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कल करीब चार घंटे के लिए यश मालवीय हमारे साथ होंगे। यश मालवीय देश के दुर्लभ प्रजाति के कवि-गीतकार हैं। ऐसा बिल्कुल भी नहीं है कि इस देश में बेहतर लिखनेवाले कवि-गीतकार की कमी है।..और ऐसा भी नही है कि किसिम-किसिम की कविता और गीत बेचकर ठाठ से जीवन चलानेवाले कवि-गीतकारों की किल्लत है। इस मामले में बल्कि संख्या में लगातार इजाफा ही होता जा रहा है। बल्कि अगर आप इस जमात के कवियों की तुलना भारतीय क्रिकेटरों से करे तो एक सीरिज के खत्म होने के पहले ही दूसरे और तीसरे सीरिज की टिकट और आने-जाने के सारे इंतजाम तय होते है। शायद यही वजह है कि आजकल कवि सम्मेलनों में किसी कवि के सम्मान और परिचय में जब भी कुछ कहा जाता है तो साथ में ये जरुर बताया जाता है कि अभी टोरंटो,कनाडा, फिजी, जेनेवा से लौटे हैं और परसों फ्रैंक्फर्ट की रवानगी है।

दर्शक दीर्घा में बैठा हिन्दी समाज और कई बार उससे इतर का भी समाज मुंह बाये ये सब सुनता है। कभी साहित्य के नाम पर आलोचना पढ़ने भर से परेशान हो उठता है। अपने भीतर कवि मिजाज को कुरेद-कुरेदकर संभावना की उस बीज की तलाश करता है जिससे कि तुकबंदी करने और हिन्दी शब्दों और लाइनों को फिट करने की पौध उग आए। इसलिए बाकी तो नहीं लेकिन एमए के दौरान मैंने देखा कि हिन्दू कॉलेज में हर तीन में से एक स्टूडेंट कवि हो जाता। एमबीए के लड़के को अकड़ के साथ बताया जाता है कि पता है ये जो कवि है न,दस हजार से नीचे पर तो आता ही नहीं है। देश में कुछ कवि तो ऐसे जरुर हैं जो तय रेट से नीचे पर आते ही नहीं हैं। बाकी उन कवियों की अच्छी-खासी जमात है जो शुरुआती दौर में तो पकड़-पकड़कर कविता सुनाते हैं लेकिन बहुत जल्द ही संगत कल्चर के कवि समूहों में भर्ती होने के लिए बेचैन होने लग जाते हैं। संगत कल्चर में एकमुश्त पैसे मिल जाते हैं और उस्ताद कवि उन्हें कुछ-कुछ बांट देते हैं। हर लाइन और हर शब्द के पीछे दाम लगाकर कविता को एक पैकेज में तब्दील करने की कला कि एक सफल और बेहतर कवि-गीतकार की असल पहचान बनती है।
संभवतः यही वजह है कि देश के साहित्यिक रुझान और गंभीर किस्म के माने जानेवाले कवि इस तरह के मंचीय कवियों के नाम पर नाक-भौं सिकोड़ते हैं। उनके बारे में बात करते ही गंभीर कवियों का बुखार के वक्त की तरह मुंह का स्वाद बिगड़ जाता है। वो उन पर कविता को कोठे पर बिठा देने का आरोप लगाते हैं। ये कवि बुद्धिजीवी समाज के बीच हाथों-हाथ लिए जाते हैं। सेमिनारों में बोलते हैं,अकादमियों में कविता की रचना-प्रक्रिया पर विमर्श करते हैं। वो कविता की औसत समझ रखनेवाले लोगों के बीच नहीं जाते। वो कविता करने और मुजरे के लिए लिखे जानेवाले बोल में फर्क करना जानते हैं,शायद। जीवन दोनों तरह के कवियों का चलता है। सक्रिय और जागरुक रहने पर दोनों तरह के कवियों की गाड़ियों की बढ़ती है।

यहीं पर आकर यश मालवीय के कवि और गीतकार होने की प्रजाति होने की प्रजाति अलग और दुर्लभ है। हजारों लोगों के बीच ये कवि अपनी कविता पढ़ना शुरु करता है। लोगों को इनकी कविताएं अटपटी लगती है। वो शोर-शराबा करने की कोशिश करते हैं। हरिवंश राय बच्चन हस्तक्षेप करते हैं कि आप ऐसा न करें। कली को खिलने का मौका तो दें। नवोदित कवि कविताएं सुनाता है और फिर अब के जमाने के वन्स मोर,वन्स मुहावरे में दोबारा पंक्तियों को सुनाने की फरमाइशें होती हैं। इस कवि को ये सब बिल्कुल भी अटपटा नहीं लगता। ये कवि कविता पाठ करने जाता है और लौटते हुए साथ में आटे की थैली लेकर घर घुसता है। उसे कभी भी कुंठा नहीं कि वो अपनी कविता को कोठे पर बेच आया है। उसने अपनी कविता की कीमत महज दो-तीन किलो के आटे का दाम लगाया। कभी कोई मलाल नहीं। कई बार किसी सम्मेलन में दस हजार तक मिल गए तो बड़ा और सिलेब्रेटी हो जाने का कोई गुरुर नहीं। सिर्फ आचमन पर ही घंटों रंग जमा देने के बाद इस बात पर कभी चिंता नहीं कि वो इस्तेमाल कर लिया गया है। फिल्म मोहनदास के लिए गाने लिखे,जगजीत सिंह के लिए गजल लिखा और फिल्म इंडस्ट्री से कई ऑफर मिले,ये सब कुछ बस रोजमर्रा के गपशप का हिस्साभर है। आपने इन गीतों के लिए बहुत ही कम पैसे लिए सर? मेरे ये कहे जाने पर उनका बहुत ही सपाट जबाब-हमसे मुंह ही नहीं खोला जाता। अविनाश के ये कहने पर कि आप पीए रखिए और वही बात करेगा,वो इस तरह के सुझाव से घबरा जाते हैं। उनकी अपनी सादगी दफ्न होती नजर आती है। यश मालवीय ने कवि भी अपनी कविताओं और लिखी गयी पंक्तियों के आगे प्राइस टैग नहीं लगाया। शब्दों की बसूली अनुवादक और सफल कवियों की तरह नहीं की।
मंच पर कविता करते हुए,बाइक चलाते हुए कविता सुनाते हुए,आचमन के लिए उत्साहित करते हुए इस कवि का सामाजिक सरोकार बुद्धिजीवी कवियों से रत्तीभर भी कम नहीं हुआ। कुछ नहीं तो कहो सदाशिव, उड़ान से पहले, राग-बोध के 2 भाग हाथ लग जाए तो पढ़िए,आपको अंदाजा लग जाएगा। कविता के दोनों पाटों पर रमनेवाला ये कवि एक जरा भी भयभीत नहीं होता कि अगर उसने मंच पर गमछा ओढ़ लोगों के साथ कविता पढ़ दिया तो उस पर नाक-भौं सिकोड़े जाएंगे। साहित्य अकादमी,हिन्दी अकादमी और विश्वविद्यालयों के मंचों से कविता पढ़ते हुए कभी इस बात का खतरा नहीं हुआ कि वो आम आदमी से दूर हो रहे हैं। ये सबकुछ उस आम आदमी के विकासक्रम के तौर पर बहुत ही सहज तरीके से चलता है। दरअसल यश मालवीय का क्लास फिक्स होने के बजाय रोटेट होता है,वो रोमिंग मोड में होता है। वो कभी भी बाकी कवियों की तरह फिक्स नहीं होता। अगर कुछ फिक्स या तय है तो कविता को लेकर तय किया गया उनका एजेंडा। कहीं से भी बोलो,किसी से भी बोलो,उनके सामने यही सवाल करो- दरी बिछानेवाले रामसुभग का क्या हुआ? छप्पन तरह के पकवाने लाने और खुद गम खाने वाले रामसुभग को लेकर आपकी क्या राय है? परिवेश और मंच बदलने के साथ यश मालवीय का सवाल नहीं बदलता,मिजाज नहीं बदलता। संभवतः यही उन्हें बाकी के कवियों से अलग करता है। इसलिए वो सिलेब्रेटी मंचीय कवियों की पांत से अलग हैं और बुद्धिजीवी कवियों की पंक्तियों में अलग से देखे जानेवाले कवि हैं। वो कविता के जरिए पैसा नहीं आदमी कमाते हैं। वो कविता के जरिए विचार नहीं सक्रियता पैदा करते हैं। इसलिए यश मालवीय दुर्लभ प्रजाति के कवि-गीतकार हैं।

नोट- कार्यक्रम की पूरी जानकारी के लिए पोस्ट पर चटकाकर बड़े साइज में देखें या फिर नीचे के लिए पर चटकाएं-
सफर का आयोजनः आमने-सामने में यश मालवीय
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4 Response to 'दुर्लभ प्रजाति का कविः यश मालवीय होंगे हमारे साथ'
  1. अंशुमाली रस्तोगी
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/11/blog-post_17.html?showComment=1258536305197#c6917785438864212590'> 18 नवंबर 2009 को 2:55 pm

    विनीतजी, इसमें भला किसे और क्यों शक हो सकता है?

     

  2. लवली कुमारी / Lovely kumari
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/11/blog-post_17.html?showComment=1258540276543#c7945099064489789291'> 18 नवंबर 2009 को 4:01 pm

    भाग्यशाली हैं आप.

     

  3. अर्कजेश
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/11/blog-post_17.html?showComment=1258546505399#c4144071194861484771'> 18 नवंबर 2009 को 5:45 pm

    आपकी इस पोस्‍ट के माध्‍यम से यश मालवीय जी के व्‍यक्तित्‍व से परिचय हुआ । अब कविता कोश में मालवीय जी को पढने जा रहे हैं ।

     

  4. रंगनाथ सिंह
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/11/blog-post_17.html?showComment=1258779659811#c2167000920840382971'> 21 नवंबर 2009 को 10:30 am

    हम तो आपके लिखने के तरीके पर ज्यादा फिदा हुए।

     

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