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अंग्रेजी पत्रिका ओपन ने अपने ताजा अंक के एक पन्ने पर हाउ इंडियन कवर्ड मीडिया स्कैंडल लिखकर पूरा ब्लैंक छोड़ दिया है। यह प्रतिरोध का वही तरीका है जिसे की इमरजेंसी के दौरान कई पत्रिकाओं ने अपनाए थे। कुछ ने तो पन्ने खाली छोड़ दिए थे और कुछ ने लाइनें लिखकर काट दी थी। उस समय का प्रतिरोध इंदिरा गांधी की सरकार के खिलाफ था और मीडिया की आजादी का गला घोंटी जाने की स्थिति में पत्रकारों,साहित्यकारों और बुद्धिजीवियों ने उन नीतियों के खिलाफ नाराजगी दर्ज करायी थी। उदारवादी अर्थव्यवस्था औऱ निजी मीडिया के पैर पसारने के बाद ये पहला मौका है जिसका विरोध एक मीडिया हाउस ने मीडिया के खिलाफ किया है। 2G स्पेक्ट्रम घोटाले में देश के नामचीन पत्रकारों और दिग्गज हस्तियों जिनमे एनडीटीवी की बरखा दत्त, हिन्दुस्तान टाइम्स के वीर संघवी, टीवीटुडे नेटवर्क के चैनल आजतक पर सीधी बात करनेवाले प्रभु चावला जैसे लोगों के नाम सामने आने लगे हैं। ओपन मैगजीन ने इस खबर को ब्रेक किए जाने के बाद इन मीडिया संस्थानों ने अपने-अपने तरीके से लीपापोती करने की कोशिश की है। एनडीटीवी के सीइओ नारायण राव ने तो साइट के जरिए मैगजीन और इस पर लिखनेवाले लोगों को हड़काने तक का काम किया है। लेकिन वर्चुअल स्पेस पर इन दिग्गज मीडियाकर्मियों की ऑडियो टेप, स्क्रिप्ट के साथ तैरने लगे हैं। मोहल्लाLIVE ने इस पन्ने को लगाया है औऱ प्रतिरोध के इस तरीके को बहुत ही असरदार और सही ठहराया है। साइट की इस तस्वीर पर मैंने जो कमेंट किए,आज साइट ने पोस्ट की शक्ल में लगायी है। लिहाजा वो कमेंट पोस्ट की शक्ल में आपके सामने हैं। संभव है ये आज की मीडिया की शक्ल को समझने में थोड़ी मदद करे-

मीडिया घरानों की इसी चुप्पी ने बिल्डर माफियाओं, रीयल स्टेट के दलालों, करप्ट पूंजीपतियों को मीडिया का धंधा करने के लिए उत्साहित किया है। सीधा फार्मूला है कि एक बार किसी तरह का कोई चैनल खोल लो, फिर तो आ ही गये मीडिया जमात में। फिर कोई उंगली नहीं रखेगा बल्कि देश के नामचीन पत्रकार आकर उसकी शोभा बढ़ाएंगे। जिस दिन जेट एयरवेज से करीब सवा सौ कर्मचारियों को निकाल बाहर किया गया, पूरे तीन दिनों तक मीडिया ने उस मामले को सिर पर उठा लिया। लेकिन उससे तिगुनी संख्या में उसी समय वाइस ऑफ इंडिया के मीडियाकर्मियों को बाहर का रास्ता दिखा दिया लेकिन किसी अखबार ने एक लाइन लिखने की जुर्रत नहीं की। स्त्रियों के साथ होनेवाली बदसलूकी पर पूरे चैनल क्रिस्पी न्यूज के लोभ में उसे प्राइम टाइम तक घसीटते हैं लेकिन स्टार न्यूज की सायमा सहर का मामला राष्ट्रीय महिला आयोग और हाईकोर्ट तक आ जाने की स्थिति में भी किसी ने ये जानने की कोशिश नहीं कि स्टार न्यूज के आकाओं ने आपके साथ क्या किया? सबसे तेज कहे जानेवाले चैनल के लिए मौत की खबर वारदात और जुर्म जैसे कार्यक्रम की झोली में सीधे जाकर गिरती है लेकिन अपने ही सिस्टर चैनल हेडलाइंस टुडे की आधी रात में हुई मौत की खबर को दिखाने में कुल 12-14 घंटे लगा दिये। पहले ये समझने की कोशिश की कि कहीं चैनल लपेटे में तो नहीं आ जाएगा कि शिफ्ट खत्म होने के बाद भी वो काम क्यों करती रह गयीं?

आजाद न्यूज के एचआर ने लाइन लगाकर सालों तक सैलरी बांटी और कोई स्लिप नहीं दिया, कइयों के पीएफ मार लिये, कहीं कोई खबर नहीं बनी। हमार न्यूज में मैनेजमेंट के साथ कई बार मार-पीट की घटनाएं हुईं, किसी ने कुछ नहीं दिखाया-बताया। देश में दर्जनों ऐसे चैनल हैं, जो कि उधार के लाइसेंस पर चल रहे हैं। वो किस चैनल का लाइसेंस है, उसे क्या दिखाना है, इस पर कभी स्टोरी नहीं चली। दर्जनों ऐसे चैनल हैं, जो कि एक ही जगह से अपलिंक होते हैं औऱ एक ही जगह से डाउनलिंक ताकि मॉनिटरिंग कमेटी को ये लगे कि इस नाम से चैनल हैं और धंधा चमकता रहे, इस पर कभी स्टोरी नहीं चली। इसलिए कि सबों के बीच एक गुपचुप तरीके का समझौता है।
अगस्त महीने में अहमदाबाद में एक चैनल के उकसावे में आकर एक शख्स ने आत्महत्या कर ली। उस चैनल पर बाजिव कार्रवाई होनी चाहिए थी लेकिन दस दिन के भीतर हमारी महान एनबीए टीम ने आठ पन्ने में ऐसी रिपोर्ट पेश की कि मामला रफा-दफा हो गया और एसोसिएशन के सर्वे-सर्वा शाजी जमा और उनके होनहार पत्रकार दीपक चौरसिया बाइक पर खुलेआम बिना हेलमेट, सैंकड़ों लोगों की जान गिरवी पर रखकर जान इब्राहिम के साथ इंटरव्यू लेते रहे। सीधी बात करनेवाले माननीय प्रभु चावला कई तरह के उल्टे कामों में शक के घेरे में आ चुके हैं लेकिन आजतक पर हीं हीं करते हुए लोकतंत्र पर प्रहसन जारी है। एक औसत व्यक्ति ऐसे आरोप लगने पर शर्म से मर जाता। मामूली चोरी करनेवाला शख्स भी कैमरे के आगे गमछा बांधकर आता है लेकिन ये अब भी प्राइम टाइम पर चुनावी नतीजे पर मसखरई करते नजर आते हैं।
मीडिया को इस बात का पक्का भरोसा हो गया है कि वो चाहे कुछ भी कर ले, उसका कोई कुछ भी नहीं बिगाड़ने वाला। क्योंकि उसे चलानेवाले के घर का एक दरवाजा मीडिया की तरफ खुलता है तो दूसरा दरवाजा सरकार और मंत्रालय की तरफ। जब सइयां भये कोतवाल तो अब डर काहे का। कार्पोरेट से लड़ने की ताकत जब सरकार की नहीं रही तो मीडिया रिस्क क्यों ले?
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7 Response to 'ओपन मैगजीन ने मीडिया संस्थानों को किया नंगा'
  1. sudhanshu chouhan
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/11/blog-post_6442.html?showComment=1290855706592#c7073391119270854957'> 27 नवंबर 2010 को 4:31 pm

    बिल्कुल सही कहा विनीत जी,
    लेकिन इसी ओपन पत्रिका में कुछ दिन पहले तो घोटाले में फंसे पत्रकारों की सफ़ाई ख़ुद ओपन मैग्ज़िन(ऑनलाइन)के प्रकाशक आर. राजमोहन ने पेश की थी...."Open’s response to NDTV के नाम से"....
    लिंक है...
    http://www.openthemagazine.com/article/nation/open-s-response-to-ndtv

    वीर संघवी की सफ़ाई “What kind of story do you want?”
    “What kind of story do you want? Because this will go as Counterpoint, so it will be like most-most read...” —VIR SANGHVI

    बरखा दत्त की सफ़ाई “Tell me what should I tell them?”
    “Oh God. So now what? What should I tell them? Tell me what should I tell them?” —BARKHA DUTT
    इतनी जल्दी इतना बड़ा परिवर्तन कैसे?

     

  2. सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/11/blog-post_6442.html?showComment=1290871396452#c631784062279059580'> 27 नवंबर 2010 को 8:53 pm

    आपने जिन बड़े मीडिया मालिकों का नाम लिया उनको टीवी पर मसखरी करते देखना अब घृणा पैदा करता है। बिहार के चुनाव परिणाम पर इन लोगों ने जेडीयू-बीजेपी की उपलब्धियों पर इतने गंदे तरीके से चुटकी ली कि मन रोष से भर गया। अब निष्पक्ष और वस्तुनिष्ठ विस्लेषण करने का बूता इनके पास नहीं रहा। थू...

     

  3. anjule shyam
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/11/blog-post_6442.html?showComment=1290921561594#c3697249766165338876'> 28 नवंबर 2010 को 10:49 am

    अंग्रेजी पत्रिका ओपन का ये कदम सराहनीय है.......................

     

  4. प्रवीण पाण्डेय
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/11/blog-post_6442.html?showComment=1290930438528#c634953677184704673'> 28 नवंबर 2010 को 1:17 pm

    चिन्तनीय स्थिति।

     

  5. Kajal Kumar
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/11/blog-post_6442.html?showComment=1290952148683#c7264083433889602562'> 28 नवंबर 2010 को 7:19 pm

    जो लोग विज्ञापन के बदले स्टोरी से परहेज़ न करते हों उनसे ये उम्मीद कैसे रखी जा सकती है कि वो गुलगुलों से परहेज़ करेंगे..

     

  6. निशांत मिश्र - Nishant Mishra
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/11/blog-post_6442.html?showComment=1290953372376#c5531199801394839917'> 28 नवंबर 2010 को 7:39 pm

    One correction is required:

    "हाउ इंडियन कवर्ड मीडिया स्कैंडल" is

    "हाउ इंडियन मीडिया कवर्ड मीडिया स्कैंडल"

     

  7. shikha varshney
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/11/blog-post_6442.html?showComment=1291037742168#c4164084431437274470'> 29 नवंबर 2010 को 7:05 pm

    जब सइयां भये कोतवाल तो अब डर काहे का।
    बस यही है आज का सच.

     

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