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मैं लोगों के बीच इस बात के लिए बदनाम हूं कि दिनभर गांव की लड़कियों की तरह कमरे में दिन बिताता हूं, रुमघुसरा हूं. कमरे में रहकर इन्टल होना चाहता हूं और कमरे में रहकर ग्लोबल स्तर पर ख्याति पाना चाहता हूं। लेकिन इधर पिछले दस दिनों से मैं ठीक इसके उलट कर रहा हूं. दिनभर इधर-उधर मारा-मारा फिर रहा हूं। मैं फैकल्टी कभी नहीं जाता. गाइड से फोन पर बातचीत हो जाती है लेकिन इधर रोज जा रहा हूं। लाइब्रेरी के आगे बैठे लोगों को मन ही मन गाली देता रहता कि उन लोगों को कोई काम नहीं है जो दिनभर यहां बैठकर भसर करते है। लेकिन आजकल मैं खुद बिना कोई काम के दिनभर यहां बैठता हूं। हिन्दी की सभा-संगोष्ठियों में जाने में बड़ी बेचैनी होती है, सब अपनी-अपनी गोटी लाल करने में लगे रहते हैं और मै उन्हें देखकर खीजता रहता हूं. लेकिन आजकल यहां भी जाता हूं। कुछ लोग मिल जाते हैं और कहते हैं कि फोटो में तो बहुत उमरदराज लगते हैं।
आजकल मैं दिनभर क्या करता हूं, मुझे खुद भी पता नहीं चलता। रोज इस कोशिश में सोता हूं कि सुबह उठकर रेगुलर कोई काम करुंगा। लेकिन अगली सुबह तक सो ही नहीं पाता कि दिन में व्यवस्थित होकर काम कर सकूं। कुछ लोगों को वायदा कर चुका हूं कि इतने तारीख तक लेख दे दूंगा लेकिन दे नहीं पा रहा. फोन कर-करके सबसे माफी और मेल करके सॉरी बोल रहा हूं। शाम होते-होते मन भारी होने लगता है। एक ही चिंता खाए जाती है कि आज नींद कैसे आएगी और फिर किसी न किसी बहाने किसी के पास चला जाता हूं. एक बार भी किसी ने कह दिया कि रुक जाओ खाकर जाना तो रुक जाता हूं। किसी ने कह दिया-रात हो गयी है, सुबह चले जाना तो जान में जान आ जाती है और वही सो लेता हूं। उनसे भी बात करता हूं जिन्हें कल तक झेल कहता रहा। पता नहीं क्या-क्या बातें करने लगा हूं जिसे अब तक मैं कहता रहा कि बकवास बंद करो। आप कह सकते हैं कि मैं इन दिनों एब्नार्मल हो गया हूं। मैं वो होता जा रहा हूं जो कभी होना नहीं चाहता, मैं वो सब करने लगा हूं जो मैं करना नहीं चाहता. मुझे भावुक होना बहुत बुरा लगता है लेकिन मैं भावुक हो उठता हूं। मुझे लगता रहा है कि भौतिक चीजों से लगे रहने और काम में फंसे रहने से टेंशन दूर हो जाती है लेकिन इसका भी भ्रम टूटने लगा है। मैं काम को टालने लगा हूं, अपने सर को चैप्टर दिखाने में कोताही बरतने लगा हूं।
फोन पर मेरे गाइड से एक या दो मिनट से ज्यादा बात नहीं होती। इधर फोन करते ही कहता हूं- सर आपसे दो मिनट बात करनी है और १५ से २० मिनट तक उन्हें यही सब बातें सुनाने लग जाता हूं। वो सुनते हैं, साहस बंधाते हैं और अंत में मैं सॉरी बोलता हूं। फिर परेशान होता हूं। रेसीडेंट ट्यूटर को फन करता हूं- पूछता हूं सर मेरे बारे में क्या किया जा रहा है, मेरा कमरा कब बदल रहे हैं, मैं बिल्कुल पढ़ नहीं पा रहा सर, सो नहीं पा रहा सर। मैं बुरी तरह अपसेट हो गया हू सर। वो कहते- कीप पेसेंस विनीत, मैं एक रात में तो कुछ भी नहीं कर सकता न। आय एम वरीड अबाउट यू एन योर करियर. वार्डन को फोन लगाता हूं। शुरु में एक बार के बाद कभी नहीं उठाते और अगर बूथ से बात हो जाए तो फिर से सबों का नाम देने कहते हैं। प्रोवोस्ट ने तो एक बार पूरी बात सुन ली लेकिन अब छोटी-मोटी बातों के लिए परेशान करने में विश्वास नहीं रखते.
जिस कमरे को मैंने बहुत मेहनत से जमाया, पर्दे से लेकर क्रॉकरी के लिए अच्छे-खासे पैसे के साथ दिन-दिनभर का समय बिताया, अब ये सब मुझे कुछ भी अच्छा नहीं लगता। स्वीपर को घुसने नहीं देता, खुद भी पोछा नहीं मारता। लगता है जो जैसे हैं, उसे वैसे ही पड़ रहने दो। फ्रीज में पानी तक नहीं भरता. सारी चीजें खराब होतीं जा रही है और मैं फेंकता जा रहा हूं। याद नहीं कि कब मेस टेबल पर बैठता हूं, खाता हूं।
क्या इतनी-सी बात हमें इतना परेशान करेगी। मेरे कमरे में कोई एक दिन शराब पीकर हंगामा कर दे तो इसका मेरे उपर इस तरह का असर होगा. पढ़ते हुए भी ये सब आपको बचकाना लगेगा। मेरे साथी भी कहते हैं जो आदमी पूरी दुनिया को खुल्ला चैलेंज करता है वो ऐसे कैसे कर सकता है। जो लोग हसरत से मुझे फोन करते थे, मुझसे मिलने की बाट जोहते थे, जिनके पास चला जाउं तो कहां-उठाउं कहां बैठाउं करते थे- आज बताते हैं कि वो फलां काम में विजी हैं। जिस कुछ को यकीन हो गया था कि ये लड़का लिख-लिखकर हंगामा खड़ा कर सकता है, आज वो सब हम पर तरस खा रहे हैं. मेरा मन कहीं भाग जाने का करता है, मेरा मन हॉस्टल छोड़ देने का करता है, मेरा मन पापा के साथ साडी और धोती बेचने का करता है, मेरा मन रिसर्च छोड़ देने का करता है.
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8 Response to 'फालतू किस्म का और एब्नार्मल होता जा रहा हूं मैं'
  1. Rajesh Roshan
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/08/blog-post_02.html?showComment=1217667060000#c1522179640845488527'> 2 अगस्त 2008 को 2:21 pm

    विनीत, मुझे नहीं पता कि तुम कैसे इसे टेकल कर रहे हो। पढ़ने के बाद इतना समझ पा रहा हूं कि तुम अच्छे स्थिति में नहीं हो। मैं तुमसे कहां मिल सकता हूं? नार्थ कैम्पस के किसी इलाके में भी या फिर जहां तुम्हारी सहूलियत हो। मेरा नंबर है 9350239304

     

  2. PD
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/08/blog-post_02.html?showComment=1217670660000#c5429492278511969059'> 2 अगस्त 2008 को 3:21 pm

    sir, khud ko sambhaaliye..
    abhi se aisaa sochne lagenge to aage kya hoga??
    vaise ye ek phase ki tarah hota hai.. samay ke saath sab normal ho jayega.. :)

    http://comics-diwane.blogspot.com/

     

  3. शोभा
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/08/blog-post_02.html?showComment=1217673780000#c6633553243375236413'> 2 अगस्त 2008 को 4:13 pm

    बहुत रोचक शैली में लिखा है। आनन्द आगया।

     

  4. आनंद
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/08/blog-post_02.html?showComment=1217692500000#c2190823567633769534'> 2 अगस्त 2008 को 9:25 pm

    ऐसा लगता है आप अप्रिय स्थिति में फँस गए हैं। गुंडागर्दी से डरते हैं। एक सुझाव है। पिटना कोई भयानक घटना नहीं होती, कि इससे डरा जाए। पिटने और एक्‍सीडेंट में घायल होने में कोई अंतर नहीं होता। दिल कड़ा कर यह डर निकाल दीजिए।
    - आनंद

     

  5. Ashish Singh
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/08/blog-post_02.html?showComment=1217705520000#c1195623430894861553'> 3 अगस्त 2008 को 1:02 am

    vineetji,
    ek din apne purane chahne walo se tv today network me mil aaiye kuch tassli milegi..aap fir pareshan ho rahe hain..thora tasalli rakhiye sab theek hoga..

    main janta hu ki kahne aur mahsoos karne me kafi antar hota hai, fir bhi kuch din aur sahi..chinta mat kijiye..hum hain na..aur humare liye aap hain na udhar, aise to nahi chalega..friz me pani ki bottles rakha kariye, acha lagta hai..koi problem ho to sushant se ek din baat kariye, shayad kuch hal nikal sake..bas pareshan na rahne ka prayas kijiye..fir milunga..

     

  6. डा. अमर कुमार
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/08/blog-post_02.html?showComment=1217745360000#c6934313209970573446'> 3 अगस्त 2008 को 12:06 pm

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    जरा अपने पीछे मुड़ कर देखिये तो..
    मैं भी तो आपके पीछे खड़ा हूँ !
    फ़र्क़ इतना है कि आप लिख पढ़ भी लेते हैं ,
    और मैं ब्लागिंग में उलझा हूँ ।

     

  7. Sanjeet Tripathi
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/08/blog-post_02.html?showComment=1217755200000#c55144806162957917'> 3 अगस्त 2008 को 2:50 pm

    बंधु, क्या मुझे यह कहने की जरुरत है कि संभालो अपने को आप।
    बातें नही हुई आपसे एक लंबा समय हुआ!

     

  8. आशीष कुमार 'अंशु'
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/08/blog-post_02.html?showComment=1218186060000#c3295506514005088667'> 8 अगस्त 2008 को 2:31 pm

    क्या आप वही विनीत है, जिसने मुझे कहा था- मैं जो भी करता हूँ, वह मेरी नीयत में होता है. आपने ही कहा था - नियती में आपका यकीन नहीं है. अब जो कुछ हो रहा है उसे क्या कहा जाए?
    विनीत जब आप इस तरह की बात करते हैं तो उन बहूत सारे लोगों का हौसला टूटता है, जिनके लिए आप सोच भी नहीं सकते कि वे आपसे कितने गहरे जूडे हैं?
    इसलिए ... क्या कहूं?
    शुभकामना

     

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