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10 जनवरी 2007. दिल्ली में पंकज भइया से मेरी पहली मुलाकात थी. उससे पहले फोन पर संकोच में(जाहिर है संकोच उनकी तरफ से ही) थोड़ी सी बातचीत. मेरी मां के बारे में जगत विख्यात था कि वो मायका सिर्फ अपने बड़े भाई यानी पंकज भइया के पापा से मिलने जाती है. मामियां मजे लेतीं. लेकिन पंकज भइया को मुझसे मिलने में संकोच बस इसलिए कि मेरे बारे में कुछ अतिसंवेदनशील रिश्तेदारों ने फैला रखा था कि-


मैं बहुत घमंडी हूं, बहुत विजी रहता हूं,किसी को ज्यादा पत्ते नहीं देता, शादी,नौकरी,सैलरी की बात करने पर साधु-संतों की तरह वैरागी होकर बातें करने लगता हूं. पंकज भइया इसस पहले कोई 10 साल में मिल रहे थे. मेरा नानीघर जाना होता नहीं और जाता भी तो वो बंगाल में मेडिकल की पढ़ाई कर रहे थे तो मुलाकात नहीं होती.  मेडिकल की पढ़ाई पूरी करने के बाद जब उन्होंने दिल्ली का परमानंद हास्पीटल जिसके बारे में रविकांत सर की सलाह रही है कि विनीत तुम हॉस्टल छोड़कर एक कमरा यहीं बुक करा लो, ज्यादा जरुरत यहां के कमरे की है,ज्वायन किया और मेरी खोज-खबर लेने की तलब हुई. फोन पर वो कुछ और बातें कहते कि मैंने कहा- भइया हमलोग इतनी कम दूरी पर हैं तो क्यों आप फोन पर पैसे खर्च कर रहे हैं, बताइए न कहां मिलना है ? इस तरह मिलने के पीछे एक लोभ ये भी था कि अपने भाई हैं,घर बुलाते हैं तो डिनर कराए बिना जाने नहीं देंगे और एक दिन फिर हॉस्टल के खाने से मुक्ति मिलेगी. वो तैयार हो गए और कहा- एड्रेस दो,आज मेरी छुट्टी है- मैं तुम्हें लेने आता हूं.

आधे घंटे बाद वो ग्वायर हॉल आए, सुकचाते हुए जब माचिस मांगी तो कहा- आप टेंशन न लें भइया, मेरी सर्किल में सब रस रंजक संप्रदाय के लोग हैं. मैं नहीं कुछ पीता इसलिए नहीं कि बहुत संस्कारी हूं- शराब का स्वाद बहुत कड़वा और स्मेल बेकार लगती है, सिगरेट पचाने की औकात नहीं है. मेरी मां मेरे स्वास्थ्य को देखकर मुझे लड़कोरी( जिस स्त्री का दूधमुंहा बच्चा हो) कहती है. उन्होंने जब सिगरेट सुलगाए तो मैंने भी ग्वायर हॉल कैंटीन के नीचे बाल्टी टांग दी और ब्रेड-ऑमलेट मंगवाकर अपने संस्कारी होने का परिचय दिया. दस साल बाद हम एक ही परिवार के दो भाई आपस में मिल रहे थे और एक सिगरेट पीकर और दूसरा ऑमलेट खाकर इस बात का परिचय दे रहे थे कि हम शेखपुरा,बिहारशरीफ के उन चिरकुटों में से नहीं है जो ये सब देखकर मेरी और उनकी मां से कहेगा- आपका लड़का एकदम खत्तम हो गया चाची. हमने अपने-अपने तरीके से जता दिया कि हम शेखपुरा-बिहारशरीफ सिन्ड्रोम से बाहर निकल चुक हैं. खैर

करीब एक घंटे की बातचीत में हमदोनों एक-दूसरे के प्रति सहज हो गए कि जिंदगी में कोई है कि नहीं टाइप के सवाल तक आ गए..फिर मिडिल क्लास मेंटलिटी,रिलेशनशिप,घर-परिवार,अपने संघर्ष,करिअर सब पर बात होने लगी. हॉस्टल पार्किंग से बाइक निकालते हुए भइया ने मेरे व्यक्तित्व को लेकर सर्टिफिकेट जारी कर दिया था- विनीत लेकिन एक बात कहूं- जिस तरह से तुम्हारे बारे में मुझे कुछ रिश्तेदारों ने बताया,तुम उसके ठीक उलट हो. तुम तो मुझसे ऐसे मिले जैसे एकदम खाली हो,कोई काम न हो और पटना में जैसे लोग एसएससी,टीजीटी की तैयारी करते हैं, उसी तरह से दीन होकर. मुझे पता है कि जो डीयू हॉस्टलर है उसकी क्या ठसक होती है ? अब अपनी तारीफ में कितना टाइप करुं, कुल मिलाक उन्हें मेरे बारे में बहुत अच्छी राय कायम की और मुझे मिलनसार शख्स समझा. मैंने मुस्कराते हुए बस इतना कहा- आपने मुझे ये नहीं पूछा न भइया कि तुम पीएचडी कर रहे हो तो कितना पैसा मिलता है, तुम्हारी नौकरी कब तक लगेगी, शादी अपनी जात की लड़की से करोगे या कोई पटाए हुए हो ? मन से पढ़ो- मां-बाप बहुत आसरा लगाकर भेजे हैं तुमको. अगर ये सारी बातें करते तो मैं तुरंत विजी हो जाता, दो घंटे बाद जयपुर चला जाता. आपने मुझसे वैसे ही बात की जैसे अक्सर मेरी उम्र से बड़े लेकिन मेरे दोस्त बातें करते हैं. आप हमसे भाई होकर नहीं पेश आए न. तो इतनी बातचीत के बाद राजी-खुशी तय हुआ कि आज रात तुम मेरे यहां ही रुकना. गप्पें मारेंगे.

मैं पंकज भइया के पास गया. तब वो इंदिरा विहार में रहते थे. वहां पहुंचकर अचानक से कहा- तुम्हें पता है आज मेरा जन्मदिन है. मैं उछल पड़ा- वाउ,सच में. तो फिर पहले क्यों नहीं बताया ? आपको क्या लगा,पहले बताते तो मैं आपके लिए लुई फिलिप की शोरुम के चक्कर लगाने लगता ? मैं इस तरह की फार्मलिटी में नहीं फंसता. बात करते-करते शाम हो गई. वैसे भी गप्प करते हुए जब आप शेखपुरा( मेरा नानीघर और पंकज भइया का घर) और बिहारशरीफ के पुल से गुजरेंगे तो समय इनो बनकर कहां-कब पच जाता है पता ही नहीं चलता. होते-होते बात जब डिनर तक आयी तो भइया थोड़े असहज हो गए. मैंने पूछा- क्या हुआ भइया, आप परेशान क्यों हैं ? उन्होंने कहा- कुछ नहीं, मेरी एक दोस्त है. उसे..मेरा मतलब है..घंटा(अविनाश के प्रभाव में बोलना सीखा था),आपका मतलब कुछ नहीं है, उनको भी बुलाइए कि मेरा भाई आया है और तुम भी आओ,साथ डिनर करेंगे. पंकज भइया- इतनी बातचीत से क्या मैं आपको इतना बड़ा बत्तख लगता हूं कि इतनी बात समझ न आए कि दिल्ली जैसे शहर में एक बैचलर डॉक्टर की एक दोस्त भी नहीं हो सकती ? अरे नहीं,नहीं.ऐसा नहीं है. तुम तो जानते ही हो न..अपनी तरफ के लोग कैसी कहानियां बनाते हैं..

तो वो दोस्त क्या पूर्वासा थी जिनसे दो-तीन मुलाकातों में ही मैंने आर के पुरम से भारतीय भाषा आयोग से हिन्दी बांग्ला अनुवाद की पुस्तक मंगवाई थी. जिसे कि मेरे बहुत ही प्यारे साथ पुनीत फुष्कर ने उपहार के तौर पर भेंट की थी. मैं समझ गया था पंकज भइया की इस दोस्त से आगे भी गहरी छनेगी और छनने के लिए बांग्ला जानना जरुरी है. अब रिश्ते में वो मेरी भाभी लगती है लेकिन मजाल है कि कोई मुझसे भाभी कहलवा दे. मेरी मां कहती है- शादी-ब्याह के पहले तक पूर्वासा बोलता था,ठीक था लेकिन अब चिक्कन(बढ़िया) थोड़े ही लगता है..तो अधकचरी टाइप की बांग्ला जो सीख सकता था और मेरी बड़ी भाभी जितना मुझे बता पायी,सीखी और बोलना शुरु किया. थोड़े समय बाद मैं समझ गया कि वो बहुत अच्छी लिस्नर हैं और मैं किसी भी भाषा में बोलूंगा तो ध्यान से सुनेगी..तो फिर उनदोनों की शादी में,जब बारात जाना होगा उसके पहले मैं कोलकाता पहुंचकर झन्नाटेदार बांग्ला बोलूंगा के वायदे के साथ मैं हिन्दी-बांग्ला अनुवाद की किताब आलमारी में सहेजकर रख दी. बहरहाल

डिनर तक आते-आते स्पष्ट हो चुका था कि पंकज भइया पनीर रसिक इंसान हैं और उन्हें पनीर की सब्जी बेइंतहां पसंद है कि दो सब्जी आर्डर किया तो एक शाही पनीर औऱ दूसरा मटर पनीर. ऐसे में मेरी स्थिति बहुत ही दयनीय हो गई. मैं हॉस्टल से इसलिए भागकर दूसरों के यहां खाने की ताक में रहता कि पनीर की सब्जी खानी न पड़े और यहां भी एक नहीं दो-दो पनीर. दरअसल हॉस्टल में चार दिन नॉनवेज बनते और हम जैसे साग-पात खानेवालों को मुआवजे की शक्ल में चार दिन पनीर की सब्जी मिलती. हम लफंगों ने(जुबान से) इन चारों दिनों की पनीर की सब्जी के अलग-अलग नाम रखे थे जो जाहिर है सुनने में जितने अश्लील लगते,अपनी अर्थ-व्यंजना में उतने ही प्रभावशाली. लगा, आज हमारे साथ धोखा हुआ है. आपस में खुल जाने का भ्रम इस संस्कार में फंस गया- बड़े भाई है, इतने जोश से दो पनीर की सब्जी मंगा रहे हैं, कैसे मना कर दूं और फिर उनका जन्मदिन भी है. क्या पता पूर्वासा को भी पनीर उतना ही पसंद हो. एकमुश्त दो का दिल दुखाना सही नहीं होगा. एक और अलग से कुछ मंगाता हूं तो उन्हें लगेगा मेरी पसंद ठीक नहीं है. खैर, खाना आया बाकायदा दो पनीर सब्जी के साथ. वैसे भी डीयू के हॉस्टल में जिसने वक्त बिताए हैं उनमें शाकाहारी खानेवालों पर शोध किए जाएं तो ज्यादातर लोग मेरी सिन्ड्रोम के शिकार मिलेंगे जिनका सारा उत्साह प्लेज में पनीर की सब्जी देखते ही मर जाता है. दिल्ली में पनीर को लेकर कुछ इस तरह का एकीकरण है कि जैसे एक वक्त में सारे मस्जिद से एक ही तरह की नमाज की आवाज आती हो.

इस मधुर मिलन के बीच पनीर के टुकड़े बार-बार अनवॉन्टेड कॉल की तरह रोड़े अटकाने में लगा था बावजूद इसके मेरे और पंकज भइया के बीच रिश्ते की डोर उसकी ग्रेवी से मजबूत हो रही थी. ग्रेवी मुझे भी अच्छी लग रही थी और उन्हें तो लगनी ही थी. अब तो सैंकड़ों बार उनके साथ पनीर की सब्जी खाना हुआ. उन्हें ये बात स्पष्ट रुप से पता है कि मुझे पनीर की सब्जी से हद दर्जे तक नफरत है और उन्हें इतनी मोहब्बत कि गलती से कहीं टाइप न कर दें- इन रिलेशनशिप विद पनीर. ;)

 आज से उस पांच साल पहले की मुलाकात को याद करते हुए मैं पंकज भइया को एसएमएस करता हूं- n u know bhaiya- we met first time in delhi n enjoyed sahi paneer, ll do the same as usual..:). उम्मीद करता हूं कि इन विरोधी बेइतहां पनीर प्रेम और नफरत के बीच आज भी ग्रेवी से पंकज भइया और हमारे बीच रिश्ते की डोर मजबूत होगी.
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5 Response to 'जन्मदिन के बहानेः पनीर ग्रेवी की डोर से बंधे हैं हम'
  1. Rakesh Srivastava
    http://taanabaana.blogspot.com/2013/01/blog-post_10.html?showComment=1357800956177#c5166440078720829094'> 10 जनवरी 2013 को 12:25 pm

    वाह...मजा आ गया...

     

  2. PD
    http://taanabaana.blogspot.com/2013/01/blog-post_10.html?showComment=1357810288331#c4568940464168892942'> 10 जनवरी 2013 को 3:01 pm

    ऊ सब छोडो, हमको तो ये बताओ कि अपने जात में शादी करोगे या ढूंढ रखे हो कोई? :P

     

  3. विनीत कुमार
    http://taanabaana.blogspot.com/2013/01/blog-post_10.html?showComment=1357814684334#c1790483637085951647'> 10 जनवरी 2013 को 4:14 pm

    PD..:)

     

  4. pankaj kumar
    http://taanabaana.blogspot.com/2013/01/blog-post_10.html?showComment=1357818733743#c6759737202174341704'> 10 जनवरी 2013 को 5:22 pm

    wah maza aa gaya..mujhe lag raha tha ki mai fir se gwayr hall ki balcony (backside)me baitha hu.sab kuchh aisa aisa mano kal hi bita ho.purbasha cake kal hi lekar aayi thi ki raat me cake katenge.par maine bola ki kal vineet aayega tab katuga.cake abhi bhi uska intezaar me hai.waise bhi tumhe pata hai ki humdono jab bhi kuchh kharidte hain to 3 piece kharidte hain.(kuchh ek chiz ko chhorkar ::))))..ab aa bhi jao mai hospital se aa gaya hu.aur haan machis mat lana.

     

  5. अनूप शुक्ल
    http://taanabaana.blogspot.com/2013/01/blog-post_10.html?showComment=1357835066723#c8514509687427020936'> 10 जनवरी 2013 को 9:54 pm

    बहुत अच्छा संस्मरण। पंकज को जन्मदिन मुबारक। यह अच्छी बात हुई कि जिस चीज (माचिस) किस्सा शुरु हुआ था उसकी जरूरत आखिर तक आते-आते खतम हो गयी।

     

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