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आओ ब्रेकिंग देंगे

Posted On 10:32 am by विनीत कुमार |

इंडिया टीवी की रिपोर्टर बड़ी तेजी से दिल्ली विश्वविद्यालय की सेंट्रल लाइब्रेरी में घुसती है और साथ में कैमरामैन फटाफट शॉट लेने शुरु कर देता है। कैमरामैन फ्रेम बना रहा है उन किताबों का जो कि जमीन पर बिखरे पड़े हैं। कुछ पुरानी किताबें कुछ नयी किताबें। पीछे से दो चार लड़के चिल्लाते हुए आते हैं और जो रिसर्चर और स्टूडेंट कम्प्यूटर पर काम कर रहे होते हैं उन्हें जबरदस्ती हाथ पकड़कर उठा रहे हैं और कह रहे हैं, आपलोग बाहर जाइए...जल्दी, भगाए जानेवाले में एक मैं भी था, बाहर तो मुझे भी जाना ही था लेकिन बिना कारण जाने बाहर जाना ठीक नहीं समझा, रिपोर्टर की ओर बढा, हम दोनों एक-दूसरे को अच्छी तरह से जानते थे अब तक अमूमन आम मेंला, फूड विलेज और इसी तरह की सॉफ्ट स्टोरी पर काम किया करती थी लेकिन अब चैनल बदलने के साथ मिजाज भी बदल गया। उसे ये तो पता था कि मैं भी डीयू से पढ़ा हूं लेकिन अभी यहां रिसर्च कर रहा हूं ये बात मालूम नहीं थी सो बताने लगी- यहां के रिसर्चर का बहुत ही बुरा हाल हैं , उनपर बहुत ही अत्याचार होता हैं, इनकी कई तरह की मांगे हैं जिसपर प्रशासन ध्यान नहीं दे रही है.....बगैरह-बगैरह। लाइब्रेरी की बदहाली को बताने के लिए तब तक कैमरामैन ने खूब सारे शॉट्स बना लिए थे।
रिपोर्टर से बात करते देख लाइब्रेरियन मेरे पास आए और कहने लगे।....सर इन किताबों की जो फोटो ले रहे हैं ये मेम्बर द्वारा लौटाई गई किताबें हैं और दरअसल ये चाहते हैं कि रिसर्चर के लिए भी चुनाव हो इसलिए ऐसा कर रहे हैं। महाशय की सारी बातें रिपोर्टर से ठीक उलट थी जबकि और अपने साथी रिसर्चर से बात की तो उनकी बातों मे और रिपोर्टर की बातों में कोई फर्क नहीं था। तो ये मान लिया जाए कि रिसर्चर सही थे और उस सच का साथ देने आयी थी इंडिया टीवी की रिपोर्टर।
इस पूरे मामले में मेरी आपत्ति सिर्फ इस बात पर थी कि आपको इस बात की इजाजत किसने दे दी कि आप चालीस-पचास काम कर रहे लोगों को डिस्टर्ब करके उनके हित में ख़बर दिखाएं और उन भाई साहब को किसने मंत्र दिया कि जिसके लिए काम कर रहे हो उसी को काम के बीच से हाथ पकड़कर बाहर खींचो। मैंने रिपोर्टर से कहा, लाईब्रेरी के लोगों से भी तो बात कर लो, मेरा मतलब है बाइट ले लो, गलत-सही तो बाद में होगा लेकिन एकतरफा स्टोरी तो चलेगी नहीं।.....बात आई गई हो गई और मैडम बाहर आकर देख लेंगें टाइप के लोगों को कवर करने में जुट गयी।....इधर जिन लोगों को काम करते उठाया गया था वे बहुत नाराज थे, सारे कम्प्यूटर के तार खींच दिए गए थे।....बार-बार एक ही बात दोहरा रहे थे कि ऐसा करके चाहेंगे कि हम चुनाव होने पर वोट दें तो ऐसा कभी नहीं होगा। एक ने कहा जरा-सा भी मीडिया सेंस नहीं है जो चैनल सांप-संपेरा दिखाकर लोगों को बरगलाने का काम करता है, उसकी रिपोर्टर को भाई साहब बरगला कर ले आए कि आ जाओ ब्रेकिंग न्यूज मिलेगी....पता नहीं किसी ने ये भी कहा हो कि हम अपने उपर पेट्रोल डालेंगे और आप कवर करके अर्जुन सिंह पर दबाव बनाना।
सब चमकना चाहते हैं, सब बहुत जल्दी चमकना चाहते हैं। रिपोर्टर रोतोंरात चमकना चाहती है सेंट्रल लाइब्रेरी पर कच्ची-पक्की स्टोरी चलाकर बिना होमवर्क किए, बिना ये जाने कि सेंट्रल लाइब्रेरी का मेन गेट पिछले तीन-चार महीने से बंद क्यों है, वो चिल्लाता हुआ बंदा रातोंरात पब्लिक फेस वैल्यू पैदा करना चाहता है, विधान-सभा जाना चाहता है। काम कर रहा रिसर्चर किसी भी बात पर प्रशासन का विरोध नहीं करता क्योंकि उसे चमकने की जल्दी नहीं है और कल को उसे सिस्टम के भीतर ही आना है।.....इसलिए अपने-अपने ढ़ंग से शोर-शराबा और हंगामा सब पैदा करते हैं.
कल रविवार को जनसत्ता में एक खबर छापी है कि दिल्ली विश्वविद्यालय के शोधार्थियों में काफी गुस्सा है लेकिन संवाददाता ने ये नहीं बताया कि कौन से शोधार्थियों में गुस्सा है जो काम के बीच उठाए गए थे उनमें या फिर जो पकड़-पकड़कर उठा रहे थे उनमें। लेकिन आगे जिस तरह की मांगों की चर्चा की गई उससे ये साफ हो जाता है कि हाथ पकड़नेवालों का गुस्साना अब भी जारी है और भगाए गए लोगों में अब गुस्सा कहां अब वे घर में ही पढ़ते हैं, एक-दो ने तो अपना कम्प्यूटर खरीद लिया है, वे तो सिस्टम के लिए बने हैं फिर विरोध कैसा।
मैडम खोज रही होगी कोई धांसू स्टोरी और किसी ने फिर फोन करके बुलाया होगा कि आ जाओ ब्रेंकिंग देंगे।वैसे भी प्रकाश बनकर चमकने की ललक तो अभी छूटी नहीं, सैंकडों मिल जाएंगे।....
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2 Response to 'आओ ब्रेकिंग देंगे'
  1. अरविन्द चतुर्वेदी Arvind Chaturvedi
    http://taanabaana.blogspot.com/2007/10/blog-post_15.html?showComment=1192455480000#c1309412652743419403'> 15 अक्तूबर 2007 को 7:08 pm

    बिल्कुल सटीक टिप्पणी है,टीवी मीडिया पर.

    अनेक वर्ष पहले ( शायद 1987 में) साप्ताहिक हिन्दुस्तान के लिये एक व्यंग्य लिखा था -" खबर सूंघती नाक का उतावलापन" यह शीर्षक आज भी सटीक बैठता है पत्रकारिता पर.फर्क सिर्फ यह है कि अब यह टीवी वालों पर ज्यादा फिट है.

     

  2. हिन्दी टुडे
    http://taanabaana.blogspot.com/2007/10/blog-post_15.html?showComment=1192469220000#c9078048612288872075'> 15 अक्तूबर 2007 को 10:57 pm

    यही सच है जनाब!पेज थ्री फिल्म सच का आईना है।

     

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