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हॉस्टल ऑथिरिटी के कहने पर और खुद भी सोचकर कि ऐसा कब तक चलेगा मैंने इसकी लिखित शिकायत अपने रेसीडेंट ट्यूटर को दे दी। लेकिन इसमें हुआ यह कि ऑरिजिनल कॉपी न देकर मैंने इसकी फोटो कॉपी दी थी. जल्दी में वो मेरे पास ही रह गया। मेरी शिकायत पर कहीं कुछ नहीं हुआ। मैंने फिर फोन करके रेसीडेंट टूयूटर से कहा कि सर मैं कुछ नहीं चाहता। मैं सिर्फ इतना चाहता हूं कि आप मेरा कमरा बदल दें। उन्होंने कहा-तुमने तो ऑरिजिनल कुछ दिया ही नहीं। तुमने तो फोटो कॉपी दी है। ऐसा करो, तुम ऑरिजिनल कॉपी ऑफिस में जमा करा दो, मैं जल्द ही कुछ करता हूं। मैंने उनके कहे अनुसार वैसा ही किया।
अगले दिन मेरा पार्टनर मेरे पास आया और कहा-क्या आपने मेरी कोई लिखित शिकायत की है. मैंने कहा-हां की है। उन्होंने पूछा- आपको पहले हमसे पूछ लेना चाहिए था न, आपको वैसे परेशानी क्या है। मैंने उनसे साफ कहा कि इसमें आपसे पूछने वाली कौन सकी बात है और जहां तक बात परेशानी की है तो ये मैं क्या, कोई भी शराब पीने और आए दिन लगों के आते जाने से परेशान हो जाएगा।
इतना सब कुछ होने के बाद मेरा पार्टनर मेरे दोस्त मुन्ना के पास गया और कहने लगे- मेरा तो करियर डूब गया, बात मेरे गाइड तक चली गयी है। कुछ करो, विनीतजी से कहो कि वो अपनी शिकायत वापस ले लें। बाद में मुझे भी फोन करके बुलाया। मैं आया और उनके एक दोस्त और मुन्ना के साथ बैठकर यही तय हुआ कि जो कुछ भी हुआ उसे भूलते हुए समझोता कर लिया जाए क्योंकि दोनों की पढ़ाई खराब हो रही है। यही तय हुआ कि हमलोग रेसीडेट ट्यूटर के पास चलते हैं और सारी बात वहीं रखते हैं।
मैं उनके कहे अनुसार कम्प्यूटर रुम में इंतजार करता रहा कि आप खाकर आएं तब हम सब चलेंगे। मैंने करीब एक घंटे तक इंतजार किया और इस बीच कम्प्यूटर रुम में कुछ लिखने लग गया। तभी एक ही साथ चौदह-पन्द्रह लोग कमरे में आए, एक ने कम्प्यूटर बंद कर दिया और कहा- क्या ब्लॉगिआते हैं और लोगों का जीना हराम कर दिया है. दूसरे ने कहा- हम अभी तक समझ नहीं पाए कि आप आदमी किस तरह के हैं। ये वो बंदा है जिसे कि मैंने एम.फिल् में पेपर लिखने के दौरान मदद की थी, उसके साथ उन जगहों पर भी एकाध बार गया था जहां से कि उसे कुछ मदद मिल सकती थी। एक और बंदा जो कि हमसे छोटा तो है ही, पढ़ने के नाम पर कुछ भी नहीं स्पोर्टस कोटे से आया है- कहने लगा, आपको बताना होगा कि आप ये कमरा क्यों छोड़ना चाहते हैं. मेरे बगल के कमरे के भाई ने कहा कि आप मेरी हिस्ट्री नहीं जानते और बंताने लगा कि वो हर महीने हॉस्टल के पैसे जमा करता है लेकिन चार-चार महीने तक नहीं रहता. नहीं रहने से कौन सी हैसियत बनती है, मैं समझ नहीं पाया। मैं अपनी बात रखता, इसके पहले कि कई लोग एक साथ बोलने लग गए। मुझे अपनी बात कहने का कुछ मौका ही नहीं दिया। वहां मैं अकेला था, मेरे लिए बोलने वाला कोई नहीं था. पूरी प्लानिंग इस तरह से की गयी थी कि मैंने महसूस किया कि वो चाह रहे थे कि ऐसा करके उन पर दबाब बनाया जाए, अगर डरकर शिकायत वापस ले ले तो ठीक है, नहीं तो जरुरत हुई तो वहीं मारा जाय। इसलिए मैं अपने पार्टनर की बात से अभी भी सहमत नहीं हूं कि वो हमसे बात करने आए थे। पन्द्रह लोग मुझे कौन-सी बात करने आए, मैं अभी तक समझ नहीं पाया और अगर उन्हें हमसे बात ही करनी थी तो फिर हमें अपनी बात रखने का मौका क्यों नहीं दिया।
कम्प्यूटर रुम तक की कहानी यही बनी कि लोग हम पर दबाब बनाते रहे कि आप शिकायत वापस ले ले लें। तभी एक बंदे ने कहा कि- आपने लिखा है कि मेरे कमरे में लोग शराब पी रहे थे, अरे भाई शराब कौन नहीं पीता है. ये कोई बड़ी बात थोड़े ही है, आप हाई स्कूल के बच्चे की तरह शिकायत करने चले गए। आपसे गलती हुई है, इस बात को आप मानिए और लिखिए कि हमसे गलती हुई है और आगे से ऐसा नहीं होगा। मैं उन लोगों द्वारा सिद्ध कर दिया गया था कि गलती मुझसे ही हुई है और हमें न सिर्फ शिकायत वापस लेनी है बल्कि यह भी लिखना है कि हमसे गलती हुई है और आगे से ऐसा गकभी नहीं करेंगे. हमने एक सीधे-साधे रिसर्चर को शिकायत करके परेैशान किया है और हमें इसका एहसास होना चाहिए...
क्या हुआ उसके बाद और क्यों अब मन नहीं लगता मुझे अपने कमरे में, क्यों भागा-भागा फिरता हूं हॉस्टल से और क्यों एक बार फिर लगता है कि रिसर्च छोड़कर मीडिया में आ जाउँ..पढ़िए मेरी अगली पोस्ट में।
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4 Response to 'सिस्टम से लड़ना आसान नहीं होता, मैं परेशान भी हूं और गलत भी'
  1. Rajesh Roshan
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/07/blog-post_31.html?showComment=1217504040000#c7224418274714640099'> 31 जुलाई 2008 को 5:04 pm

    पूरी जिन्दगी में १ बार बीयर पी है...सिगरेट कभी नही... मेरे कई सारे दोस्त पीते हैं... मैं कभी शिकायत नही करता... हा एक दो बार समझाया हू...नही मानते.... छोड़ दिया... विनीत सिस्टम से लड़ना तब होता है जब हम पूरे पूरे साफ़ हो.... मुझे तुममे केवल एक गलती दिख रही है तुम प्रैक्टिकल नही हो.... अच्छा होना और प्रैक्टिकल होना दोनों दो बातें हैं.... सोचो....

     

  2. Anil
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/07/blog-post_31.html?showComment=1217504400000#c4847234313806975066'> 31 जुलाई 2008 को 5:10 pm

    "शराब कौन नहीं पीता" - कोई भी समझदार आदमी नहीं पीता। एक बार की बात है, मेरा एक दोस्त शराब पीकर मुझसे झगड़ा करने आगया होस्टल में। मैंने थोड़ी देर तो सहा, लेकिन उसके बाद अति हो गयी। मैंने उसके बाल पकड़ लिये अपनी मुट्ठी में, और उसको ज़मीन पर बिठा के दो चपत दिये। जैसे ही कसके चपत लगे, अगल-बगल के कमरों से निकलकर लोग आये उसके बचाव में। उनका भी यही तर्क था "छोड़िये न अनिल भाई, इसने पी रखी है"। मैंने कहा "साले ने मुझसे पूछ कर पी थी क्या?" मज़े की बात, गलती उसकी, और रोका गया मुझे। मेरा यह मानना है कि शराब पिया हुआ आदमी कुत्ते समान होता है - यदि वह गलती करता है तो दस मारकर एक गिनिये।

    मैं हिंसा करने को नहीं कह रहा हूं, बल्कि ये बता रहा हूं कि शराब पीकर आदमी नहीं बोतल बोलती है, इसलिये उससे बोतल जैसा ही बर्ताव किया जाये।

    और, १५ लोगों के आने का मतलब है ये आपकी परीक्षा है। यहीं पता चलेगा कि अब सोना निकलेगा या राख!

    आपकी जिंदादिली और हौसले को सलाम, और ढेरों शुभकामनायें!

     

  3. pravin
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/07/blog-post_31.html?showComment=1217505540000#c5632981147701375190'> 31 जुलाई 2008 को 5:29 pm

    PRACTICAL KA MATLAB KAYAR HONA HAI RAJESH G?

     

  4. Ashish Singh
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/07/blog-post_31.html?showComment=1217631780000#c1741754743109859701'> 2 अगस्त 2008 को 4:33 am

    wah rajesh ji bajai iske ki vineet babu ki sthiti ko samajhein aap unhe 'practical' banne ka path parha rahe hain..gajab kiya malik..aur vineet ji accha kar rahe hain hostels ki nangayi ke bare likh kar..ye bahar pata chalna chahiye ki hostel me kya kabaddi kheli jati hai..

     

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