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एक बत्तख हिन्दी में एमए

Posted On 10:25 pm by विनीत कुमार |

पोस्ट का शीर्षक पढ़कर आपको थोड़ा अजीब लगेगा लेकिन पूरी पोस्ट पढ़ने के बाद आपको दूसरा और इससे बेहतर शीर्षक ढ़ूढने में बड़ी मशक्कत करनी पड़ेगी। अच्छा शीर्षक ढूंढने पर इनामी खत जल्द ही भेजा जाएगा।
घर से वापस हॉस्टल लौटनेवालों का हमलोग बेसब्री से इंतजार करते हैं, आने के पहले बाकायदा फोन करके कहते हैं, स्टेशन पर लेने आ जाउं। और अगर हमारे हिसाब से ( पहले पूछ लेते हैं सामान वजनी है कि नहीं,मतलब माल है कि नहीं) मामला फिट बैठ जाता है तो लेने चले भी जाते हैं। हमारा जोर बिहार और हरियाणा वालों पर ज्यादा होता है। बिहार के लोग खाने का जो आइटम लाते हैं मां बताती है कि हमारे पूर्वज भी वो सब बनाया करते थे, अब मॉड भाभी के आ जाने से बिहारी प्रजाति के सारे आइटम लुप्त होते चले गए और हरियाणा वाले शुद्ध भैंस की घी लाते हैं, शुद्ध घी बोलने में थोड़ी दुविधा है, क्या हरियाणा में मिलावट नहीं है। आए दिन खबर हर कीमत पर वाले घी में डिटरजेंट की मिलावट वाली कहानी सुनाते रहते हैं लेकिन शुक्र है कि अब तक भैंस में कोई मिलावट नहीं है। छोडिए, दोनों राज्यों के अलावे एक बंदे का हमलोग बेसब्री से इंतजार करते हैं, अब ये मत पूछिएगा कि वो कहां के हैं आपको एनथ्रोपॉलाजी पर से विश्वास उठ जाएगा। आपको गुस्सा भी आएगा कि स्साले हमार हिंया क्यों पैदा लिए और डर भी लगेगा कि अगर अपने राज्य में ऐसी ब्रीड पैदा होती रही फिर जीडीपी बढ़ने से रही। कुल मिलाकर अगर मैं आपको उसकी पवित्र भूमि बता दूं तो ब्लॉग दुनिया में चिंता फैल जाएगी। ये नपुंसकता से भी खराब पछताने वाली चीज है।हम उनसे खाने-पीने की चीजों के कारण घर से आने का इंतजार नहीं करते बल्कि वजह कुछ और है।
आपको साहित्य की थोड़ी भी समझ है तो एक चर्चित नाम है मस्तराम। सीनियरों से शिक्षा मिली है कि कामायनी और प्रियप्रवास को समझने के सौन्दर्यबोध इसी से पढ़कर विकसित होंगे। शुरु में तो मैं राजकमल प्रकाशन, दरियागंज चला गया खोजने। साहित्य का स्टूडेंट रहा हूं, इतना पता था कि हिन्दी की अच्छी किताबें वहीं मिलती है। लेकिन अब मैं सोचता हूं कि तब मैंने एक अच्छा काम किया था कि दूकान का नाम पूछने से पहले किताब का नाम पूछता था और तब कहता था कि राजकमल में मिल जाएगी न मस्तराम की किताब। मनचलों ने बताया कि हां हां जाओ तो। सीधे कांउटर पर न जाकर दूकान के बाहर जो पार्सल के लिए किताबें पैक करते हैं, उनसे पूछा-भइया मस्तराम की किताबें यहीं मिलेगी। वो बंदा मुझे थोड़ी देर तक घूरता रहा, मानो अंदाजा लगा रहा हो कि हुलिए से तो संस्कारी जान पड़ता है फिर कुसंगति में कैसे फंस गया और जब हमनें अपना परिचय दिया तो अफसोस करते हुए बताया कि मस्तराम जैसी घटिया किताबों से दूर ही रहना। उसके लाख उपदेश देने के बाद भी मेरे मन में किताब पढ़ने की इच्छा बन चुकी थी। इसी बीच हुआ ये कि हमारे एक दोस्त(जिसकी चर्चा आगे जारी रहेगी) के दोस्त का बीए में ठीक नंबर नहीं आए, ठीक क्या जी आप फेल ही समझें। उसने पढ़ाई छोड़कर किताब की दूकान कर ली। अच्छा भी है कि पढ़ न सको तो कम से कम पढ़ने के साधन बेचो। लेकिन मेरे दोस्त ने बताया कि कभी भी उसकी दूकान पर स्कूल और कॉलेज में पढ़नेवालों की भीड़ नहीं रही। हमेशा अध्दधा, पौआ खरीदने वाले लोग आते हैं, बाद में बताया कि वो ज्यादातर एमआर सीरिज ( मस्तराम) बेचा करता है। उसी के घर से आने का इंतजार हमलोग बेसब्री से किया करते।
वो मस्तराम की किताबें अपने दोस्त के यहां से सफर काटने के लिए लाता है लेकिन हमलोग का भी ज्ञान बढ़ जाता है। उसके आने पर हमलोगों ने इस मूर्धन्य साहित्यकार का सामूहिक पाठ किया है।
दो तरह के लोग इस विधान में शामिल होते हैं। एक तो वेलोग जो गर्व से कहते हैं कि हां हम मस्तराम को पढ़ते हैं क्योंकि अपने जोशीजी को भी कसप और हमजाद की कच्ची सामग्री यहीं से मिली और दुसरे वेलोग जो अपनी छवि पर मर मिटने वाले लोग हैं। प्याज लहसुन की तरह इसे और आकाशीजल को हाथ नहीं लगाते। लेकिन सबसे ज्यादा कुंठा और किताब में ही लेडिस स्पर्श का सुख पाने की चाहत भी इन्हीं में हैं। हमारी तरफ ऐसे देखेंगे, मां-बाप का हवाला देंगे कि क्या करने आए थे और क्या कर रहे हो। फिर अधीर होकर पूछेंगे कि अच्छा आप बताइए कि जब आप घर से दिल्ली के लिए निकल रहे थे तो मां ने क्या कहा था। मैं तुरंत जबाब देता- मेरी मां ने कहा कि जा बेटा दिल्ली, दिल्ली पर मुगलों ने बहुत दिनों तक राज किया अब जाकर हिन्दू राष्ट्र की नींव रख आ। हिन्दू समाज को संगठित कर। और तब पीछे से ठहाके शुरु हो जाते और एक दो अमृतवाणी भी कि साला चुतियापा करने से बाज नहीं आएगा, बैठ यहां। फिर उसे भाई लोग मिलकर मस्तराम को जोर-जोर से बोल-बोलकर पढ़ने कहते. ये काज ऐसा ही होता जैसे प्रेमचंद की कथाओं में ब्राह्मण को मांस खिलाने की कोशिशे रहती हैं। वो पढ़ने लगता लेकिन एक दो लइन पढ़कर बोलता कि इसमें मस्ती का स्पेलिंग ठीक नहीं है। मस्ती की जगह मस्ठी लिखा है और बेडरुम को बोडरुम लिख दिया है, लड़की को लरकी लिखा है, सच पूछो तो इससे सौन्दर्यबोध मरता है वो भाव ही नहीं आ पाते जो लेखक प्रेषित करना चाहता है। पीछे से फिर लोग गरियाते बैठ साला, न पढे तो दिक्कत और पढ़े तो फजीहत। प्रूफ रीडिंग करता है। तुम साले हिन्दीवालों के साथ यही परेशानी है। सब बत्तख हिन्दी में ही एमए करने चला आया है, फिर मेरी तरफ देखकर बोला तुम्हें कुछ नहीं बोल रहे हैं तुम्हारा ऑप्शन मीडिया है न।........
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3 Response to 'एक बत्तख हिन्दी में एमए'
  1. राकेश
    http://taanabaana.blogspot.com/2007/10/blog-post_26.html?showComment=1193374860000#c777647688390956335'> 26 अक्तूबर 2007 को 10:31 am

    सुंदर. अतिसुंदर. मज़ा आ गया. हॉस्टल लाइफ़ याद करा दिया इस बत्तख ने. बढिया लिख रहे हैं मित्र.
    इस गति से लिखाई होती रही तो दो महीने बाद ही प्रकाशक ढूंढने पड़ेंगे. :)

     

  2. Sanjeet Tripathi
    http://taanabaana.blogspot.com/2007/10/blog-post_26.html?showComment=1193381400000#c9084780124289718020'> 26 अक्तूबर 2007 को 12:20 pm

    छाते जा रहे हो गुरु, बेलाग, बेलौस जारी रहे!!

     

  3. आशीष कुमार 'अंशु'
    http://taanabaana.blogspot.com/2007/10/blog-post_26.html?showComment=1194868560000#c5246156898708205093'> 12 नवंबर 2007 को 5:26 pm

    राजकमल प्रकाशन, theekaanaa to sahee tha, par pucha galat aadamee se. Ander chale jaate to aapako

    MASTRAM KAPOOR kee kitaab padhane ko jarur mil jati.

     

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