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हादसे, हम और हमारे चैनल्स

Posted On 5:00 am by विनीत कुमार |

ैसहादसों की खबर दिखाते समय चैनलों का चरित्र बिल्कुल अलग हो जाता है। वो और दिनों की अपेक्षा ज्यादा ऑडिएंस प्रो हो जाते हैं। ज्यादा संवेदनशील, भावुक और शायराना हो जाते हैं। ऐसे समय में वो न केवल सूचना देने का काम कर रहे होते हैं बल्कि समाजसेवी की भूमिका में आ जाते हैं। वो आपसे शांति बनाए रखने की बात करते हैं, रक्तदान दान करने की बात करते हैं, मदद के लिए आगे आने की बात करते हैं। जहां हादसे हुए हैं वहां की एतिहासिकता की याद दिलाकर आपको ज़ज्बाती बनाने की कोशिश करते हैं, वो अपनी एकरिंग से आपको एक्टिवेट करने का काम करते हैं। वो सबकुछ करते हैं जिससे आपको पूरा भरोसा हो जाए कि इस मुश्किल घड़ी मे वो आपके साथ हैं।
ऐसे समय में हम इतने बदहवास होते हैं, इतने घबराए होते हैं कि लगता है कोई हमारे साथ हो, हमें बैकअप दे और मीडिया सबसे पहले बैकअप देनी शुरु कर देती है। वो आपको बताने लग जाती है कि किस हेल्पलाइन पर आप सम्पर्क कर सकते हैं। सलामती के लिए स्क्रीन पर पट्टियां चलने लग जाती है। मरनेवालों के प्रति संवेदना व्यक्त करते हैं और घायलों को बचाने में सूचना और सम्पर्क के जरिए बचाने में लग जाते हैं।
एक घड़ी को आपको लगने लग जाएगा कि वाकई मीडिया जनपक्षधरता को लेकर चलनेवाली चीज है। बाकी के दिनों में आप खबर के नाम पर खली, रैम्प, क्रिकेट औऱ मसाले दिखाए जाने से चिढ़े रहते हैं, आज आप ठीक इसके उलट हो जाते हैं। आप मीडिया के प्रति सहानुभूति रखते हैं कि ये भी बेचारे क्या करें। बने रहने के लिए ये सब करना पड़ता है।
इधर हर एक खबर के बाद विज्ञापन दिखाने वाले चैनल भी सतर्क हो जाते हैं. वो घंटेभर तक बिना विज्ञापन दिखाए सिर्फ खबरें दिखाते रहते हैं। ताकि आपके भीतर खीज पैदा न हो, आप भटके नहीं और झल्लाकर चैनल न बदल दें। बिना विज्ञापन के जब आप सिर्फ खबर देख रहे होते हैं तो खबरों के प्रति एक रिदम बनती है, आप डिस्ट्रैक्ट नहीं होते और आप खबरों में खुद भी शामिल हो जाते हैं। तभी आप भी हादसे को लेकर भावुक, बेचैन और संवेदनशील भी होते हैं. और दिनों की तरह डेड बॉडी को देखकर नाक-भौं सिकोड़ने की कोशिश नहीं करते। इसके बजाए आपमें ये भाव जगने लगता है कि आज जयपुर में हुआ है तो हो सकता है, कल को दिल्ली में या फिर अपने ही शहर में हो जाए। आपकी चिंता का दायरा बढ़ता है और आप आज से साठ-सत्तर या फिर उससे भी पहले के इंसान बनने लग जाते हैं जहां मानवीयता एक मूल्य के रुप में मानी जाती रही है. साल में एक-दो मौके ऐसे आ ही जाते हैं जबकि हम सेल्फ से हटकर अदर्स पर आकर सोचना शुरु करते हैं। और ऐसे में चैनल भी आपको उसी ओर ले जाए तो आपको और भी अच्छा लगता है।
हादसे की इस घड़ी में आपकी मनःस्थिति और चैनल की रणनीति में कोई फर्क नहीं होता। आप भी सिर्फ और सिर्फ इंसानियत की बात सोचते हैं और चैनल भी. इसलिए दोनों को एक होने में वक्त नहीं लगता और फिर आपको पता भी नहीं चलता और ये चैनल आपकी भाषा बोलने लग जाते हैं और आप भावुक हो उठते हैं।
विज्ञापन नहीं होने की वजह से आपको चैनल को भी समझने का पूरा मौका मिलता है। क्योंकि इस बीच चैनल जो अपने कार्यक्रमों का विज्ञापन देते हैं वो आपको ठीक-ठीक समझ में आता है। वस्तु विज्ञापनों के बीच वो मिक्स नहीं होते। चैनल की सही पह इन्हीं हादसों के बीच बनती है। आप पूरी तरह आश्वस्त हो जाते हैं कि मीडिया जनपक्षधरता को तबज्जो देती है। ये चैनलों की महानता ही है कि इस दिन चड्डी, चप्पल और ठंड़ा न बेचकर हमें हालात से रुबरु कराती है।
इसके बाद मामला धीरे-धीरे बदलने लग जाता है। चैनल को जब ये भरोसा हो जाता है कि हमारी ऑडिएंस खबरों में पूरी तरह घुस चुकी है तो फिर उनका कुछ कलाबाजी करने का मन कर जाता है. क्योंकि जिस मीडिया की आदत में शामिल है, कलाबाजी दिखाना वो भला कितनी देर तक एक खबर को लेकर मौन बनी रहेगी।...और आप देखेंगे कि यहीं से हादसे की खबर कहीं और लग जाती है।
सबसे पहले सरकारी बयान शुरु होते हैं। राहत एवं बचाव कार्य के साथ मुआवजे की घोषणा हो जाए जिससे आम आदमी का गुस्सा थोड़ी देर के लिए थमे। सरकार के प्रति हमारा भरोसा बने। लेकिन फिर ऐसा न हो जाए कि आप पूरी तरह सरकार के भक्त ही हो जाएं। इसके लिए जरुरी है कि विपक्षी पार्टियों की बाइट सुनायी जाए। इससे आपको अंदाजा लग जाएगा कि गड़बड़ी कहां-कहां थी। आप इस बात का भी अंदाजा लगाने लग जाएंगे कि सरकारी लापरवाही के कारण ऐसा हुआ। अगर सरकारी सचेत रहती तो हमारे भाई और माताओं की जान जाने से बच जाती। आप इतने बौखलाए होते हैं कि आपका मन करता है कि अपना गुस्सा किस पर उतारें। आप विपक्षी पार्टियों की बाइट सुनकर सरकार के विरोध में चले जाते हैं। आपको लगने लग जाता है कि सरकार ने ही सब नरक किया है. आप कोसने लग जाते हैं, गरिआते हैं और आपका मन करता है कि सरकार को सड़क पर खींच लाएं और जनता की क्या औकात हैं उन्हें बताएं। लेकिन आप इतना ज्यादा टेंपर न हो जाएं कि आप देशद्रोही हो जाएं, अपने देश और वहां की सरकार के खिलाफ हो जाएं और बौखलाहट में देशविरोधी कारवाइयों को अंजाम न देने लग जाएं।
इसलिए तभी,
आप देखेंगे कि किसी आतंकवादी संगठन का नाम फ्लैश होने लग जाता है और उसके साथ किसी विदेशी शक्ति के हाथ होने की बात की जाने लगती है। आपका पूरा गुस्सा विदेशियों और आतंकवादी संगठनों पर शिफ्ट हो जाता है. आप पूरी तरह भारतीय होने लग जाते हैं। आप देश के लिए मर-मिटने को तैयार हो जाते हैं। चैनल जब आपसे ये कहता है कि इन आतंकवादियों के नापाक इरादों को हम कामयाब नहीं होने देगें। ये सवाल सिर्फ जयपुर का नहीं है पूरे देख का है तो एकबार फिर आप जोश से भर जाते हैं और आपमें नेशनल होने का बोध हो जाता है। चैनल आपकी इस पूरी मानसिकता के साथ चलता है या यों कहें कि चैनल और आप दोनों एकददूसरे की मानसिकता के साथ चलने लग जाते हैं।
लेकिन इसी बीच चैनल की जज्बाती एंकरिंग के बीच की मदद में आए सैंकड़ों हाथ, कोई मेडिकल स्टूडेंट जिसे की बचाव एवं सेवा कार्य में लगाया गया है, बड़े ही साफ शब्दों में कहने लग जाती है कि- नहीं मदद के लिए बहुत कम लोग आगे आ रहे हैं। हजार में से दस लोग आ रहे हैं खून देने और तब पीछे से आवाज आने पर फिर सुधार कर बोलती है कि नहीं दस भी नहीं आ रहे हैं। तब आपको एहसास होगा कि चैनल कुछ ज्यादा ही ज़ज्बाती हो गए। वो वस्तुस्थिति को धकेलकर मानवता का पाठ उच्चार रहे हैं।
ये सब करते-कराते हम, आप और चैनल खबरों से इतनी दूर चले जाते हैं, इतने साहित्यिक और भावुक हो जाते हैं। सच जानने के नाम पर इतने पॉलिटिकल होते चले जाते हैं कि हमारी सारी समझ मरनेवालों की संख्या, मुआवजे और दिया न रे बाबा के बीच उलझकर रह जाती है। सारा मामला इतना गोलमोल हो जाता है कि ही नहीं चल पाता, एक आम आदमी को समझ में ही नहीं आता कि को चैनल ने जो ज़ज्बाती घुट्टी दी है उसे लेना कैसे है और जो बातें होती रही उसका जमीनी अर्थ क्या है. ....और इतना थक भी तो जाते हैं कि इंसानी चीख शोर लगने लग जाते हैं।
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2 Response to 'हादसे, हम और हमारे चैनल्स'

  1. प्रभाकर पाण्डेय
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/05/blog-post_1882.html?showComment=1210818480000#c5182094541121869228'> 15 मई 2008 को 7:58 am

    सटीक और तार्किक विश्लेषण।

     

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