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इस दिल्ली शहर में जो दारु नहीं पीता हो और साथ में कोई चमचमाती लडकी नहीं हो उसके लिए नए साल का क्या मतलब रह जाता है डॉक्टर साहब? नया साल क्या आधे दर्जन से ज्यादा उत्सवों का कोई मतलब नहीं रह जाता। ऐसे मौके हमें घर की याद नहीं दिलाते बल्कि बीए और एम.ए.की याद दिलाते हैं कि हमने बाकियों जैसा ही किसी के साथ कुछ क्यों नहीं किया? अगर किए होते तो बंड़े नहीं घूमते। यकीन मानिए ऐसे मौके पर बहुत टूअर-टापर फील कर रहे हैं। माल रोड़ पर दस रुपये जोड़ी के दो उबले अंडे खाकर जैसे ही उसने दोना फेंका तो यही सब कहने लगा। फिर अपने उपर गर्व होने का बोध कि हम दारु नहीं पीते हैं, औरों की तरह बन-ठनकर लड़कियों के साथ मस्ती नहीं करते। इस वक्त मैं बौद्धिक होना नहीं चाहता था। मेरा कुछ भी बोलने का मन नहीं कर रहा था। वैसे भी आज दोपहर में कोठारी हॉस्टल के सीनियरों ने बहुत दिनों बाद मिलने के नाम पर पकड़कर बहुत पकाया। विश्वविद्यालय की पॉलिटिक्स से लेकर मीडिया को गरियाने का काम और एक-एक प्रोफेसर के नाम पर मां-बहन करके बुरी तरह फ्रस्ट्रेट कर दिया था। मैं उस मनहूस महौल से निकलने के लिए छटपटा रहा था। वहां से भागा तो किस्मत देखिए कमरे पर आए दोस्त ने फिर से वही सब चर्चा छोड़ दी। नौकरी,फ्लैट,गाड़ी शादी। हम एक-एक करके अपने उन दोस्तों को याद करने लग गए जो अब सेटल्ड हो गए हैं। कुछ तो पलटकर कभी फोन तक नहीं करते। ओह..यार पहले कमरे से निकलो। आज हम ये सब क्यों डिस्कश कर रहे हैं। चलो बाहर चलते हैं। बाहर कहां,वही मियां की दौड़ मस्जिद पर। अब यहां भी फिर से...मूड नहीं था। मैं बस माल रोड पर बुके खरीदती लड़कियों,लड़के को कोहनी मारते हुए..ज्यादा बनो मत,यू नो,आइ मीन की गिटपिट अंग्रेजी सुनना चाह रहा था। मैंने कहा- दोस्त,ऐसा करते हैं,घूमते हैं। उसने पूछा कहां- मैंने कहा,आसपास। कमलानगर के शोरुम्स में चक्कर लगाते हैं।..तो चलिए फिर और हम निकल पड़े।

उस पर थोड़ा प्रेशर डाला और लिवाइस की एक कार्गो खरीदने के लिए राजी कर लिया। उसे कार्गो तो बहुत पसंद आ गया। अंदर से खुश भी हो रहा था कि चलो बहुत दिनों बाद कुछ कायदे का पसंद आया। लेकिन फिर कहा-आपके साथ आने से यही दिक्कत है,आप सीधे जेब पर चोट करते हैं। अब आप भी कुछ खरीदिए..ऐसे कैसे होगा। चलो खरीदते हैं और फिर कन्वर्ज की स्लीपर खरीदकर वापस हॉस्टल की तरफ। चारो तरफ हॉस्टलों में डीजे की बहुत ही तेज आवाजें,तेज धुनें। वो एक बार फिर से उदास हो गया। कार्गो खरीदने से हासिल खुशी गायब। बार-बार एक ही बात कहने लगा। आज पता नहीं बाबूजी को क्या हो गया है? सुबह ही फोन करके कहा कि बारह बजे फोन ऑन रखना,नए साल पर फोन करेंगे। हमें डर लगने लगा कि कहीं हम एक बार फिर उदासी की तरफ तो नहीं जा रहे हैं। मैं उससे एकदम से उबरना चाह रहा था। मैं देर रात टीवी देखना चाहता था। उसने फिर उदासी से कहा- डॉक्टर साहब, स्टार वन पर महाभारत खत्म हो गया। मतलब साफ था कि अब क्या करके मन बहलाए....। मेरा मन उसके साथ बिताने का था लेकिन शर्त थी कि मैं किसी भी हालत में सीरियस नहीं होना चाहता था,उदास भी नहीं,नए साल में मां याद नहीं आती कि कोई संस्मरण लिख लिया जाए। ये अपने ढंग का मेरे लिए अकेला उत्सवी महौल है जिसे कि अपने दम पर खेपना होता है। मैंने उसे बाय-बाय कहा और कहा कि रात में धावा बोलते हैं तुम्हारे यहां।

तय कर लिया था कि क्या करना है। फ्लासक में खौलता हुआ पानी भरा। बगल में टी बैग और शक्कर पॉट। लैपटॉप ऑन कर लिया। मुझे कुछ नहीं करना है। जमकर टीवी देखनी है और लगातार फेसबुक पर कुछ न कुछ लिखते जाना है।
हॉस्टल के इस कमरे में ढाई साल से रह रहा हूं। बहुत ही संयमित होकर टीवी,सीडी और रेडियो बजाता आया हूं। लेकिन आज मैंने तीनों रिमोट के फुल वाल्यूम किया। फेसबुक को दूहने की तैयारी शुरु। बिना इस बात की चिंता किए कि लोग इतनी जल्दी-जल्दी स्टेटस बदलने पर कमेंट करेंगे या नहीं। मैं धीरे-धीरे टीवी में डूबता चला जाता हूं। फेसबुक पर स्टेटस बदलना शुरु- टीवी को चलाने के मेरे पास तीन रिमोट हैं- एक टीवी का,दूसरा टीवी रिकार्डर का और तीसरा टाटा स्काई का। दो साल में आज पहली बार मैंने तीनों को लास्ट पर लाकर बजा रहा हूं। एम टीवी फुल..है लव मेरा हिट,हिट...तौबा मेरी तौबा कुड़ी है तू सेक्सी.
शू शू के लिए कमरे से बाहर निकलता हूं। चारो तरफ डीजे की आवाज और शोर से घिरा मेरा हॉस्टल। वापस आकर टीवी की आवाज कम करता हूं। एफ.एम का हाल समझना चाहता हूं। फेसबुक पर लिखता हूं- आइ वना फक यू,आइ वना किस यू, आहूं,आहूं,आहूं...बारी बरसी खटन गियासी..हॉस्टल के चारो के हॉस्टल की आवाजें। मेरे हॉस्टल की ऑथिरिटी ने पढ़ने-लिखने की जगह पर डीजे लगवाने से मना कर दिया। पड़ोस के कमरे से पापा कहते हैं बेटा नाम करेगा और मेरे कमरे में लगातार एफ एम...मन का रेडियो बजने दे जरा।..

तभी मुंबई से अजय ब्रह्मात्मज का फोन। हुलसती आवाज। कैसे हो,नए साल पर क्या कर रहे हो। मैं जबाब देता हूं-कुछ नहीं सर,पिछले आठ दिनों से किसी न किसी बहाने बाहर डिनर कर रहा हूं। बहुत मिलना-जुलना हो गया लोगों से। आज नहीं सिर्फ और सिर्फ टीवी और हॉस्टल में खाना। और आप क्या कर रहे है। मैं-मैंने आज कटहल बिरयानी बनवायी है,रास्ते में उतरकर कहीं छेने की मिठाई लूंगा,केक खाने से ज्यादा नुकसान है। दिल्ली से एक बहुत अच्छी दारु लाया हूं। दोनों बच्चे अपने दोस्तों के साथ मस्ती कर रहे हैं। मैंने सोसाइटी के बुजुर्गों को अपने यहां बुलाया है। जमकर होगी पार्टी। अजय एक ऐसे शख्स हैं जो किसी भी इंसान को कभी बूढ़ा होने नहीं देते,थका महसूस होने नहीं देते। पिछले सप्ताह तीन दिन बिताए हैं उनके साथ मैंने,मेमरेबल डेज इन माई लाइफ। मैंने चुटकी ली,आप तो दुनियाभर के जवान और लौंडों से मिलते हैं,आज बुजुर्गों के साथ क्यों। वो उत्साहित हो जाते हैं,अरे तुम नहीं समझते. बहुत मजा आएगा। मानो सबों को जवान होने का एहसास कराने जा रहे हों।..और सुनो,एक खुशखबरी,मुझे मदर इंडिया का ऑरिजिनल पोस्टर मिल गया। मेरे बच्चों ने इसे अगर संभाल कर रख लिया तो एक प्रोप्रटी हो जाएगी।...और आप एकदम अकेले हो,एकाकीपन ठीक है लेकिन अकेलापन नहीं। मैंने कहा जी। फिर ढेर सारी बातें। सिनेमा पर,पोस्टरों पर,लोगों पर। मैं हंस-हंसकर दोहराता जाता हूं। वो ठहाके लगाते हैं..यानी ऑल इज वेल की टिप्स। मैं जोशिया जाता हूं। रेडियो की आवाज मेरी इस खुशी में साथ नहीं देगा। फिर से टीवी फुल करना होगा।...एम टीवी पर नगाड़ा बजा..नगाड़ा बजा...। तभी न्यूज चैनलों का हाल जानने की इच्छा। एक और फेसबुक पर स्टेटस-
नया साल शुरु होने के पहले एक खुशखबरी- सज्जन कुमार के खिलाफ फिर चलेगा मुकदमा।..मुझे जरनैल सिंह और उसके प्रयास याद आते हैं। सभी न्यूज चैनलों ने अपने-अपने स्तर से मोर्चा संभाल लिया है। जी गानों के पीछे पड़ा है। आजतक राजू श्रीवास्तव का मौगापन लगातार दिखाए जा रहा है। न्यूज24 पर गंगूबाई। आइबीएन7 गोवा की पार्टी में मैनेजमेंट स्टूडेंट की मौत पर लगा हुआ है। एनडीटीवी पर रवीश का व्ऑइस ओवर। अच्छा लगता है सुनना। ठहर जाता हूं। रवीश का थोड़ा व्यंग्यात्मक अंदाज है। राजनीति,जीरो फीगर,चांद-फिजा को लेकर। विनोद दुआ भी ऐसे ही होते जा रहे हैं। एनडी के लोग आजकल व्यंग्यकार हो गए हैं। 09 की नौटंकी का एंकर भी खुद ही व्यंग्य बनकर आया है। फेसबुक पर स्टेटस बदलता हूं-
बार्बी के जीरो साइज पर रवीश कुमार के जबरदस्त शब्द..2009 का लेखा-जोखा दे रहे हैं रवीश..सिर्फ व्ऑइस ओवर का मजा मिल रहा है।..। तभी एक और खुशखबरी- जमीन पर अवैध कब्जे के मामले में आसाराम बापू पर खबर,हटाने के आदेश।. आजतक ने घड़ी लगा रखी है। श्वेता सिंह बताती है कि आज एग्जैक्ट टाइम पर विश कर सकें इसलिए ये घड़ी चलती रहेगी। बहुत हो गया न्यूज चैनल। अब एक नजर मनोरंजन चैनलों पर-
सोनी पर टेली अवार्ड। सारे टेलीविजन कलाकारों की मौजूदगी। जो बसंत की तीसरी पत्नी गहना बालिका वधू में दिन-रात रोती रहती है,यहां जबरदस्त तरीके से नाच रही है। यूटीवी बिंदास पर लगातार 50 गाने एक के बाद एक जारी है। स्टार वन पर राजू श्रीवास्तव। पवित्र रिश्ता का पुराना राग जारी है। डांस पर डांस में जज की फटकार- ये किसका कॉन्सेप्ट था। लड़की जबाब देती है-सर मैं। जज- बहुत ही घटिया आइडिया है। जूनियर दोस्तों ने दरवाजा पीटना शुरु कर दिया। घड़ी देखी,बारह बज गए। फेसबुक पर 2009 का अंतिम स्टेटस अपडेट- लो भइया,अब 2009 गया तेल लेने। अब जो भी जोर-जबरदस्ती करनी हो,2010 के खाते में जाएगा।..
जल्दी लकड़ियों को घेरे हुए मेरे हॉस्टलर दोस्त। मुझे देखते ही चिल्लाते हैं-अरे विनीत आ गया। अब जमेगी महफिल। जमकर होगी बकचोदी। मैंने कहा- सुनो,अपने यहां तो डीजे आया नहीं है। पीजी मेन्ज वालों को बोलो कि आवाज थोड़ी तेज कर दे,हम दो चार सौ रुपये दे देंगे। सब ठहाके लगाते हैं। मैंने कहा-यार एक बार उधार की धुन पर नाचकर तो देखो। फिर ठहाके। तभी एमबीए का एक प्यारा बंदा नहीं। नहीं सर,इंतजाम है। कमरे से साउंड बॉक्स ले आया है। लैप्टॉप से जोड़कर गाने बजने शुरु होते है- पैसा,पैसा क्यों करती है,पैसे पे क्यों मरती है। पीछे से जोर से- पूजा आइ लव यू..मिस यू। आग को पार करता है..आइ वना फक यू आइ वना फक यू। सब एक-दूसरे को काटकर केक खिलाते हैं। अमित सबसे प्यारा जूनियर दोस्त है। गाल पर केक मलता है। मैं कहता हूं-अबे चूतिए,बर्बाद मत कर,मेस बिल ज्यादा आएगा। जबरदस्ती में थोड़े ठुमके लगाता हूं। बाकी के हॉस्टल का हाल लेने के लिए गेट के बाहर। पीजी मेन्ज में ज्यादा रौनक है। रंग-बिरंगी लाइटों के बीच थिरकते रिसर्चर। एक भी हिन्दी गाना नहीं,खालिस पंजाबी औऱ हरयाणवी। जुबली हॉल में मेरे दोस्त इंतजार में हैं। पहुंचते ही एक स्वर में- तोहफा कबूल करें डॉक्टर साहब। लेकिन स्साले सब ललचाकर कॉफी का कप पकड़ा देते हैं। फिर नाचने की जिद। मेरी शॉल एक के गिरफ्त में आ जाती है और मुझे जबरदस्ती नाचना होता है। यहां गानों का मामला अलग है। भोजपुरी पॉपुलर बज रहा है यहां। पूरबिया रंग जमा है। सानिया मिर्जा कट नथुनिया जान मारे ले बीट के पीछे रिसर्चर दिवाने हो जाते हैं। पीछे से हॉस्टल ऑथिरिटी की तारीफ,वो भी यहां ठुमके लगाकर गयी है।...थककर चूर। फिर वीसी ऑफिस का एक चक्कर,वापस हॉस्टल।

मीडिया पर लिखी जेम्स कर्रन और जीन सीटॉन की किताब पॉवर विदाउट रिस्पान्सिविलिटी पढ़ते-पढ़ते पता नहीं कब सो गया। ओह तो ये है नए साल की नई सुबह। किसी भी बाथरुम में जाने का मन नहीं कर रहा। बेसिन में सिर्फ उल्टियां। सारे ट्वायलेट से सिगरेट,वोमेटिंग और शराब की मिली-जुली बेचैन कर देनेवाली बदबू। बेतहाशा पानी मारता जाता हूं। वापस कमरे में आकर सकुचाते और लजाते हुए पुष्कर की दी हुई परफ्यूम को पुश करता हूं,अद्भुत..स्वर्ग सी अनुभूति। एक लड़की दोस्त का फोन,तुम दिनोंदिन कमीने होते जा रहे हो। स्साले एक फोन नहीं कर सकते हो,नए साल पर। एनी वे मुबारक हो ये नया साल और एक दिन बहुत बड़े,बहुत बड़े,बहुत ही बड़े.............बनो।..
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8 Response to 'आइ वना फक यू के बीच जो उदास होने नहीं देते'
  1. neelima sukhija arora
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/01/blog-post.html?showComment=1262331801254#c64897600543280028'> 1 जनवरी 2010 को 1:13 pm

    इस दिल्ली शहर में जो दारु नहीं पीता हो और साथ में कोई चमचमाती लडकी नहीं हो उसके लिए नए साल का क्या मतलब रह जाता है डॉक्टर साहब?

    वो उत्सवी माहौल के बीच अजीब सी उदासी , फिर भी धमाचौकड़ी चालू रहती है, अपनी नहीं तो दोस्तों की तो होती ही है। पर फिर भी हैट्स आ‍फ टू यू अकेले रहते हुए खुद को उतनी ही जिंदादिली से जिंदा रखना इस पत्थर के शहर में बड़ी बात है।

     

  2. डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/01/blog-post.html?showComment=1262332546404#c735494086501765940'> 1 जनवरी 2010 को 1:25 pm

    नव वर्ष की मंगल कामनाएँ!

     

  3. सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/01/blog-post.html?showComment=1262337291767#c3394272879401198113'> 1 जनवरी 2010 को 2:44 pm

    वाह विनीत जी, आपने तो जबर्दस्त रिपोर्टिंग कर दी।
    इस स्क्रिप्ट पर तो फिल्म बननी चाहिए। थ्री ईडिएट्स सरीखी...। बधाई।

    आपको नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं।

     

  4. narottam
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/01/blog-post.html?showComment=1262354425100#c4386272695922819814'> 1 जनवरी 2010 को 7:30 pm

    gud one....
    neelima sukhija arora ji ki baat se mai puri tarah sahmat hun....
    karan bas ek hi hai ki mai v daru nahi pita n mere paas v chamchamti ladki(ye kuchh ajib sa prayog hai)nahi hai...fir v dil ko zindz rakhna hai....
    bahut khub....

     

  5. अनूप शुक्ल
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/01/blog-post.html?showComment=1262366228175#c4034214548581831549'> 1 जनवरी 2010 को 10:47 pm

    एक अलग अंदाज की कोलाज नुमा पोस्ट। नये साल के बहाने अपने आसपास की तमाम चीजों को देखते हुये अपनी मन:स्थिति बयान करती हुयी सुन्दर पोस्ट।

    नये साल की शुभकामनायें।

    एकाध दोस्त ऐसे हमेशा बने रहें जो समय-समय पर इत्ते अधिकार से कमीना कहते रहें। :)

     

  6. rashmi ravija
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/01/blog-post.html?showComment=1262368297591#c2167249511140122938'> 1 जनवरी 2010 को 11:21 pm

    Thats the spirit...अकेले ही आपने कम एन्जॉय नहीं किया...फिर दोस्तों के साथ भी मस्ती की..और अंत में किताब के साथ भी समय बिताया..क्या बात है....इसी जज्बे के साथ,नए साल का हर पल बिताते रहें.

     

  7. Sheeba Aslam Fehmi
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/01/blog-post.html?showComment=1262376098797#c7967560479880926753'> 2 जनवरी 2010 को 1:31 am

    aapko padhna hamesha khud ko samajhne jaisa hota hai. Apne andar aur bahar ki bareekiyoN par zabardast grip! aur saath mein asli bhasha ka tadka!

     

  8. prabhat gopal
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/01/blog-post.html?showComment=1262503409052#c4767435509138915773'> 3 जनवरी 2010 को 12:53 pm

    लेख ये बताता है कि कई विचारों और द्वंद्वों का सामना करते हुए लेखक महोदय ने नये साल में प्रवेश किया है। वैसे जो भी हो, लेकिन थोड़ा से मस्ती करने में कोई हर्ज नहीं है। दूसरी बात, आदमी को जैसा देश, वैसा वेश के लिहाज से चलना चाहिए, इसलिए दिल्ली के रंग में रंग जाने में कोई बुराई भी तो नहीं। जिंदगी है, जी लिजिये, बौद्धिक बनकर कितने दिनों तक खुद को फुसलाते रहेंगे।

     

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