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7 नवम्बर के नवभारत टाइम्स ने प्रभाष जोशी के निधन पर एक लाइन की भी खबर छापना जरुरी नहीं समझा। इसी प्रकाशन समूह का अखबार The Times Of India ने action on pitch cut short his acerbic pen शीर्षक से तस्वीर सहित करीब 600 शब्दों में खबर छापा है। नवभारत टाइम्स डॉट कॉम के ब्लॉग कोना में पूजा प्रसाद ने कितने सीधे थे प्रभाष जोशी शीर्षक से पोस्ट लिखी है। दैनिक जागरण ने उनके लिए साइड में वमुश्किल से सौ शब्द छापे। ये दोनों देश के प्रमुख अखबारों में से है। रीडरशिप की दौड़ में रेस लगानेवाले हैं। अपनी ब्रांडिंग के लिए लाखों रुपये खर्च करते आए हैं। लेकिन आज ऐसा करते हुए जरा भी अपनी ब्रांड इमेज की चिंता नहीं की। कहने को कहा जा सकता है कि नहीं छापा तो नहीं छापा इसमें कौन-सा पहाड़ टूट गया? लेकिन सवाल है कि क्या देश की पत्रकारिता इसी तरह की किसी व्यक्तिगत पसंद-नापसंद के बूते चलती रहेगी ? हिन्दी पत्रकारिता में इसी तरह की बर्बरता बनी रहेगी?
यहां सवाल सिर्फ प्रभाष जोशी की खबर छापने या नहीं छापने भर से नहीं है। ये तो फिर भी मीडिया,पाठकों और प्रभाष जोशी को जानने-समझनेवाले लोगों के लिए बड़ी खबर है। हम जैसे देश के हजारों पाठक रोज कमरे तक न्यूजपेपर पहुंचाने वाले भैय्या के आने का इंतजार बर्दाश्त नहीं कर पाने की स्थिति में संभवतः खुद ही नजदीकी स्टॉल से चले गए होंगे। रोज एक या दो अखबार पढ़ने के अभ्यस्त आज सारे अखबारों को देखना-खरीदना चाह रहे होगें और पन्ने पलटते गए होंगे गए। तब जाकर पता चला होगा कि इन दोनों अखबारों ने इस तरह का खेल किया है। नहीं तो कहां पता चलनेवाला था कि कोई अखबार ऐसा भी कर सकता है? प्रभाष जोशी की खबर की तरह ही बाकी की कितनी खबरों के प्रति इतने संवेदनशील होते हैं,जानने-समझने के उत्सुक होते हैं। कितनी घटनाओं के प्रति हमारा सरोकार होता है? कितनी खबरों को लेकर हम एक ही दिन कई-कई अखबार पलटते हैं? मुझे नहीं लगता कि एक औसत पाठक दो-तीन अखबार से ज्यादा देख पाता होगा। तो क्या ऐसे में अखबार में काम करनेवाले मीडियाकर्मियों के पसंद-नापसंद के फार्मूले पर कई खबरें न छपने की बलि चढ़ जाती होगी? क्या यहां से हमें अखबारों के चरित्र को समझने के कोई सूत्र मिलते हैं? मास की बात करनेवाला अखबार,व्यावहारिक स्तर पर इतना इन्डीविजुअल हो सकता है? खबरों को दबाए औऱ कुचले जाने का काम व्यक्तिगत इच्छा-अनिच्छा की चीज बनती आयी है?

मीडिया के अलग-अलग मसलों पर लिखते हुए इधऱ कुछ दिनों से मैंने तय किया है कि इसकी समीक्षा इन्हीं की शर्तों पर की जाए। हमें मीडिया में सरोकारों के सवाल पर न तो हाथ में कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो लेकर बात करनी है। न ही अपनी तरफ से कोई फार्मूला फिट करके मीडिया को देखने-परखने की जुगत भिड़ानी है। हमें मौजूदा मीडिया को उसी नजरिए से देख-समझकर बात करनी है,जिस नजरिए से मीडिया से जुड़े लोग हमें समझने का तर्क देते हैं। देखते हैं,इससे किस तरह के निष्कर्ष निकलकर सामने आते हैं? अभी चार दिन पहले ही देखिए, शाहरुख के केक काटने की लाइव कवरेज के नाम पर चैनलों ने बुजुर्ग पत्रकारों के टकले सिर दिखाए,पत्रकारों की पिछाड़ी दिखाए। ये अपने ही फार्मूल पर नहीं टिके रह सके। इधर अखबारों से जब आप खबरों की हिस्सेदारी की बात करेंगे,सामाजिक सरोकारों की बात करेंगे तो आपसे सीधा सवाल करेंगे कि जो चीजें पढ़ी ही नहीं जाती,उस पर लिखने-छापने से क्या फायदा? साहित्य,संस्कृति और कला से जुड़ी खबरें इसी तर्क के आधार पर अब प्रमुखता से खबर का हिस्सा नहीं रहा। हमें तो बाजार देखना होता है,हम क्या कर सकते हैं? मतलब साफ है कि वो उन्हीं खबरों को छापेंगे जो उन्हें रिटर्न देने की ताकत रखते हों। अब इसी फार्मूले से आप नवभारत टाइम्स और दैनिक जागरण से सवाल करें कि क्या प्रभाष जोशी की खबर बिकाउ नहीं है, मीडिया,खासकर अखबारों के लिए सेलेबुल आइटम नहीं रहा।(प्रभाष जोशी के निधन की खबर के लिए इस तरह की भाषा का इस्तेमाल करने के लिए माफ करेंगे,लेकिन अखबार शायद इस तरह की भाषा ज्यादा आसानी से समझते हैं,बस इसलिए)।

सुबह उठकर पुष्कर जब समाचार अपार्टमेंट के पास के स्टॉल वाले से जनसत्ता की मांग करता है तो उसका जबाब होता है-नहीं है। आप से पहले पचासों लोग जनसत्ता खोजने आ चुके हैं। पता नहीं आज लोग क्यों इस अखबार को ज्यादा खोज रहे हैं? वैसे तो ये इतवार को ज्यादा बिकता है। देर रात जागने के बाद सुबह उठते ही सारे अखबार खरीदने के लिए पटेल चेस्ट की तरफ भागता हूं तो देखता हूं छात्रों की एक बड़ी जमात वहां पहले से मौजूद है जो कि फ्रंट पर खोजते हुए अंदर तक अखबारों में घुसती है,सिर्फ और सिर्फ प्रभाष जोशी की खबर को पढ़ने के लिए।..और दिनों के मुकाबले कल लोगों ने एक से ज्यादा अखबार पढ़े होंगे,खरीदे होंगे। मेरा ऐसा अनुमान है। ऐसे में अखबारों का सेलेबुल होने के आधार पर खबर को छापने वाला फार्मूला प्रभाष जोशी की खबर के साथ क्यों नहीं लागू किया गया? दिन-रात बाजार के दबाब का रोना रोनेवाले ये अखबार हमेशा बाजार को ध्यान में रखकर खबरें नहीं छापते हैं। इस घटना के आधार पर तो यही समझ बनती है कि अखबार संभवतः कई मौके पर व्यक्तिगत खुन्नस,जातीय,क्षेत्रीय और भाषाई स्तर के दुराग्रह की वजह से भी कई खबरों को नहीं छापता होगा। प्रभाष जोशी ने जीते-जी पैसे लेकर खबरें छापने और नहीं देने पर नहीं छापने की बात कही थी। उसे अपनी लेखनी से लगातार अभियान का रुप देने जा रहे थे। इस घटना में पैसे के फार्मूले के आगे व्यक्तिगत स्तर का पसंद-नापसंद वाला फार्मूला ज्यादा हावी नजर आया।

प्रभाष जोशी की खबर को नहीं छापने की घटना से हमारे सामने एक ही साथ कई सवाल खड़े हो जाते हैं? क्या अखबारों में खबरों को छापने और न छापने का आधार जाति,समुदाय,क्षेत्र,संप्रदाय और धर्म को लेकर पसंद और नापसंद भी होता है? अखबार में बहुसंख्यक समुदाय,जाति और विचारधारा के पसंद-नापसंद से खबरें प्रमुखता पाती है? क्या गुजरात का नरसंहार, 1984 के सिख विरोधी दंगे,बाबरी मस्जिद जैसे दर्जनों मनहूस घटनाएं होंगी जिसमें इसी पैटर्न को फॉलो करते हुए खबरें छापीं गयी होगीं,खारिज की गयी होगी? ऐसा सोचते ही सिहरन सी होने लग जा रही है?
मुझे नहीं पता कि प्रभाष जोशी को लेकर दैनिक जागरण औऱ नवभारत टाइम्स के शीर्ष पर बैठे लोगों के साथ क्या असहमति और रंजिशें रही होंगी। लेकिन तीन-साढ़े तीन रुपये देकर अखबार खरीदनेवाले ग्राहक के साथ न्याय तो कर देते। आप मीडिया एथिक्स तो दूर सही तरीके से प्रोफेशनल एथिक्स को भी फॉलो करने में यकीन नहीं रखते। प्रभाष जोशी का इससे तो कुछ हुआ नहीं,कम से कम अपनी साख में बट्टा लगने से तो अपने को बचा लिया होता।

नोटः- 7 नवम्बर के नवभारत टाइम्स ने प्रभाष जोशी को याद करते हुआ अभय कुमार दुबे का संस्मरण छापा है- वह खनक अभी भी बजती है। अब सवाल है कि क्या इसे ही खबर के तौर पर पढ़ा-समझा जाना चाहिए और इस बात का संतोष कर लिया जाना चाहिए कि,कोई बात नहीं चाहे किसी भी रुप में हो,याद तो किया।
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13 Response to 'प्रभाष जोशी का जाना जिस अखबार के लिए खबर नहीं'
  1. कुलवंत हैप्पी
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/11/blog-post_08.html?showComment=1257657824406#c5349870673282821930'> 8 नवंबर 2009 को 10:53 am

    विज्ञापन एकत्र करने के नशे में असलियत से दूर हो गए हैं अखबार

    नंगी तस्वीरें, अंतररंग किस्से, बैडरूम की बातें
    लिखते वो ही हैं जो बिकता बीच बाजार

     

  2. Anil Pusadkar
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/11/blog-post_08.html?showComment=1257660741871#c7345326045405198935'> 8 नवंबर 2009 को 11:42 am

    अख़बार कहने के लिये अन्याय और अव्यवस्था से लड़ रहे है,सच्चाई ये है कि वे सबसे पहले एक-दूसरे से लड़ रहे हैं।खुद ज़िंदा रहने के लिये और दूसरे को मार डालने के लिये लड़ रहे हैं।एकाधिकार के लिये लिये लड़ रहे हैम और कह रहे हैं देश के लिये,समाज के लिये लड़ रहे हैं।मालिक रोज़ जी रहे है और उनके ज़िंदा रहने के लिये पत्रकार रोज़ मर रहे हैं।

    इससे ज्यादा शर्मनाक मैने पत्रकारिता मे शायद और कुछ नही देखा है।कोई हीरो,हीरोईन या मसखरा मरता भी नही सिर्फ़ जेल जाता है तो ज़रुरत से बड़ी खबर रहता है और पूरी ज़िंदगी खबर को ज़िंदा रखने के लिये फ़ूंक देने वाला अगर किसी अख़बार मे खबर भी ना बन पाये तो क्या कहा जा सकता है……………

     

  3. अनूप शुक्ल
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/11/blog-post_08.html?showComment=1257665504421#c5564849828778310092'> 8 नवंबर 2009 को 1:01 pm

    बहुत सुन्दर तरीके से अपनी बात कही। एक जरूरी लेख।

     

  4. अनूप शुक्ल
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/11/blog-post_08.html?showComment=1257665505770#c2782138718219952587'> 8 नवंबर 2009 को 1:01 pm

    बहुत सुन्दर तरीके से अपनी बात कही। एक जरूरी लेख।

     

  5. अविनाश वाचस्पति
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/11/blog-post_08.html?showComment=1257667732957#c7364829070810532839'> 8 नवंबर 2009 को 1:38 pm

    कृपा राम की होते हुए भी सिंह नहीं बन सके रामकृपाल सिंह। पापी पेट का सवाल है।

     

  6. अजय कुमार झा
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/11/blog-post_08.html?showComment=1257668406815#c3880972835802953564'> 8 नवंबर 2009 को 1:50 pm

    विनीत भाई,
    मीडिया में इलेक्ट्रोनिक मीडिया से खैर बहुत पहले ही मोह भंग हो चुका था ..मगर अब धीरे धीरे जो स्थिति प्रिंट की भी बन रहे है उससे तो लगने लगा है कि यहां भी किसी संवेदनशील अपेक्षा की कोई गुंजाईश नहीं बची है । बांकी सब कुछ कह ही दिया है आपने ॥

     

  7. सुशील कुमार छौक्कर
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/11/blog-post_08.html?showComment=1257668850978#c7884484575656058530'> 8 नवंबर 2009 को 1:57 pm

    क्या कहूँ जी इस पर। मैने भी जब नवभारत देखा तो वहाँ ये खबर ना देखकर बहुत अजीब सा लगा था। पत्रकारिता जगत में ऐसा भी होता है सोचा ना था। विचारो के मतभेद का मतलब ये नही कि हम पत्रकारिता करना ही भूल जाए। कभी कभी.......

     

  8. गिरिजेश राव
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/11/blog-post_08.html?showComment=1257673427160#c8538489060764462611'> 8 नवंबर 2009 को 3:13 pm

    आप से ऐसे ही लेख की आशा थी।
    वैचारिक असहिष्णुता के आगे पाठकीय सरोकारों को भी धता बता दी गई।
    हद है !

     

  9. रंगनाथ सिंह
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/11/blog-post_08.html?showComment=1257777211279#c9152201989849529548'> 9 नवंबर 2009 को 8:03 pm

    navbharat ka ravaiya sabhi mediakarmoyo ko sharmsar kar dene wala rha...

     

  10. आभा
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/11/blog-post_08.html?showComment=1257790131522#c7404908929654570274'> 9 नवंबर 2009 को 11:38 pm

    दुखद, निन्दनीय .. ..

     

  11. anurag
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/11/blog-post_08.html?showComment=1258221573254#c2781893419800082929'> 14 नवंबर 2009 को 11:29 pm

    danik jagran me to noida se bakayada nirdesh aaya tha ki prabhas ji ki khbar ko bas itna hi lena hai meerut aur patna mein kuch logo ne kudh risk lekar khabar chaapi agle din nirdesh a gaya

     

  12. anurag
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/11/blog-post_08.html?showComment=1258221623762#c163254407821934372'> 14 नवंबर 2009 को 11:30 pm

    danik jagran me to noida se bakayada nirdesh aaya tha ki prabhas ji ki khbar ko bas itna hi lena hai meerut aur patna mein kuch logo ne kudh risk lekar khabar chaapi agle din nirdesh a gaya

     

  13. अशोक कुमार पाण्डेय
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/11/blog-post_08.html?showComment=1258383646129#c8057318678960431122'> 16 नवंबर 2009 को 8:30 pm

    कुंवर पाल जी भी गुज़र गये इस बीच

    उनकी चिन्ता कितनों ने की?

     

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