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बाबा मानी तीन केले

Posted On 3:15 am by विनीत कुमार |

दिल्ली यूनिवर्सिटी से किसी भी रुप में सरोकार है या रहा होगा तो आपने बाबा शब्द जरुर सुना होगा। अपने तरफ पापा के बाबूजी के लिए बाबा शब्द का प्रयोग करते हैं या फिर बूढ़े-बुजुर्गों के लिए। लेकिन कैम्पस में बाबा का मानी कुछ और ही होते हैं।जब मैं शुरु-शुरु डीयू में आया तो हॉस्टल सहित दूसरी चीजों को लेकर बहुत परेशानी हुई। लोगों ने समझाया कि बाबा के पास जाओ, अपनी तकलीफ बताओ...जरुर मदद करेंगे। भगवान पर रत्ती भर भरोसा है नहीं, तब भी नहीं था सो टाल गया और तकलीफें झेलता रहा। झारखंड से था इसलिए मुझसे मिले बिना ही लोगों ने धारणा बना ली थी कि जरुर बोक्का होगा या फिर दिल का बहुत साफ। करियर के लिहाज से ये दोनों चीजें बहुत खतरनाक है..हमसे गए-गुजरों को हॉस्टल मिल गया और मैं बजाता रह गया। तभी एक दिन मेरे एक क्लासमेट ने मुझे एक आदमी से मिलाया जो कि आदमी होने की योग्यता खो चुका था। उनकी तरफ मुंह करके और मेरी तरफ इशारा करके बताया कि विनीत है और झारखंड से आया है। बातचीत में वो बंदा बार-बार झारखंड पर विशेष जोर दे रहा था और आदमी की बातचीत से लग रहा था कि उसे बिहार से विशेष लगाव है। अंत में मैंने जोड़ा कि सर घर तो बाबूजी ने झारखंड में बनवा लिया है लेकिन मैं हूं तो बिहार का ही। राशन कार्ड भी बिहार का ही है। मुस्कराते हुए आदमी ने कहा...स्साला बत्तख ही रह गए इसीलिए तो हम तुमको अपने में मिक्स नहीं होने देते पहीले सीधे काहे नहीं बोल दिए की हमहुं बिहारी है....सोचोगे कि अपने को बिहारियों से अलग रखें और दिखें और हेल-मेल से काम भी बन जाए। चलो भागो यहां से। बाद में पता चला कि ये किसी हॉस्टल के बाबा हैं और बाकी हॉस्टलों के बाबाओं ने आपसी सहमति और आस्था से सुपर बाबा मान लिया है।सुपर बाबा यानि कहीं भी टांग डालने की कूबत। आप धर्म के हिसाब से निरंकारी बाबा समझ लें क्योंकि इनकी लीला फिक्स नहीं है। ये अगर पढ़ते हैं हिन्दू कॉलेज में तो रामजस वाले पूछने आ जाते हैं कि अबकी इलेक्शन में किसको बैठाना है उठाने का काम तो बाबा करेंगे ही। मार हुआ है कोठारी हॉस्टल में तो इनके हॉस्टल के इनके अपने स्वयंसेवक स्थिति पर काबू पाने के लिए पहुंच जाएंगे। मैंने कई बार अपनी आंखों से देखा है कि दिल्ली पुलिस भी इनके हिसाब से फैसले लेती है या फिर कई बार इनके बीच में पड़ने से समझौता हुआ है। दिल्ली पुलिस को भी बाबा का प्रताप और पहुंच की खबर होती है भले ही उसे अपने एस.एच.ओ. के बारे में पता न रहे कि वो किस बैच का है या फिर बोर्ड कब पास किया है।हॉस्टल की लिस्ट निकले और वो बिना बाबा की मर्जी के...अगर आप ऐसा सोचते हैं जैसा कि कभी ऑथिरिटी ने सोचने की कोशिश की थी तो समझिए आपको डीयू से फिर से ग्रेजुएशन करने की जरुरत है। ये सब बचकाना हरकत वे ही वार्डन कर जाते थे जिन्होंने पहले कभी डीयू का मुंह नहीं देखा। पैसे की तंगी, कमजोर अंग्रेजी, आत्मविश्वास की कमी या फिर कम पर्सेंटेज के कारण यहां पढ़ नहीं पाए लेकिन बाद में सरकार की अखिल भारतीय नीति के तहत पढ़ाने आ गए। पहले वाली कमजोरी आपको अभी भी इनमें जब-तब दिख जाएगी. लेकिन इनकी दिली इच्छा रहती है कि ये कुछ ऐसा कर जाएं कि डीयू से ग्रेजुएट हुए स्टूडेंट को ये बताना नहीं पड़े कि - पहिचान कौन।.....बाबा ने कई बार इनको भी तरीके से पटकनी दी है, एक-दो बार तो नौकरी पर बन आई है। अच्छा बाबा का आहार-विहार भी सबसे अलग होता था, जब तीन-तेरह करने के बाद मुझे हॉस्टल मिल गया तो मैं तो कभी इनके सामने पड़ना ही नहीं चाहता, साइड से क़ट लेता, लेकिन लोग औऱ हमारे खाने बनाने वाले उस्ताद जी बताया करते कि रात में उनके कमरे में सबकुछ ले जाकर बाबा की इच्छा के मुताबिक खाना बनाना पड़ता है। बाकियों से अलग- एकदम डिफरेंट।अब यहां बहुत अधिक लिस्ट बढाने की जरुरत है कि बाबा क्या-क्या किया करते थे या फिर ये बताने की जरुरत है कि उनका भौतिक स्वरुप कैसा होता था। एकेडमिक परफॉरमेंस कैसा होता था....ये सब पूछकर हमसे क्लर्की न करवाएं। उनके कार्यों और प्रवृत्तियों के आधार पर आप ग्राफिक्स तैयार कर लें।समय बदला, छात्र राजनीति कमजोर हुई, देशभर में स्टूडेंट पॉलिटिक्स पर नकेल कसा जाने लगा उसकी लगातार नकारात्मक छवि पेश की जाने लगी और ये मान लिया जाने लगा कि स्टूडेंट ये सब छोड़कर अपनी पढ़ाई-लिखाई पर ध्यान दे, राजनीति उसकी पर्सनालिटी का हिस्सा नहीं है। पढ़ाई-लिखाई करे मतलब अपने को बाजार के हिसाब से तैयार करे। आनेवाले समय में सरकार का एक बेहतर नागरिक बनें, बढ़िया करदाता बने। इसका सीधा असर आप डीयू की पॉलिटिक्स में देख सकते हैं। छात्र चुनाव तो यहां बंद नहीं हुए हैं लेकिन चुनाव का जो रंग-ढंग है वो सेठों और बड़ी पार्टियों के लिए सट्टे की चीज बनकर रह गई है। आप देखेंगे कि सालभर में राजनीतिक पार्टियां डीयू के मसले में रुचि नहीं लेती लेकिन चुनाव की शक्ल विधान- सभा के चुनाव से भी ज्यादा भव्य हो गया है।.....यही कारण है कि अब कोई कॉलेज या स्टूडेंट अपने ढ़ंग से मुद्दे को उठाता है तो डूसू को उससे दूर ही रखता है। ताजा उदाहरण इन्द्रप्रस्थ कॉलेज को लें । खैर.......ये सब हो जाने से बाबा की स्थिति में लगातार गिरावट आई है। ऑथिरिटी को डर नहीं है कि स्टूडेंट विरोध करेंगे, डूसू अपने साथ है। अब बाबा की स्थिति ये है कि या तो वो डूसू का पालतू हो जा या फिर अपने वजूद को बनाए रखने के लिए लगातार संघर्ष करे जो कि आज की तारीख में बड़ ही मुश्किल काम है.।जो बाबा अपने वजूद बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रहा है वो बाबागिरी के नाम पर
कमरे में गेस्ट रख ले रहा है, गेस्ट के आने पर बिना कूपन कटाए खाना खिला सकता है या फिर बहुत हुआ तो हम जैसे आम हॉस्टलरों के हटकर एक की जगह तीन केले खा सकता है इससे ज्यादा कुछ कर लेना अब उसके बूते की बात नहीं है।....तो अब हैं ये डीयू के बाबा और इनकी माली हालत.....
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6 Response to 'बाबा मानी तीन केले'
  1. गिरीन्द्र नाथ झा
    http://taanabaana.blogspot.com/2007/10/blog-post_08.html?showComment=1191835140000#c522036723402852332'> 8 अक्तूबर 2007 को 2:49 pm

    Baba ko lekar jo baaten aap ne kahi hai na...wo hai kamal ki,
    sayad jo bhi DU ki hawa me thori zindgee uraee hai na..unke liye to yah aur bhi rochak hai.

     

  2. Sanjeet Tripathi
    http://taanabaana.blogspot.com/2007/10/blog-post_08.html?showComment=1191838200000#c2127498029941394518'> 8 अक्तूबर 2007 को 3:40 pm

    बहुत बढ़िया विनीत भाई।
    ऐसे ही अपने संस्मरण, अनुभव और उन सब पर अपना नज़रिया हमसे बांटते रहें। आभार

     

  3. munna
    http://taanabaana.blogspot.com/2007/10/blog-post_08.html?showComment=1191852300000#c931222936459563506'> 8 अक्तूबर 2007 को 7:35 pm

    waise baatein aapki d u ki zameeni hakikat bayan karti hain magar ishi baba giri ke hisse mein aaka blog bhi aa raha hai 3 kele wale babao ki mahima blog par aapne to ughar di ..zara bachiye..in babao ka upar niche har jagah setting hai...sambhal kar saath hi nivedan hai ...inhe aur ugadhe.
    munna k pandey
    gwyer hall

     

  4. अनूप शुक्ल
    http://taanabaana.blogspot.com/2007/10/blog-post_08.html?showComment=1191864600000#c8770372253492011621'> 8 अक्तूबर 2007 को 11:00 pm

    बढ़िया लिखते हैं। ऐसे ही मन लगा रहा तो कुछ दिन में आप भी ब्लाग बाबा बन जायेंगे।

     

  5. vijay
    http://taanabaana.blogspot.com/2007/10/blog-post_08.html?showComment=1191899400000#c2945492101509991831'> 9 अक्तूबर 2007 को 8:40 am

    bahut achhe sir, babao ki kya lee h apne aise hi lete rahiye ga. hum apke saath h

     

  6. avinash
    http://taanabaana.blogspot.com/2007/10/blog-post_08.html?showComment=1191947280000#c1482951069108567453'> 9 अक्तूबर 2007 को 9:58 pm

    आपमें कमाल की क्रिएटिविटी है बंधु।

     

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