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अवीनाश, भडास, एन डी टी वी ओर हिन्दी ब्लोगजगत पोस्ट में खुल के बोल ने लिखा कि
हिंन्दी ब्लॉगिंग के 5000 ब्लॉग्स मे से सिर्फ दोमोहल्ला और भड़ास ही दर्शकों तक पहुँचाये गये इसके अलावा अविनाश के करीबी यार रवीश , का ब्लॉग कस्बा का पता दिखाया गया
उनकी शिकायत है कि बाकी लोग कहां गए।...
खुल के बोल की जो पीड़ा है, इसे मैं पीड़ा न कहकर मलाल कहूं तो ज्यादा बेहतर होगा क्योंकि पीड़ा खुल के बोल को बहुत ही निरीह और असहाय बना देगा जो कि वो हैं नहीं। खैर, खुल के बोल का जो मलाल है वो हिन्दी समाज के लिए नया नहीं है। हिन्दी समाज इसका पुराना मरीज और मुरीद रहा है। आप एक राउंड लगा आइए हिन्दी वालों के बीच आपको इसका अंदाजा लग जाएगा कि हिन्दी समाज में ९० प्रतिशत से ज्यादा लोग मलाल और कुंठा में जीते हैं और इस बीच अगर कुछ लिखते भी है तो इससे गुजरते हुए। स्थापित तो स्थापित जिन्हें अभी लिखना शुरु किए जुम्मा-जुम्मा चार दिन भी नहीं हुए वो आपको कहता मिल जाएगा-
देखिए जी, दस कहानियां लिख चुका, अभी तक राजेन्द्रजी ने कहीं कुछ कहा ही नहीं मेरे बारे में। पचासों कविताएं छप चुकी है, नामवरजी ने कभी नोटिस नहीं ली। अब तक पता नहीं किस मसले पर लिखता रहा लेकिन जैसे ही उसके दिमाग में ये बात आनी शुरु हो जाती है कि उसकी कोई नोटिस नहीं ले रहा, आगे से चाहे वो जिस किसी मुद्दे पर लिखे, उसमें जाने-अनजाने कुंठा,मलाल, नोटिस होने की छटपटाहट घुलने लगा जाती है। ये कितना सही है या गलत, पता नहीं लेकिन किताबी ज्ञान की बात करुं तो मम्मट, भामह से लेकर नए आचार्यों ने रचनाकार की उपलब्धि में बाकी चीजों के साथ यश की प्राप्ति बताया है। कोई बंदा इनके शास्त्र न भी पढ़ा हो तो लिखनेवालों के बीच यश पाने की लालसा जन्मजात होती है, यानि जब से वो लिखना शुरु करता है। इसका नतीजा होता है कि कई बार लिखनेवाले की रचना उसके मुद्दे और लिखने की वजह से खिसकते चले जाते हैं। कई उभरते रचनाकार इस हादसे के शिकार हो चुके हैं। जिन्हें इस बात का एहसास होने लगा कि नोटिस होने के लिए कुछ अलग लिखो, उटपटांग भी लिखो यो फिर नोटिस में आ गए हो तो नोटिस में बने रहने के लिए लिखो। ऐसे में वो अपने भीतर ही आए दिन अपने से लड़ता है, अपनी कुंठा से लड़ता है।
मैंने अपने एम.ए की पढ़ाई के दौरान कुछ ऐसे भी मास्टरों से शिक्षा ली है जिनका मलाल बना रहा कि उन्होंने कविता पर और वादों ( इज्म) पर इतनी सारी किताबें लिख दीं लेकिन साहित्य के इतिहासकारों ने उनके बारे में एक भी शब्द नहीं लिखा. एक दो ऐसे विद्वान और हिन्दी के बाबा मिल जाएंगे जिन्हें इस बात का मलाल है कि उनसे टटपूंजिए लोग प्रोफेसर बन गए और वो रीडर से ही रिटायर हो गए।... और उनकी ये कुंठा और मलाल इनकी राइटिंग में इतनी हावी हो जाती है कि वो हमें बता ही नहीं पाते कि वो कहना क्या चाह रहे हैं. मुद्दे से फिसलना इसे ही कहते हैं।
खुल के बोल जिस बात को आज रख रहे हैं कि ५००० ब्लॉगों के बीच केवल तीन ही चार ब्लॉग हैं जिसकी चर्चा एक नेशनल चैनल में की जानी चाहिए, ये मसला भी नहीं है। इनकी तरह मैं भी जब नया-नया ब्लॉग की दुनिया में आया तो नीलिमा के एक लेख पर गहरी आपत्ति दर्ज की थी कि उन्होंने करीब आठ-दस पन्ने में जो लेख लिखा उसमें मोहल्ला जैसे चर्चित ब्लॉग की कहीं कोई चर्चा ही नहीं की। मैं इस बात को पचा ही नहीं पा रहा था कि इतने पॉपुलर ब्लॉग को कोई कैसे छोड़ सकता है र तब मैंने मोहल्ला पर ही पोस्ट लिखी। वो लेख भी देशभर में बिकनेवाली नए विमर्शों की त्रैमासिक वाक् में छपी थी।... लेकिन धीरे- धीरे मैं समझने लगा कि हम या हम जैसे कोई भी नए लोग जब ब्लॉग की दुनिया में आते हैं तो उसे बहुत ही मासूम और इन्सेंट माध्यम मानने लगते हैं। इसी क्रम में,
कलम छोड़कर जब लोगों ने कीबोर्ड थामा तो एकबारगी तो ऐसा लगा कि अब हिन्दी समाज हीनता की ग्रंथि जल्द ही मुक्त हो जाएगा। क्योंकि अब कतरन फाड़कर दिखानेवाले भी औकात में जाएंगें जो अबतक मुनादी किए फिरते थे कि देखोजी, हमारा छपा है। यहां तो मामला एकदम से साफ है कि जिसको लिखना है लिखे, जैसा चाहे लिखे। जिसमें औकात होगी, उसे लोग पढ़ेंगे। संपादक जैसे किसी भी नॉलेज ब्राकर की जरुरत नहीं है। आप ही लेखक, आप ही संपादक और जो कुछ भी आर्थिक मुनाफा होगा, उसके हकदार आप ही। लेकिन, फिर उस कहावत का क्या होता-
चल जाओ चाहे नेपाल, रहेगा वही कपाल।
आमतौर पर हिन्दी समाज में कोई विचारधारा या तकनीक आती है तो उससे इस बात की उम्मीद कर ली जाती है कि अब क्या, इसके आते ही सारी झंझटें दूर हो जाएंगी। परिवार से लेकर व्यक्तिगत कुंठा तक सारी चीजें दूर हो जाएंगी। जबकि सच्चाई ये है कि जब भी हम किसी चीज को अपनाते हैं तो उसे अपनी मानसिकता के साथ शामिल करते हैं। इसलिए माध्यम के बदल जाने से कोई खास फर्क नहीं पड़ता।
हिन्दी समाज में पॉपुलर होने का बहुत ही सीधा फंड़ा है। शुरु में लात खाओ और बाद में लात मारने की कला सीखो और फिर लात मारने और गलती से खा लेने पर बर्दाश्त करने की कला सीखो। इसे आप बने रहने का बेसिक फंड़ा भी कह सकते हैं और इसी में अगर बरकत होती रही तो बने रहने से आगे की स्टेप जिसे अपनी भाषा में मठाधीशी भी कहते हैं। इस फार्मूले के तहत लिखते-पढ़ते रहने से कभी मलाल नहीं होता, कुंठा कभी पनपने नहीं पाती।
खुल के बोल वाले भायजी अगर आप इतनी बात समझते हैं, समझते तो हैं ही, बस ध्यान से उतर गया होगा तो अब आपको समझने में कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए कि पांच हजार के ब्लॉग के बीच तीन ही क्यों।...और जबाब मिलते ही मलाल थूक दीजिएगा, प्लीज....।।।
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10 Response to 'कहीं कुंठा की बलि न चढ़ जाए ब्लॉगजगत'
  1. सुशील कुमार
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/05/5000.html?showComment=1209885420000#c6720715437685360318'> 4 मई 2008 को 12:47 pm

    कोई नोटिस ले या ना ले विनीत ने तो लिया। "खुल के बोल" भईया. अब खुश।

     

  2. nadeem
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/05/5000.html?showComment=1209887160000#c9184481445203763846'> 4 मई 2008 को 1:16 pm

    क्षमा चाहूँगा मगर या तो मुझमें बुद्धि कम है या शायद आप सही से समझा नहीं पाए. मुझे लगता है पहले ''खुल के बोल भाई'' का लेख पहले पढना पड़ेगा.

     

  3. इरफान
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/05/5000.html?showComment=1209895020000#c6233984306019168752'> 4 मई 2008 को 3:27 pm

    मम्मट, लोलट और भामा की याद प्रासंगिक है.

     

  4. Suresh Chiplunkar
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/05/5000.html?showComment=1209898740000#c3368907525957586925'> 4 मई 2008 को 4:29 pm

    हमेशा की तरह जबरदस्त विश्लेषण, कायल हो गया साहब मैं आपका। और NDTV के बारे में कुछ कहना तो बेकार ही है…

     

  5. ajeet
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/05/5000.html?showComment=1209901080000#c4658524852281512290'> 4 मई 2008 को 5:08 pm

    नमस्कार विनीत भाई,

    कुंठा का बड़ा ही मनोहारी मनोविज्ञान गढ़अ है आपने खासकर हिन्दी समाज के बारे में. लेकिन ये नोटिस न लेने वाली कुंठा कहीं न कहीं आपमें भी नजर आती है तब जबकि आपका मोहल्ले में प्रकाशित लेख किसी देशभर में बिकनेवाली नए विमर्शों की त्रैमासिक वाक् में छपा है. वैसे मैंने आपके लेखों में एक बात जो बहुत गौर करने लायक देखी है वो हिन्दी मीडिया, हिन्दी साहित्य, हिन्दी समाज के प्रति हिकारत भरी नजर और साथ में अंग्रेजी भाषियों के प्रति अतिशय सम्मान है. आप तो जानते ही हैं की हम हिन्दी भाषियों की जन्मजात कमजोरी है की जो हमें गरियाते हैं हम उन्हें बहुत ही तेजी से नोटिस करते हैं जबकि अंग्रेजी भाषियों में मामला ठीक इसके उलट ही है जहाँ ऐसी बातों को खासकर नोटिस नहीं लिया जाता है. जाहिर है आप भी वही कर रहे हैं. लेकिन विनीत बाबू, इतना जरूर कहना चाहूँगा कि इतनी आत्ममुग्धता अच्छी नहीं है जिसमें आप सरकारी दामाद हैं और बाकी सारा हिन्दी समाज कुंठाग्रस्त नजर आ रहा है. जानता हूँ की आप ऐसी टिपण्णी को देखकर मुझे भी कुंठाग्रस्त कहेंगे तो भैये हाँ मैं कुंठाग्रस्त हूँ और आश्चर्यजनक रूप से खुश भी क्यूंकि हम हिन्दीभाषियों का ये भी एक तरीका है कुंठाग्रस्त रहने का.

    आशा है की आप किसी भी बात को अन्यथा न लेते हुए कुंठाशास्त्र को और वृहद् रूप प्रदान करते हुए एक स्वस्थ और समवेत टिपण्णी की तरह ही लेंगे.

    आपका अजीत

     

  6. विनीत कुमार
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/05/5000.html?showComment=1209912840000#c8488024708016907831'> 4 मई 2008 को 8:24 pm

    ajitji, mai jo bhi baate likhta hu usme aisa nahi hota ki mai usse alag ivory tower par baitha hota hoo,aap chahe to kah le aur kaha bhi hai ki mai bhi kunthit hoo lekin is kuntha ke beech kuch kah gujarne ka saahas paida ho jaayae to kya bura hai. abbal to hum maante hi nahi ki hum aise hai. hindi se mujhe bhi utna hi pyar hai jitna ki ek sarkari daamaad ke naate hona chaahiyae lekin asahmati to likhni hi hogi.
    aur aapki baat ka bura kya maanna, blog me to yahi maja hai ki yaha maar-kaat machao aur milne par kahi ajit sirji ghar kab bula rahe ho. vichaaro ki asahmati ke saath sambandho ki madhurta me hi apna visvaas hai aur aise hi jeena pasand karta hoo

     

  7. विनीत कुमार
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/05/5000.html?showComment=1209913140000#c1464053638784462305'> 4 मई 2008 को 8:29 pm

    आपने गलत समझा, वाक् में लेख मैंने नहीं लिखा था, लेख तो नीलिमा ने लिखा, जिसकी प्रतिक्रिया मैंने मोहल्ला पर दी थी। आप इसे सुधारकर पढ़ेगें, प्लीज।

     

  8. ajeet
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/05/5000.html?showComment=1209928080000#c6537538062551712925'> 5 मई 2008 को 12:38 am

    विनीत भाई,

    आपका बहुत-बहुत शुक्रिया कि आपने टिपण्णी को अन्यथा न लेते हुए असहमति को विमर्ष का कारक कहकर बहुत ही सकारात्मक तरीके से लिया है और जो ब्लॉगजगत के लिए बहुत ही जरुरी है. लेकिन यहाँ जो जूतम-पैजार मची हुई है उसका क्या? कोई भी मुद्दों को लेकर गंभीर नहीं है सबके-सब विमर्ष के नाम पर एक-दूसरे कि धोती खींचने में लगे हुए हैं. जब ब्लॉगजगत का सदुपयोग करते हुए विमर्ष के साथ-साथ मुद्दों के हल की बात करिये तो ज्यादातर बगलें झाँकने लगते हैं. हम तो बस लिख सकते हैं जैसा रटअ-रटाया जवाब देते हुए उनके अन्दर का डर साफ दिखता है की जब मुद्दे ही नहीं रहेंगे तो बौद्धिक जुगाली के नाम पर अपने बुध्हिजिवी होने का ढिंढोरा कैसे पीटेंगे, बहुत कुछ वैसे ही जैसे नेता कहते हैं की जब मुद्दे ही नहीं रहेंगे तो हम चुनाव कैसे लडेंगे. तो बंधु सार-संक्षेप यही है की तथाकथित बुध्हिजिवियों का प्रयास यही है की जैसे भी करके मुद्दों को बने रहने देना है. फकत कल्पना करिये की जब जातिवाद ही न रहेगा तो मंडल जी जैसों का क्या होगा (मंडल जी से माफ़ी चाहूँगा लेकिन बात को बल देने के लिए कहना पड़ रहा है). खैर इन्हीं सबके बीच कुछ ब्लॉगर हैं जो सूचना के आदान-प्रदान के बीच मुद्दों पर विमर्ष और उनके हल की संभावनाएं भी जगाते हैं. लेकिन हिन्दी ब्लॉगजगत के लिए बहुत जरुरी है की पहले उपलब्ध सुविधाओं का दुरूपयोग करने की प्रवृति से उबरना होगा जिसकी पूरी सम्भावना हैं क्यूंकि मैं एक बहुत ही आशावादी व्यक्ति हूँ.

    और हाँ ग़लती का सुधार कर लिया है, ध्यान दिलाने का बहुत-बहुत शुक्रिया.

    अंत में असहमति के बीच संबंधों में मधुरता बनाये रखने के लिए घर कब बुला रहे हैं?

    आपका अजीत

     

  9. Suresh Chandra Gupta
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/05/5000.html?showComment=1209949920000#c8429633505694933049'> 5 मई 2008 को 6:42 am

    लोग किसलिए लिखते हैं, स्वयं के सुख के लिए या दूसरों से वाह वाही पाने के लिए? पहले वालों को तो कोई तकलीफ नहीं. पढ़ना है तो पढ़ो बरना आगे जाओ. दूसरों को जरूर है तकलीफ होगी. दूसरों से शाबाशी पाने के लिए लिखने में यह खतरा तो है.

    में तो अकस्मात ही हिन्दी ब्लागजगत में आ गया. आकर देखा तो चकरा गया. इंटरनेट भरा पड़ा है हिन्दी ब्लाग लेखन से. बहुत सारे ग्रुप ब्लाग्स हैं जिनमें केवल ग्रुप मेम्बर्स ही लिख सकते हैं. दूसरे केवल टिपण्णी कर सकते हैं. कहीं कहीं तो टिपण्णी भी मोडरेशन की दया पर है. एक अजीब तरह की सेंसरशिप नजर आई मुझे हिन्दी ब्लागजगत में. अभी तो नया हूँ, देखें आगे क्या होता है!

     

  10. खुल के बोल
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/05/5000.html?showComment=1209982140000#c186448732617399731'> 5 मई 2008 को 3:39 pm

    @सुशील कुमार ,
    खुश होने की कोई बात नही है , बात खेद की है कि जिनके पास माध्यम की शक्ति है वे उसके गलत इस्तेमाल मे लगे हैं ।

    @अजीत
    आपसे सहमत हूँ ।

    @विनीत ,
    कुण्ठा ही ढूंढोगे तो वही दिखेगी , चिंता को तो तुम समझे ही नही । शायद इसका कारण तुम्हारा प्रो-मोहल्ला और प्रो-भड़ास होना है या एकतरफा विश्लेषण जो कि तुम हर पोस्ट में ठेलते हो ।
    भाया कभी कभी चश्मा बदल लेना चाहिये ।

    खैर , मैं तुम और बाकी हिन्दी जगत जल्द ही कुंठाओं से मुक्त होगा इसकी आशा है ।

     

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