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हिन्दी विभाग में हंगामा

Posted On 10:22 am by विनीत कुमार |

अगर कान में मैल भर जाए तो इसे निकालने के लिए आवाज की जरुरत होती है। राजनीति में डॉक्टरी कर रहे डीयू स्टूडेंट यूनियन के लोगों का कुछ ऐसा ही कहना है। कान में मैल भर गया है हिन्दी विभाग के लोगों को और आवाज करके साफ करने का जिम्मा उठाया है डीयू के स्टूडेंट यूनियन के लोगों ने। ये अलग बात है कि डीयू स्टूडेंट यूनियन यानि डूसू अपनी साख धीरे-धीरे खोती जा रही है। आज कॉलेज या फिर हॉस्टल से जुड़ा कोई भी मसला हो, प्रशासन तो प्रशासन स्टूडेंट भी नहीं चाहते कि डूसू के लोग उसमें शामिल हों। आप हाल ही लड़कियों के साथ छेड़छाड़ वाले मामले में देख सकते हैं कि कैसे उसे इससे बिल्कुल दूर रखा गया। यानि स्टूडेंट के लिए बनी यूनियन से स्टूडेंट बचना चाहते हैं। बाबजूद इसके हर उस मामले में डूसू शामिल होना चाहता है जिसमें उसे लगता है अपन को रातोंरात चमकने की गुंजाइश है। एक तरह से कहें तो डूसू का एकमात्र काम रह गया है, मुद्दा गरम करना, उसे राजनीति रंग देना और पेशेवर नेताओं के अंदाज में मीडिया के सामने बयानबाजी करना।
इसका ताजा उदाहरण कल दिल्ली विश्वविद्यालय, हिन्दी विभाग में मची तोड़-फोड़ है।
कुछ लड़के अचानक विभाग की ऑफिस में घुसते हैं, लोगों से एकाध सवाल करते हैं और फिर चीज़ों को उठाना-पटककर फेंकना शुरु कर देते हैं। शीशे चटकतें हैं, कम्प्यूटर उलटकर नीचे आ जाता है, कुर्सियां उलट जाती हैं और फिर देखते ही देखते एक दहशत का महौल बन जाता है।....और विभाग के ऑफिस में ताला लटक जाता है और इस तरह विभाग के लोगों की कानों में जमी मैल की परत को हटाने का काम सम्पन्न होता है।
आपको याद होगा कि कुछ दिन पहले मैंने एक पोस्ट लिखी थी, पढ्रे मीडिया हुए बर्बाद। ये बात हमनें डीयू, हिन्दी विभाग से मीडिया कोर्स कर रहे स्टूडेंट को लेकर कही थी और हमने लॉजिकली बताया था कि किस तरह यहां से मीडिया की पढ़ाई करना उनके हित में नहीं है। इस बाबत लोगों की प्रतिक्रिया भी आयी थी, हमने पोल भी कराया था। लेकिन इसी बात को डीयू स्टूडेंट यूनियन के लोगों ने दूसरे तरीके से उठाया.....सीधे विभाग में आए और भारी तोड़-फोड़ मचाया। उनका दावा है कि सारे मीडिया पढ़ने वाले छात्र उनके साथ हैं। होंगे क्यों नहीं भइया कल को उन्हें भी बार-बालाओं को गुडगांव से लाकर स्टूडियो में स्टोरी शूट करनी है और इस्क्सूसिव बोलकर चलानी है।..अभ्यास यहीं हो जाए तो क्या बुरा है।
हिन्दी विभाग और पत्रकारिता कोर्स को लेकर मुद्दा गरमाया हुआ है और इसे लेकर कैंपस के भीतर अच्छी खासी राजनीति भी हो सकती है और हो भी रही है। मीडिया के भीतर भी इस बात को लेकर भारी समर्थन मिलने की गुंजाइश हो सकती है कि सही बात है भइया कि अगर चैनल को स्टिंग ऑपरेशन करानेवाला बंदा चाहिए तो फिर उसे मुक्तिबोध क्यों पढ़ा रहे हो। छात्रों की भी अपनी बात हो सकती है कि हमें मीडिया के नाम पर जिस तरह की सुविधा मिलनी चाहिए, वो सुविधा नहीं मिल रही है। लेकिन दो सबसे बड़े सवाल यहां तब भी रह जाते हैं कि विरोध का जो रवैया अपनाया जा रहा है, वाकई वो मीडिया पढ़ रहे स्टूडेंट के माकूल है। उन्हें असुविधा और सिस्टम के खिलाफ अपनी आवाज जरुर उठानी चाहिए, अपनी बात रखने का उन्हें पूरा हक है लेकिन अभिव्यक्ति का ये तरीका ......जरा सोचें।
दूसरी बात जैसा कि डीयू के स्टूडेंट पॉलिटिक्स के बारे में अक्सर कहा जाता है कि यहां पॉलिटिक्स का सीधा संबंध राजनीति में करियर बनाने से है। तो हर चार-पांच दिन में यूनिवर्सिटी के भीतर तोड़-फोड़ मचाना उनके करियर का हिस्सा है और आनेवाले समय में राजनीतिक पार्टियां क्या इसी विहॉफ पर टिकट देगी कि उसने कितनी तोड़-फोड़ मचायी है। डूसू के लोगों के उपर से अगर यूनियन का बिल्ला हटा दें तो पहचान के नाम पर जो बचता है वो एक दबंग, गुंडा और सरफिरे से ज्यादा कुछ भी नहीं है।
और देश भर के हिन्दी विभाग को नए सिरे से सोचना होगा कि कोर्स शुरु करने के पहले वे साफ कर दें कि पत्रकारिता के नाम पर वे कौन और किस तरह की पीढ़ी तैयार करना चाहते हैं, पत्रकारिता को क्या वे साहित्य का ही एक हिस्सा मानते हैं और उसे उसी रुप में पढ़ाना चाहते हैं या फिर चैनलों और मीडिया हाउ में जाने के लिए बेताब लोंगों के हिसाब से मीडिया को पढाना चाहते हैं। मीडिया की जो शक्ल हमारे सामने है उसमें सिर्फ साहित्य सा रचनात्मकता नहीं है, मैनेजमेंट भी है, संचार भी है, आर्ट भी है और प्रोफेशनलिज्म भी। अगर पढ़ानेवालों का ध्यान इन ठोस और जरुरी बातों की तरफ जाए तो टकराव की स्थिति जरुर थोड़ी कम होगी।
अच्छा, पत्रकारिता कर रहे लोगों के लिए अभ्यास करने का ये कितना अच्छा मौका हो सकता है कि वे सिस्टम में रहकर सिस्टम को कैसे दुरुस्त कर सकते हैं, उनके खिलाफ बड़े ही सधे और धारदार तरीके से लिख सकते हैं। जो पढ़ाई वे पढ़ रहे हैं उसका इससे बेहतर इस्तेमाल और क्या हो सकता है कि वे इन सार मुद्दों पर सम्पादक को लगातार लिखें, बजाए इससे कि फर्जी स्टिंग और न्यूज बनाने की कलाबाजी के चक्कर में अपने को बर्बाद करें।
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3 Response to 'हिन्दी विभाग में हंगामा'
  1. आलोक
    http://taanabaana.blogspot.com/2007/10/blog-post_25.html?showComment=1193290020000#c6642622959080441721'> 25 अक्तूबर 2007 को 10:57 am

    विनीत जी, मुक्तिबोध क्या है, इस पर भी ज़रा प्रकाश डालें तो कृपा होगी।
    वैसे डूसू के बारे में तो इतना ही कहूँगा कि वह एकदम अनावश्यक ही है। जिन जिन कैंपसों में विद्यार्थी - या उनके माँ बाप अपनी जेब से खर्चा उठाते हैं वहाँ ऐसी अराजकता नहीं होती है। तो इस डूसू का तो सीधा साधा इलाज है कि फ़ीस बढ़ा दो, और विद्यार्थियों को खुद खर्चा करने दो या बैंकों से कर्ज़ लेने दो। सही हो जाएगा।
    आलोक

     

  2. राकेश
    http://taanabaana.blogspot.com/2007/10/blog-post_25.html?showComment=1193290260000#c3255506411086791765'> 25 अक्तूबर 2007 को 11:01 am

    बढिया लिखा. थोड़ा और होना चाहिए था. विनीत ये पूरा का पूरा मामला डूसू की लम्पटगर्दी का. मुझे लगता है ऐसी गतिविधियों की वजह से ही छात्र राजनीति बदनाम होती है और फिर लिंगदोह जैसे लोग छात्र राजनीति पर अंकुश लगाने के नाम पर सिरफिरी सिफ़ारिशें कर डालते हैं.

    बिल्कुल विरोध होना चाहिए डूसू के इस कुकृत्य का. साथ ही गुरुजियों को समझना चाहिए कि वो अब भी भारतेंदू और द्विवेदी युगीन पत्रकारिता चलाएंगे या भाई अरिंदम चौधरी छाप? या समय की नज़ाकत को समझते हुए वृहत्तर सामाजिक सरोकारों वाली भी कोई पत्रकारिता हो सकती है?

     

  3. note pad
    http://taanabaana.blogspot.com/2007/10/blog-post_25.html?showComment=1193320020000#c7180588240937700914'> 25 अक्तूबर 2007 को 7:17 pm

    अच्छा है, आपके माध्यम से कैम्पस की खबरे‍ वक्त पर पता चल जा रही है ।
    सुजाता

     

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