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अभी-अभी तस्लीमा नसरीन से मिलकर आ रहा हूं, उसकी बातों में हां में हां मिलाकर आ रहा हूं, इससे तीन घंटे पहले राजेन्द्र यादव से लघु कथा सुनकर आ रहा हूं। उन पर अर्चना वर्मा की टिप्पणी सुनकर आ रहा हूं। उससे भी तीन घंटे पहले चोखेरबाली की वर्षगांठ के मौके पर अनामिका को सुनकर आ रहा हूं। चोखेरबाली के बनाए जाने के पीछे आर.अनुराधा के तर्कों को सुनकर आ रहा हूं। नीलिमा चौहान से ब्लॉग पर पितृसत्ता के कब्जे की बात सुनकर आ रहा हूं। मधु किश्कर की झन्नाटेदार भाषा में स्त्री-विमर्थ के तर्कों को सुनकर आ रहा हूं। ब्लॉग का पक्ष लेते हुए सुकृता पाल कुमार को सुनकर आ रहा हूं। पिछले आठ-दस घंटों में आठ स्त्रियों को सुनकर आ रहा हूं। कई बातों से असहमति है, नए सिरे से बहस करना चाहता हूं, इन सब पर लेकिन बहुत थका हूं, कुछ सोचना नहीं चाहता अभी। सोना चाहता हूं फिलहाल। लेकिन इन सारी की बातें दिमाग में चक्कर काट रही है, सोने में परेशानी पैदा कर रही है।
बातचीत में तसलीमी नसरीन ने कहा कि मैं होमलेस हूं,मेरा कहीं कोई घर नहीं है। राकेश सर से पूछा-आप दिल्ली में रहते हो( अंग्रेजी में पूछा), राकेश सर ने कहा-हां। फिर सवाल किया- आप दिल्ली में रहना चाहती हैं। तसलीमा का जबाब था- रहना तो चाहती हूं लेकिन रह नहीं सकती। मैं बस यही सोच रहा हूं, कोई लिखकर सरकार और देश की किरकिरी नहीं पत्थर बन जाता है कि उसका अपना कोई घर ही नहीं रह जाता।
2, अनामिका की बात याद आती है- आज स्त्रियां जो बिना दीवारों के घर बनाने का सपना देख रही है, वो स्त्री-भाषा से ही संभव है, एक ऐसी भाषा जो कॉन्टेक्ट्सलेस होकर भी एक-दूसरे से जोड़ती है। मर्द ने अभी वो भाषा सीखी ही नहीं है।
3, तो फिर मधु किश्कर की बात याद आ रही है- स्त्री-विमर्श को जनाना डब्बा नहीं बनने देना चाहिए, इससे स्त्री खुद को ही मार्जिनलाइज करेगी। स्त्री की कोई भी समस्या पुरुष से बाहर की नहीं है, इसलिए उसे साथ लेना अनिवार्य है।
4,नीलिमा ने तो जो बात कही, उस पर भोर में उठकर फिर से विचार करुंगा, कि क्या सचमुच बाकी स्पेस की तरह ही ब्लॉग पर भी पितृसत्ता का वर्चस्व है।
5, आर.अनुराधा का चोखेरबाली के उपर दिया गया पावर प्वाइंट प्रजेन्टेशन याद आ रहा है जहां स्त्री-पुरुष के हिसाब से ब्लू ब्लॉगिंग और पिंक ब्लॉगिंग का विभाजन बताया।
6, सुकृता पाल कुमार की बात पर सोच रहा हूं कि क्या ब्लॉगिंग ने सचमुच एक डिमोक्रेटिक स्पेस तैयार किया है, स्त्रियों के लिए एक ज्यादा मजबूत माध्यम उभरकर सामने आया है।
7, अर्चना वर्मा राजेनद्र यादव की कहानी लक्ष्मण-रेखा का संदर्भ देते हुए कह रही हैं- अब कोई सीता से ये कहलवा दे कि मैं तुम्हें कभी माफ नहीं करुंगी,साधु कि तुमने मुझे इस सुख से इतने दिनों तक वंचित क्यों रखा तो गाली तो पड़ेगी ही।

एक ही दिन में तीन अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग मसलों पर इन स्त्रियों की बात। सब जगह पुरुष या तो चुप है या फिर बस संदर्भ पैदा करने भर के लिए है। स्त्रियां ही बोले जा रही है एक-दूसरे की बात को काटते हुए। स्त्री-विमर्श करते हुए भी पुरुषों के प्रति सॉफ्ट होते हुए. पुरुष चुप है, इतनी देर चुप कैसे रह सकता है पुरुष भला। बाकी सवालों के साथ-साथ इस सवाल पर भी नए सिरे से विचार करना चाहता हूं। लेकिन फिलहाल नींद बहुत आ रही है।
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4 Response to 'आज कितनी स्त्रियों को सुना और लगभग चुप ही रहा'
  1. sareetha
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/02/blog-post_4782.html?showComment=1233977160000#c942996551814563001'> 7 फ़रवरी 2009 को 8:56 am

    दर असल हर स्त्री के भीतर एक पुरुष और एक पुरुष के अंदर कहीं स्त्री मौजूद है । किसी भी तरह से इन दोनों का वजूद अलग-अलग कर नहीं देखा जा सकता । सामाजिक व्यवस्थाओं ने इन्हें अपने फ़ायदे के लिए खाकों में बांटा है । मेरी समझ से ये एक दूसरे के बैरी होकर नहीं सामंजस्य से ही आगे बढ सकते हैं ।

     

  2. रचना
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/02/blog-post_4782.html?showComment=1233982620000#c7711854944584908947'> 7 फ़रवरी 2009 को 10:27 am

    ब्लॉग के ऊपर बात चीत या विमर्श करना हैं तो आम ब्लॉगर की तरह करे . आम ब्लॉगर जो अलग अलग बेक ग्राउंड से हैं . जो अलग अलग भाषा , देश से हैं . जिनकी जीविका के साधन अलग अलग हैं . आप जिन लोगो की बात कर रहे हैं वो सब कहीं ना कहीं टीचिंग कम्युनिटी से जुडे लोग हैं जो ज्ञान वर्धन के लिये , रिसर्च के लिये लिखते और पढ़ते हैं . वो ब्लॉग पर रिसर्च तो कर सकते हैं पर आम ब्लॉगर तक ना तो उनकी बात पहुचती हैं क्युकी आम ब्लॉगर को उनमे एक अत्तितुदे दिखता हैं स्त्री विमर्श करना और उस पर लिखना और रिसर्च के लिये ग्रांट पाना फिर रिसर्च कर ना ये सब अध्यापक , लेखको का जीविका से जुड़ा मसला हैं इसको ब्लॉग / आम ब्लॉगर से जोड़ कर क्या हासिल होगा ?? ब्लॉग पर साहित्त्य्कारिता का रंग हैं अच्छा हैं उनके लिये को साहित्य से जुडे हैं किताबो से ज्ञान पाते हैं .
    Natural ability without education has more often attained to glory and virtue than education without natural ability.
    Cicero
    Roman author, orator, & politician (106 BC - 43 BC)

     

  3. रचना
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/02/blog-post_4782.html?showComment=1233984360000#c4271618679854718464'> 7 फ़रवरी 2009 को 10:56 am

    इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

     

  4. भावना
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/02/blog-post_4782.html?showComment=1234507020000#c5184713915044859725'> 13 फ़रवरी 2009 को 12:07 pm

    stri vimarsh mein bhi aik abhijatya varchasv dikhta hai...baby haldar ko to prabodh kumar se hosala afzai mil gayi...par shramjivi mahilaon ko aaj bhi 'budhijivi' mahilaon ke chashme se dekha ja raha hai....manch dena he hai, to kisi dihari mazudurin, safai karne wali ko dekar uske vicharon ko sunte, bajay ki suni -sunai aik jamat ko sammanit kar ke khud ke program ki celeb rating se mediayai drishti akarshit karne ki koshish ke baraqs yah jayada jamini vimarsh hota.

     

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