.


रवीशु कुमार हमसे पूछ रहे हैं कि आप एनडीटीवी इंडिया से कब बोर हो जाते हैं? मेरी अपनी समझ है कि अभी भी ये देश का अकेला हिन्दी चैनल है जिसके बारे में ये नहीं कहा जा सकता है कि- ये न पूछिए कि कब बोर नहीं होते हैं? इस चैनल का अंदाज अभी भी बाकियों चैनलों से कुछ मायनों में अलग है जो कि मीडिया और चैनल को लेकर जेनरल पर्सेप्शन से अलग करता है। ये अलग बात है कि कई बार लगता है कि ये भी आजतक और इंडिया टीवी के रास्ते पर चलने लग गया है। फेसबुक पर पूछे गए इस सवाल को लेकर लोगों ने जो जबाब दिए हैं उसे पढ़ते हुए लगता है कि उनके भीतर सालों से कुछ जमा है जो कि आज मौका मिलते ही कमेंट के तौर पर बाहर निकल रहा है। किसी-किसी के कमेंट जमे हुए थक्के रुप में। इसलिए वो एक बार कमेंट करने के बाद दोबारा कमेंट कर रहे हैं। वैसे भी चैनलों ने हमें मौका ही कब दिया है कि हम उनके बारे में कुछ बोल-बतिया सकें,उन्हें-उनतक अपनी बात पहुंचा सकें। सालों से जो मन आया,सुविधा हुई दिखाते रहे और अब कहने लग गए हैं कि ऑडिएंस जो देखती है वही तो दिखाएंगे न। एक गरीब की तरह ऑडिएंस भी मारा जाता है।. ये तो फेसबुक और ब्लॉग के जमाने में ही संभव हो सका। कुछ लोग इस चैनल में नया और बदलाव के तौर पर वो सबकुछ देखना चाहते हैं जो कि निजी समाचार चैनल देखते हुए दूरदर्शन की कमी को पूरी कर दे।

ये तय बात है कि फेसबुक पर रवीश कुमार के बहाने एनडीटीवी इंडिया को जो भी राय दे रहे हैं उसे मानना,लागू करना चैनल के लिए संभव नहीं है। क्योंकि रवीश कुमार जो कुछ भी जानना चाह रहे हैं वो एक ब्रॉडकास्टर/मीडियाकर्मी और ऑडिएंस के बीच के संबंध की हैसियत से जानना-समझना है। इसे अमल करना मार्केट पॉलिसी,एचआर और चैनल एडमीनिस्ट्रेशन का हिस्सा है। ऐसे में ही सौरभ सेनगुप्ता ने सवाल किया है कि जब कुछ बदलना ही नहीं है तो फिर पूछा क्यों जा रहा है,कोई कुछ सुनता ही नहीं है। रवीश कुमार अपने और ऑडिएंस के बीच के संबंध की याद दिलाते हैं। कुछ बदलेगा या नहीं इस बहस और नीयत से उपर उठकर कमेंट करें तो इतना तो जरुर होगा कि चैनल से जुड़े लोगों को इस बात की जानकारी हो सकेगी कि टीआरपी के आंकड़ों के बीच ऑडिएंस के मिजाज हैं,पसंद-नापंसद है जिसे जानना-समझना जरुरी है। रवीश कुमार पहले भी इस तरह के मसलों पर अपने फेसबुक दोस्तों से राय मांगते आए हैं। फेसबुक पर टेलीविजन के अलग-अलग मुद्दों पर बहस के लिए आजकल अजीत अंजुम भी सक्रिय हैं। टीआरपी,एंकर की गलतियों से लेकर कार्यक्रम को लेकर बहस शुरु की। आप भी अपनी राय दें,शायद हमारा टेलीविजन कुछ हद तक सुधर जाए। फिलहाल तो एनडीटीवी इंडिया को लेकर-

Ravish Kumar
आप एनडीटीवी इंडिया से कब बोर हो जाते हैं? कोई एक बदलाव जो आप चाहते हों। सिर्फ एक। जैसे- वॉयस ओवर, स्टोरी लिखने का तरीका, सुपर्स-टिकर्स, स्टोरी का चयन, चैनल का रंग, विषय। दो शब्दों में जवाब दे सकते हैं। क्यों बोर होते हैं इसके लिए लंबा लेख चलेगा।


View all 57 comments
Pankaj Sharma 11 hours ago
Ndtv is also going on other channel's track. Means more masala and less information. Ndtv should remain the inormation oriented and content of international also increase.

Prabhash Dutta 11 hours ago
Desh ke dwipakshiya mudde pichhe chhut jate hain, International Affairs bhi dhang se cover nahin kiye jaate, Kai baar story writing theek nahin hoti .... aisa lagta hai ki bilkul hi inexperienced copy writer ko bitha rakha hai ....

Vicky Tiwari 10 hours ago
Ravish bhaiya namashkar!
NDTV india
khabar ke mamle me apna ek alag mukam banaya tha, magar in dino woh 'to entertain' pe jyada focus ho gaya hai. NDTV ko India tv na banaye.
auron ke mukabale apki story sankshep me hoti hai usse thoda vistaar de. story vagairah achchi likhi jati hai. विनोद दुआ ki vaani me aoj hai unki prastuti behtareen hoti hai. unke karyakramon ko jari rakhen. ek कमाल ke 'खान' hai jo gahe-begahe dikh jaya kartein hai, unko bhi koi karyakram prastut karne ka avsar de, woh Debang ke dwara rikt ki gai pad ko bakhubi sambhal sakte hai. supers aapke akarshak hoten hai jinpar nigahen barbas chali jati hai. ticker ko thoda rochak banayen aur kuch colours use karen. graphix pe thoda dhyan dena hoga.
aur kya kiya ja sakta hai? aur soch kar punah apko bata ta hun.

Kirti Chauhan 10 hours ago
aapne logo ke mantavya janane ki tasdee li he is liye aaka dhanyavad... jab bhi cricket match hota hai tab me bore hota hu, kyuki ndtv par cricket news ka atirek ho jata hai, 24 ghante me se ek yaa do ghante cricket ke liye thik hai.... baki to aapke haath me hai.....!!!!

Arpan Raut 10 hours ago
india tv ki barabari na kare... matlab bharipan barkarar rakhe

Vaibhav Saxena 10 hours ago
Ravish G aap puch rahe hain isliye bata raha hun.. aapke jitne bhi naye anchors hain unmein se jyadatar news ki seriousness ko nahin samajhte most importantly Deepti Sachdeva and Sushil Bahuguna.. "I can't forget a news about a MiG crash.. The Pilot had dead.. and oh God, Deepti was reading the news with smiles.." I felt very bad.. Bhagwaan ki daya se meri feelings abhi mari nahin..
Sorry, if anybody feel bad, but according to me, its all important for a news-reader.. You must feel the importance or seriousness of a news..

×Vineet Kumar 10 hours ago
व्ऑइस् ओवर के मामले में एनडीटीवी बाकी चैनलों की नकल पर उतर आया है। एक बात। दूसरी बात शाम के समय जब हम खुद बोर होते हैं और इससे बचने के लिए एनडीटीवी पर जाना चाहते हैं तो वो भी बोर करता है। विनोद दुआ लाइव के पहले तक। ये अलग बात है कि अब विनोद दुआ भी बोर करने लगे हैं।..मनोरंजन भारती को देखते ही चैनल बदलने की मजबूरी बढञ जाती है।...

Amit Kumar Tripathi 10 hours ago
ek khabar ek zindagi ka sach kehti hai aur vo sach is glamourised form mein kabhi nahi ho sakta, ye roshniyon mein aur mastiyon mein dooba huaa sach humaara to nahi ho sakta, katrina salman se shaadi k arti to bhi hum vahi hain aur na kare to bhi to kya baat hai ki media ko inhi baaton mein interest hai Idon't know ki NDTV ko bhi kyun bimari si ho gayi hai is Gossip ki, bcoz humare liye NDTV maane khabarein jo zindagi se judi hoti hain aam zindagi se.

Sanskrita Pandey 10 hours ago
ravish ji,being a entertainment reporter i feel in entertainment there should be more effective and influencive vo.i dnt like the way of ur vo artist,espl grls.but i must say that i seriously like ndtv's generel and crime bultns....

Dhananjay Kumar 10 hours ago
सर जिस तरह से विनोद दुआ साहब का एंकर रीड इतिहासिक भूमिका के साथ रहता है, अगर उस तरीके का एंकर रीड सुवह की बुलेटिन में करने की कोशिश करे तो मेहरबानी होगी । दर्शकों को सुवह शाम खबर के साथ ज्ञान भी मिलेगा ।

Purnendu Pritam 10 hours ago
जब खबर को खबर के तरह न पेश किया जाये, उसे नाटकीय अंदाज में दिखाया जाये, जैसा की अभी लगभग सारे चैनल टीआरपी की होड़ में खबरों को मशाला मार कर पेश करते है।
ऐसी तर्ज पर जब एनडीटीवी इंडिया खबरों को दिखाते हैं तो हम चैनल बदलने को मजबूर हो जाते है.... बोर हो जाते है।

Arvind Batra 9 hours ago
कुछ नया करते रहिये..कभी खुशवंत सिंह जी की शैली में थोडा रोमांटिसिज्म भी ट्राई करिए. हल्का व्यंग भी चलेगा. कटाक्ष तो आप से बेहतर कोई नहीं करता. आप सब से अलग है.

Dipak Parmar 8 hours ago
need some aggression

Amit Yayavar 7 hours ago
मुझे तो हिंदी मई से सबसे अच्छा लगता है | ज्यादा लोगो को अच्छा लगने के लिए कुछ हल्का होना पड़ेगा | मुझे नही लगता आपके पास इसकी गुंजायश है|

Chhupa Rustam 4 hours ago
देखो मित्र,
किसी को बताना मत..
एक तो जब कोई ऐसा व्यक्ति स्क्रीन पर आ जाए जो बोले कम और हकलाए ज्यादा...
तब मैं ये सोचने को मजबूर हो जाता हूँ कि आखिर NDTV की क्या मजबूरी है जो प्राईम टाईम में भी ऐसी गलती करते है,और जब साथ में कोई ऐसा व्यक्ति भी एंकरिंग कर रहा हो जिसकी जुबान केस्ट्रोल ऑयल पीकर चलती है, तब वो अटकल ज्यादा अखरती है,अगर विवादास्पद होने की उम्मीद हो, और अगर आप चाहे तो मेरे कमेन्ट को मिटा भी सकते है,

Chhupa Rustam 4 hours ago
एक जब लगे की अब NDTV जैसा महान चैनल दूसरे सनसनी ब्रांड चंनेलो की कॉपी कर रहा है,
बार बार एक ही लाइन रीपीट करना, स्क्रीन पर बड़ा बड़ा लिखना, जैसे अनपढ़ और गंवारो की VIEWERSHIP बटोरने का इरादा हो...
मुझे याद नहीं कब, पर ध्यान है कि एक बार NDTV पर भूत-प्रेत की कोई खबर दिखाना भी लोगो में चर्चा का विषय बन गया था..

Chhupa Rustam 4 hours ago
जब दूसरे चैनल पर चलने वाली खबर को बड़ी खबर माना जाए... अपनी अकल से कम काम लिया जाए...

Chhupa Rustam 4 hours ago
जब भड़ास जैसे ब्लॉग पर NDTV के स्ट्रिंगर की पोलखोल जानकारी मिलती है तो लगता है, कि जमीनी स्तर पर पत्रकारों के चयन में NDTV भी बाकी घटिया चंनेलो के तरीके से ही निर्णय लेता है...

Gopal Chakravarti 4 hours ago
throw out barkha dutt..after her tirade..post IPL auctions..she shud be shifted to GEO TV

Shahid Siddiqui 4 hours ago
टीआरपी के रेस में सब जायज है, हां...लेकिन फिलहाल एनडीटीवी कुछ बेहतर है जिसे दर्शक बर्दाश्त कर सकते हैं.

Sarvesh Upadhyay 4 hours ago
NDTV के जो special programs होते हैं वो बहुत अच्छे होते हैं. लेकिन राजनितिक समाचारों में वो neutral नहीं रह पाते हैं. उनकी प्रस्तुति biased लगती है. किसी एक पार्टी विशेष के प्रति नरम और किसी के प्रति गरम रुख. महंगाई मार रही है लेकिन रुख नरम ही है. याद है वो मजाक भरा हसी जब एक पार्टी की हार पर हसी जा रही थी पिछले लोक सभा चुनाव के दौरान?

Saurabh Sengupta 3 hours ago
रावीष जी? आपके रहते ऐसा हो रहा है?
आप ऐसे सवाल क्यों कर रहे ... क्या आप UNDER-PRESSURE है? YA! आपके नीचे, एडिटर और प्रोडूसर आपकी नहीं सुनते ... ? ———

-Ranjan Rituraj 2 hours ago
I agree with Sarvesh Jee , In Loksabha election NDTV - INDIA journalist MANORANJAN BHARATI was having extreme soft corner for LALU PRASAD - It was extremem visible , You can not play such biasness based on your CASTE & CREED , You will have to be answerable to INDIAN viewers .

Juzar Vora about an hour ago
when advertisement is on, otherwise every thing is up tothe marke, i like vinod dua live it is the best, it is the mile stone of journalism....

Atul Kanakk about an hour ago
please introduce some programme on contemporary poetry.

Pankaj Bengani about an hour ago
मुझे तो एनडीटीवी द्वारा खबरों की बजाय दृष्टिकोण पेलना अखरता है. समाचार दिखाईए ना! यह टिप्पणी विशेष रूप से दुआ साहब के लिए है. मुझे सबसे अधिक वे ही बोर करते हैं.

Chandan Kumar about an hour ago
मेरे मुताबिक़.......स्टोरी लिखने का तरीक़ा...

Chandan Kumar about an hour ago
मुझे भी लगता है, एनडीटीवी न्यूट्रल नहीं रह पाता है...एंकर पार्टी विशेष की बात को जस्टिफाई करने लगते हैं...ख़बर दिखाइए किसी की तरह से प्रवक्ता बनने की क्या ज़रूरत है....कई दफा एंकर्स ने किसी पार्टी विशेष की बात जस्टीफाई की......अच्छा नहीं लगा....

Pankaj Bengani about an hour ago
एनडीटीवी [विशेष रूप से इंडिया] न्यूज़ कम व्यूज़ चैनल अधिक है. दुआजी को हर जगह खराबी ही नजर आती है!

GArima TiwaRi 48 minutes ago
story ka chayan...

GArima TiwaRi 48 minutes ago
asli kalewar khota sa najar aa raha hai....

Ravish Kumar 43 minutes ago
सौरव जी सवाल इसलिए नहीं कि कोई सुनता नहीं है। हम दर्शक की राय जानने के लिए कर रहे हैं। पहले भी ऐसा किया है। इसी फेसबुक पर। लेकिन ज्यादातर लोग सब्जेक्टिव हो गए हैं। हमने सिर्फ एक चीज जो आपको अखरती है, उस पर राय मांगी थी।

Ravish Kumar 41 minutes ago
पंकज, हां हम कई मायनों में व्यूज़ चैनल हैं। हमारी सोच है कि दर्शकों के एक बड़े तबको को व्यूज पसंद आता होगा। यह हमारा भ्रम भी हो सकता है। चंदन की भी बात आपसे मिलती जुलती है। अतुल जी कविता पर कोई कार्यक्रम शुरू नहीं कर सकते। दूरदर्शन भी नहीं बनना चाहता। कुछ लोगों के अलावा कविता के कार्यक्रम में दिलचस्पी नहीं होगी। हां अगर कोई इसे क्रांतिकारी तरीके से बना दे तो और बात है। फिलहाल मेरे पास ऐसा आइडिया नहीं है।

Rahul Pandey 39 minutes ago
har akhbar me apna edit page hota hai. jo news par viws rkhta hai. lekin news chnlls se ye page gayab sa hota lagta hai NDTV ke alawa. to khabar par najar rakhni hi hogi, lekin ye bhi gaurtalab hai ki hamare desh me pankaj bhai jaise log jyada hain, to unka bhi samman kiya jana chahiye. hard news ki sripting hard news ki hi tarah ho, ant me ek commnt kiya ja sakta hai, aisa na ho ki hard newd story lage...

Rahul Pandey 38 minutes ago
aur abhi to ye kafi lamba chalega, kuch aur vichar ayenge

Pankaj Bengani 37 minutes ago
स्पष्टिकरण के लिए धन्यवाद रविशभाई.

Ravish Kumar 33 minutes ago
इन सवालों के जवाब से दर्शक के मन की बातों का पता चलता है। वो जानना ज़रूरी होता है। मैं इन संवादों के बाद अपने प्रदर्शन को बदलने की कोशिश करता हूं और सारे वरिष्ठ संपादकों को आप लोगों की राय पढ़वाता भी हूं।

Prabhat Gopal Jha 31 minutes ago
एनडीटीवी बेहतर है। थोड़ा सा फीचर बेस्ड ज्यादा है। थोड़ी आक्रामकता चाहिए। लगता है कि जैसे इलिट क्लास का स्तर बनाए रखने के चलते आम लोगों से दूर होता जा रहा है। थोड़ी रिपोर्टिंग में आक्रामकता चाहिए। बस। लगे कि असली खबर यही दे रहा है, असली खबर। बस। ये अहसास होना जरूरी है।

Rahul Pandey 30 minutes ago
prabhat ji se sahmat...

Pankaj Bengani 28 minutes ago
वैसे मुझे एनडीटीवी के "व्यूज़" से परेशानी नहीं है. परेशानी यह है कि खबर दबती जा रही है. विचार उभरते जा रहे हैं. मतभिन्नता तो होगी ही, तो जिनके विचार नहीं मिलते वे दर्शक सोचेंगे कि यार क्या देखें?!?

कहने का तात्पर्य यह कि विचार भी प्रगट कीजिए [आपका चैनल है जो चाहें करें] परन्तु समाचार से मूँह मत मोडिए. उन्हें प्राथमिकता दीजिए. विचारों के लिए अलग से दुआ साहब से कमेंटरी करा लीजिए :) :)

रविशभाई, मेरी सोच आपके चैनल से कम ही मेल खाती है, लेकिन स्वीकार करना चाहूंगा कि खबर देखने के लिए पहले वहीं जाता हूँ या फिर अंग्रेजी चैनलों की शरण में. बाकी चैनल शोर शराबा है. परंतु आजकल व्यूज इतना भारी हो गया है कि न्यूज दब गया है. इसलिए अब कम जाता हूँ.

Saurabh Sengupta 27 minutes ago
चलिए, जवाब तो दिया :) ... आप कुछ भी लिखे, टिप्पणी मिल ही जाती है│ लेकिन करेंगे क्या इन सब राय का ... ? पहले भी ऐसे सवाल कर चुके है ... जवाबो में तब और अब में कोई अंतर नहीं│ इसीलिए मैंने पुछा था ... खैर! NDTV का स्तर गिर भी रहा हो तो आप क्या कर लेंगे ... क्या सवाल/जवाब से स्तर और अच्छा हो जाएगा? ऐसा दिख तो नहीं रहा —— बाक़ी आप ज़्यादा समझ रखते होंगे│

Ashok Chakradhar 20 minutes ago
अशोक चक्रधर जैसे किसी व्यक्ति से जीवंत कार्यक्रम कराइए रवीश जी, बोरियत दूर होगी। लवस्कार।

Jitesh Kumar Jha 19 minutes ago
Sir Hindi media jagat mai NDTV ek aisa channel hai jissne` aaj bhi Media ko kisi hadd tak Zinda rakha hai... iske alawa ginati k 1 se 2 channel hai jo apni peshkash mai imandaari dikhata hai.. Bash Apni Imaandaari ko banaye rakhe... thats all..

Ravish Kumar 19 minutes ago
पंकज की बातों में दम है। सौरभ ये जो आप क्या कर लेंगे टाइप सवाल है उससे असहमत हूं. जान लेंगे न कम से कम आप क्या सोचते हैं। और मुझे ये लिखना पंसद नहीं आया कि आप कुछ भी लिखते हैं टिप्पणी मिल जाती है। ये टिप्पणीकारों का अपमान है। मैंने तो टिप्पणी मांगी है। आप लोगों से कहा है कि दीजिए। शाम छह बजे से रात के साढ़े ग्यारह बजे तक मनोरंजन का प्रतिशत पांच फीसदी भी नहीं होता होगा। साढ़े सात बजे के बाद कभी कभार ही मनोरंजन का कुछ चलता है। हम मनोरंजन खराब दिखाते होंगे यह मैं मान सकता हूं लेकिन मनोरंजन से कैसे मुंह मोड़ सकते हैं। अजीब बात है। वैसे ही कुछ लोग बोल देते हैं कि यू ट्यूब चलता है। मेरी राय में चलना चाहिए। पहले मैं भी यू ट्यूब को आपके नजरिये से देखता था, लेकिन बाद में समझता गया कि हमारे समय का यह सबसे महत्वपूर्ण वीडियो दस्तावेज है। एक किस्म का खजाना है। हां ये न्यूज का विकल्प नहीं हो सकता लेकिन इस पर कोई कार्यक्रम ही न बने इस पर मेरी असहमति है। वैसे हम बहस में क्यों जा रहे हैं। बहस भी करेंगे। लेकिन पता तो चले कि आप हमारी स्टोरी से संतुष्ट हैं या नहीं। ग्राफिक्स अच्छा लगता है या नहीं।

Prabhat Gopal Jha 18 minutes ago
@ saurabh..सवाल जवाब से अच्छा न भी हो, तो निष्कर्ष तो निकलेगा ही। दूसरी बात जब सौ के करीब चैनल हों और हाथ में रिमोट, तो दर्शक सीधे खबर चाहता है। भाषा, कंटेंट और कलेवर को लेकर बहस अपनी जगह है, लेकिन जिस दिन सिर्फ खबर दर्शक के माथे पर चढ़कर बोलने लगेगा, उस दि दर्शक सिर्फ वही चैनल देखेगा। दर्शक या पाठक को सिर्फ खबर से मतलब होता है। बाजार में अगर टिकना है, तो खबर दीजिए, असली खबर, जिसके लिए मेहनत करनी होगी और कुछ नहीं। फीचर या शब्दों के मायाजाल से सिर्फ टाइमपास ही होता है या दायित्व का नाम मात्र का निर्वहन।

Parveen Kr. Dogra 18 minutes ago
i have been a regular viewer of ndtv india. i can say only one thing that smhow and smwhre it is also trying to be a part of the herd!!!! i knw its a question of survival in competitive markt but viewrs cant undrstnd it.. in one line" ndtv india is not wht it used to be initially"

Yagnyawalky Vashishth 10 minutes ago
वो खबरें अब नहीं दिखती जिन्हे याद रखा जाए बावजुद इसके बोर होने लायक हालात फिलहाल नहीं है

Prabhat Gopal Jha 9 minutes ago
आप ज्यादा दूर क्यों जाते हैं, अंगरेजी और हिन्दी के एनडीटीवी में जमीन-आसमान का अंतर है। अंगरेजी में खबरों और मुद्दों पर जोरदार बहस होती है। वहां जो एंकर मुद्दों पर बात करने के मामले में आक्रामकता का बोध कराते हैं, वहीं एनडीटीवी हिन्दी वह सिरे से गायब रहता है। सामनेवाले से खबर या मुद्दों पर विचार लेने के लिए आक्रामक होना पड़ता है। लेकिन एनडीटीवी हिन्दी में ऐसा लगता है, जैसा सहज वार्तालाप के जरिये खबरों को पेश करने की कोशिश हो। देवांग साहब के पुराने मुकाबले के स्तर को प्राइम टाइम में खबरों को देते समय उतारिए।

Saurabh Sengupta 7 minutes ago
मैं कहीं देखा था की कई देसी न्यूज़ चैनल ने आसाराम जी बापू पर अनावश्यक लांछन लगायें│ पहले तो लगा कि, उनके किसी भक्त कुंठित होकर ऐसा किया होगा, पर ... पूरा स्टिंग आपरेशन लोड था, जिसमे एक व्यक्ति कैसे लड़कियों को सिखा रहा था कि, प्रेस कांफेरेंस में क्या बोलना है│ ... कई चैनलों के नाम थे उस रिपोर्ट में!

(सच के पीछे शायद ग्यारह मुल्को कि पुलिस न हो पर — सच जानना मुश्किल ही नहीं —— नामुमकिन है!) ... कृते

Ramnish Kumar 39 seconds ago
Unnecessary BJP ko gali dena aur Soniya/Rahul ki tarif ke pool bandhna chor dijiye ... Waise Vinod Dua sahab ka pgm band karwa dijiye to ye bimari 75% khatm ho jaegi ... voice over me ab dheere dheere aaplog bhi Aajtak aur Starnews ke rah pe nikal pare hain .

(बहस और सुझाव अभी भी जारी है।...
| edit post
12 Response to 'रवीश हमसे पूछ रहे हैं,कब बोर करता है एनडीटीवी इंडिया?'
  1. prabhat gopal
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/01/blog-post_22.html?showComment=1264147167972#c711334019399689697'> 22 जनवरी 2010 को 1:29 pm

    इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

     

  2. prabhat gopal
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/01/blog-post_22.html?showComment=1264147630268#c53677947822761914'> 22 जनवरी 2010 को 1:37 pm

    एक चैनल का आदमी खुद बदलाव की बात करता है। फीडबैक मांगता है। इसका स्वागत तो होना ही चाहिए। यही असली रास्ता है।

     

  3. ravishndtv
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/01/blog-post_22.html?showComment=1264152703413#c5599013951190517216'> 22 जनवरी 2010 को 3:01 pm

    ये सही है कि दर्शकों की राय जानने का माध्यम फेसबुक,ब्लॉग और ट्विटर के कारण संभव हो सका है। उससे पहले ईमेल से सैंकड़ों राय आती थी लेकिन उसकी एक सीमा थी। जिस तरह से फेसबुक पर आप अपने अलावा दूसरे की राय पढ़ सकते हैं उस तरह से
    ईमेल में संभव नहीं था।

    रही बात इस इंटरएक्टिविटी की तो इसका फायदा होता है। इससे पहले मैं कोई पांच-छह सौ लोगों से मिल चुका हूं। घरों में जाकर और बाजार में जाकर। तीन महीने तक लगातार किया है।

    इसका फायदा होता है। इन्हीं फीडबैक के आधार पर हमने बहुत चीज़ें बदली हैं। यह कहना ठीक नहीं है कि कुछ नहीं होता। अजीत अंजुम से बहुत पहले मैं फेसबुक पर इस तरह के सवालों को पूछा करता था। उन प्रतिक्रियाओं का अपने शो, लिंक या स्टोरी लिखने की शैली में इस्तमाल किया है। पर जैसा कि आप कहते हैं कि लोग जमा हुआ थक्का उड़ेल रहे हैं वो ठीक भी है। उससे सुनना चाहिए। बस दर्शक यह राय न दें कि हम प्रतियोगी बने बिना ही जिंदा रहे तो वो आज संभव नहीं है. टीवी एक महंगा माध्यम है। बताने की जरूरत नहीं। मंदी ने सिर्फ एनडीटीवी इंडिया को ही मारा। और किसी को नहीं। नौकरियां हमारे यहां से गईं। इसकी वजह यह थी कि हम बाजार में रह क र कमा नहीं रहे थे। इसकी सबसे बड़ी वजह ये भी थी कि हम अच्छे हो कर भी अच्छा नहीं कर रहे थे। हम इस भ्रम में नहीं रहना चाहते कि एनडीटीवी इंडिया ही सर्वश्रेष्ठ चैनल है। इसका मतलब यह नहीं कि मैं इस चैनल को कम आंकता हूं। लेकिन हकीकत जानना चाहिए। अगर हम अच्छा समझते हैं तो क्या दर्शक अच्छा समझता है? हम क्यों बाजार में कंपीट नहीं कर पा रहे हैं? मुझे राय और खासकर आलोचना सुनने में परहेज़ नहीं। लोगों के घर जाकर सुन आया हूं। लेकिन इसका साकारात्मक असर पड़ता है। जो आप सोच रहे हैं वहीं हम भी सोच रहे हैं। हम उस रास्ते को खोज रहे हैं जहां अच्छा भी रहा जा सके और ज़िंदा भी।

     

  4. विनीत कुमार
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/01/blog-post_22.html?showComment=1264156333139#c4938392736121235974'> 22 जनवरी 2010 को 4:02 pm

    @रवीश
    आपने सही कहा कि-बस दर्शक यह राय न दें कि हम प्रतियोगी बने बिना ही जिंदा रहे तो वो आज संभव नहीं है.। ऑडिएंस को एक हद तक चाहिए कि वो टेलीविजन की आलोचना व्यावहारिक पक्षों को ध्यान में रखकर करे।..
    18 जनवरी के the hindu में जे.मुरली का एक लेख है- trends in socil media marketing. उस लेख में साफ बताया गया है कि सोशल साइट के जरिए अपने कन्ज्यूमर को इन्गेज किया जा सकता है,उन्हें जाना-समझा जा सकता है। इसमें मेरी अपनी समझ है कि ये तभी संभव है कि जब लोग फेसबुक और दूसरी सोशल साइटों को तेल-मालिश करने का खटिया समझने के बजाय शेयरिंग की जगह मानने लग जाएं।..

     

  5. Anil Pusadkar
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/01/blog-post_22.html?showComment=1264168903066#c433957570595965110'> 22 जनवरी 2010 को 7:31 pm

    kitna bhi bor kare baki channelon se thora thik hi hai

     

  6. lakshaman prasad
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/01/blog-post_22.html?showComment=1264174158223#c5723380858438657450'> 22 जनवरी 2010 को 8:59 pm

    Ndtv ham dekana chate hai ki abe garib gurbo ki kitani batta karta hai. sarkar ki basha bolta hai ki aam jantta ka. TRP lena ho to koi bat nai ape buut preate dekho

     

  7. ravi ranjan kumar
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/01/blog-post_22.html?showComment=1264179581992#c3584605225170877774'> 22 जनवरी 2010 को 10:29 pm

    NDTV ने भारतीए हिंदी मिडिया में स्तरीय पत्रकारिता की कमी को पूरा किया है। मेरा मतलब टीवी से है। व्यवसायिकता के नाम पर जिस तरह अंधविश्वासों को बेचने कि प्रथा सी चैनलों पर चली है। उसमें NDTV एक अपवाद कि तरह दीखता है। एक सुझाव कि क्या कहूँ - विनोद दुआ एक उदाहरण हैं।समाज के हर हिस्से के लिए अगर खबर हो तो चैनलों की विश्वसनीयता बढ़ेगी ही । BBC से बड़ा उदहारण क्या है। जानते साब हैं - बस कोई पहल नहीं करता। उम्मीद है रवीश पहल करें। - यह सिर्फ एक दर्शक की नज़र से।

     

  8. अनूप शुक्ल
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/01/blog-post_22.html?showComment=1264180986530#c7820166497184920109'> 22 जनवरी 2010 को 10:53 pm

    फ़ीडबैक के लिये फ़ेसबुक का शानदार उपयोग करते हैं रवीश कुमार। अच्छा किया इसे पोस्ट किया।

     

  9. रज़िया "राज़"
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/01/blog-post_22.html?showComment=1264326084269#c8550536929869133178'> 24 जनवरी 2010 को 3:11 pm

    हाँ! एक ज़माना था कि मैं एन.डी.टी.वी की ज़बरदस्त फ़ेन रही। जब ईस के रीपोर्टर अपने समाचारों में जान दाल दीया करते थे। आज सिर्फ़ न्यूज़ की वजह से ही नहिं पर NDTV IMAGINE पर भी "राखी का स्वयंवर" या "राहुल दुल्हनीया ले जाएगा। जैसे प्रोग्राम दिख़ाये जाने लगे तब से दर्शकों को एनडीटीवी सिर्फ एक टाईमपास लगने लगा है।

    मेरी नज़रों में तो 100 से 20 तक नीचे आ चुका है।
    सही है कि ये भी इंडीया टीवी के रास्ते पर चलने लगा है। अगर ऐसा ही रहा तो बहोत जल्द इस का नाम निशां बदलना होगा।

     

  10. आवेश
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/01/blog-post_22.html?showComment=1264522843221#c5885493715689921912'> 26 जनवरी 2010 को 9:50 pm

    मत कहो आकाश में कोहरा घना है ,ये किसी की व्यक्तिगत आलोचना है

     

  11. eda
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/01/blog-post_22.html?showComment=1264842980640#c3899246201043905089'> 30 जनवरी 2010 को 2:46 pm

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  12. dinesh
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/01/blog-post_22.html?showComment=1287257176017#c204053357476975292'> 17 अक्तूबर 2010 को 12:56 am

    Jab aapki koi nai report nahin dekhne ko miti

     

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