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अधिकांश मीडियाकर्मियों को ऐसा लगता है कि आज भी टेलीविजन के मुकाबले प्रिंट मीडिया लाख गुना अच्छा है। आज भी उसमें बाजार के तमाम दबाबों के बावजूद जर्नलिज्म जिंदा है। शायद यही वजह है कि वो जब टेलीविजन की चिल्लम-पो से उकता जाते हैं, सो कॉल्ड पत्रकारिता के नाम पर बकबास करते-करते झल्ला जाते हैं तो अखबारों को पकड़ लेते हैं। आठ साल-दस साल के बाद उन्हें फिर से सत्य का ज्ञान होता है कि- नहीं अभी तक जो कर रहे थे, वो सब छल था, अब वाकई पत्रकारिता करनी चाहिए। इस बीच फ्लैट के लिए लोन की किस्त भी पूरी हो जाती है, इसलिए माल कम भी मिले तो भी काम करने में परेशानी नहीं होती। हालांकि माल कम मिलता नहीं है। यह रघुवीर सहाय की हिन्दी नहीं है जो सिर्फ मुटाती जाती है, ये हिन्दी मीडिया है जो बाजार के माल से न केवल थुल-थुल हुई है बल्कि पहले से कहीं ज्यादा दुधारु हुई है, पैसा इसमें भी है। प्रिंट के पत्रकारों ने भले ही जमीनी स्तर पर तेजी से अपना हुलिया नहीं बदला हो लेकिन माल उन्हें भी टेलीविजन के लोगों से कम नहीं मिलते। खैर,

टीवी मीडिया में दूसरे तरह के वे मीडियाकर्मी हैं जो टीवी में ही बने रहना चाहते हैं। ये उनका समर्पण कहें, मोह कहें या फिर आदत। बोलने की भी आदत खराब होती है, ड्रग्स से भी खराब, इसका इलाज सिर्फ है, पहले से ज्यादा बोलना। ज्ञान देने के लोभ से वो टीवी छोड़ना नहीं चाहते। लेकिन उनका मन करता है कि वे अपनी बातों को, अपने अनुभवों को, मीडिया के ज्ञान को अखबार के पाठकों तक पहुंचाएं। एक तो पहुंच पहले से ज्यादा बढ़ती है, अच्छा सोचने और लिखने का लेबल लगता है, लोगों के बीच ये मैसेज जाता है कि- देखो, बंदा टीवी में रहकर भी इसके भीतर के खोखलेपन को कितनी हिम्मत से लिख रहा है, सबमें ऐसा करने का करेजा नहीं होता। लोग ऐसे मीडियाकर्मियों की ईमानदारी पर रीझ मरते हैं। साथ ही ये जो आम धारणा बनती जा रही है कि टीवी में काम करनेवाले लोग बुद्धिजीवी हो ही नहीं सकते , वो इससे भी बरी हो जाते हैं और बुद्धिजीवी कहलाने का सुख भी मिल जाता है। ग्लैमर, स्टेटस का कॉम्बी पैक ।

आप टीवी पत्रकारिता कर रहे मीडियाकर्मियों की बातों पर गौर करें। आप एक बार में ही अंदाजा लगा लेंगे कि ये जो कुछ भी कह रहे हैं, वो तो हम सब भी कहते हैं, टेवीविजन की जिन बातों से हमें असहमति है, उससे वे भी असहमत होते हैं। मतलब आज टीवी चैनलों के विरोध में जितना हम बोलते-बतियाते हैं, उतना तो ये भी बोलते हैं। टीवी के अंदर का बंदा भी टीवी से उतना ही असहमत है जितना कि टीवी के बाहर का दर्शक या आम आदमी। इसे आप टीवी मीडियाकर्मियों की ईमानदारी कह सकते हैं, आप इसे उसकी छटपटाहट कह सकते हैं। और वो जो लगातार प्रिंट में लिख रहे हैं, उसे फर्स्ट हैंड एक्सपीरियेंस कह सकते हैं। लेकिन बात क्या सिर्फ इतनी भर है।

टीवी में काम करते हुए जो भी लोग प्रिंट में लिख रहे हैं, वे नौसिखुए लोग नहीं है, नए मीडियाकर्मी नहीं है कि फ्रस्ट्रशेन में जो मन में आया लिख दिया। ये वो लोग हैं जिन्हें मीडिया का अच्छा-खासा अनुभव है, जिनकी चैनलों के भीतर अच्छी-खासी पैठ है। वो डिसिजन मेकिंग बॉडी में हैं, उनके हिसाब से काफी कुछ चीजें तय होती हैं। हम जैसे लोगों के जाने पर बताते हैं कि खबर क्या है औऱ क्या नहीं। हम जिसे खबर मानकर शूट कर लाते हैं, वो उनके लिए खर-पतवार है, एक सिनिकल स्टेज है और उनके मुताबिक हमें जल्द से जल्द इससे उबरना चाहिए। लेकिन प्रिंट में आकर फिर यही लोग उन सब बातों पर लिख जाते हैं, लगातार लिख रहे हैं जिसे कि पाठ्यक्रम पढ़कर और संस्थानों से पत्रकारिता करके नए-नए मीडियाकर्मी चैनल में पत्रकारिता करने आते हैं। चैनल में जो चीजें नए मीडियाकर्मियों के लिए सिनिकल, नास्टॉल्जिक और कोरी भावुकता है, प्रिंट में आते ही इन अनुभवी टेलीविजन मीडियाकर्मियों के लिए सीरियस जर्नलिज्म, सच्ची पत्रकारिता।

....तो क्या हम ये मान लें कि प्रिंट माध्यमों में वो ताकत है जो कि अनुभवी से अनुभवी टीवी मीडियाकर्मियों को टीआरपी से हटकर घोर सामाजिक स्तर पर सोचने और लिखने को मजबूर कर देता है, उनकी कलम( अब कीबोर्ड) समाज से शुरु होती है और समाज पर जाकर खत्म होती है। उन्हें एहसास कराती है कि मीडियाकर्मी होने के पहले तुम एक संवेदनशील इंसान हो। या फिर इससे भी अलग कि इन टीवी मीडियाकर्मियों के लिए प्रिंट मीडिया एक कॉन्फेशन सेंटर है। जहां आकर वे थर्ड पर्सन में लिखकर सबकुछ बयान कर दें कि- मीडिया के नाम पर न्यूज रुम में क्या-क्या होता है। खबरों के नाम पर लोगों के सामने कूडे का अंबार लगाया जा रहा है। ये हमें जानकारी देने से ज्यादा अपना मन हल्का करने के लिए लिख रहे हैं। कॉलेज के दिनों में ये काम हमने चर्च के फादर के सामने खूब किया है।

साहित्य में ये काम विद्यापति और घनानंद जैसे मूर्धन्य कवियों ने खूब किया है। जीवनभर नायिका-भेद और श्रृंगार परक रचनाओं के लिखने बाद अंत में उन्हें लगा कि- अब तक हमनें जो कुछ भी किया, वो ठीक नहीं था, हमें ये सब नहीं करना चाहिए था । अंतिम दौर में उन्होंने जो पद लिखे हैं, उसे पढ़कर आपको अंदाजा लग जाएगा कि वे अबतक के अपने किए गए कर्म को पाप समझ रहे हैं और ईश्वर पर लिखकर प्रायश्चित करना चाहते हैं।... तो टीवी के अनुभवी मीडियाकर्मी, प्रिंट में लिखकर कुछ ऐसा ही कर रहे हैं या फिर अपनी अनुभूति की प्रामाणिकता हमारे सामने पेश कर रहे हैं।




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3 Response to 'प्रिंट में आकर कॉन्फेशन करते हैं टीवी पत्रकार ?'
  1. डॉ .अनुराग
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/08/blog-post_18.html?showComment=1219064460000#c1696640517892515878'> 18 अगस्त 2008 को 6:31 pm बजे

    कथा देश ओर हंस में जो मीडिया पर संकरण निकला था उसे देखकर यही लगा की फ़िर काम क्यों करते है भाई ?

     

  2. Unknown
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/08/blog-post_18.html?showComment=1219090080000#c2763414592824397021'> 19 अगस्त 2008 को 1:38 am बजे

    मुझे लगता है के ये बेवजह की बहस है ,चाहे टी. वी . मिडिया कितना भी हावी हो जाये प्रिंट की पत्रकारिता के मायने अपनी जगह है , इन सब की उठा पटक से दूर एक अच्छी पत्रकारिता होनी चाहिए चाहे वो ई .या प्रिंट मीडिया से हो ..

     

  3. Anil Pusadkar
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/08/blog-post_18.html?showComment=1219128000000#c8015697302773539642'> 19 अगस्त 2008 को 12:10 pm बजे

    patrakaita ki chunautiyan saman hai,chahe print ho ya electronic.samjhaute dono me karne padte hain.jo risk lete hai unhe daftar badalna padta hai warna sab thik-thak hai.bahut katheen hai imaandari se patrakarita karna

     

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