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जेएनयू का हिन्दी प्लैनेट

Posted On 12:35 am by विनीत कुमार |

जहां पहुंचकर आवारा हवाएं भी शांत हो जाए और परेड करने लगे-

डॉ. नगेन्द्र ना जी ना जी
नामवर सिंह हां जी हां जी
दिनकर,बच्चन ना जी ना जी
धूमिल, मुक्तिबोध सिर्फ वही सिर्फ वही
रीतिकाल का माने
कूड़ा कूडा
उत्तर आधुनिकता
भांड है भांड है
पॉपुलर कल्चर वाला
बाजारवादी, पूंजीपतियों का गुलाम है
भक्तिकाल और कबीरवाले
महान हैं, ज्ञानी है
रिसर्च का माने खोजो पांडुलिपि
रिसर्चर का माने
सबसे हटकर.......तो आप समझ जाइए कि आप जेएनयू भारतीय भाषा केन्द्र के ठीक सामने खड़े हैं।.....और उस पर भी दीवारों से आवाजें आनी शुरु हो जाए कि-- आ गए बेटा इ रामविलास बाबू ने हमरे साथ न्याय नहीं किए, अभी भी आत्मा भटकती रहती है। अब आ गए हो तो कोई बढ़िया वाद(ism) से जोड़-जाड़कर हमरे उपर पीएच.डी. कर डालो..राहत मिल जाई।... सुना है इ बार बहुत जोग आदमी हेड बने हैं, हमरे नाम से टॉपिक पास होने में कौनो दिक्कत नहीं होने देंगे। बताओ हमरे मुकाबले भारतेन्दु को खड़ा कर दिए। वैसे गोपालगंज वाले मास्टर साहब भी ठीके थे लेकिन उनके साथ परेशानी रही कि स्थापिते कवियन को फिर से स्थापित करने लग गए। हमरे तरफ ध्यान ही नहीं दिए। खैर छोडो, इ सब बात पर बेसी ध्यान मत दो।..
तो समझिए कि आप हिन्दी-विभाग के सामने खड़े हैं ।
ये अपने ढंग का अलग प्लैनेट है। वैसे देश का कोई भी हिन्दी विभाग आपको अलग ही प्लैनेट लगेगा क्योंकि उपर से जब आदमियों की डिलीवरी होती है तो उसमें मेन्शन होता है कि दो सौ पीस हिन्दीवाले भेज रहे हैं, ध्यान से सप्लाय करना और हां उसमें से जेएनयू के लिए कौन-कौन से हैं कोने में पर्ची में लिख देना।...
मान लीजिए आप भी हिन्दी से ही एम.फिल्. या पीएच.डी कर रहे हैं, कायदे से आपको वो सारी बातें समझ में आनी चाहिए जिसके बारे वे बात कर रहे हैं लेकिन आपको समझ नहीं आएगी और आप अपने को बहुत ही गिरा हुआ, रिसर्चर के नाम पर चंपक समझेंगे, आपको ये एहसास करा देंगे कि आपसे बेहतर तो गंगा ढाबा पर चाय देनेवाला छोटू है, अभी जाकर पूछो कि प्रियप्रवास में वर्ग-संघर्ष कहां है बता देगा। अगर आपका जेआएफ है तब तो आप देशद्रोही हैं, आप सरकार का पैसा उड़ा रहे हैं क्योंकि आपको इतना भी नहीं पता कि कबीर की रचनाओं में भारतीय संविधान की अनुगूंज कहां-कहां हैं और कैसे अंबेडकर को भारतीय गणराज्य के लिए संविधान लिखने और लोकतांत्रिक व्यवस्था कायम करने की प्रेरणा कबीर वाणी से मिली। आपको ये भी नहीं पता कि हिन्दी नवजागरण के अग्रदूत भारतेन्दु नहीं कोई और हैं।वहां जाते ही चारो ओर से प्रश्नों की झड़ी लगा दी जाएगी और तब आपको सही अर्थों में सत्य का ज्ञान होगा।
सबसे पहले तो ये कि आपको पता है ,अपने ओम थानवी जी ने आचार्य शुक्ल को हिन्दूवादी बताने कि कोशिश की है। हिन्दी की मायापुरी पत्रिका समयांतर ने डीयू के मास्टरों को धो डाला है, आपके गाइड पर तो सीधा चोट है और वो भी नहीं बचे हैं जो साहित्य के जरिए मानव-मुक्ति का रास्ता खोज रहे थे और उनको भी तो लपेट लिया जो बेचारे चाहते हैं कि कामकाजी लेडिस भी कुछ पढ़-लिख जाएं। अच्छा इ बताइए नया ज्ञानोदय वाले मामले में आपको क्या लगा। कालियाजी को लगा कि पत्रिका का सर्कुलेशन बढ़ाकर तीर मार लेंगे। उनको क्या पता कि हिन्दी समाज में उंगुली करनेवालों की कमी नहीं है और सच पूछिए तो जिसको उंगली करने का अभ्यास नहीं है वो हिन्दी के नाम पर दिन काट रहा है। चले युवा रचनाकारों को प्रमोट करने उनको पता ही नहीं है कि यहां पैंतालीस साल के शूगर का मरीज भी युवा है।
अच्छा आपके डीयू से एक लेडिस आई है, उसका वहां एमए में 55 प्रतिशत नहीं बना था उसको आप जानते हैं आजकल तो खूब....खैर जाने दीजिए लेकिन वहां भी यही सब था तबे तो लसक गई....लेकिन है कन्टाप गुरु।
फुटनोट जरुरी है-
एक लाइन में कहूं तो हिन्दी से जुड़े तमाम मुद्दों का स्टिंग ऑपरेशन जेएनयू में ही होता है।
लीजिए इतनी बातें हो गई लेकिन असली मुद्दे की तरफ तो ध्यान ही नहीं गया। आपके रिसर्च का टॉपिक और गाइड। मेरे एक मित्र हैं उन्हें साथी बनाने की बहुत कोशिश की लेकिन उनके हार्डवेयर में ही प्रॉब्लम है नहीं बन पाए। खैर, वे अपने टॉपिक और काम को लेकर खुशफहमी के शिकार हैं वैसे शिकार तो हर हिन्दी में रिसर्च करनेवाला बंदा होता है, उसे लगता है कि वो जब राजनीतिक मुद्दों और आर्थिक मसलों से जोड़कर काम करेगा तो मनमोहन अंकल की सरकार हिल जाएगी और दद्दा अटलजी राय देंगे कि जब इतनी मेहनत किए ही हो तो फिर अंग्रेजी में काम को छपवाना। अपना एक एनआरआई स्वयंसेवक है, उसका प्रेस का ही काम है। और फिर देश में ही क्यों अंतर्राष्ट्रीय हल्कों में भी हलचल हो कि जो बंदा न्यूक्लियर डील पर जनता को बरगला रहा है उसकी इकॉनामी इतनी लचर है कि एक हिन्दीवाला भी धो-पोछकर बराबर कर दिया। जो लोग दलित-विमर्श पर काम कर रहे हैं उनकी खुशफहमी विकासवादी तरीके की है। उनका विश्वास है कि उनके काम को बहनजी हाथोंहाथ ले लेगी..ठाकुर हैं इसलिए कुछ पोरशन यूपी बोर्ड में भी लग जाएगा और साल होते-होते कांशीराम साहित्य रत्न पुरस्कार। बजाते रहें बोधा, ठाकुर और राजेश जोशी पर काम करनेवाले। जिस विषय का सत्ता से कोई तालमेल ही नहीं उसका फ्यूचर क्या कच्चू होगा।
हां तो हमारे उस मित्र का तर्क है कि जिस पर उन्होंने एम.फिल्. किया उन्हें उसी साल साहित्य अकादमी मिला। ये अलग बात है कि महीने-दो महीने के भीतर वे चल बसे। अब मित्र पीएच.डी. के लिए मारामारी कर रहे हैं....जिसपर काम करेंगे उनको हिन्दी में पहला बुकर मिलेगा और उसके जस से मित्र के लिए साहित्य आकादमी तो रखा हुआ है। लेकिन मुझे मौजूदा एक अच्छे साहित्कार खोने का डर बराबर बना रहता है।
हां तो बात हो रही थी टॉपिक और गाइड की। अगर मेरे जैसे रिसर्चर जो कि हिन्दी का माल खाकर भी डकार मीडिया की लेनी चाहता है, से पाला पड़ गया और टॉपिक पर बात छिड़ गयी तो नजारा देखने लायक होता है। दरभंगा का आम जो अभी काटने ही वाले थे, खास मेरे लिए उसे जेएनयू की सबसे बदसूरत लेडिस( उनके मुताबिक, हमें तो सब अच्छी लगती है) या फिर एम.ए. में चोट देनेवाली लेडिस को दे देंगे लेकिन हमें नहीं या तो उठाकर अलमारी में रख देंगे लेकिन हमें नहीं।
बात शुरु होगी टॉपिक से लेकिन गरियाना शुरु करेंगे गाइड को। और आप तो जानते ही हैं कि रिसर्चर के लिए गाइड का मामला कुछ उसी तरह का होता है जैसे अपने यूपी-बिहार में मां-बहन को लेकर। कहां हैं आप दिल्ली में तो जब तक दिनभर में दस बार मां की बहन की नहीं बोला तो लगता ही नहीं कि दिनभर कोई क्रिएटिव वर्क हुआ है लेकिन अपने यहां तो खून-खराबा हो जाता है। अपना बीपी लो होने के बावजूद सुलग ही जाती है। पहले वे कहेंगे महाराज, आप बाजा पर काम कर रहे हैं, ये भी कोई टॉपिक है, कुछ ढंग का काम कीजिए। आप अपना तर्क देंगे कि इसने हिन्दी को कैसे बदला है..थोड़ा लॉजिकल तरीके से समझाने की कोशिश करेंगे लेकिन लॉजिक प्रिय जेएनयू के दुराग्रही होने का आभास आपको होता चला जाएगा, वो आपकी एक नहीं सुनेंगे। फिर मुद्दा उछलकर गाइड पर आ जाएगा। उनका सीधा कहना होगा कि अजी आपके गाइड तो साहित्य और हिन्दी के नाम पर चुटकुला करते हैं। कहते हैं कि हिन्दी की दिशा बाजार तय होगी। सुन लीजिए अपने जानते हिन्दी को हम कोठे पर बैठने नहीं देंगे और कभी बता दीजिएगा कि उत्तर-आधुनिकता के विरोध में मोर्चा खुल गया है, कई ऐसी बाते जिसका जबाब वे हमसे नहीं हमारे गाइड से चाहते हैं...धीरे-धीरे वे सनक जाते हैं और तब मैं कहता हूं-
बंद कीजिए ये प्रलाप आपसे लड़ने नहीं आया था और न ही अपने गाइड की विद्वता का सर्टिफिकेट लेने और अगर देंगे भी तो दरियागंज में सौ-पचास में निलामी कर देंगे। आप महान, आपका परिवेश महान, आपका टॉपिक महान लेकिन नहीं कहूंगा कि आपका भविष्य भी महान... क्योंकि नौकरी खोजने आप उधर ही आएंगे और यही हाल रहा तो ...........खैर
मैं चलने को होता हूं, रात में गंगा ढाबा पर बैठकर भसर करने का बहुत मन होता है लेकिन गाइड के मुद्दे पर आंखे छलछला जाती है कि जो आदमी उनकी इज्जत नहीं करता उसके यहां का पानी भी नहीं पीना। बस तक छोड़ने दो-तीन लोग आते हैं मैं मना करता हूं, वे नहीं मानते। रास्ते भर वे अपने को कोसते हैं, आपस में बातें करते हैं कि...कितने शौक से आते हैं ये जेएनयू में ।कहते हैं यहां आकर अपना-सा लगता है लेकिन कभी भी अच्छे मन से नहीं जाते। मैं भी मन ही मन जोड़-घटाव करता हूं कि हिन्दी के नाम पर हम कुछ ज्यादा नहीं कर देते। स्टैड पर एक कनफेशन का दौर चलता है। बस आ जाती है...जेएनयू के साथी और मित्र पूछते हैं, अभी जेआरएफ का पैसा मिलना तो शुरु नहीं हुआ है न। पर्स से जेएनयू का आईडी कार्ड अलग करते हैं और बस पास थमा देते हैं, ये कहते हुए कि यहां अपना ब्लू लाइन में भी पास चलता है। और सुनिए ये जंग अभी खत्म नहीं हुआ, अबकी डीयू में आकर लतिआएंगे। मैं सीट पर बैठ जाता हूं और खिड़की से सिर निकालकर चिल्लाता हूं......
साहित्य के नाम पर ज्यादा सीरियस मत होना साथी......सीरियस होकर लिखने-पढ़ने से सरकार कोई अलग से कंटीजेन्सी नहीं देती और हां अबकी बार दरभंगा का आम अलमारी में रखा तो बनारस वाली लेडिस को बता दूंगा कि आप फ्रस्टू हैं........
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3 Response to 'जेएनयू का हिन्दी प्लैनेट'
  1. Sanjeet Tripathi
    http://taanabaana.blogspot.com/2007/10/blog-post_13.html?showComment=1192259760000#c1901132103733165965'> 13 अक्तूबर 2007 को 12:46 pm

    बहुत खूब!!

    सही जा रहे हो बंधु!!
    आपके कैम्पस मे कदम रखे बिना ही समझ रहा हूं उसे!!

    लिखते मस्त हो और बड़ी बात यह कि मन की लिखते हो!!

     

  2. Shiv Kumar Mishra
    http://taanabaana.blogspot.com/2007/10/blog-post_13.html?showComment=1192260240000#c7132943752512333137'> 13 अक्तूबर 2007 को 12:54 pm

    झोल-झाल है, भाई सब झोल-झाल है.....

    भैया, कमाल का खिलते हैं आप...जमाये रखिये.

     

  3. अनूप शुक्ल
    http://taanabaana.blogspot.com/2007/10/blog-post_13.html?showComment=1192285860000#c8141438931832651184'> 13 अक्तूबर 2007 को 8:01 pm

    बहुत अच्छा लगा बांचते हुये आपकी गाइड कथा। हम आपके नियमित पाठक बन गये। :)

     

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