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आठ-आठ रुपये लेकर स्कूली बच्चों को सदभावना अभिव्यक्ति के स्टीकर बांटे जा रहे हैं। रूपनगर (दिल्ली) के सरकारी स्कूल से निकलनेवाली लड़कियों से रुक कर जब हमने पूछा कि इसे अपनी आइडी पर क्यों चिपकाया है – उसका जवाब था, टीचर ने कहा है लगाने के लिए। स्टीकर की कीमत भी उसी ने बतायी। कैंपस में कुछ लड़के हमें इसे दस रुपये में ले लेने का अनुरोध कर रहे थे।

डीयू कैंपस की आर्ट्स फैकल्टी के मेन गेट के आगे बहुत भीड़ है। किसी छात्र राजनीतिक पार्टी के लोग जमा होकर वहां मोमबत्तियां जलाने का काम करने जा रहे हैं। हवन की तरह लकड़ियां पहले से जल रही है। देश के कई मीडिया चैनल पहले से तैनात हैं। पीछे से एक बंदा दूसरे बंदे को धक्का देता है – भैनचो… बार-बार आगे आ जा रहा है,टीवीवाले क्या तुम्हारे… की फोटो खींचेंगे…
अबे सुन, ये ले, इतने में जितनी कैंडिल आ जाए, ले लियो।
चैनल की माइक लिये लोगों के पास ही बंदे मंडरा रहे हैं। कुछ को इसका फल भी मिला है और उसकी बाइट ली जा रही है। चारों तरफ दैनिक जागरण के बैनर पाट दिये गये हैं। बैनर टांगता हुआ एक बंदा कहता है- अबे भोसड़ी के हंसा मत, ठीक से बंध नहीं रहा।

ये सब कुछ देश के उन शहीदों को याद करने के लिए किया जा रहा है, जिन्होंने शायद ही कभी सोचा होगा कि मेरे शहीद होने के साथ ही किसी खास पार्टी के खांचे और रंगों की लकीरों से बने बैनरों के बीच फिट कर दिया जाएगा?

दो दिन पहले मुंबई के लियोपोल्ड कैफे ने 26/11 के चिन्हों और शहीदों की याद में 300 रुपये के पैग की सेवा शुरू की। पैग मग पर शहीदों की तस्वीरें और धमाके और खून के धब्बों को प्रतीक के तौर पर मग पर छपवाया। अफ़सोस कि एनडीटीवी इंडिया ने कैफे की समझ को पहल बताया। कल रात एनडीटीवी के फुटेज में 26/11 के शहीदों को याद करने के लिए क्या तैयारियां चल रही हैं, इसके बारे में विस्तार से बताया गया। एंकर रुचि डोंगरे ने बताया कि शहीदों को श्रद्धांजलि देने के लिए कॉलेजों के स्टूडेंट सड़कों पर उतर आये हैं। कुछ एमटीवी टच के स्टूडेंट्स अंग्रेज़ी में स्लोगन लिख रहे थे, एंकर हम हिंदी समझनेवाली ऑडिएंस को उसका हिंदी तर्जुमा करके बता रही थी। इस फुटेज को देखते हुए मुझे रंग दे बसंती का पूरा का पूरा डीजे ग्रुप याद आ जा रहा था। वो भी ऐसे ही स्प्रे पेंट करते हैं। गृहमंत्री की लापरवाही और दलाली के चलते फ्लाइट लेफ्टीनेंट अजय राठौर की मौत पर इंडिया गेट पर कैंडल जलाते हैं।

मैं ये बिल्कुल भी नहीं कहता कि इस दिन ऐसा नहीं किया जाना चाहिए। लेकिन इस फिल्म का मीडिया पार्टनर एनडीटीवी इंडिया, 26/11 के मौके को सिनेमाई अंदाज़ में पेश करता है। सवाल है कि हम इस रवैये को मीडिया मैटर मानकर चलता कर जाएं या फिर इससे आगे भी सोचने की ज़रूरत है?

26/11 को लेकर टेलीविजन चैनलों ने लाइव कवरेज के नाम पर जो कुछ भी दिखाया, उसकी कई स्तरों पर समीक्षा हुई है। इस बार के इंडिया टुडे ने इस पर विशेषांक निकाला है। पिछले साल मीडिया मंत्र ने कैमरे में 26/11 पर विशेषांक निकाले हैं। टेलीविजन चैनलों ने जिस तरह इसके कवरेज दिखाये, उसकी जमकर आलोचना हुई। एक साल होने पर सप्ताह भर पहले से ही टीवी चैनलों ने जिस तरह के महौल बनाने शुरू किये, उसे देखते हुए संयमित होकर प्रसारण का (23 नवंबर) सरकारी फरमान जारी किया गया। ये सारी बातें ठीक है कि मीडिया किसी भी घटना को एक कन्जप्शन मोड तक ले जाता है। वो उसे सिर्फ सूचना और देखे जाने तक का हिस्सा बनने नहीं रहने देना चाहता। वो एक दर्शक को बाज़ार के दरवाजे तक लाकर पटक देना चाहता है। इस पूरी अवधारणा को समझने के लिए ऑर्थर असा बर्जर की किताब मैनुफैक्चरिंग डिजायर पढ़ना दिलचस्प होगा। यहां आकर देश के चैनलों से हम ये सवाल कर सकते हैं कि क्या 26/11 का आतंकवादी हमला मीडिया इवेंट भर है? ऐसा पूछा जाना इसलिए भी ज़रूरी है कि जिस तरह के मैलोड्रामा और मैनुपुलेशन जारी हैं, उसमें मानवीय संवेदना की सही समझ ग़ायब हो जाती है। छवि के जरिये यथार्थ के दावे को लेकर सूसन सौंटगै की पूरी अवधारणा है, इस पर बात होनी चाहिए। लेकिन इसके साथ ही कुछ सवाल और हैं कि

♦ 26/11 को लेकर बच्चों के बीच आठ रुपये के सदभावना टिकट बेचा जाना क्यों ज़रूरी है?
♦ इसके पीछे के सांकेतिक अर्थे क्या हैं?
♦ क्या ये आतंकवादी घटनाएं दो कौमों के बीच की पैदाइश है?
♦ ये किसने शुरू किया कि आज के दिन इस तरह के टिकट जारी किए जाएं और बच्चों के बीच सद्भावना बनाये रखने के पाठ पढ़ाये जाएं। ये समाज में किस तरह के असर पैदा करेंगे, इस पर चर्चा ज़रूरी है।
♦ दूसरी बात कि आठ रुपये के इस टिकट से जो पैसे आएंगे, उसके पीछे का क्या हिसाब है? ये काम तो आइडिया मोबाइल फोन भी करने जा रहा है। हम आतंकवाद से बचने के लिए कोई और पाठ और महौल तो तैयार नहीं कर रहे?

जगह-जगह संगठनों और पार्टियों की ओर से कैंडिल जलाये जा रहे हैं। चैनलों ने एक लौ जलाने का कॉन्सेप्ट ईजाद किया है। क्या ये देश के किसी भी शहीद को याद करने का सही तरीका है, जब इसमें ताम-झाम पैदा करके शहर के हर चौक को जाम कर दें। लौ जल जाने के बाद भी कैमरे के चूक जाने पर दोबारा जलाएं… हम चाहते क्या हैं?

दरअसल हमारा देश कर्मकांडों को इतनी तवज्‍जो देता आया है कि हर घटना को एक कर्मकांड में बदल देने के लिए हम बेचैन हो उठते हैं। हम अपनी भावनाओं का, संवेदना और अनुभूतियों का एक मूर्त रूप (physical form) चाहते हैं। हम इन अनुभूतियों को निराकार रूप में संजोने के अभ्यस्त नहीं हैं। हमारी इसी मानसिक कमज़ोरी से कर्मकांड के विस्तार की गुंजाइश बढ़ जाती है। समाज की हर घटना कर्मकांडों का हिस्सा बन जाती है। उसके बाद एक पैटर्न हमारे सामने तैयार होता है कि हमें किसी के शहीद होने पर या मर जाने पर क्या करना है। यहां पर आकर कर्मकांड और बाज़ार के बीच एकरूपता कायम होती है। कर्मकांड का काम है हमारी हर भावनाओं और अनुभूतियों को एक जड़ रूप देना और बाज़ार का काम है हमारी इन अनुभूतियों को वस्तु (comodity) के आगे रिप्लेस करके कर्मकांड के साथ गंठजोड़ कर लेना। शायद यही वजह है कि इस देश में कभी और आज भी हर मुसीबत को लेकर एक नया देवता पैदा होता जाता है और उसे खुश करने की पूजन विधि, तो दूसरी तरह हर घटना के पीछे सैकड़ों सिंबॉलिक प्रोडक्टस और बाज़ार की हरकतें। उसके बाद हमारी भावनाएं हवा हो जाती हैं, सब कुछ इस कर्मकांड और वस्तुओं में रिप्लेस हो जाता है। दुर्भाग्य से देश का टेलीविजन इसी के बीच अपनी भूमिका खोजता नज़र आता है। इससे आगे वो कभी नहीं जाता।

ये सच है कि टेलीविजन अपने मतलब की बात करता है, लेकिन आखिर क्यों शहीदों को याद किये जाने की घटना, समाज को मदद करने के तरीके, हाशिये पर के समाज की सुध लेने के अंदाज़ मीडिया स्ट्रक्चर में रह कर ही किये जाते हैं। हम ये सब कुछ इसी अंदाज़ में फॉर्मेट करते हैं, जिससे कि मीडिया कवरेज में आसानी हो। इस नज़रिये से अगर आप सोचें तो दिन-रात मीडिया को कोसने, गरियाने और कोसनेवाली संस्थाएं, विचार और लोग काम करने के तरीके में उसी के स्ट्रक्चर को फॉलो करते हैं। इसलिए सवाल सिर्फ इस बात का नहीं है कि मीडिया किसी भी बात को हायपरबॉलिक बना देता है, सवाल इस बात का भी है कि हम मीडिया के फॉर्मेट में रह कर क्यों एक्ट करना शुरू कर देते हैं, सोचना शुरू करते हैं? सिविल सोसायटी में शहीदों के नाम पर एक मोमबत्ती जला देने और टीवी के फ्रेम के आ जाने से उन माओं की आंखों के आंसू थम जाते हैं, उन विधवाओं के दर्द ख़त्म हो जाते हैं, जिसके जवान बेटे और पति ने अपनी जान गंवायी? सवाल इस बात का है कि संवेदना के स्तर पर समाज इस दर्द को किस हद तक महसूस करता है? क्या कोई भी इसलिए शहीद होता है कि उसके नाम पर कर्मकांडों के जाल बिछाये जाएं और शहादत को एक ब्रैंड में तब्दील करके बाज़ार पैदा किये जाएं।..
मूलतः प्रकाशित- मोहल्लाlive
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7 Response to 'शहीदों की शहादत महज एक मीडिया इवेंट नहीं है ?'
  1. Alok Nandan
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/11/r.html?showComment=1259309518726#c5243699630749051705'> 27 नवंबर 2009 को 1:41 pm

    विनित जी, आप सिर्फ मिडिया की भूमिका को लेकर ही चिंचित हैं जबकि सच्चाई यह है कि आतंकवाद का बाजारीकरण हो गया है...पहले हमला और फिर हमले को याद करने के नाम पर तमाम तरह के तंत्र खड़ा करना...आतंकवाद के इस बाजारीकरण मे मीडिया भी अपना हिस्सा मार रहा है...यह मीडिया की मजबूरी भी हो सकती है...क्योंकि उसे लगता है कि लोग इन खबरों को देखेंगे और नहीं भी देखेंगे तो उन्हें दिखाया जाएगा ताकि यह बाजार यूहीं चलता रहे...तो जो मारे जा चुकें हैं उनकी परछाइयों को भी बेचा जा रहा है..और पूरी कुशलता से बेचा जा रहा है...और साथ ही आतंकवाद के बाजार का विस्तार भी किया जा रहा है...समाज का कौन सा घटक इसमें कैसे पैसा बना रहा है उसका खुलासा तो अपने लेख में कर ही रहे हैं लेने आतंकवाद की मार्केटिंग को आप सीधे तौर पर नहीं रखे हैं...स्कूलों..कालेजों पब हाउसों की तरह मीडिया भी आतंकवाद की मार्केटिंग करके अपना पेट भर रही है, सरोकार की बात तो भूल ही जाइये..

     

  2. sameer
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/11/r.html?showComment=1259313523448#c1855639239492718173'> 27 नवंबर 2009 को 2:48 pm

    sab kuchh bikaau hai ke khel me jab koi peechhe nahi rahanaa caahataa to media jan maadhyam hone ke daawe ke aadhaar par kyon peechhe rahe. kyaa koi ye hisaab lagaayegaa ki kal kitnee momabattiyon kee bikrii hui...

     

  3. प्रवीण त्रिवेदी ╬ PRAVEEN TRIVEDI
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/11/r.html?showComment=1259324792725#c8009376556113446324'> 27 नवंबर 2009 को 5:56 pm

    मार्केटिंग का तो ज़माना है भैया !!
    काहे परेशान हैं ......हमारे घरों से लेकर शहीदों की अर्थियों तक !...हर जगह मार्केटिंग ?

    पिछली पोस्ट पर टिप्पणी करने से चूक गया था !
    पर विनीत आपका यह दृष्टिकोण अच्छा लगा .....हम सब कोई ना कोई वाद का बिल्ला लगाए हैं सो है किसी में हिम्मत जो अपने .......वाद के तथाकथित स्टैंड के खिलाफ बोल सके ?

    नए तर्क कुतर्क गढ़ लिए जायेंगे ..... पर किसी वाद का बिल्ला नहीं छोड़ सकते !!! चाहे हम हों या आप !

     

  4. डॉ .अनुराग
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/11/r.html?showComment=1259328957969#c5613659832831545469'> 27 नवंबर 2009 को 7:05 pm

    सवेदनाये फ्लैशलाइटों की चमक में चोंधिया रही है फ़िर रिमोट से कोने में धकेल दी जा रही है , बाजार वक़्त की पीठ पर बेताल की तरह बैठ गया है....हर बाईट के समय की अहमियत है ......सच का भी बाजारीकरण हो गया है...कई किस्मों के सच अब मुहैय्या है... ..समाज फ़िर एक नये" म्यूटेंट संक्रमण " से गुजर रहा है .... बुद्दिजीवी या तो बंटे हुए है या हमेशा की तरह चुप है ..ओर सरोकारों की भी किस्मे है......
    खबरे मुज़िकल चेयर की तरह हो गयी है .....जवाबदेही किसी चीज की नहीं है..... कोई आलोचना स्वीकार्य नहीं है ....एक पत्रकार कुछ साल कही काम करके एक नया चैनल खोलता है ....क्या वाकई देश हित में ?या समाज को सच दिखाने के वास्ते ...समाज को कितने सच दिखाए जायेगे ..जब एक ही सच पर सहमति नहीं बनती .आत्मनियंत्रण की बात सुनते ही लोग आग बबूला हो जाते है ....क्यों ?

     

  5. anjule shyam
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/11/r.html?showComment=1259347945201#c8995012003851996735'> 28 नवंबर 2009 को 12:22 am

    vineet sir............
    jo kam ndtv india ne nahi kiya wo kam mumbai mein 93.5fm ne kiya...........usne apne ak ad ke jariye bar bar logo se apil ki aap apni kalatmakta ke liye is hadshe ka dutrpyog na kare.. han usne to apna kam kiya go ki hum media walo ko karna chahiye tha.......but yadi yahi shilshila jari raha to koi pani tak ke liye midiyawalo ko nahi puchega..main to abhi jyadetar news room me hi work kiya hai hai but 1-2 bar kisi jagah covrej ke liye jana pada to mane bhi dekha hai ki logo mein ab media ko lekar utsukta kam hi dikhti hai..........
    anjule shyam maurya............
    anjuleshyam@gmail.com

     

  6. सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/11/r.html?showComment=1259432201336#c826980325204757732'> 28 नवंबर 2009 को 11:46 pm

    मुश्किल सिर्फ़ यह है कि आप को आज के मीडिया से उस भूमिका की उम्मीदें हैं जो आजादी की लड़ाई के दौरान और आजादी के तुरन्त बाद की अवधि में राष्ट्रवादी अखबारों द्वारा उठायी गयी थी। देशहित, समाजहित, सामाजिक शिक्षा, सरोकार, राष्ट्रीय हित, सामाजिक समरसता आदि को बढ़ावा देना, लोकतंत्र का प्रहरि, चौथा स्तम्भ आदि-आदि।

    विनीत जी, इन चीजों को यहाँ ढूँढकर आप निराश ही होंगे। आजका मीडिया, खासतौर पर टेलीविजन का माध्यम इन बातों को अपना उद्देश्य नहीं बनाता। अब तो यह किसी भी धन्धे की तरह पैसा कमाने पर जोर देता है। सबसे ज्यादा पैसा कमाने के लिए दो रास्ते हैं:१.लोगों में उपभोक्ता संस्कृति विकसित करना, और २.स्वयं को सत्ता प्रतिष्ठान के साथ सौदेबाजी की मजबूत स्थिति में लाकर खड़ा कर देना। आज का मीडिया इन दो कार्यों को बखूबी कर रहा है।

    इस व्यावसायिक कृत्य में बाकी बातें यदि असुविधा पैदा करती हैं तो उन्हें किनारे लगा देने से कौन परहेज करेगा?

     

  7. अनूप शुक्ल
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/11/r.html?showComment=1259433575294#c1728163249659852673'> 29 नवंबर 2009 को 12:09 am

    मैंने कल यह लेख पढ़ा था। आज फ़िर देखा। बहुत अच्छी तरह अपनी बात रखी है। बधाई!

     

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