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हद है, मुसलमान होकर भी चिकन बनाना नहीं जानता। गए थे, बहुत नाम सुन रखा था, भरोसा करके कि कुछ खास होगा। साढ़े चार सौ रुपये बर्बाद हो गए।
ये दास्तान है हॉस्टल के हमारे दूसरे साथी की जो कुछ दिनों पहले मेस बंद होने की वजह से बाहर खाने गए थे। चांदनी चौक के उस रेस्तरां में जिसका उन्होंने बहुत नाम सुन रखा था। दि हिन्दू में रिव्यू भी पढ़ी थी उसने। लेकिन आज बहुत खुन्नस खाए हुए थे। उनका कहना बिल्कुल साफ था कि- अब गलती से भी कभी नहीं जाएंगे वहां और किसी को जाने की राय भी नहीं देंगे। मैंने उनसे कहा भी कि हो सकता है आज ऐसा हो गया हो, नाम तो मैंने भी सुना है बहुत वहां का। यहां तक कि लोग बताते हैं जब शाहरुख या रानी मुखर्जी दिल्ली आने पर तो वहां एक बार जरुर खाते हैं। कुछ तो बात होगी, तभी तो।..वो बंदा गरम था, अजी खास होगा कच्चू। चावल वैसा ही घटिया और चिकन की पीस, ओह नाम मत लीजिए। बेकार में इतना नाम है।
भाई साहब जिसका नाम ले रहे हैं,वाकई वो दिल्ली का मशहूर नॉनवेज रेस्तरॉ है। दिल्ली क्या नॉनवेज के शौकीन लोग दिल्ली के बाहर भी इसका नाम अलापते हैं। मैं कभी वहां गया ही नहीं। एक बार सीएसडीस-सराय के वर्कशॉप के तहत वहां जाना भी होता कि बैंग्लूर से आयी मीरा हमें परांठेवाली गली लेकर चली गयी। उसने कहा जब नॉनवेज खाना ही नहीं है तो वहां जाकर क्या करोगे। लोगों ने बताया कि नहीं वहां तो वेज भी मिलते हैं लेकिन उसका कहना था कि जब वेज ही खाना है तो फिर वहां क्यों। सो, मैं वहां गया नहीं.
बंदे की शिकायत रही कि मुसलमान होकर भी नॉनवेज ठीक से बनाना नहीं जानता जबकि मीरा की जिद थी कि जब वेज ही खाना है तो वहां क्यों जाओगे। इसका एक मतलब तो ये भी निकला कि मुसलमान को जरुरी तौर पर बढ़िया नॉनवेज बनाने आना चाहिए जबकि वो बेहतर वेज बना ही नहीं सकते. यानि खाने को लेकर समुदाय विशेष के प्रति लोगों का नजरिया बरकरार है।
इसी तरह आप कहते सुन जाएंगे कि- अजी मछली खानी हो तो बंगाली या मैथिल के हाथ की खाओ। जाहिर है इडली और सांभर-बड़े के लिए आप दक्षिण भारतीयों का नाम लेंगे।...और इसी तरह एक लम्बी फेहरिस्त होगी।
बाजार भी इसी मानसिकता को बेहतर तरीके से समझती है क्योंकि बाजार ग्राहकों की मानसिकता के हिसाब से चले बिना बिजनेस कर ही नहीं सकता। इसलिए आप देखेंगे कि दिल्ली में पंजाबी, हरियाणवी कल्चर की प्रमुखता के वाबजूद भी जब दही की बात आती है तो मदर डेरी की- मिष्टी दोई हो जाती है। बाकी चीजें और चीजों के नाम दिल्ली और उसके आस-पास के इलाकों के कल्चर के हिसाब से ही तय होते हैं।
इसकी एक बड़ी वजह तो ये होती है कि जो चीजें जहां प्रमुखता से इस्तेमाल होती है, उनका प्रोडक्शन होता है या फिर वहां के जीवन का एक हिस्सा है, बाजार उसे सतर्कता से अपने में शामिल कर लेता है और एक आम ग्राहक के विश्वास को विज्ञापन में बदल देता है.
मैं जब बिहार के कस्बों में जाता हूं तो लोग गलियों में खोंमचे लगाकर चिल्लाते दिख जाते हैं- मथुरा के पेड़े ले लो। ये लो इलाहाबादी अमरुद. जबकि दोनों में से वो चीजें वहां की नहीं होती. देखते-देखते बेचनेवाले और खरीदनेवाले के बीच एक प्रैक्टिस सी हो जाती है- वहां का नहीं भी होने पर वहां की बताकर बेचना और वहां की नहीं होने पर ये जानते हुए भी खरीदना. जब कभी कोई कहीं का नहीं बताकर सीधे-सीधे कहता है- मीठे, रसीले या फिर और कुछ तो कई लोगों को पूछते देखा है, कहां का है भईया, अमरुद इलाहाबादी है क्या और वो हां कहता है और खरीददार मुस्कराकर रह जाता है।
हिन्दुस्तान में चीजों के उत्पादन, बिक्री और उसकी खरीददारी पर आप एक नजर डालेंगे तो आपको अंदाजा लग जाएगा कि यहां का बाजार इसी स्थानीयता बोध,सामुदाय विशेष और जातिगत आधार पर निर्मित है। आप रेडिकल होकर कह सकते हैं कि जिस जातिवाद और क्षेत्रवाद को समाज का कलंक मानकर सोशल साइंटिस्ट खत्म करने की बात करते हैं, बाजार उसे दुर्गुण न मानकर कन्ज्यूमरिज्म के स्तर पर मजबूत करना चाहता है.
एक मुसलमान से किसी को लगाव भले ही न हो, एक बंगाली के विचारों से असहमति भले ही हो, मथुरा जाने पर पाकेटमारी का भय भले ही बना रहे लेकिन चिकन और मटन, मिष्टी दोई और रोसगुल्ला और पेड़े के प्रति विश्वसनियता की बात आती है तो आप इनके मुरीद हो जाते हैं। बाजार इस मानसिकता को लम्बे समय से मजबूत करता आया है। इसलिए पुश्तैनी बिजनेस का कॉन्सेप्ट लम्बे समय तक चलता रहा है।
एक पंडितजी की चाय अच्छी होने पर पूरे उत्तरांचल के लोगों को चाय बनाने में सिद्धस्थ मान लेते हैं।...और आप देखेंगे कि डीयू में सारे टी स्टॉल का नाम लगभग पंडितजी की कैंटीन के आसपास ही है। पुश्तैनी और जातिगत आधार पर बाजार का असर इतना है कि कोई राजस्थानी है औऱ उसके पुरखे लम्बे समय तक नमकीन का रोजगार करते आए तो वो ग्लोबल ब्रांडिंग भी उसी शर्त पर करता है। उत्पादन की तकनीक, पैकिंग और विज्ञापन के पूरी तरह बदल जाने के बाद भी पोस्टर या पैकेट के कोने में अपने परदादा की मूंछ पर ताव देती तस्वीर या फिर नाम डालता है। यही उनका लोगो है और ब्रांड प्रोमोशन के टूल्स भी।
जाति,समुदाय, प्रांत और क्षेत्र के एलिमेंट्स को लेकर बाजार जो काम करता है उसे आप क्या कहेंगे कि ये जाति, क्षेत्र और प्रांत की फीलिंग को मजबूत करता है। अगर ऐसा है तब तो चिकन खानेवाले बंदे की धारणा के टूटने के साथ ही जातिगत मानसिकता से मुक्त हो जाना चाहिए। बिहारी-बंगाली का भी झमेला खत्म हो जाना चाहिए।
दूसरी तरफ जिस बाजार की बात मानकर आप मिष्टी दोई और साउथ इंडियन रेस्तरां में जाकर छोटू न बोलकर अन्ना बोल रहे हैं तो भाषा और क्षेत्रवाद का झमेला भी खत्म हो जाना चाहिए. लेकिन ऐसा होता है। नहीं न...आप कोई राय बना ही नहीं सकते कि कहां, कहां बाजार इसे मजबूत करता है और कहां इसे धवस्त करता है लेकिन कुछ करता तो जरुर है। तब तक...
ये है मीना बाजार तू देख बबुआ।
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3 Response to 'मुसलमान बनाएंगे चिकन और हिन्दू सिर्फ सोहनहलवा'
  1. कुश एक खूबसूरत ख्याल
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/05/blog-post_08.html?showComment=1210234140000#c9085879761530829709'> 8 मई 2008 को 1:39 pm

    बिल्कुल ठीक कहा आपने..

     

  2. bhuvnesh
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/05/blog-post_08.html?showComment=1210239480000#c4021359520154503324'> 8 मई 2008 को 3:08 pm

    क्‍या खूब पकड़ा आपने.

    मेरे मुरैना श‍हर की गजक भी बहुत प्रसिद्ध है और नाम से बिकती है. ग्‍वालियर में कई दुकानों पर लिखा दिखेगा कि- 'मुरैना की असली गजक' जबकि होती वो वहीं की है.

    बाजार को फायदे से मतलब है जैसे भी हो.

     

  3. हरिमोहन सिंह
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/05/blog-post_08.html?showComment=1210252620000#c7670607793388543290'> 8 मई 2008 को 6:47 pm

    बढिया बात खोद निकाली है आपने । हमारा भी ज्ञान बढा

     

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