिलाने और शोषण के खिलाफ कारवाई करने के कामों में तेजी आयी है तो कोई क्यों हमारी बच्ची को बेरहमी से पीटने और जलील करने के बाद भी छुट्टा घूम रहा है। सच मानिए दलितों के नाम पर राजनीति करने, घेराबेदी करने में और दलितों के लिए कुछ करने में बहुत फर्क है। ये बात अब हमको समझ में आने लगी है।

कल मैं कनकलता के बाबूजी से मिला। वही कनकलता जिसका जिक्र मैंने 5 मई की पोस्ट दलितों को गाली न भीदें, मार तो सकते ही हैं में किया था। जिसे कि मकान मालिक ने दलित जान लेने पर उसे और उसके भाई-बहनों को बुरी तरह पीटा था। मीडिया ने इसकी खबरें छापी और दिखाई भी थी।
कनकलता के बाबूजी सारा काम-धाम छोड़कर बोकारो से दिल्ली आ गए है और अभी तक जहां-तक की चक्कर लगा रहे हैं। उन्हें न्याय मिलता, इसके पहले ही कई कहानियां बन गयी।
पहली कहानी तो ये कि कनकलता और उसके भाई-बहन को मारने पर जो केस उसके मकान-मालिक के उपर बनी है वही केस उसके और उसके भाई -बहन के उपर भी लगी है। यानि कि इनलोगों ने भी मिलकर मकान-मालिक की पिटाई की है। इस बात से हैरान जब उसके बाबूजी ने थाने के लोगों से बातचीत की तो उनका जबाब था कि- छोटी लड़की तो फिर भी थोड़ी मजबूत है लेकिन बड़ी लड़की यानि कनकलता को देखकर नहीं लगता कि वो किसी को मार सकती है। काफी कमजोर है। लेकिन केस तो केस है और अब उसे अपने बाबूजी के साथ दोहरी लड़ाई लड़नी पड़ रही है। एक तो खुद को बचाने के लिए और दूसरा कि मकान मालिक को सजा दिलाने के लिए।
वस्तुस्थिति ये है कि माकान-मालिक और उनके घर के लोग खुल्ला घूम रहे हैं, उन्हें किसी बात का ड़र नहीं है। उल्टे,
इनलोगों को लोगों से धमकियां मिल रही हैं। बाहरी लोगों से दबाब बनाया जा रहा है। उन्हें समझौता कर लेने के लिए मजबूर किया जा रहा है। उन्हें कहा जा रहा है कि हम आपके बच्चों को उठवा लेंगे। राह चलते और थाने में जाकर कहा कि- केस करेगी, भगवान ने दलितों को न शक्ल ही दिया और न ही अक्ल।
इधर, बाप-बेटी का जहां-तहां चक्कर लगाते बुरा हाल है.बाबूजी को तो सबसे बड़ी हैरानी इस बात को लेकर है कि दिल्ली जैसे शहर में इतना सबकुछ हो गया और कोई कारवाई नहीं और उल्टे उन्हीं पर केस। दुखी होकर कहा- बताओ बेटा, एक लाख का ऑफर दे रहा है और कह रहा है कि कॉम्परमाइज कर लो। हम अपने बच्चों की इज्जत का सौदा करेंगे।
बेटी के साथ वो लगातार दूसरी जगहों के साथ-साथ लगातार यूनिवर्सिटी का चक्कर लगा रहे हैं। डूसू के लोगों से मिल रहे हैं जहां से उन्हें जबाब मिला है कि ये फैमिली मैटर है, इसमें वो क्या कर सकते हैं? शिक्षकों और विश्वविद्यालय प्रशासन से मिल रहे हैं। लेकिन इन सबसे एक टालू किस्म का जबाब मिल रहा है। कोई भी बात को सीरियसली नहीं ले रहा।
दलित-विमर्श के नाम पर सेमिनार में मंचों की रौनक बढ़ाने वाले लोग कटने लगे हैं। सहानुभूति और तर्क के अतिरिक्त उनके पास ऐसा कुछ भी नहीं है कि कनकलता की परेशानियों के बीच काम आए।

कितना खोखला है सबकुछ यहां, खाली दूर बैठकर देखने से ही लगता है कि दिल्ली में बहुत जागरुकता है, वहां लॉ- ऑर्डर ठीक से काम करता है। इस तरह की बातें जब उसके बाबूजी कर रहे थे तो हमारे पास कोई ठोस तर्क नहीं था कि हम उनकी बातों को काट सकें।
अब तक दसों लोगों के मां-बाप के सामने जो हम ढींग हांकते आए कि हमारी यूनिवर्सिटी में काफी कुछ बदल गया है. यहां हिन्दी में भी सिर्फ कविता-कहानी नहीं पढ़ाए जाते, अस्मिता विमर्श भी पढ़ाए जाते हैं, दलित मुद्दों पर रिसर्च का काम होता है और स्त्री- विमर्श के बारे में सबकुछ पढ़ना पड़ता है, सब बेकार लगने लगा। सब खोखला औऱ एक-दूसरे के परस्पर विरोधी।
पढ़ने-पढ़ाने के स्तर पर हम जो भी पढ़ लें। आइडेंटिटी पॉलिटिक्स से लेकर सोशल जस्टिस तक। लेकिन जब तक इसे महज कोर्स के रुप में देखते-समझते रहेंगे, तब तक दादू पढ़े या दलित विमर्श, क्या फर्क पड़ता है. जो कुछ भी हम पढ़ रहे हैं, सरकार जो भी स्लोगन बना रही है, अगर वो सबकुछ हमारी प्रैक्टिस में नहीं है तो फिर क्या मतलब है...। सही तो कहा बाबूजी ने कि सब पाखंड है।

...और इन सबके बीच अगर किसी के भी बाबूजी कहने लगें कि पूरे हिन्दुस्तान की हालत एक सी है, सब जगह दलाल बैठे हैं तो अपने प्रांत की शेखी बघारने, कोर्स अपडेट होने और दिल्ली मेरी जान कहने से पहले दस बार तो सोचना पड़ेगा ही और सोचना भी चाहिए।
| edit post
5 Response to 'दलित की इज्जत, लाख रुपये के भीतर ही'
  1. भुवनेश शर्मा
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/05/blog-post_20.html?showComment=1211283960000#c2854621820781052829'> 20 मई 2008 को 5:16 pm

    काहे का दिल्‍ली और काहे का देहात....चौपट राज में सब बराबर है गुरू
    .

    अंधेर नगरी में चमचमाती लाइटों और चिकनी सड़कों से बदलाव नहीं आता. चिराग तले अंधेरा ही रहता है.

     

  2. निशान्त
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/05/blog-post_20.html?showComment=1211323860000#c4592655797232795674'> 21 मई 2008 को 4:21 am

    यह हमारे ड्राइंग रूम और सेमिनार हाल की बौद्धिक दिखावे और दोगलेपन की निशानी है. पता नहीं कब जातिगत विसंगतियाँ दूर हो पाएँगी. इस समाचार के फोल्लो अप के लिए आभार.

     

  3. munna
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/05/blog-post_20.html?showComment=1211966400000#c4973414193246511512'> 28 मई 2008 को 2:50 pm

    ish hammam mein sabhi nange hain vineet bhai. abhi bhi kuch kaha ho raha hai ....kanak delhi rah ke jab ish isthiti ko jhel rahi hai to unki to baat hi rahne dijiye jo sudur dehat mein hain...khair achchi tippani ..kaash ye so called manu ki santane jamini haqiqat bhi dekhti ki unki rassi to jal hi gayi hai fir bhi pooch ki akad par lage hue hain...

     

  4. ganand
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/05/blog-post_20.html?showComment=1212070860000#c8434338720778971720'> 29 मई 2008 को 7:51 pm

    आप बिल्कुल सही कह रहे हैं , सब दलित के ऊपर सोध करने वाले जब "ground work" करने की बात आती है टू कन्नी काट लेते हैं. वैसे उनका लगाव दलित से नही होता है, बल्कि दलित का नाम ले ले कर अपना पेट भरने के लिए रिसर्च और किताबें लिखते हैं, भाषण देते हैं . और भइया जब काम का समय आया टू जय रामजी की बोल के निकल लेते हैं . खैर छोडिये इन बातों को बताये जाए की आपलोग क्या करने का सोच रहे हैं. हम रस्थ्राव्यापी आन्दोलन छेड़ेंगे इसके खिलाफ . आपकी योजना हमे बताएं हम अपनी मित्र मंडली को भी इसमें शामिल करेंगे . आप मेल से हमे सूचित कर सकते हैं anand_guneshwar[at]yahoo[dot]co[dot]in
    please replace [at] by @ and [dot] by .
    kya ham is sandarbh mein RTI file kar sakte hain ?

    Guneshwar Anand.

     

  5. DHINGAN
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/05/blog-post_20.html?showComment=1277102712725#c2828778968967029083'> 21 जून 2010 को 12:15 pm

    Thanks for your blog. Every dalit is being exploited in India. It is my suggestion we should start inter-caste marriages within sc/st/obc and converted dalits to sikh and christens religion by doing this we will become relatives of each other and then we can fight against upper caste.

     

एक टिप्पणी भेजें