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गांव के लोगों का दिल अब गांव में नहीं लगता। बुजुर्ग कथाकार विद्यासागर नौटियाल की इस समझ पर असहमति जताते हुए टेलीविजन पत्रकार पुण्य प्रसून वाजपेयी ने कहा- सच तो ये है कि अब शहर में मन नहीं लगता। शायद इसलिए आज हम गांव पर बात करने के लिए यहां जमा हुए हैं। बड़ी तेजी से एक ऐसी संस्कृति पनप रही है जहां हम अकेले होते जा रहे हैं। विदर्भ के चालीस हजार किसानों ने आत्महत्या की तो अकेले होकर आत्महत्या की। हम अकेले बनती दुनिया के बीच जी रहे हैं। विचार के ये बिल्कुल दो अलग सिरे हैं लेकिन गांव और शहर को लेकर जो भी नक्शा हमारे जेहन में बनता है,उसकी भाषिक व्याख्या पाखी,साहित्यिक पत्रिका की ओर से आयोजित संगोष्ठी साहित्य और पत्रकारिता में गांव में सुनकर अच्छा ही लगा। हालांकि पूरी बहस का एक बड़ा हिस्सा इस बात पर आकर टिक गया कि दिल्ली या फिर दूसरे बड़े शहरों में रहकर गांव और देहात पर लिखनेवाले लोगों की बातों की ऑथेंटिसिटी कितनी है या फिर शहर में रहकर जो लोग गांव पर लिख रहे हैं उसमें कितनी तल्खी है। मैनेजर पांडेय के शब्दों में कहें तो दिल्ली जैसे शहर में,एसी हॉल में बैठकर जो हम गांव पर सेमिनार कर रहे हैं उससे बड़ा ही मनोरंक दृश्य पैदा हो गया,जाहिर है ये उनकी ओर से सेमिनार को लेकर किया गया व्यंग्य है लेकिन इसी बहाने साहित्य औऱ पत्रकारिता के बीच गांव भी एक मुद्दा है,इस पर बात होनी चाहिए, ऐसे सेमिनार विमर्श की दुनिया में इन विषयों के प्रति एक महौल पैदा करने का काम तो करते ही है।

साखी पत्रिका ने साहित्य औऱ मीडिया में गांव विषय पर संगोष्ठी का आयोजन पत्रिका के एक साल पूरी होने के उपलक्ष्य में कराया और विषय की जरुरत को ध्यान में रखते हुए इस पर विशेषांक भी निकालने की बात भी की। ये अलग बात है कि इस पूरे एक साल में स्वयं पाखी ने गांव औऱ उनसे जुड़ी समस्याओं,स्थितियों औऱ संरचना को लेकर रचनात्मक स्तर पर बहुत कुछ नहीं किया। बकौल पुण्य प्रसून वाजपेयी इस एक साल में न तो पाखी ने और न ही हंस ने गांव को लेकर बहुत कुछ किया है। संगोष्ठी के बाद विशेषांक निकाले जाएंगे इससे एक उम्मीद बंधती है लेकिन सवाल ये है कि इसके बाद क्या? बहरहाल,

वक्ता के तौर पर साहित्य और मीडिया से जुड़े कुल चार बुद्धिजीवियों ने अपनी बात रखी। बुजुर्ग कथाकार विद्यासागर नौटियाल,टीवी पत्रकार पुण्य प्रसून वाजपेयी, बरिष्ठ हिन्दी आलोचक मैनेजर पांडेय और हंस के संपादक औऱ कथाकार राजेन्द्र यादव। बुजुर्ग कथाकार नौटियाल के ये कहे जाने पर ही कि अब गांव के लोगों का मन भी गांव में नहीं लगता,किसी गांव में बैठकर भी वो न्यूयार्क,लंदन और विदेशों के बारे में ही सोचते हैं तो समझिए कि बहस का पलीता सुलगाने का काम हो गया। उसके बाद उनकी ये बात गंभीर रही कि पहले के मुकाबले देहातों में अखबार पढ़ने का चलन बढ़ा है,कई गुना ज्यादा अखबार बिकने लगे हैं,मीडिया उन इलाकों में प्रवेश करने लग गया है जबकि साहित्य से देहात तेजी से गायब हो रहे हैं। अगर लिखा भी जा रहा है तो वो भी नास्टॉलिक होकर ही। साहित्य को इस दिशा में सोचने की जरुरत है जबकि मीडिया जिस भाषा का प्रयोग कर रहा है,अखबार जिन शब्दों औऱ भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं,जिसे पढ़कर देहात के लोग भाषा सीखते हैं,वही भाषा में कल को दिल्ली आकर बोलेंगे वो बहुत ही खतरनाक है। नौटियाल ने इस बात पर चिंता जाहिर करते हुए संभावना के लिए बैचेन नजर आए कि आज देश में कोई भी एक अखबार नहीं है जिसकी भाषा हिन्दी हो। हिन्दी के नाम पर भाषा पूरी तरह भ्रष्ट हो चुकी है।

नौटियाल की गांव के लोगों का मन गांव में नहीं लगने की बात को पुण्य प्रसून वाजपेयी ने अपने वक्तव्य में एक दार्शनिक और काफी हद महानगरों का एक पुर्जा बनकर रह जानेवाली बिडंबना की तरफ इशारा करते हुए कहा कि सच तो ये है कि अब हमारा मन शहर में नहीं लगता। हम लगातार अकेले होते जा रहे हैं। विदर्भ को आइडियल शहर घोषित किया गया लेकिन वहां चालीस हजार किसानों ने अकेलेपन के स्तर पर आत्महत्याएं की। आज अगर मीडिया में गांव नहीं है,मीडिया से जुड़े लोग गांव की स्थितियों को संवेदना के स्तर पर नहीं ला पा रहे हैं इसके लिए उन्होंने सरकार को सीधे तौर पर जिम्मेवार ठहराया। सरकार मतलब कोई मनमोहन सिंह और नरसिंह राव की सरकार नहीं बल्कि वो संसदीय प्रक्रिया और मशीनरी जिसके तहत निर्णय लेने और लागू करने के काम होते हैं। वाजपेयी मीडिया से गांव के गायब हो जाने की घटना को देश की आर्थिक नीतियों से जोड़ते हैं और लोगों की उस मानसिकता को तोड़ने का प्रयास करते हैं जो आज की अधिकांश गड़बड़ियों के लिए सीधे-सीधे मीडिया को जिम्मेवार मानते हैं। वाजपेयी के मुताबिक निजी टेलीविजन चैनलों के आए हुए तो मात्र दस साल हुए लेकिन आप देखिए लोकसभा जैसा चैनल पर भी भूखमरी पर बात करते हुए एक्सप्कट ठहाके लगाने का काम करता है। वाजपेयी ने मीडिया और गांव से जुड़े सवाल को संसद औऱ उसको लेकर होनेवाली राजनीति,आर्थिक नीतियों और नियत से जोड़ते हुए विस्तार से समझाया। किसानों के मजदूर बन जाने की घटना,रेड कॉरीडोर को धकियाते हुए अंदर किए जाने की बात,कोई विकल्प न दोने औऱ खड़ा करने की बात पर चिंचा जताते हुए वाजपेयी ने उन तमाम बिडंबनाओं की तरफ खुलकर इशारा किया जहां किसान सभा निकालने वाले राजनाथ सिंह पूरे गांव से हाइवे की सड़कों की तरह गुजर जाते हैं,राहुल गांधी बिस्लरी की बोतल थामे लोगों से जुड़ने के लिए बेचैन रहते है औऱ चंदन मित्रा जैसा पत्रकार राजनीति में आते ही जनता की न होकर पार्टी लाइन की जुबान बोलने लग जाते हैं। पत्रकारिता की पराकाष्ठा राजनीति तक आकर शांत हो जाती है।

मैनेजर पांडेय इस बात को नहीं मानते कि हिन्दी साहित्य में जो कुछ भी लिखा जा रहा है उसमें गांव को लेकर कोई चिंता नहीं है। उन्होंने शिवमूर्ति का आखिर छलांग और रणेन्द्र का उपन्यास लालचंद असुर और ग्लोबल गांव के देवता का उदाहरण देते हुए स्पष्ट किया कि हिन्दी में लोग लगातार गांव से जुड़े मसलों और समस्याओं पर लिख रहे हैं। वक्तव्य के अंत में उन्होंने राजेश जोशी की दो कविताएं भी पढ़ी जिसमें से कि विकल्प कविता की उन पंक्तियों पर जोर दिया जहां गांव के लोगों के पास या तो शहर जाकर नौकर बनने या फिर आत्महत्या कर लेने के अलावे कोई दूसरा विकल्प नहीं है,अपराध के दरवाजे पर नो वैकेंसी का बोर्ड कभी नहीं लगा होता,इस विकल्प पर सोचकर हमारे सामने जो सीन बनते हैं,उससे भी हम शायद मौजूदा समाज का विश्सेलेषण कर सकते हैं। मैनेजर पांडेय के मुताबिक आज जो देश की स्थिति है,दरअसल इसके भीतर एक ही साथ दो-दो हिन्दुस्तान है। एक हिन्दुस्तान जिसमें कि कुल आबादी के नब्बे फीसदी लोग रहते हैं औऱ दूसरे हिन्दुस्तान में मात्र दस फीसदी लोग रहते हैं। दस फीसदी के लोगों के लिए ये स्वर्णिम युग है,स्वर्ग है,बसंत है जबकि नब्बे फीसदी लोगों के लिए ये नरक है और अब वो इस इस नरक को छोड़कर कहीं औऱ नहीं जाना चाहते,उनके लिए ये माघ की ठिठुरन है....और सबसे बुरा वक्त है। मैनेजर पांडेय ने अपने सरस अंदाज में गांव की चिंता करनेवाले उन बुद्धिजीवी साहित्यकारों की मानसिकता की तरफ भी इशारा किया जो कि सामयिक मसलों से बिल्कुल कटकर जीने को अभ्यस्त हैं जिसे कि उन्होंने हरियाणा औऱ दिल्ली के आसपास इलाकों में युवाओं के प्रेम किए जाने पर सामूहिक हत्या कर देने और फरमान जारी करने पर दिल्ली में पांच लोग भी जुटकर प्रतिरोध नहीं करने के तौर पर रेखांकित किया।

अंतिम वक्ता के तौर पर राजेन्द्र यादव ने उक्त विषय पर बोलने से पहले ही अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी कि वो अपने को इस विषय पर बोलने के अधिकारी नहीं मानते। लेखन के स्तर पर शुरुआती दौर से ही उनका संबंध मध्य वर्ग की समस्याओं से रहा है। लेकिन इस घोषणा के बाद उन्होंने जो कुछ भी कहा उसे समझना जरुरी है। राजेन्द्र यादव के मुताबिक अब तब जितने बदलाव हुए हैं उनमें शहर और मध्य वर्ग के लोगों की ही भूमिका रही है। शहर और यहां के लोगों ने धक्का दे-देकर गांव में बदलाव की भूमिका तैयार की है। अगर ये शहर और लोग नहीं होते तो गांव रुढ़िवाद और अपनी स्थानीय जड़ता में ही जकड़ा रहता। इस लिहाज से मुझे गांव पर न बोलने और लिखने का कोई अफसोस नहीं है। राजेन्दर यादव ने गांव और शहर के बीच में कथाकार संजीव और स्वयं के बीच के प्रसंग को एक रुपक के तौर पर पेश किया और उन लोगों पर लगभग व्यंगय भी जो गांव शब्द सुनते ही पंत की कविता याद करते हैं-अहा-ग्राम्य-जीवन भी-क्या है,थोड़े में निर्वाह यहां है...याद करने लग जाते हैं और खोने की नकल करते हैं।

पाखी पत्रिका ने जिस विषय पर संगोष्ठी आयोजित की है,उस पर बात करने के लिए निश्चित पर निर्धारित समय बहुत ही कम रहा,इस पर लंबी बहस औऱ बातचीत संभव है जिसकी भरपायी विशेषांक निकाले जाने की घोषणा के साथ करने की कोशिश की गयी। लेकिन फिर वही सवाल कि उसके बाद क्या...क्या मुख्यधारा की पत्रकारिता और साहित्य के बीच इसे शामिल करने की जरुरत पूरी हो पाती है या फिर हिन्दी पखवाड़ा या आरक्षण की नीति के तहत इसके लिए साल में दो-चार दिन निर्धारित कर दें औऱ बाकी समय हुर्रा-हुर्रा करते निकल जाएं।

पूरी संगोष्ठी में हुई बातचीत सुनने के लिए चटकाएं-
साहित्य और पत्रकारिता में गांव,23 अगस्त 09.पाखी
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1 Response to 'गांव की खोज साहित्य और मीडिया में, बुद्धिजीवियों का जमावड़ा दिल्ली में'
  1. गिरीन्द्र नाथ झा
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/08/blog-post_24.html?showComment=1251105864356#c1575834276042061014'> 24 अगस्त 2009 को 2:54 pm

    मैंने एक बार फेसबुक पर लिखा था- कितना अजीब लगता है एसी कमरों में बैठकर यह लिखना कि बाहर झूलसा देने वाली गर्मी है। मैं फेसबुक की दिमागी जुगाली से अपनी प्रतिक्रिया की शुरुआत इस वजह से कर रहा हूं क्योंकि गांव-देहात जैसे शब्दों का प्रयोग और वहां की बातें मुझे पत्र-पत्रिकाओं में पढ़ने को नहीं मिल रही है। खुश हुई कि पाखी ने इस पर संवाद की व्यवस्था की।

    साहित्य और मीडिया में गांव खोजने जुटे बुद्धिजीवी की बातों को पढ़कर अच्छा लगा, खासकर राजेन्द्र यादव की यह स्वीकारोक्ती कि वे इन बातों से अनजान हैं क्यों कि लेखन के स्तर पर शुरुआती दौर से ही उनका संबंध मध्य वर्ग की समस्याओं से रहा है। उन्होंने कहा कि वो अपने को इस विषय पर बोलने के अधिकारी नहीं मानते।

    लेकिन इन सबके बावजूद मैं यही कहूंगा शहरी लोगों को मीडिया में गांव को खोजने के लिए कुछ कदम उठाना होगा, आखिर हम वहीं से यहां टपके हैं तो वहां की बातों को हम क्यों भूलते जाएं। इस रपट को पढ़ते वक्त विनीत भाई का मन से शुक्रिया अदा कर रहा हूं, श्रोता के तौर पर मुझे भी रविवार को वहां पहुंचना था, पर कुछ कारणों से नहीं पहंच पाया और पुण्य प्रसून वाजपेयी को यह कहते नहीं सुन सका कि- सच तो ये है कि अब शहर में मन नहीं लगता। शायद इसलिए आज हम गांव पर बात करने के लिए यहां जमा हुए हैं।

     

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