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एक बैचलर का शिक्षक होना

Posted On 4:32 pm by विनीत कुमार |

तीस साल के एक बैचलर का शिक्षक होना
उसके भीतर एक मां का जन्म होना है
जिसे सबसे ज्यादा ममता होती है
क्लास के पढ़ने में कमजोर और शैतान बच्चे पर
उसे डर होता है कि वो फेल हो जाएगा तो
पता नहीं क्या कर लेगा
उसकी बदमाशियां इसी तरह बढ़ती रही तो
क्या पता कल को टीवी स्क्रीन पर
उसके नाम के नीचे लिखा होगा-
तलाश है दिल्ली पुलिस को
अपनी तमाम दुश्चिंताओं से वो उसे
सहेजने की कोशिश करता है.

उसे आशंका होती है क्लास के सबसे होशियार बच्चे को लेकर
कहीं जमाने की तारीफ उसे लापरवाह न बना दे
वो उन्हीं चमचों,चाटुकारों की शक्ल में न बदल जाए
जैसा न बनने की नसीहत वो देता आया है.
लेकिन वो मां नहीं है और आस्तिक भी नहीं
कि ललाट के कोने पर लगा दे एक काला टीका
ताकि बच जाए जमाने की बुरी नजर से
सपाट सीने पर आंचल नहीं होते कि
ढंककर आश्वस्त कर दे उसे कुछ नहीं होगा.

एक तीस साल के बैचलर का शिक्षक होना
एक किसान बनकर खेती-बाड़ी करना है
जिसे खेत की एक-एक पौध भविष्य निधी लगते हैं
किसी के जल्द बड़े होने पर उसे छांट देता है
और छोटे रह जाने पर जड़ के नीचे लगातार चलाता है खुरपी
जमाने की नजर में उसका काटना और जड़ें खोदना क्रूर है
लेकिन इसके पीछे छिपी ममता को समझ पाता है वो छात्र
जो अपनी रोज की छंटाई और खुदाई के बावजूद
समय पर उसी क्लास में हो जाता है हाजिर
आशंकाओं से भरा ये किसान अपनी फसल के लिए
चाहता है समय पर बारिश, समय पर धूप
और वो सबकुछ जो इस बरकरार रख सके
लेकिन वो शिक्षक किसान नहीं हो सकता
वो रातोंरात फसल बड़ी करने के लिए
नहीं डाल सकता रसायन, कीटनाशक
उसे डर लगता है ऐसा करने से बड़ी फसल के भीतर
का मर जाएगा स्वाद,खत्म हो जाएगी संभावनाएं.

एक तरह से एक तीस साल के बैचलर का शिक्षक होना
उस अल्हड़, सिली-विली लड़की के प्यार में
 बुरी तरह पड़ जाना है
जिसे उसने कुछ दिनों तक एक कठोर आलोचक की नजर से देखा
फिर उस बेचैनी से की गर वो कोशिश करे कि
दुनिया के सारे शास्त्र घोल-घोलकर
उसके भीतर डाल दे तो क्या वो
कुछ वक्त के बाद हो जाएगी,ठीक वैसी ही समझदार
जैसा कि वो चाहता है ?
लेकिन इस कोशिश के पहले ही वो डूब जाता है
उस गहरी आंखों में जिनमे तैरती है किताबों से भी
बहुत बड़ी समझदारी, जीवन का उल्लास और वो सब
जो इस बोरिंग कैरेक्टर को हंसने पर मजबूर कर जाती है
जिसे घंटों निहारना अपनी थोथी समझ से दूर जाना है
जिसके होने पर वो उसका आलोचक है और चले जाने पर
धरती का सबसे बड़ा मुरीद
लेकिन ये शिक्षक आशिक नहीं हो सकता
उसे पढ़ाते हुए हर दो दिन में टकराना होता है
सीमा और संभावनाओं के सवालों से
पार नहीं जा सकता.

टुकड़ा-टुकड़ा मां,किसान और आशिक होते हुए भी
वो नहीं होना चाहता ये सब
ये सब होना अतीत में लौटना चाहता है जिससे वो छूट गया है
उसे तलाश है बस जमीन एक ऐसे टुकड़े की
जहां खड़े होकर वो देख सके
अपने उन सारे छात्रों को
जो नजरों से ओझल होकर भी निगाहों में बने रहेंगे
जिनकी आंखों में ये शिक्षक नूर बनकर नहीं
किरकिरी बनकर उस हर वक्त पर चुभेंगे
जब छात्र देखने में चूक जाने लगेंगे
वो चाहता है कि वो इस चुभन को ही अपनी मौजूदगी माने
नूर की चमक बनकर उसे चुंधियाना नहीं है
किरकरी बनकर ये एहसास कराते रहना है
तीस साल के एक बैचलर का शिक्षक होना
अपनी जिद तक उसके लिए शिक्षक ही बने रहना है.
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7 Response to 'एक बैचलर का शिक्षक होना'
  1. Dipti
    http://taanabaana.blogspot.com/2013/01/blog-post_15.html?showComment=1358254205206#c8419217175362339864'> 15 जनवरी 2013 को 6:20 pm

    Umda !

     

  2. प्रवीण पाण्डेय
    http://taanabaana.blogspot.com/2013/01/blog-post_15.html?showComment=1358261523614#c6175307550822891541'> 15 जनवरी 2013 को 8:22 pm

    बहुत खूब, भावों को क्या उकेरा है..

     

  3. JP bajpai
    http://taanabaana.blogspot.com/2013/01/blog-post_15.html?showComment=1358267381100#c791674878450265816'> 15 जनवरी 2013 को 9:59 pm

    अनुपम, अव्दितीय उध्दारण है!

     

  4. Bhuwan
    http://taanabaana.blogspot.com/2013/01/blog-post_15.html?showComment=1358276185136#c1091416164854734841'> 16 जनवरी 2013 को 12:26 am

    एक तीस साला शिक्षक के भावों की सुंदर और बेहतरीन अभिव्यक्ति।

     

  5. तरुण गुप्ता
    http://taanabaana.blogspot.com/2013/01/blog-post_15.html?showComment=1358354595661#c4030145691841868894'> 16 जनवरी 2013 को 10:13 pm

    सर सच्ची, इस काव्यनुमा गद्य के भीतर छुपे अनुभव को फील कर पा रहा हूँ। अनुभव का साझापन कविता और गद्य दोनों के लिए बेहद ज़रूरी है ये आपने फिर साबित कर दिया। मेरे द्वारा पढ़ी गई आपकी ये पहली कविता है और कहूँगा कि आज के इस बेहद काव्य विरोधी समय में जहाँ तथाकथित कविताओं की बाढ़ आ चुकी है वहाँ कविता की असल खोज दरअसल कवि न कहे या माने जाने वाले व्यक्तियों के अनुभव की भी खोज है, मैं खुश हूँ कि मैं इस अनुभव से खुद को जोड़ पा रहा हूँ। बहुत बेहतरीन कविता। और लिखिये अच्छा गद्य तो लिखते ही हैं कविता में पहली(पूरी उम्मीद है ये पहली नहीं होगी) बॉल पर ही छक्का मारा है सर। बधाई

     

  6. Sheeba Aslam Fehmi
    http://taanabaana.blogspot.com/2013/01/blog-post_15.html?showComment=1358444980697#c3766116962805017423'> 17 जनवरी 2013 को 11:19 pm

    इतना मह्सूसोगे तो जियोगे कैसे? अब हमें अपनी चिंता में मत डालो।
    ...इसके बावजूद ऐसे ही बने रहना, जब 50 के हो जाना तब भी।

     

  7. हेमा दीक्षित
    http://taanabaana.blogspot.com/2013/01/blog-post_15.html?showComment=1358487422353#c1226540765692810042'> 18 जनवरी 2013 को 11:07 am

    सार्थक चिन्तनाओं की सशक्त अभिव्यक्ति ...

     

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