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मेरी मां को यकीन है कि लोहे की कडाही में सब्जी,पोहा,उपमा बनाकर खाने से शरीर में कभी आयरन की कमी नहीं होती है. मां जब तक बिहारशरीफ रही, लोहे की कडाही में ही सब्जी बनाया करती. पड़ोस की भाभीज/आंटीज सलाह देती कि हिन्डोलियम या नॉन स्टिक में बनाइए तो कहती- इ सब माथा मूडे के मशीन है. मैं रसोई के एक कोने में मां को लोहे की कडाही में सब्जी बनाते देखता और पापा की बात याद करके मुस्कराता. पापा इस कडाही में बनी सब्जी देखकर हत्थे से उखड़ जाते. लोहे की कडाही में बनी सब्जी का रंग थोड़ा काला होता है, पापा इसे बिल्ली का गू बोलकर नहीं खाते और उखड़ने की वजह दूसरी भी होती. मां मुझे कहती- तुम अंडा-पोटा का क्या है, कोढ़ा-कपार खाकर( पापा मुझे अंडे खिलाया करते,मां इसे कोढा-कपार कहती) आयरन जुटा लेगा. इ मर्दाना को दू बित्ता( बहुत छोटा) बुतरु के कोई और अकिल-बुद्धि देने का नहीं होता है तो एगो कोढ़ा-कपार( वही अंडे और छिलकर लहसुन) खिलाकर बजरंगबली बनाने का होता है. एगो संस्कार आदमी का देने का नहीं होता है. पापा चौबीस घंटे में मुझे सिर्फ तब ही शायद प्यार करते जब उन्हें खुद अंडे खाना होता. अंडे खाने के बाद की पीड़ा बहुत असह्य होती. रगड़-रगड़कर हाथ-पैर धोने होते. सौंफ खाना होता. मां के पास मुंह करके जोर से सांसे लेता कि देखो- आ रही है अंडे की खुशबू नहीं न. मां कहती- नरक के चीज के लिए खुशबू बोलता है. बौडाहा( पागल).


फिर मां कहती- तुमलोग ज्यादा आय़रन लेकर करेगा भी क्या. इ हम जन्नी जात( औरतें) के लिए झंझट है न, महीने-महीने. तब मैं नहीं समझता लेकिन मां का इशारा पीरियड्स की तरफ होता. जेतना देह में बनता नहीं है, ओतना निकल जाता है. मां एक बार बुरी तरह बीमार पड़ी. कई डॉक्टरों ने कहा- अब शायद ही बचेगी. ब्लीडिंग रुकता ही नहीं था. तब दीदी मुझे बताने लगी थी, पीरियड्स क्या होता है,कैसे होता है. मां को क्या हो रहा है.. मां को इस लोहे की कडाही पर इतना यकीन था कि गरम करके तब पानी भी पीती तो कहती- लोहे की ही कडाही में दो. उपर से उनके बचपन का कोई मुंहबोला भाई हाल ही किताबें पढ़कर होम्योपैथ हुए थे औऱ देखने आए थे तो कहा- इ काम बहुत अच्छा कर रही हो दीदी, लोहा के कडाही का ही पानी पीओ, शरीर में आयरन बना रहेगा. उस मातम के बीच भी मुझे थोड़ी ंहंसी आ गयी थी. लोहे की कडाही का प्रताप लोग ऐसे बता रहे थे जैसे अभी गोविंदा और जैकी श्राफ जैसे लोग संधि सुधा,लाल किताब औऱ श्रीयत्रम की महिमा देर रात टीवी पर बांचते हैं. लेकिन थोड़ी देर बाद मुझे लगता- ऐसा नहीं हो सकता है कि डॉक्टर सुई से मेरे भीतर के सारे आयरन निकालकर मां को दे दे. मां फिर लगातार इलाज से ठीक हो गई और ठीक हुई तो लोहे की कडाही की यकीन के साथ.

मैं फिर आदत के अनुसार लोहे की कडाही को लेकर मजे लेने लगा. सब्जी खाने के बाद मैं हाथ-पैर खींचते हुए कहता- बहुत भीतर से ताकत-ताकत जैसा लग रहा है मां, लोहे की कडाही में सब्जी बनायी हो क्या ? मां कहती- तुम पिल्लू भर का बुतरु( बच्चा) हमारा खिल्ली उड़ाता है. अभी निकोट जाते न( मर जाते) तो देखते-देखते तुम टूअर( बिना मां का) हो जाते. उठके कोई एक गिलास पानी देनेवाला नहीं मिलती..औ इ जो मर्दाना तुमको अंडा खिलेक बजरंगबली बनाने के चक्कर में रहते हैं न, किसी और को ले आते औ दिनभऱ वही साडी-गमछा-धोती के धंधा में फंसे रहते. तुमको ठठ्ठा समझ में आता है. फिर अचानक से रो देती- भले हम निकोट जाते. इ तुम पिल्लुअन सबके खिल्ली उड़ावे का हो तो नहीं होता. तुम अभी आठवे-नोमा( आठवीं-नौंवी) मे ही हो तो ये हाल है. हमरा भाय( मेरे गोपाल मामू) एतना डॉक्टरी का पढ़ाय पढ़ता है तब भी नैहरा(मायका) जाने पर दीदी-दीदी करता रहता है. कपिल के चार गो बाल-बच्चा है. मजाल है कुछ उन्नीस-बीस बोले. तुम दुन्हु बाप-बेटा( मेरे बाकी भइया का जिक्र नहीं करती क्योंकि वो सब दूकान में होते और मां से सिर्फ रात में बात होती) मिलकर मेरा मखौल उड़ाते हो न..किसी दिन चिडारी पर चल जाएंगे( नरक, मां अपने लिए कभी भी स्वर्ग में जाने का प्रयोग नहीं करती. कहती,हम इस दुनिया में ऐसा कोई काम नहीं किए हैं कि चित्रगुप्तजी हमको स्वर्ग में रखेंगे) न त दुन्हू बाप-बेटा बिलट( बर्बाद हो जाना) जाओगे. मैं एकदम सीरियस हो जाता. कान पकड़ता और कहता- अब कभी नहीं हंसेंगे मां. तुम लोहे की ही कडाही में ही सब्जी बनाओ. टेस्टी तो होता ही है, ये तो पापा को बिल्ली का गू(पोट्टी) लगता है. बस एक बात बताओ, तुमको कौन बताया कि लोहे की कडाही में खाना बनाने से शरीर में आयरन की कमी हो जाती है ? मां का पारा सातवें आसमान पर होता, फिर अचानक से नार्मल होकर कहती- कपिल यानी मेरे सबसे बड़े मामा.

आज से कोई 15 साल पहले मां का ससुराल बिहारशरीफ हमेशा के लिए छूट गया. बहुत ही खराब हालत में छोड़ना पड़ा था बाप-दादा का ये घर. घर छोड़कर जब वो टाटानगर आयी तो अक्सर कहती थी- दद्दा(मेरे नानाजी) जब उ कउआकोल( बहुत ही शांत इलाका था) में हमको पटक दिए तो लगा कि हियां ज्यादा दिन नहीं बचेंगे..लेकिन धीरे-धीरे रहते-रहते मन लग गया. फिर एक-एक करके फूआ, दादी, चाची सबको याद करने लग जाती और रोने लगती. हम केतना बदनसीब औरत हैं- न नैहरा अपना रहा औऱ न ससुराल ही. दुन्हु एक दिन छूट गया. इ अंजान शहर में मन लगता है थोड़े. एगो बंगाली त दूसरा मद्रासी. नाम के है टाटा, कोय न बोले वाला, न चाले वाला.

जमशेदपुर आने पर मां का लोहे की कड़ाही में खाना बनाना छूट गया. मैं जब रांची से गया तो पूछा- मां तुम लोहे की कडाही नहीं लाई हो, कभी बनाती नहीं उसमें ? मां कहती- तुम हमरा असली गोतिया हो, गड़ल-गड़ल मुर्दा खोदते रहते हो. यहां क्या जरुरत है बनावे के. बाथरुम का बाल्टी बीस दिन में कोयला हो जाता है. सब बासन-बर्तन लगता है ओही रतन टाटा के खदान से निकला है. जमशेदपुर के जिस इलाके में हमारा घर है, वहां पानी का रंग बिल्कुल लाल आता और सारी बाल्टी, बर्तन जंग लगे जैसे लाल हो जाते. अब खुद की बोरबेल होने से फिर भी ठीक है. मां कहती- यहां तो ऐसे ही एतना आय़रन है, उपर से लोहा के कडाही में बनावेंगे, पागल हैं क्या ? मां का लोहे की कडाही में खाना बनाना हमेशा के लिए छूट गया. बिहारशरीफ को अक्सर याद करके रोती है लेकिन शरीर में आयरन की बात आते ही कहती है- इ शहर जन्नी जात के लिए बहुत अच्छा है. लेकिन इस लोहे की कड़ाही के साथ मां की याद अक्सर आती है. 

मयूर विहार फेज-1 के जिस इलाके में मैं रहता था, सोसायटी के बाहर थोड़ी दूर जाने पर संजय झील है, उसके ठीक सामने खासकर जाड़े के दिनों में खूब लोहे की कहाड़ी बिकती. लोग इसमें लकड़ी जलाते. दो साल पहले मैंने भी एक कडाही खरीद ली. सोसायटी में प्रेस करनेवाले भइया से मैं लकड़ी के कोयले खरीदता और जलाकर लिट्टी सेंकने लगता. हुलसकर मां को फोन करता- मां, आज लिट्टी बनाएं लोहे की कहाड़ी में सेंककर. वो पूछती औऱ जलाए क्या, दिल्ली में लकड़ी मिलता है ? मैं बताता- लकड़ी के कोयले पर. वो मना करती- उस पर लिट्टी मत सेंको बेटा, मुर्दा का जलाया हुआ रहता है. तुम ही सोचो न हियां टाटा में लकड़ी नहीं मिलता है तो दिल्ली में कैसे कोयला मिल जाएगा. मत खाया करो.

मयूर विहार छूट गया लेकिन लोहे की वो कडाही अपने साथ रही. आज मन किया कि क्यों न इसे साफ करके इसी में बनाया जाए. वैसे भी इस कड़कड़ाती ठंड में बड़ी कड़ाही धोने में जान चली जाती है. खूब घिसकर धोया फिर पोहा बनाया. बनाते समय फिर मां का ध्यान आया. अभी फोन करुंगा और वो पक्का कहेगी- बार-बार मत बनाना, औरत जात को आयरन का जरुरत ज्यादा होता है, तुम एतना आयरन मत लो. कभी-कभार बनाना, हमेशा नहीं. नहीं होता है तो बहू बता रही थी कि नॉन स्टिक कडाही धोने में मेहनत कम पड़ता है, वही ले लो.
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3 Response to 'औरत जात को लोहे की कडाही का पका खाना चाहिए'
  1. अनूप शुक्ल
    http://taanabaana.blogspot.com/2013/01/blog-post_8.html?showComment=1357626370759#c6227546425877965581'> 8 जनवरी 2013 को 11:56 am

    नरक के चीज के लिए खुशबू बोलता है. बौडाहा( पागल).

    पढ़कर बहुत अच्छा लगा। तुम्हारे संस्मरणात्मक लेख अद्भुत लेख होते हैं।

     

  2. Devendar Ojha
    http://taanabaana.blogspot.com/2013/01/blog-post_8.html?showComment=1357637251083#c7240215187183727814'> 8 जनवरी 2013 को 2:57 pm

    bhaut khoob...
    aisa laga jaise mai apni maa se baat kar raha hun...
    maja aa gaya bhai ji...

    jabardast likhe bara..

     

  3. प्रवीण पाण्डेय
    http://taanabaana.blogspot.com/2013/01/blog-post_8.html?showComment=1357834350019#c1430774806624856942'> 10 जनवरी 2013 को 9:42 pm

    रोचक और ज्ञानपरक आलेख..

     

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