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लौटे हैं कटा के......

Posted On 12:40 pm by विनीत कुमार |

गए थे भाई लोग
पॉलिटिक्स, प्यार छोड़ के
लौटे हैं झारखंड से
अपनी अब कटा के
आए दिन इंजतार के
आए दिन इंतजार के ।।
भाई....ये हिन्दी वालों को अचानक क्या हो गया था, कोई फोन करके क्रीम कलर या फिर आसमानी रंग की शर्ट खरीदने की बात कर रहा रहा था तो कोई फोन करके पूछ रहा है की कम दाम में बढ़िया जूते कहां मिलेंगे तो कोई कह रहा है भाई रे सिर्फ दो घंटे के लिए चलो न मेरे साथ बाजार, कुछ शॉपिंग करनी है। मैंने सोचा कि सरकार ने रिसर्चर का हुलिया सुधारने मतलब कि वो लगे कि रिसर्च कर रहा है के लिए जो वजीफा देना शुरु किया है ये उसी का जोश है कि कोई शर्ट खरीदनी चाह रहा है तो कोई जूते। जो बंदा बुध बाजार से पचास रुपये में आध दर्जन चड्डी खरीदता है वो पूछ रहा है कि जॉकी का ऑरिजिनल माल कहां मिलेगा। जो एक ही मोजे को उलटकर पहनता है आज उसे नाइकी के मोजे लेने हैं। एक बंदे को डार्क कलर की बनियान इसलिए पसंद है क्योंकि ये गंदा कम होता है, आज एक जोड़ी सफेद बनियान चाहिए।......मेरे एक साथी है बीएचयू से, पैदाइशी पवित्र भूमि कहां है पता नहीं, और न जानना जरुरी है क्योंकि अब वे बनारस की फक्कड संस्कृति में आकंठ डूब चुके हैं। हमें गरियाते हैं कि आप भोगी आदमी हैं हिन्दी के नाम पर बिलटउआ शोधार्थी हैं आप बढिया-बढिया विदेशी ब्रांडेड कपड़ा पहनकर हिन्दी के भिखमंगई लुक को तहस-नहस करने में लगे हैं....हमसे पूछ रहे थे कि कौन-सा रेडीमेड पैंट अच्छा रहेगा लुई फिलिप कि ऐरो।.....
सबको राय दिया भइया कपड़ा-लत्ता खरीदना इतनी हड़बड़ी की चीज नहीं है काहे एकदम से ऐसे पैसा उड़ाने में लगे हो...सरकार ने हुलिया सुधारने के लिए पैसे दिए हैं लेकिन विवेक बेच कर थोडे ही हुलिया सुधरेगा। किसी ने कुछ नहीं कहा और न ही बताया कि बात क्या है।....एक दो से पूछा कि आप तो सरकार के पहले से ही दामाद हैं। दो साल पहले से ही जेआरएफ उठा रहे हैं तो फिर ये अचानक देह की सर्विसिंग माने जूता से लेकर चड्डी तक बदलने का इरादा अब क्यों आ गया। आप तो प्रोपर्टी जुटाने( किताब) वाले जीव है तो फिर ये भोग-विलास के चक्कर में कहां से पड़ गए। भाई साहब थोड़ी देर चुप रहे और फिर एकदम से झटका मारकर बोले चैनल में आप रोज सज-संवर कर किसके लिए जाते थे....उम्मीद बंधेगी तो आपका भी अंदाज बदल जाएगा। मैंने मन ही मन थुकियाते हुए बोला....बत्तख साला...जिन्दगी भर दीदी-दीदी और दिल्ली आकर मैडम से उपर तो उठ नहीं सका और अब वृद्धा पेंशन मिल रहा है तो जवानी सूझी है। ऐय्याशी का एबीसी नहीं जानता है और आज अंदाज समझा रहा है। भाई साहब हमारे जेएनयू वाले तो और घाघ निकले, बाजार में साथ ऐसे घूम रहे थे कि जैसे सबको मॉरिशस या फिर जर्मनी से पढ़ाने का ऑफर आया है। बीच-बीच में मजाक करता तो चुप मार जाते। मैं मन ही मन अपने को कोसता तू यही बैठे-बैठे ब्लॉग लिखता रह और ग्लोबल होने के सपने देख और ये सब साल-दो साल बाद एनआरआई का ठप्पा लेकर घूमेंगे।....खैर चांद देखकर बल्लीमारान दौडंने की वजह किसी ने मुझे नहीं बताई।
करीब सात-आठ दिन बाद जब सब मैं भूल-भाल गया तो फिर फोन आने शुरु हुए। एक ने पूछा यार सुना है कि तुम्हारा झारखंड बहुत सुंदर है। मैंने कहा हां भाई मेरा झारखंड तो वाकई बहुत सुंदर है लेकिन कुछ दिनों के लिए वो मधु कोडा का झारखंड हो गया है इसलिए अब पता नहीं कितना सुंदर है। लेकिन ये अचानक झारखंड प्रेम कैसे उमड़ पड़ा भाई। जबाव मिला बस ऐसे ही जाना चाहता हूं..बता न कौन-कौन सी ट्रेन जाती है। तब भी मेरी समझ में कुछ ज्यादा नहीं आया लेकिन बाद में एक-दो फोन आए और वे पूछ रहे थे कि विनीतजी आप कब जा रहे हैं झारखंड या फिर आप किस ट्रेन से जा रहे हैं। वो भी सब जगह से हार गए और हमारे सीनियर्स की बतायी कहानी से डर गए तब अंत में मुझे फोन किया कि साथ लेंगे। एक- दो अंकल चिप्स में गाइड मिल जाएगा इसलिए। मेरे सीनियर ने उन्हें बताया था कि वहां लूटपाट का तरीका थोड़ा आदिम है। चोर अंगूठी छिनता नहीं बल्कि हाथ काटकर झोले में रख लेता है और फाका (एकांत) में जाकर अंगूठी निकालकर हाथ फेंक देता है। एक-दो भावुक साथी( साथी जिसे बनाने में कॉलेज का हाथ रहा कि एक ही सेशन और क्लास में एडमीशन दिया) जिसपर कुदरत थोड़ा और टाइम और कच्चा माल देता तो लेडिस होते....फोन करके कहा..क्या विनीत विश भी नहीं करोगे, तुम्हारा तो वैसे भी हो जाएगा, हमलोगों का इलाका थोड़ा अल्टर पड़ जाता है.....मुश्किल है यार लेकिन विश तो कर दो। लोग बताते हैं कि इस बाजारवाद और कनज्यूमर कल्चर के दौर में बत्तीस दांत के बनिए का कहा भी खूब फलता है। इतना सब हो जाने पर तरीके से समझ में आया कि भाई लोग झारखंड के लिए लेक्चरर बनने जा रहे हैं।
नोट- मैं भी झारखंड में रहकर हिन्दी पढा-लिखा हूं और अगर लेक्चरर होने के लिए अगर ये बड़ी शर्त है....मुझे पता नहीं और न ही सरकार की और से कोई घोषणा हुई है तो मेरे लिए तो एक सीट फिक्स थी...लेकिन मैंने फार्म ही नहीं भरा....एक तो बहुत बाद में पता चला और दूसरी बात जो कि उससे भी बड़ी वजह है वो ये कि आपको वहां हिन्दी पढ़ाने के लिए हिन्दी का अनुवाद करना पड़ेगा।..ये परेशानी मेरे कॉलेज के टीचर अक्सर झेला करते थे और हमलोग कसम खाते कि न भाई...हिन्दी पढ़ाना बड़ा टफ काम है। सो मैं फार्म भरा ही नहीं और वहां गया ही नहीं।.....और हमारे सारे भाई इस अखिल भारतीय जोर-आजमाइश रैली में झारखंड कूच कर गए।

टेलीफोनिक टॉक उर्फ हौसला बढ़ाओ साथी
फोन पर भाई लोग नाम बता रहे हैं मुझसे जानना चाह रहे हैं कि ये सारे महाशय किस-किस क्षेत्र के एक्सपर्ट हैं माने कविता, कहानी, उपन्यास, साहित्यिक चुटकुला, साहित्यक पॉलिटिकल स्टंटः आगे से साहित्यक नहीं लगा रहा हूं लम्बा हो जाएगा आप मन में ही जोड़ लें, मसखरई, ऋतु- रंग आदि-आदि। मैंने फोन पर ही बताया कि ये डीयू, जेएनयू वाला एक्सपर्ट वाला फंडा वहां के मामले में भी मत पेलो। वहां के लोग हिन्दी की सेवा नहीं साधना करते हैं इसलिए तमाम विधाओं पर समान अधिकार होता है, किसी भी विषय पर प्रश्न पूछने की काबिलीयत रखते हैं। और ऐसा पूछकर हमारे पूर्वज गुरुओं का अपमान मत करो।....जो भी पूछा जाए उसे श्रद्धा से समझो और सुनो ये लॉजिक-वॉजिक डीयू के अढॉक पोस्ट के लिए बचा के रखो। इसकी खपत दिल्ली में आकर होगी। बार-बार फोन करके पूछते हो तो लगता है कहीं न कहीं तुम मेरी बेइज्जती कर रहे हो....अगर परेशानी हो रही है तो तुम्हें पहले सोचना चाहिए था न कि कहां जा रहे हो। अब गए हो तो वहां की शर्तों पर इंटरव्यू दो और अब आकर ही बात करना, पैसे बचाओ....अभी रिजल्ट आने तक जेब पर थोड़ा कंट्रोल रखो।
इतनी नसीहतें देने के बावजूद एक जूनियर ने मिस कॉल दिया और कहा कि सर दिल्ली आने पर दस जूते मार लीजिएगा और बिल से दुगुने पैसे ले लीजिएगा लेकिन मेरी बात सुन लीजिए प्लीज। गुस्सा तो बहुत आया, बोला जब तुमलोग मुझे इतना जरुरी आदमी समझते हो तो पैरवी करते आना कि हमारे एक सीनियर को जन सम्पर्क विभाग में रख लीजिए....चलो बोलो।
जूनियर ने सुनाया इंटरव्यू का अनुभव यानि
कॉन्फीडेंस के चिथड़े होने की स्टोरी
एक्पर्ट- किस विषय पर काम है
जूनियर- जी फिल्म पर
एक्पर्ट- ये क्या सब पर काम कराते हैं डीयू, जेएनयू के लोग
जूनियर- मन में, बेकार लिया ये टॉपिक, नशा चढा था उत्तर-आधुनिक बनने का
हिन्दी में रहकर भी डिफरेंट दिखने का
एक्पर्ट- देवदास देखे हो
जूनियर- जी
एक्सपर्ट- किसकी रचना है इ देवदास
(एक्सपर्ट मन ही मन याद कर रहा है किसकी रचना है....)
जूनियर- जी शरतचंद्र
एक्सपर्ट- पुरानेवाले में और नएवाले देवदास फिल्म में क्या फर्क है।
जूनियर- जी प्रस्तुति और अभिनय को लेकर फर्क है
एक्सपर्ट- तुमको नहीं लगता है कि जो बात रचना में है वो बात फिल्म में नहीं है
जूनियर- मुझे लगता है ऐसा माध्यम में बदलाव के कारण हुआ है और इतनी छूट तो मिलनी चाहिए
एक्सपर्ट- फिल्म को ही शोध के लिए क्यों चुना
जूनियर- मुझे लगाता है कि भारत जैसे देश में सिनेमा सबसे ज्यादा पॉपुलर माध्यम है और इसे सामाजिक बदलाव के लिए काम में लाया जा सकता है,आगे मैं इसी दिशा में काम करना चाहता हूं।
एक्सपर्ट- ये फ्लैश-बैक क्या होता है।
जूनियर- जब इंसान बहुत तकलीफ में हो, बहुत खुश हो या फिर उसकी सामाजिक-आर्थिक हैसियत बदल जाती है और उसके पहले की स्थिति को दिखाने के लिए जिस टेकनिक का इस्तेमाल किया जाता है उसे फ्लैश- बैक कहते हैं
एक्सपर्ट- राम की शक्तिपूजा पढ़े हो..उसमें फ्लैशबैगक कहां है।
जूनियर- जी माता कहती थी मुझे राजीवनयन या फिर याद आया उपवन विदेह का
एक्सपर्ट-पूरी पंक्ति सुनाओ
जूनियर- जी पूरी पंक्ति तो याद नहीं है, बहुत पहले पढ़ी थी
एक्सपर्ट- अच्छा टीक है जाओ।
नोट- जूनियर को एक्सपर्ट का नाम नहीं पता। इससे पता चलता है कि या तो जूनियर को साहित्यिक हलकों की समझ नहीं है या फिर साहित्य की दुनिया में लद्दड है।
.....एक्सपर्ट तो फिर भी एक्सपर्ट है।
इस तरह से जितने लोग उतने तरह के उनके अनुभव। अब सारे के सारे लौट आए हैं झारखंड की वादियों से। जो कुछ रुक गए हैं उनको सर्कुलर रोड या फिर सेक्टर-2 धुर्वा में कुछ जरुरी काम है, कुछ का अपना घर पड़ता है....भांजे-भतीजियों के साथ रावण को जलाकर लौटेंगे और दो-चार बंदों को अपनी कजिन जो कि इंटरव्यू के दौरान बने हैं उन्हें तोरपा, लोहरदग्गा या गुमला छोड़ने जाना है।
सर्वसम्मति से जो सब बोले
- इंटरव्यू में तो फाड दिए गुरु वो भी सोचेगा कि बेटा किससे पाला पडा है, एक्सपर्ट का तो बार-बार होंठ सूख रहा था

- मजाक है डीयू, जेएनयू से पढ़े लड़को से सवाल-जबाव करना, ऐसा पटखनिया दिए कि चारो-कोना चित्त
-भाई हमको तो साफ बोला एक्सपर्ट कि समकालीनता को लेकर आपके जो विचार हैं उसपर कोई किताब लिखकर साहित्य पर कुछ उपकार क्यों नहीं कर देते हैं।
- भाई वहां जाकर हमको लगा कि हम भी कुछ चीज हैं, यहां तो दिल्ली में गाइड एक चैप्टर चेक करने पर इतना दौड़ाता है कि डिप्रेशन से उबरनें में हफ्ता लग जाता है।
कुल मिलाकर सैंकड़ों शेखी के किस्से और हिन्दी, झारखंड और एक्सपर्ट को लेकर सैंकडों
धारणाओं की निर्मिति।
लेकिन इन सबके बावजूद एक सामान्य धारणा रिजल्ट का इंतजार करते हुए इनकी बनी है वो ये कि
अगर सबकुछ सही रहा, टैलेंट पर जोर रहा और घूस-घास नहीं चली तो मेरा होने से कोई नहीं रोक सकता। करीब ढाई सौ लोग किसी न किसी माध्यम से ऐसा बता चुके हैं जबकि सरकार ने हिन्दी की 90 के आसपास सीटों की घोषणा की है ।....
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10 Response to 'लौटे हैं कटा के......'
  1. अजित
    http://taanabaana.blogspot.com/2007/10/blog-post_07.html?showComment=1191699300000#c180359052898572024'> 7 अक्तूबर 2007 को 1:05 am

    भाई साफगोई अच्छी लगी. बीस साल पुरानी अपनी कहानी याद आ गयी. आपने सही फैसला लिया. अपन तो शोध को अधूरा छोड़ कर पत्रकार हो गए थे. आज पछताते हैं. मास्टरी करते हुए भली सी कट रही होती ज़िन्दगानी.
    आपका ब्लॉग अच्छा लगा.

     

  2. गिरीन्द्र नाथ झा
    http://taanabaana.blogspot.com/2007/10/blog-post_07.html?showComment=1191732000000#c7643172289785803069'> 7 अक्तूबर 2007 को 10:10 am

    भैया, मान गये......आप तो सबकुछ फटाक से कह देते हैं, शायद आपकी लेखनी का कमाल हीं यही है......
    जम कर अपनी इन्हीं सब बातों को हमें भी बताते रहिए....

     

  3. गुस्ताख़
    http://taanabaana.blogspot.com/2007/10/blog-post_07.html?showComment=1191761160000#c3798638974482231430'> 7 अक्तूबर 2007 को 6:16 pm

    घूमने का मन मेरा गाहे-बगाहे ही होता है। आपके आमंत्रण पर आपका ब्लाग घूमा। गुरु मज़ा आ गया। लिखते रहिए..लगातार। अनथक। आप तो बिहार के ही मालूम होते हैं। मेरे ब्लाग का लिंक जोड़ दें अपने पर ..मैं तो अभी जोड़ दे रहा हूं। लिखने के लिए साधुवाद... पढ़े और उम्मीद है की सकारात्मक-नकारात्मक प्रतिक्रियाएं भी देते रहेंगें आप।

     

  4. विनीत उत्पल
    http://taanabaana.blogspot.com/2007/10/blog-post_07.html?showComment=1191771660000#c5319404970122549700'> 7 अक्तूबर 2007 को 9:11 pm

    safgoi se khi bat aksr log galat tarike se lete hain. aksr aap khud ko isi karan sankat se ghire pate hai. hamnam kee lekne tej chalte dekh khushee hui.

     

  5. Sanjeet Tripathi
    http://taanabaana.blogspot.com/2007/10/blog-post_07.html?showComment=1191838440000#c763692680561831331'> 8 अक्तूबर 2007 को 3:44 pm

    गज़ब लिखते हो यार!!

    बनाए रखो अपने आप को ऐसे ही!!

     

  6. Shrish
    http://taanabaana.blogspot.com/2007/10/blog-post_07.html?showComment=1191853260000#c2872605875881667356'> 8 अक्तूबर 2007 को 7:51 pm

    वाह विनीत जी क्या मजेदार लिखे हो और पोस्ट की लम्बाई देखकर तो लगता है कि आप फुरसतिया जी से प्रभावित हैं। :)

     

  7. अनूप शुक्ल
    http://taanabaana.blogspot.com/2007/10/blog-post_07.html?showComment=1191865500000#c8686338593401997156'> 8 अक्तूबर 2007 को 11:15 pm

    आनंद आया आपका ये कहानी बांचकर!

     

  8. vijay
    http://taanabaana.blogspot.com/2007/10/blog-post_07.html?showComment=1191899880000#c6547406464031393057'> 9 अक्तूबर 2007 को 8:48 am

    bahut achha likha h sir,du & jnu ke producto ko professionalism sikhhe me help ho jaygi kyoki aaj ke samay me knowledge ke saath saath setting bi honi chahiye

     


  9. eda
    http://taanabaana.blogspot.com/2007/10/blog-post_07.html?showComment=1264842926979#c102353833022775159'> 30 जनवरी 2010 को 2:45 pm

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