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हंस की संगोष्ठी में नामवर सिंह के सावधान रहो इन लौंडों से कहे जाने के बाद मेरे सहित कई लोगों को इस बात से हैरानी हुई कि हमारे आलोचक का जिगर औऱ नजरिया इतना छोटा कैसे हो गया? अजय नावरिया औऱ राजेन्द्र यादव के लिए अपने-अपने राहुल जैसे मुहावरे का प्रयोग करने की जरुरत क्यों पड़ गयी? मोहल्लाlive पर ऐवाने-ग़ालिब में नामवर सिंह को हो क्‍या गया था? लिखे जाने के बाद रंगनाथ सिंह ने मेरे उपर राजेन्द्र यादव का आदमी औऱ हंस के इनहाउस लोगों की जुबान बोलने का लेबल लगाने में तत्परता दिखायी। जिस व्यक्तिवाद के प्रतिरोध में हमने बात करनी शुरु की,हम खुद ही कैसे इसके शिकार होते चले गए,आप भी पढ़ें और राय दें कि क्या हिन्दी मानसिकता कुछ इसी तरह की है कि तालाब पर विमर्श के लिए जुटनेवाले लोग अंत में अपने-अपने हिस्से का कुआं घेरने में लग जाते हैं।

रंगनाथ भाई
इतनी गंभीरता से पोस्ट पढ़ने के लिए शुक्रिया। मुझे इस बात की आशंका लिखने के पहले से ही थी कि हंस की संगोष्ठी में जो कुछ भी हुआ और नामवर सिंह ने जो बातें हमलोगों के सामने रखीं, अगर मैं उससे असहमत होते हुए कुछ लिखता हूं, तो लोग (जिसमें कि अब आप शामिल हैं) मेरे ऊपर हंस और राजेंद्र यादव का आदमी होने का लेबल लगा देंगे। इन सबके बावजूद मैंने इस पर लिखा, क्योंकि मुझे पता है कि इस तरह के स्टीगर हवा और पानी के संपर्क में आते ही बहुत जल्द ही उखड़ जाते हैं।

मुझे बहुत अफ़सोस नहीं है कि मैं अपनी बात जिस संदर्भ में करना चाह रहा हूं, आपने उससे ठीक उलट अर्थ लिया बल्कि लिया ही नहीं, अर्थ ही थोप डाला जिसे कि अरुंधति राय रिप्लेसिंग द मीनिंग ऑफ द वर्ड कह रही थीं। इसमें आपका कोई दोष भी नहीं है क्योंकि जिस परिवेश और औजार से हम निर्मित हुए, साहित्य की समझ जिस ढंग से हमारी बनी है, उसमें व्यापक संदर्भ के आते ही हम घबरा जाते हैं। हमारे हाथ में अभी तक तोड़ती पत्थर वाली साइज़ की छेनी और हथौड़ा है जबकि अब हमें आये दिन पहाड़ों से टकराना पड़ जाता है और हम तब निरस्त हो जाते हैं। कहने को तो हमारी साहित्यिक समझ और बौद्धिकता का विकास प्रकृति, मानवीय संवेदना और दुनिया के तमाम विचारों को लेने से हुआ है, जिसका कि कैनवास बहुत बड़ा है लेकिन सच्चाई ये है कि हम एक बड़े जंगल में एक ऐसा मचान बना कर रह रहे हैं, जहां कुछ ही लोग उस पर बैठे हैं, दिन-रात गप्प-शप करते हैं, हुक्का-सुक्का पीते हैं और बीहड़ जंगल में रहने के महानताबोध से अकड़े रहते हैं। दुनिया को बताते फिरते हैं कि हम जंगल में रहते हैं और कितना रिस्क कवर करते हैं। जबकि मेरी तरह इतना तो आप भी जानते होंगे कि जिस सेफ ज़ोन में रहकर हिंदी के हम जैसे अधिकांश लोग काम कर रहे हैं, वो खुशफहमी के अलावा कुछ भी नहीं है। हमने प्रकृति, जंगल और मानवीय संवेदना से भरे साहित्य के इस बड़े कैनवास को कितना छोटा कर लिया है, इसका अंदाज़ा इसी बात से लग जाता है कि नामवर सिंह को बोले चार दिन हो गये और अभी तक हम उसी को पकड़ कर बैठे हैं। ऐसा लगता है जैसे सचमुच हमारे पास कोई दूसरा काम नहीं है।

मुंबई और नोएडा फिल्म सिटी में काम करनेवाले मेरे दोस्त मेरी इस हालत पर अब हंस रहे हैं। मुझे तो कभी-कभी लगता है कि साहित्यिक बहसें करने और रचने के नाम पर साहित्य का एक बड़ा हिस्सा व्यक्तिगत स्तर की लल्लो-चप्पो और हील-हुज्‍ज़तों में जाया कर दिया गया है, जिसका कि एक समय के बाद कोई मतलब नहीं रह जाएगा। इस नजरिए से अगर हम साहित्य को देखना शुरू करें, तो हमें अफ़सोस भी होगा।

कहने को तो साहित्य की इतनी बड़ी दुनिया, जिसमें इंद्रसभा से लेकर अमेरिका का साम्राज्यवाद तक समा जाए, लेकिन सच्चाई देखिए। महज दो सौ से ढाई सौ चेहरों के बीच पूरा का पूरा हिंदी साहित्य सिमट कर रह गया है। हम इन्हीं लोगों की बातों और गतिविधियों के बीच फंसे रह जाते हैं। इसमें बिडंबना है कि इतनी बड़ी दुनिया होने पर भी हम छत्तीसगढ़ के भीतर घुस नहीं पाते, जाकर कुछ लिखने की हिम्मत नहीं जुटा पाते। दिल्ली में बैठ कर चार दिन तक नामवर सिंह के पक्ष-विपक्ष में कबड्डी खेलना पसंद करते हैं लेकिन भोपाल, पटना में मर रहे किसी रचनाकर्मी को देख आने का जज्बा पैदा नहीं कर पाते। अपनी पोस्ट में मैं यही तो बताना चाह रहा था कि साहित्य के नाम पर हम कितने व्यक्तिवादी हो जाते हैं। नामवर सिंह जैसा आलोचक युवा का मतलब राहुल का मुहावरा इस्तेमाल किये बिना समझ नहीं पाते और युवा रचनाकार का मतलब सिर्फ अजय नावरिया से लगा लेते हैं। मैं अपनी उसी मानसिकता पर तो बात कर रहा था, जहां हिंदी समाज एक बड़े संदर्भ को कैसे संकुचित करता जाता है। अरुंधति राय ने भाषा के सवाल पर जो बात कही, उसकी चर्चा न करते हुए हम आलोचक नामवर सिंह की चुटकुलेबाज़ी में फंस कर रह जाते हैं क्योंकि उसमें हमारी व्यक्तिगत स्तर पर की जानेवाली चुगली का सार्वजनिक रूप दिखायी दे रहा था, हमें मज़ा आ रहा था। क्या हम साहित्य पढ़ते हुए चुगलखोर होते चले जाते हैं।

रंगनाथ भाई, विश्वविद्यालय सहित अब तक मैंने लिखने-पढ़ने के स्तर पर जितना भी समय बिताया है, उस आधार पर इतनी समझदारी तो बन ही गयी है कि हिंदी समाज में जीने-खाने और बने रहने के लिए आपको अपनी पीठ पर किसी न किसी का तो लेबल लगाना ही होगा। बहुत लंबे समय तक आपकी पीठ कोरी नहीं रह जाएगी। मेरी पीठ अब तक कोरी है, तो इसका मतलब कतई नहीं है कि मैं कोई महान किस्म का लिटरेचर प्रैक्टिसनर हूं। बल्कि सच बात तो ये है कि अब तक मैंने इसकी शिद्दत से ज़रूरत महसूस नहीं की है। जिस दिन करूंगा, उस दिन ज़रूर लगा लूंगा। इस बीच आप जैसे लोगों से बातचीत होती रही, तो ज़रूरत पड़ने पर आपसे राय भी लूंगा। लेकिन क्या मैं आपसे पूछ सकता हूं कि मेरे ऊपर राजेंद्र यादव और हंस से जुड़े लोगों का लेबल लगाने का अधिकार किसने दिया। क्या साहित्य में हम इश्तहारों, लेबलों, स्टीकरों से अटी-पड़ी पीठ देखने के इतने अभ्यस्त हो गये हैं कि हमें कोरी पीठ आंखों में चुभने लग जाती है।

क्या नामवर सिंह या फिर किसी भी दूसरे आलोचक की बात से असहमत होने के लिए हंस, राजेंद्र यादव या किसी दूसरे संस्थान और व्यक्ति का लेबल लगाना अनिवार्य है। बिना इसके हम अपनी बात नहीं कर सकते और अगर सचमुच नहीं कर सकते जिसकी घोषणा आपने अपनी पोस्ट में सरोगेट रूप में कर दी है तो क्या हमें इसके विरोध में कुछ काम नहीं करने चाहिए। बजाय इसके कि हम एक पोस्टर के लगने और दूसरे पोस्टर के उखड़ने का इंतज़ार करते रहें और हम अपनी इसी भूमिका को साहित्यिक भूमिका मान कर बौद्धिक होने और कहलाने का क्लेम करने लग जाएं, जैसा कि अधिकांश लोग करते आये हैं। आज आपको सुविधा हो गयी कि मैंने नामवर सिंह से असहमति जतायी नहीं कि दूसरी तरफ मेरी पीठ पर राजेंद्र यादव का लेबल चिपकाने के लिए मौक़ा मिल गया। संभव हो ये सुविधा आपको हमेशा मिलती रहे, क्योंकि कोई न कोई तो आयोजक होगा और जब हमें असहमति होगी, मैं लिखूंगा ही। इस हिसाब से आपको भविष्य में भी मुझे संघी, व्यक्तिवादी, कुंठित, फ्रस्ट्रेड और भी बहुत तरह के लेबल लगाने को मिल जाएंगे। लेकिन एक स्थिति ऐसी भी बनती है कि जब नामवर सिंह एक ऐसी किताब पर बोलने आते हैं, जिसे कि उन्होंने पढ़ा ही नहीं है। केवल इतनी-सी जानकारी के आधार पर 25 मिनट तक उस पर बोल जाते हैं कि इस किताब को दिल्ली की झुग्गियों में रहनेवाले अंडर मैट्रिकुलेशन के बच्चों ने मिल कर लिखी है। नामवर सिंह को किताब के शीर्षक पर आपत्ति होती है, उन्हें ये नाम धुंधला-धुंधला सा-नज़र आता है। आलोचक फिर भाषा पर बात करते हैं, इस बात को नज़रअंदाज़ करते हुए कि इसे किस बैग्ग्राउंड के बच्चों ने कितनी शिद्दत से लिखा है। मैंने लोकार्पण के पांच घंटे बाद ही दीवान (सराय, सीएसडीएस के मेलिंग ग्रुप) पर लिखा, नामवर सिंह से घोर असहमति। बच्चे एक बुजुर्ग के मुख से भाषा-वाषा पर गंभीर बात सुनकर अवाक हो गये थे। रंगनाथ भाई, मैंने उस समय भी नामवर सिंह के रवैय पर असहमति जतायी। बताइए, आप होते तो कौन सा लेबल लगाते। ये भी संभव है कि हवा-पानी से ये लेबल और स्टीगर उखड़ते चले जाएं और आप नया लगाते चले जाएं। आप बिल्कुल नहीं थकें। लेकिन मैं आपसे अपील करता हूं कि प्लीज़ आप मेरी पीठ को एमसीडी की दीवार मत बनाइए। ऐसा करना आपके लिए जितना सुविधाजनक है, मेरे लिए उतनी ही तक़लीफ़देह और शायद हिंदी के नाम पर होनेवाले विमर्श के लिए ख़तरनाक भी।

देखिए न, ये कितनी बड़ी विडंबना है कि हममें से दोनों लोग व्यक्तिवाद के विरोध में लिख रहे होते हैं। हमें नामवर सिंह में व्यक्तिवाद की भनक लगी और आपको हंस में बोलनेवाले कुछ लोगों में। लेकिन अब जब हम लिख रहे हैं तो आप अपनी चिठ्ठी के लगभग हर पैरे में विनीत और विनीत कुमार लिख रहे हैं और मैं रंगनाथ भाई, रंगनाथ भाई किये जा रहा हूं। इससे अधिक और व्यक्तिवादी कैसे हुआ जा सकता है? हम क्यों साहित्य जैसे तालाब पर विमर्श के लिए जुटते हैं और अंत तक आते-आते उसमें मौजूद पानी, उसकी सड़ांध और पलनेवाले लोगों के बारे में बात करने के बजाय अपने-अपने हिस्से का कुंआ घेरने में लग जाते हैं। क्या हम इस बात की गुंजाइश पैदा नहीं कर सकते कि हम बेबाक तरीके से अपनी बात रख सकें, मेरी पीठ कोरी रह जाए और आपको बार-बार स्टीगर चिपकाने से मुक्ति मिल जाए। मुश्किल तो है लेकिन कोशिश करने में क्या हर्ज है।

बहुत हो गया। जिस तरह से अपन लोग बात कर रहे हैं, ये बहुत ही पर्सनल मामला बनता जा रहा है। इसे पढ़नेवाले जो लोग हमें जानते हैं, वो ज़रूर गरिआएंगे – स्साला, यहां दिखाने के लिए एक दूसरे पर पिल पड़े हैं जबकि मंडी हाउस में एक-दूसरे के पैसे से समोसे खाने के लिए खींचतान करेंगे। ये इनहाउस विज्ञापन हो जाएगा रंगनाथ भाई, कोशिश करते हैं कि हम औरों की तरह इससे बचें और अपना नाम चमकाने के बजाय मुद्दों को व्यापक और सही संदर्भ में समझें… है कि नहीं।
मोहल्लाlive पर प्रकाशित
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5 Response to 'मेरी पीठ को एमसीडी की दीवार मत बनाइए रंगनाथजी !'
  1. Science Bloggers Association
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/08/blog-post_04.html?showComment=1249389492757#c3627994555064056097'> 4 अगस्त 2009 को 6:08 pm

    Har taraf maaraamaari?
    -Zakir Ali ‘Rajnish’
    { Secretary-TSALIIM & SBAI }

     

  2. उसका सच
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/08/blog-post_04.html?showComment=1249398630088#c2743620506600552956'> 4 अगस्त 2009 को 8:40 pm

    विनीत भाई...उनके जिगर में बड़ी आग है..सठिया जाने के बाद भी..

     

  3. tarun
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/08/blog-post_04.html?showComment=1249983839302#c1502609633755973776'> 11 अगस्त 2009 को 3:13 pm

    mai aapki is post par bhi kuchh nahi kahunga . kyonki aap hi kehte hai ki ........ke baare me agar aap kuchh kehna chahte hai to kuchh mat kaho . mera maanna bhi kuchh esa hee hai. khair jab blog khola hai to kuchh to zaroor kahunga.mujhe ek shiqayat hai aap se ,aapne baaki bloggers ke link apne blog se kyo hata diye . mere jaise kai log to apke blog ke through hee un logo ke blog padhte the . ab kisi shabd ka matlab janne ke liye maane-matlab bhee dikhaai nahi deta . hame kaafi dikkat hoti hai . aapka blog hamare liye un sabh jaroori aur creative cheezo tak pahunchne ka ek achchha shortcut hua karta tha . mujhe ummeed hai ki aaj jab adhiktar log shortcut ke khilaf apna hath uthate hai aap hame ye shortcur muhaiya karane me dilchaspi dikhaenge.

     

  4. विनीत कुमार
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/08/blog-post_04.html?showComment=1250015240628#c4653457213039257594'> 11 अगस्त 2009 को 11:57 pm

    तरुण,मैंने अपने ब्लॉग से कोई भी सामग्री या लिंक किसी रणनीति के तहत नहीं हटाया है। हां ब्लॉग के मामले में मैंने इतना जरुर किया कि जो लोग दो महीने त अपने ब्लॉग का कोई भी अपडेट नहीं करते,मैंने धीरे-धीरे उन्हें हटाना शुरु कर दिया। कई लोग मुझे फोन करके शिकायत करते कि आपने जितने ब्लॉगरों के लिंक दिए हैं,क्या हम उनके यहां जाकर म्यूजियम में घूम आने का मजा लें। मुझे भी कई बार इरीटेशन होती कि महीनों एक ही पोस्ट पड़ी हुई है। मैं नहीं कहता कि कोई रोज लिखे लेकिन हां ब्लॉग को जिंदा रखने के लिए तो जरुरी है कि उस पर कुछ न कुछ फेरबदल होते रहें।
    जहां तक सवाल कंटेंट और बाकी के लिंक का है तो मैं एक दिन लेआउट बदलने का काम कर रहा था,उसमें से कई के एचटीएमएल कोड गायब हो गए। अब दोबारा से उसे एक जगह जुटाना थोड़ा समय देने का काम है। अभी मैं उस स्थिति में हूं नहीं कि ऐसा करुं लेकिन इतना वादा है कि बाकी की शिकायतें जल्द ही दूर कर दी जाएगी।

     

  5. tarun
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/08/blog-post_04.html?showComment=1250074673755#c5882447499802442782'> 12 अगस्त 2009 को 4:27 pm

    विनीत सर, ये कोई शिक़ायत नहीं थी जैसाकि आपने लिखा या माना । ये सिर्फ ग़ुज़ारिश थी । रणनीति की बात आपने क्यों की, मेरी समझ से बाहर है । और हाँ , मैंने ऐसे ब्लॉगर्स के संदर्भ में लिखा था जो रेगुलर हैं और आप ही की तरह ब्लॉग कलचर को ज़िन्दा रखने की मुहीम में लगें हुए हैं (जैसाकि आपने लिखा) हालाँकि मुझे नहीं लगता कि ब्लॉग मरने की प्रोसेस में हैं फिर भी जैसा आपको लगे आप इस बारे में हमसे ज़्यादा जानते हैं।
    लेआउट बदलने वाली बात समझ में आती हैं । आपने जवाब दिया । इसके लिए शुक्रिया।

     

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