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लो विनीत भइया, बहुत पैसे बर्बाद किए हो अब तक, फ्री में जाकर पिलाना कॉफी अबकि बार। बाबू( अब मेरा दोस्त, जब से मैंने लेख लिखना शुरु किया, लगभग तभी से उसने टाइपिंग औऱ फोटो कॉपी करनी सीखी)। बाबू मुझे कपल कॉफी कूपन पकड़ा रहा था। मैंने बस इतना कहा-बाबू एक ही दो, एक तुम रख लो। उसने कहा,नहीं मेरे पास एक औऱ कपल है। बाबू कपल का मतलब एक या एक साथ समझ रहा था, वो कंपनी की भाषा समझ रहा था जबकि मैं कपल का मतलब दो समझ रहा था। मैंने कहा- नहीं बाबू, एक तो मैं जाउंगा नहीं और दूसरा गया भी तो अकेले, तो एक कूपन तो बर्बाद ही हो जाएगा न। बाबू ने फिर अरे भइया- आप तो ऐसे बात कर रहे हो, कि जैसे नौ जानते हो, छह नहीं जानते। कपल टिकट में आपको अकेले कैसे जाने दे देगा। और फिर तुम अकेले काहे जाओगे, ऐसे दुकान पर हर बार किसी न किसी के साथ आते हो और मौके पर जाना होगा तो अकेले। हद हो आप भी। मैंने फिर कहा- अरे बाबू टाइपिंग कराने तो कोई भी किसी के साथ आ सकती है लेकिन कॉफी पीने और वो भी चौदह को। चलो रखो, अपना कूपन और मुझे चलता करो। बाबू ने कहा- अब काट लो मेरा चुतिया, पूरे पटेल चेस्ट में तुम मेरी ही काट सकते हो। तुम हनुमानजी के आगे जाकर भी कसम खाओगे न कि कोई नहीं है तो वो भी नहीं मानेगा औऱ मान भी गया तो कहेगा- तो पांच साल तक कैंपस में रहकर कटा रहे थे।
कॉफी शब्द जैसे ही मेरे कानों में पड़ते हैं उसके स्वाद से पहले मैं एक पंचलाइन याद करता हूं- ए लॉट कैन हैपेन ओवर ए कॉफी। ए लॉट का मतलब क्या हो सकता है, कुछ भी हो सकता है लेकिन वो नहीं हुआ जिसके बारे में बाबू तकसीद कर रहा था। जल्दी में तो कई बार अधूरे कप को छोड़कर भागना पड़ा, कई बार ऑर्डर कैंसिल करानी पड़ी औऱ कई बार फिर कभी बोलकर मामले को टाल दिया गया। कंपनी ने जिस भरोसे के साथ ये पंचलाइन नत्थी की है, एक समय के बाद हम सबका भरोसा टूटने लगा था।
हम सब एक साथ लेकिन अलग-अलग चैनल में काम करने आए थे। कुछ का मामला पहले से बना हुआ था, सो चैनल में आकर गहरा रहा था। अटकलें और विमर्श के दौरान लोग समझाते कि विनीत तुम्हें इन सबके बीच के मामले को अफेयर से आगे की चीज समझनी चाहिए। अफेयर तो सेंट्रल बैंक से डिमांड ड्राफ्ट बनवाते समय ही हो गया था। ये सारे आइएमसीसी से आगे लोगों की बात करते। कईयों का मामला गहरा रहा था यहां आकर। अपनी सर्किल में ज्यादातर आइएमसीसी के लोग ही थे। कई मौके पर आजमाए हुए, एक-दो बार यूपीएससी की पीटी देकर पिटे हुए। मैं उनसे पूछता- तुम तो आइएमसीसी में थे, कुछ नहीं किया। पीछे से राणा कहता- अरे नहीं,ये वहां बुलेटिन बनाता था औऱ कुछ नहीं करता था। लेकिन तुम बताओ, विद्या भवन में तुम क्या करते रहे और चार साल डीयू में। मैं अपने उपर ही ठहाके लगाता- अरे मेरा तो ज्यादा समय एक लड़की को एंकर बनाने में ही लग गया। फिर चारों तऱफ से ठहाके।
आमतौर पर हुआ ये है कि जब कॉलेज में, इन्स्टीच्यूट में और यहां चैनल के भीतर जिस किसी का मामला नहीं जमा, उसने फटाक से नैतिकता का चोला ओढ़ लिया। तुमको क्या लगता है- वो जो जा रही है, नहीं मान जाएगी। हम ही घास नहीं देते हैं, हम जानते हैं, उसका भूगोल सही होते हुए भी इतिहास बहुत अच्छा नहीं है, एक साल पढ़े हैं बाबू, उसके साथ,खूब लीला-कीर्तन देख लिए हैं। अब कुछ नहीं।
पीछे से मैथिल कहता- मां-बाप यही सब करने भेजा है, तुमको पता नहीं है,यहां कितने बड़े-बड़े तोप आए, आज उसका भी गोयनका एवार्ड के लिए नाम रहता लेकिन वही- लंगोट का कच्चा, गए तेल लेने। मैं तो साफ कहता हूं भाई, मीडिया लैन में लंगोट पर लगाम जरुरी है, नहीं तो तीन में न तेरह में, डोलते रहोगे डेरा में। स्साला एक बार ट्रेनी का लेबल हटा कि दस लाख से कम कौन नगदी देगा रे। मैं कहता मैथिल-गाड़ी लेना तो चैनल की स्टीकर ऑरिजनल लगाना, सब फोटो कॉपी करके चिपकाया रहता है।
एंकर आइटम शब्द हमलोगों के बीच बहुत पॉपुलर था। इस शब्द का प्रयोग हम उन लड़कियों के लिए करते जो आयी तो हमारे साथ ही, पैसे भी उतने ही मिलते थे लेकिन वो प्रोड्यूसर लेबल से नीचे लोगों से बात ही नहीं करती। मुझे सीढ़ियों पर मिल जाती तो गाल छूते हुए कहती- और बच्चे,कभी-कभी हीरो, तेरा एफ-एम पर काम कैसा चल रहा है। वो आगे बढ़ जाती, मैं पुकारता- अरे सुनो तो सवाल किया तो जबाब भी तो सुन लो- बहुत बेकार चल रहा है, कुछ हेल्प कर दो। वो कहती- तुम मेरी काट रहे हो, मैं मान ही नहीं सकती कि अच्छा नहीं चल रहा होगा। अपने सर्किल के लोग कभी-कभी मुझे जात-बिरादरी से बाहर करने की बात करते। कहते-स्साला हट, तू मउगा है, लड़की से हंस-हंस के बतियाता है और हमारे सामने साध बनता है। मैं कहता मैं लड़कियों से कहा बतियाता हूं, वो तो एंकर आइटम है।
अपने सर्किल में दो-तीन लड़कियां भी थी। एंकर आइटम की शिकायत वो भी जमकर करती, वो भी उसके साथ आयी थी लेकिन ऑफ स्क्रीन और मेहनतवाला काम, अनसंग हीरो वाला काम। इन लड़कियों को ग्लैमर में ज्यादा दिलचस्पी नहीं थी या फिर वैसा कभी मौका नहीं मिला, इसलिए बॉस के बारे में वही राय रखती जो कि हम सब गुपचुप तरीके से रखते थे। हममें से ज्यादातर लोग चों-चों करनेवाले कपल को गरियाते। जाकर पूछते- चलोगी लंच करने और हममे से ही कोई लड़की,लड़के के आवाज में कहती- तुम जाओ, एक्स को आने दो, मैं आ जाउंगी।
व्यंग्य से हम सब हंसते और फिर अपने भीतर महान होने के एहसास से भर जाते। जब त मे चारो तरफ इश्क और अफेयर की बयार हो औऱ आप कुछ कर नहीं पा रहे हो तो बिना कुछ किए ही चरित्रवान,महान,मासूम और समझदार महसूस करने लग जाते हो। कभी-कभी निरीह और बेचारा भी।
लेकिन गाली देते हुए भी, एंकर आइटम बोलकर उन सबको सर्किल से बेदखल करते हुए हममें से ज्यादा भीतर ही भीतर इस बात से सहमत थे कि अगर अफेयर-इश्क मीडिया में रहकर नहीं किए तो समझे किसी भी फील्ड में नहीं कर सकते। इसलिए बिना किसी दिखावे और हो-हल्ला के सब अपने-अपने स्तर पर सक्रिय रहते।
हम सब नए थे, चैनल भी रिलांच होना था। इसलिए किसी का काम निर्धारित नहीं था। आज एडिटिंग पर तो कल इन्जस्टिंग पर। जिसको दिन में श को स बोलने पर रिपोर्टिंग में भेजने से मना कर दिया, रात में किसी के न मिलने पर आग लगने पर रिपोर्टिंग के लिए भेज दिया। कभी किसी को दस बजे दिन में बुलाया तो अगले दिन रात के दस बजे। सबकी जिंदगी तंबू बन चुकी थी। जो तीन दिन से लगातार एक समय, एक डेस्क पर आता वो पास काम कर रही लड़की से मिक्स होने की कोशिश करता, बात होने भी लग जाती। हमलोगों के पास सकुचाते हुए आता औऱ कहता- आजभर माफ करना, लंच साथ नहीं कर पाएंगे। कोई कहता- चार साल बाद किसी औरत जात के हाथ का खाना नसीब हुआ है, डकार लेता और हमें जलाता। एक ने कहा- अबे, कुछ लड़कियों को मैंने देखा है कि उपर से एटीट्यूड होता है लेकिन घर का काम भी अच्छा जानती है। बेजोड़ कढ़ी बनाती है। मैं कहता- जैसे कौन। वो कहता- तुम बेटा, पॉलिटिक्स करते हो। हमलोगों ने भी जात-बिरादरी बाहर वाला फंड़ा छोड़ दिया था। सब इस संभावना से लवरेज हो गए थे कि कोई भी बंड़ा या बंड़ी नहीं रह पाते। जिसका काम मुश्किल नजर आता, उसके फेवर में माहौल बनाते, रिवायटल टॉक करते। लेकिन इन सबका, कोई फायदा नहीं होता, हममें से किसी न किसी की शिफ्ट या डेस्क बदल जाती औऱ दो भावी पत्रकारों के सपने उजड़ जाते। अब वो स्क्रीप्ट लेकर अपने पास नहीं आती, उसको फोनो पर लगा दिया गया था, दिखती ही नहीं।
सब शिफ्ट खत्म होने पर बाहर आते। उदास औऱ उत्तेजित होकर। स्साला, भोंसड़ी के, प्रोड्यूसर ने अफेयर तक नहीं होने दिया। पैसा देते हो कम तो दो लेकिन इंसान के मन को तो भी समझो। स्साले सब न्यूज ब्रेक करेंगे। यहां सबकी शिफ्ट बदलकर चैनल को बूचड़खाना बना दिया है सो नहीं। लड़कियों की पेट गाली होती, वो आज का हरामी नहीं है, हमारे यहां गेस्ट क्लास लेने आता था चिरकुट। किसी का सुख इससे बर्दाश्त नहीं होता....ऐसे ही पत्नी से थोड़े ही तलाक हुआ है। आज भी मिलते हैं तो सब कहते हैं, स्साले ने अफेयर होने नहीं दिया। बाबू को कूपन लौटाते हुए मैंने फिर दोहराया- ए लॉट कैन हैपन ओवर ए कॉफी।..
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4 Response to 'स्साले प्रोड्यूसर ने अफेयर तक होने नहीं दिया'
  1. गिरीन्द्र नाथ झा
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/02/blog-post_14.html?showComment=1234614660000#c1441674270476236319'> 14 फ़रवरी 2009 को 6:01 pm

    ए लॉट कैन हैपन ओवर ए कॉफी।..का सरजी सबको उघारने का काम कर रहे हैं..पोस्ट में मज़ा है, क्योंकी इसमे रिदम है, सो पढने और अनुभव करने में मज़ा आता है.

    एक गो और बात ''अगर अफेयर-इश्क मीडिया में रहकर नहीं किए तो समझे किसी भी फील्ड में नहीं कर सकते। ''
    आपका फ मंत्य्वा हम ममझ नही पाए..कभी विस्तार से समझायेगा..
    और का का हुआ आज..ए लॉट कैन हैपन ओवर ए कॉफी।

     

  2. इष्ट देव सांकृत्यायन
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/02/blog-post_14.html?showComment=1234620720000#c3289970746486836898'> 14 फ़रवरी 2009 को 7:42 pm

    अजी तो अबसे कर लीजिए न अफेयर, क्यों परेशान है?

     

  3. मसिजीवी
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/02/blog-post_14.html?showComment=1234680120000#c2393253424276728494'> 15 फ़रवरी 2009 को 12:12 pm

    इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

     

  4. मसिजीवी
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/02/blog-post_14.html?showComment=1234680180000#c2410837844525612439'> 15 फ़रवरी 2009 को 12:13 pm

    हा हा हा
    पाठक पढता भी है अपने ही दिमाग को..; हम सब पढ गए ये सोचते हुए कि शीर्षक है 'स्‍साले प्रोफेसर ने अफेयर तक नहीं होने दिया' जबकि था प्रोड्यूसर।

    पर ठीक ही है अब स्‍साले प्रोफसर न होने देंगे अफेयर... कुछ नहीं बदलता

     

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