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तुम क्या लिए इस बार, पिछले सात-आठ सालों से दीवाली की सुबह फोन पर दीदी के इसी सवाल से शुरु होती है। पलटकर फिर मेरा सवाल तो तुमने क्या लिया? उसका अक्सर जबाब होता है-कुछ खास नहीं बस एक रिवाज है तो ले लिए कुछ। जाहिर है दीदी का ये कुछ मां के कुछ से बिल्कुल अलग होता है। मां को लगता है कि अग हम नहीं लेंगे तो घर में ये परंपरा धीरे-धीरे खत्म हो जाएगी जबकि दीदी महसूस करती है कि यही सब मौके होते हैं जिसमें हम एक-एक करके सामान जुटाते चले जाते हैं। दीदी की शादी के बाद से मैं लगातार देख रहा हूं कि किस तरह एक-एक करके सामान जुटाती आयी है और सबों की जानकारी मेरे दिल्ली बैठे देती आयी है।

दीदी की इस कुछ में शुरुआत के सालों में घर की बहुत ही जरुरी चीजें शामिल होती- मिक्सी ग्रांइडर,फ्रीज,टीवी और भी घर की चीजें। दीवाली से ठीक एक दिन पहले संयुक्त परिवार को जिस तरह उसे सबों से अलग होना पड़ा था उसकी टीस के साथ वो इन सामानों को जुटाती आयी। अब इस कुछ में जो चीजें शामिल होती है वो मेरी डिक्शनरी में कई बार गैरजरुरी है लेकिन दीदी की भाषा में एसेट है..चांदी के सिक्के,अनिवार्य तौर पर गहने..वगैरह। जूस सेट,डिनर सेट,नॉनस्टिक,यही सब। मां के शब्दों में कोढ़ा-कपार इससे अलग और दुनिया के उन तमाम लोगों से अलग जो सामान बाजार से खरीदते हैं,बाजार की सोच के हिसाब से खरीदते हैं,मेरी मां सामान तो बाजार से खरीदती है लेकिन उसके बारे में घर में बैठकर सोचती है। उसकी इस सोच में नितांत उसका अपना नजरिया है। मां के साथ दीवाली की सुबह धनतेरस के दिन की उस नसीहत से शुरु होती है- बोले थे,एक चम्मच भी खरीद लेना,नेग रहता है बेटा, त कुछ लिए कि नहीं?

पलटकर मैं भी सवाल करता हूं,मेरा छोड़ो- ये बताओ कि तुम क्या खरीदी इस साल? मां इस सवाल का जबाब मुझे याद नहीं पिछले कितने सालों से देती आयी है- कूकर,कड़ाही,कभी तांबे का तो कभी पीतल का लोटा,दूध गरम करने का बर्तन। मां की ग़हस्थी में बर्तनों की साइज के हिसाब से इतनी तेजी से बदलती रहती है कि धनतेरस में उसे खरीदना जरुरी हो जाता है। जो भी वो कूकर,कड़ाही,भगोने,स्टील के डिब्बे खरीदती है,उसके पीछे उसका एक तर्क होता है जिसके सुनने के बाद मैं सिर्फ यही कह पाता हूं- तो इतनी दिक्कत हो रही थी तो इतना इंतजार क्या कर रही थी,पहले ही खऱीद लेती?

मुझे याद है बोर्ड की परीक्षा तक मैं मां के साथ रहा- हर साल दीवाली,धनतेरस में मुझे सबसे विश्वसनीय संतान मानकर अपने साथ रखती। तब बिहारशरीफ में दुनियाभर की चमकदार दुकानें खुल गयीं थी,एक से एक ऑफर मिलते लेकिन मां उस दिन भी अपनी पुरानी सहेली के पति दिनेशवा का दूकान ही जाती। वहां मुझे कोई भी बर्तन पसंद न आता। मैं अक्सर टोकता- देखो तो कैसी कडाही है,कोई फिनिशिंग नहीं,मत लो। मां चिढ़ जाती- तुम ही जब एतना टांग अड़ाते हो तो जब तुमरी मौगी आएगी त सब बर्तन लगता है कूड़ा पर फेंक आएगी। तुम बनाओगे इसमें,हम बनाएंगे,हम लें रहे हैं। दिनेशवा जो कि उम्र में मेरे पापा का पड़ता,मैंने उसे कभी भी शहर के बच्चे की तरह न तो अंकल कहा और न ही कस्बाई आदत के हिसाब से चचा। मां भी पता नहीं क्यों,सहेली का पति होने पर भी दिनेशवा ही कहती। वही आदत मुझे भी लग गयी थी। मेरी बात सुनकर एकदम से चिढ़ जाता और कहता- जब पसंद नहीं आता है तो काहे आते हैं मंटू के माय। ले लीजिए वही से जहां बढ़िया सामान के नाम पर मूड़ी कतरता है( मंहगा देता है)। मेरी मां कहती- काहे,लड़कन-बुतरु के बात पर गोस्सा रहे हैं,इ हैइए है कलाहा। सब चीज में नुक्स निकाल के कलह पसारेगा। मुझे दिनेशवा की दूकान और उसके प्रति कभी सम्मान नहीं जगा क्योंकि हर साल उसने वही घिसी-पिटी टिफिन बॉक्स दिए जिसे ले जाने पर स्कूल की लड़किया चिढ़ाती- किचन से रोटी रखने का डब्बा चुरा लाए क्या,मां को टिफिन खरीदने नहीं कहते और फिर एक स्वर में ही ही ही ही,ठी ठी ठी ठी।

शहर बदला,घर में लोग बढ़े। भइया की शादी,फिर बच्चे। लोगों का आना-जाना बढ़ा। दीदी एक-एक करके ससुराल जाने लगीं। फैशनेबल भाभी से किचन का सौन्दर्यशास्त्र बदला। किचन में बर्तनों के नाम तेजी से बदलने लगे। बरगुन्ना,बटलोई,कठोती,तसली-तसला, सबके सब गायब होते चले गए। मुझे याद है मां की किचन में हर थाली,गिलास,कडाही का बाल-बच्चे की तरह अलग नाम होता- मंगउल्टा लोटा,उंचका गोड़ी का गिलास,टेढ़का मां के थाली,चुमउना परात...। समय के साथ हम स्टाइलिश हो गए। तसली को भगोना बोलने लग गए। थाली को प्लेट बोलने लग गए और देखते ही देखते पता नहीं वो सारे बर्तन कहां गए। सब एक साथ खाना खाते लेकिन जरुरी नहीं सबों की थाली एक हो। उम्र और अदब के हिसाब से थालियां होती। डिनर सेट ने इस समाजशास्त्र को खत्म कर दिया। अब पांच साल की खुशी और भइया की थाली की कोई अलग पहचान नहीं। किचन में अब न तो मां के खरीदे गए बर्तन दिखाई देते हैं और न उन बर्तनों के साथ वो भावनात्मक जुड़ाव बन पाता है। नहीं तो दादी( मां के शब्दों में मरकर देवता हो गयी) के गंगासागर से लायी लोटनी( लोटे का छोटा रुप) के अलावे पांच-छ साल तक किसी औऱ बर्तन में पानी नहीं पिया।..मां के खरीदे गयाब बर्तनों के बीच भी उसका अपने तरीके से खरीदना जारी है। अब वो दूध लाती है तो डोलनी,पहले से ज्यादा पूजा करती है तो अलग-अलग साइज की पीतल की थाली और परिवार के बढ़ते-घटते समीकरण के बीच वही कूकर कड़ाही। वो टीवी की मेरी तरह कट्टर दर्शक है,दैनिक जागरण पढ़ती है।  लेकिन उस पर बोझा का बोझा आए विज्ञापनों और ऑफरों का रत्तीभर भी असर नहीं।

दस साल पीछे जाकर देखता हूं तो किचन का संसार तेजी से बदला है। पहले मेरे घर में फाइवर,प्लास्टिक,कांच का कोई भी बर्तन नजर नहीं आता। मां द्रव्य( पीतल,कांसा,बाद में स्टील) के बर्तन का महत्व देती। इनके बारे में कहती कि छूतहर( अशुद्ध) लगता है। बढ़िया घर का आदमी इसमें थोड़ी ही खाता है। दूकान में चीजों के साथ कई सारी चीजें आती तो वो इधर-उधर हो जाते। लेकिन अब फाइवर,शीशे,प्लास्टिक के बर्तन मेरे यहां खरीदे जाते हैं। स्टील का रोटी का डब्बा को मिल्टन,सैलो के कैसरॉल और हॉटकेस ने रिप्लेस कर दिया। किचन में कई रंग के बर्तन,कंटेनर सब इसी फाइवर-प्लास्टिक की माया है। मैंने मां को थोड़ा उकसाया कि देखें इस पर उसकी क्या प्रतिक्रिया है- तो मां तुम अभी तक कूकर कड़ाही में ही फंसी हो.जमाना कहां से कहां चला गया। देखो तो एक बार बाजार जाकर,कितनी सारी नयी चीजें आ गयी हैं,उसमें दुनियाभर के ऑफर हैं,देखने में भी अच्छा लगता है। मां ने पहले थोड़े शांत स्वर में कहा- कितना भी कुछ आ जाए- प्लास्टिक तो प्लास्टिक ही रहेगा न,फाइवर का सामान में खाने में घिन लगता है,पीतल-कांसा के आगे कहां है मुकाबला? मैंने फिर उकसाया लेकिन इ कांसा-पीतल में फंसकर जब तुम बात करती हो तो लग रहा है कि अब तुम सचमुच बुढा गयी। अबकी बार मां थोड़ा सुलगती है- त रहि रहे हो दिल्ली में,आबेगी पूतोहू त लेगी सब रंग-बिरंगा सामान। उसको मत फंसाना,पीतल-कांसा में। फिर अचानक अपने पुराने बर्तनों और शब्दों के खो जाने की पीड़ा से भर जाती है- बाल-बच्चा के थोड़े बुझाता है,एक-एक करके माय-बाप सामान खरीदता है,कहां उडिया जाता है,पता चलता है।

मैंने फिर कहा-तुम्हारी जैसे महिला तो येरा,लॉओपेला,एलजी जैसी कंपनियों को तो बंद करा दोगी। कसइया के सरापे से गाय मरती है। हम नय लेंगे त पूरा दुनिया छोड़ देगा लेना औ फिर तुमरा जैसा अदमी इ सब समान का बराहिलगिरी(पैरवी) करनेवाला तो हैइए है न।.देखो,बात मत बनाओ,साफ-साफ कहते हैं। आज भोरे ही नहा लेना,सांझ के दिया जला लेना,एगो छोट गो मूर्ति लाके लक्ष्मीजी को गोड लग लेना औ मिठाय में मिलावट है तबेसन का लड्डू ले लेना एक पाव। ऐसे मत रह जाना।..घर भर के आदमी हियां दीवाली के तैयारी में जुटा है औ हमरा बुतरु..अकेले परदेस में। लगा अब मां ने रोना शुरु कर दिया है।...  
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10 Response to 'दीवालीः मेरी मां एक नालायक कन्ज्यूमर है'
  1. कृष्ण मुरारी प्रसाद
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/11/blog-post_05.html?showComment=1288945446131#c8425930033632027254'> 5 नवंबर 2010 को 1:54 pm

    संवेदना, गहराई और जमीन से जुड़े होने का गंध....सभी कुछ है..इस पोस्ट में....दीवाली की शुभकामनाएं.....

     

  2. Anand Rathore
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/11/blog-post_05.html?showComment=1288958145811#c4199075028528836888'> 5 नवंबर 2010 को 5:25 pm

    ye vineet bhaiya.. postwa padh ke bahute dimaag kharab ho gaya..aur khush bhi hoga.. na jaane kahe... shayad samajh nahi paa rahe hain ka likhen.. shayad emotional ho gaye hain aur saath hi.. pata nahi... murari bhaiya upaar sahi kah rahe hain...

     

  3. Rangnath Singh
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/11/blog-post_05.html?showComment=1288979124290#c6607110663102840713'> 5 नवंबर 2010 को 11:15 pm

    आपने लोकरुचि और समाज में परंपराओं के निर्वाह की गतिकी को बखूबी पकड़ा है।बेहतरीन लिखा है।

     

  4. प्रवीण त्रिवेदी ╬ PRAVEEN TRIVEDI
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/11/blog-post_05.html?showComment=1289020791058#c6091637499588417685'> 6 नवंबर 2010 को 10:49 am

    कुछ और नहीं ...बहुत बढ़िया !!! एक्ससेलेंट !!

    दीवाली की शुभकामनाएं!!

     

  5. anjule shyam
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/11/blog-post_05.html?showComment=1289020937288#c833933830558986005'> 6 नवंबर 2010 को 10:52 am

    बेहद संवेदनशील पोस्ट...........

     

  6. अनूप शुक्ल
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/11/blog-post_05.html?showComment=1289109663755#c8330355891600908823'> 7 नवंबर 2010 को 11:31 am

    ओह!! कहां से होते हुये कहां तक पहुंचे। बहुत संवेदनशील।

     

  7. anitakumar
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/11/blog-post_05.html?showComment=1289239686888#c7482732135214530206'> 8 नवंबर 2010 को 11:38 pm

    excellent post

     

  8. सागर
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/11/blog-post_05.html?showComment=1289378303220#c5856229055617651915'> 10 नवंबर 2010 को 2:08 pm

    आपका यह रंग रूप भी बहुत पसंद आया... घर की याद आ गयी और आपने बात को ऐसे उठाया की मज़ा आ गया

     

  9. rashmi ravija
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/11/blog-post_05.html?showComment=1289382029818#c3001442622299914812'> 10 नवंबर 2010 को 3:10 pm

    पोस्ट तो बहुत अच्छी लिखी है....बदलते समय से तालमेल बिठाते बुजुर्ग....बेटे के यहाँ जाने पर इन फाइबर-प्लास्टिक का उपयोग तो कर लेते हैं...परन्तु मन, कांसे-पीतल में ही अटका होता है...परंपरा निभाने का भी आग्रह होता है..क्यूंकि माँ का मन हमेशा अपने संतानों को फलते-फूलते देखना चाहता है...

    परन्तु इस पोस्ट के शीर्षक पर मेरी गहरी आपत्ति है... 'ना लायक' का शब्दार्थ बुरा नहीं है...पर जिन भावार्थों में यह प्रयुक्त होता है...भले ही कंज्यूमर के साथ इसका प्रयोग किया गया है.....पर माँ के लिए इसका प्रयोग, नागवार गुजरा .

    शायद आधुनिक लेखन हो...नया रिवाज हो... पर मुझे अच्छा नहीं लगा... शायद, मैं भी पुराने जमाने की सोच वाली हूँ...पर नहीं अच्छा लगा, तो बता दिया.

     

  10. सतीश पंचम
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/11/blog-post_05.html?showComment=1289389197806#c1516431448866409634'> 10 नवंबर 2010 को 5:09 pm

    पोस्ट का मंतव्य और उसके भावों से मैं पूरी तरह सहमत हूँ लेकिन पोस्ट के शीर्षक से मुझे भी आपत्ति है।

    इस तरह से अपनी मां के लिये नालायक लिखना कुछ अजीब लगता है।
    संभवत: मीडिया में चले नये शगूफे की तरह.....'वो कौन थी'......'वो सुमुदर में समा गई'......'वो देखते देखते गायब हो गया'.....'हवा में घमासान' टाईप के शीर्षक। इस तरह के कैची शीर्षक डराउ चमकाउ टाइप के होते हैं....इनसे जितना बचा जाय उतना अच्छा। वरना पोस्ट के भाव कितने भी गहरे हों, शीर्षक बात को सतही बना देते हैं।

     

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