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तुम्हें कुछ भी पता है न मां

Posted On 10:57 am by विनीत कुमार |

तुम जैसे पढ़े-लिखे आदमी के आगे हम जैसे अनपढ आदमी के बीन बजाने का कोई फायदा नहीं है। तुम वही करोगे जो तुम्हारा मन होगा। इतना कहने के वाबजूद भी वो फोन पर अक्सर दुनिया भर की नसीहतें झोंक देती हैं। खाने-पीने पर ध्यान देना,बिना बात के किसी से मत उलझना,पैसे बचाना मत जो मन आए खाना-पीना। कोई लादकर थोड़े ही ले जाता है। इधर भइया ने जबसे बताया है कि मैं इनटरनेट पर किसी-किसी के बारे में कुछ लिख देता हूं तो वो घबरा जाती है।
किसी के खिलाफ तुम लिखते हो तो वो तुमको चुम्मा थोड़े ही लेगा। कभी कभी आंख पर चढ़ा लेगा. बेकार में काहे दुश्मनी मोल लेते हो. तुम बस अपने कोर्स का लिखा-पढ़ी करो। दुनिया का अखबार गलत-सलत छापता है,बेटी बहू के साथ बैठकर देखने लायक प्रोग्राम टीवी पर नहीं आता है तो क्या तुम सबको सुधार लेने का ठेका ले रखे हो। बहुत डरती है वो कि मेरे लिखने पर कोई दुश्मनी निकाल ले।
आपकी जिंदगी में टीवी और रेडियो का कितना असर है , मैं नहीं जानता। लेकिन मेरे रोज की रुटिन का अच्छा-खासा समय टीवी और रेडियो के उपर जाता है. शाम के सात बजे के बाद मैं सिर्फ टीवी देखता हूं, उनके कार्यकर्मों की रिकॉर्डिंग करता हूं। मुझे बाहयात प्रोग्रामों को देखने पर भी संतोष मिलता है कि चलो आज भी किसी के खिलाफ जबरदस्ती का मोर्चा खोलने से बच गया। आज भी वेवजह किसी की शिकायत किसी से नहीं की। हॉस्टल से बाहर जितने समय तक रहता हूं, रेडियों सुनता हूं। ऐसा करने से एक अलग ढ़ंग का उत्साह बना रहता है। मेरे लिए एक थेरेपी है इन्हें सुनना और देखना. मेरे कई फैसले टीवी और रेडियो से तय होते हैं। कल की ही बात लीजिए न।...
मुझे नहीं पता कि मदर्स डे का क्या इतिहास है। स्टार प्लस पर जब मंदिरा ने कहा कि ये हमारे कैलेंडर का सबसे इम्पार्टेंट डे है तो मैं चौक गया कि भई किस कलेंडर में लिखा है। घर में रहा तो ठाकुर पंचाग को पलटता या फिर एलआइसी के कलेंडर और यहां हूं तो मंत्रालय के कलेंडर लेकिन दोनों में से कहीं भी इसका कोई जिक्र नहीं है। लेकिन रात के दस बजे से साढ़े ग्यारह बजे तक स्टार प्लस ने मदर्स डे स्पेशल के नाम पर जो जीता वही सुपरस्टार में ऑडिएंस को सेंटी करने की कोशिश की, उसका शिकार मैं भी हो गया।
विनीत,राजा, अभिजीत सामंत की तरह मैं कोई सिलेब्रेटी तो नहीं बन पाया कि मैं स्क्रीन पर दूर बैठी मां को मैसेज दे सकूं लेकिन उन सबकी मां और मेरी मां कॉमन है क्योंकि उनकी तरह मेरी मां ने भी मुझे कुछ अलग, डिफरेंट और काबिल बनाने की कोशिशें की।...और अभिजीत की मां की तरह दस पैसे गिरने पर खोज के ला कहां गिराया है,पैसे का महत्व बताती रही।
पेश है मां से जुड़ी कुछ यादें, कुछ बातें।
मुझे याद है बचपन मैं जिस मोहल्ले में रहता था, जहां हमारा अपना घर था, वहां बहुत ही अमीर किस्म के लोग रहते थे। पापा की भी औकात कुछ कम नहीं रही थी। लेकिन मेरे होने के कुछ साल पहले इमरजेंसी की मार कुछ ऐसे पढ़ी थी कि पापा बताते हैं कि भारी नुकसान हुआ था। उनकी दूकान तक तोड़ दी गयी थी औऱ जिसका फायदा लोकल लोगों ने उठाया था और बहुत सारा माल लूट ले गए। पापा के शब्दों में कहें तो सबकुछ लुट गया था। तब घर में सिर्फ जरुरत के सामान आते। फालतू चीजें बंद कर दी गयी थी। घी फालतू चीजों में शामिल थी।
मैं बाकी बच्चों को भी घी और चीनी लगाकर रोल करके रोटी खाते देखता जिसे हमलोग बांसुरी बनाकर खाना कहते तो मेरा भी मन करता। मां के पास जाता तो कभी-कभी डालड़ा यानि वनस्पति घी दे देती दिन में भात बनाती और उसके पानी यानि माड के उपर की परत जिसे कि हम छाली कहते वो दे देती। बहुत बेकार लगता और मैं रोटी सहित उसे फेंक देता तो मां बहुत मारती, फिर गोद में लेकर खूब रोने लग जाती। पापा को कई चीजों के बारे में कहते सुनता-इसके बिना मर नहीं जाएगा कोई.

मैं जिस स्कूल में पढ़ता था वहां लोग स्टील या अल्यूमीनियम के बक्से ले जाया करते। मेरा भी मन होता। बहुत रोने पर पापा ने टीन की लाकर दिया तो था लेकिन बरसात आने पर उसमें जंग लग गयी और गर्मी की छुट्टी के बाद देखा तो सारे कॉपी किताब खराब हो गए थे। पापा बहुत नाराज हुए थे कि सब बर्बाद कर दिया। तब मां ने लकड़ी का श्रृंगारदान जिसे दी अब बेनेटी बॉक्स कहती है, दे दिया था। देखने में तो बहुत खूबसूरत था। कुछ दिन ले भी गया लेकिन बाद में सर लोग बहुत हंसते, लड़कियां कहतीं, हमसे बदला-बदली करोगे और एक दिन फादर ने कहा-कल से इसे लेकर आए तो बाहर खड़ा कर दूगा।
मैट्रिक के बाद मैं बाहर जाना चाहता था। लेकिन घर में कोई भी राजी नहीं था. पापा की इच्छा थी कि यहीं रहकर पढ़े औऱ शाम को लौंडों की संगति में रहकर बर्बाद हो जाए सो दुकान जाया करे. लेकिन मां अड़ गयी थी। उसने सारे मामा को देखा था- इंजीनियरिंग और मेडिकल निकालकर लाइफ बनाते। पापा से खूब बहस करके मां ने मुझे रांची भेज दिया।
एक बार सेंट जेवियर्स से मेरा एक दोस्त आया मेरे घर।.. और पापा ने उसे टॉयलेट के पास सिगरेट पीते देख लिया। फिर क्या था वहीं पर शुरु हो गए। लड़के को रांची भेजा और मैं डेढ़ महीने तक घर में झक मारता रहा। पापा का साफ कहना था कि हमें ऐसी पढ़ाई नहीं करानी है। बहुत ही अवसाद के दिन थे वो। तब छोटे भइया आगे आए थे।
डिवेट बोलने पर एक बार मेरी रंगीन तस्वीर छपी थी, दैनिक हिन्दुस्तान में। लिखा था- बीए हिन्दी, सेकेण्ड इयर, हिन्दी से विनीत कुमार। मां को बहुत सदमा लगा कि इतनी मेहनत और लात-जूता खाने पर मैं हिन्दी पढ़ रहा हूं। साइंस नहीं। बस एक लाइन कहा था मां ने. अब किस बूते तुम्हारे लिए लड़ेंगे, बताओ। क्या करोगे इसे पढ़कर। तब से मां का मन कचोटता रहा और मैं बताता रहा कि मां मैं पत्रकार बनूंगा।
मां नानी के यहां सबसे बड़ी थी सो नाना की दूकान पर रोज बैठती। इस क्रम में लोकल अखबारों के पत्रकार बड़ी ही दीन हीन दशा में विज्ञापन के लिए आते। कई पत्रकार एक ही साथ कुछ दूसरे काम भी करते। मां भी उससे कुछ कुछ करवा लेती। इसलिए मां के सामने पत्रकार की हैसियत अच्छी नहीं थी। उसे लगता कि इसका सब दिन मांगकर गुजारा होगा। तब और उदास हो गयी थी। लेकिन मेरे प्रति विशेष लगाव बना रहता। घर में सबसे छोटा था. अनुशासन बरतने के नाम पर हर कोई दो-चार हाथ जब तब आजमा लेता, व्यंगय करता,ताने मारता और तब मां एकदम से बड़े भाई-बहनों और कभी-कभी पापा के सामने कर देती। सब्जी काटनेवाला हंसिया लाती और कहती- काटकर फेंक दो इसे करेजा भर जाएगा सबका....
सुस्त-सुस्त सा रहता है कहीं लड़की का तो चक्कर नहीं। पढ़िए अगली किस्त में
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5 Response to 'तुम्हें कुछ भी पता है न मां'
  1. सुशील कुमार
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/05/blog-post_10.html?showComment=1210485120000#c8895819766727068582'> 11 मई 2008 को 11:22 am

    यार विनीत तुम्हारे शब्दों में कुछ जादुई असर होता है चाहे हमे अच्छा लगे या नही। पढेगे जरुर।
    माँ के दिल ही कुछ ऐसे होते है।

     

  2. Dr.Parveen Chopra
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/05/blog-post_10.html?showComment=1210488480000#c8463880681681521958'> 11 मई 2008 को 12:18 pm

    विनीत जी, इस से बढ़िया क्या ढंग होगा मां-दिवस मनाने का.....आपने तो यादों का पिटारा ही खोल दिया...खुले दिल से। सदा खुश रहो।

     

  3. भुवनेश शर्मा
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/05/blog-post_10.html?showComment=1210494360000#c5728437432813713225'> 11 मई 2008 को 1:56 pm

    मदर्स डे के बारे में हमें तो मालूम ही नहीं था यदि आप याद ना दिलाते.

    आपकी यादों से रूबरू होना अच्‍छा लग रहा है.
    जारी रखें....

     

  4. Udan Tashtari
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/05/blog-post_10.html?showComment=1210523520000#c8596478835125189966'> 11 मई 2008 को 10:02 pm

    बहुत सुन्दरता से यादों के सागर में डुबकी लगाई है. बहुत बढ़िया.

     

  5. Krishna Murari
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/05/blog-post_10.html?showComment=1264926415650#c2244282849200812430'> 31 जनवरी 2010 को 1:56 pm

    पोस्ट तो पुराना है तम्हारे लिए लेकिन मेरे लिए बिल्कुल नया. सच कहूँ तो जब मैं इसे पढ़ कर तम्हारी मामी को सुना रहा था तो कई बार मेरा गला भर आया. ऑंखें भींग आयी.बहुत ही भावुक.......

     

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