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मुझे नहीं पता कि "मटरु की बिजली का मन्डोला" की प्रोमोशन इस रुप में कितनी हुई है कि ये फिल्म दरअसल सोनिया और राहुल गांधी(2) या फिर शीला और संदीप दीक्षित(2) को ध्यान में रखकर बनायी गयी है लेकिन देखते हुए अपने आप ही असल राजनीति के इन किरदारों का ध्यान आता है. और आप इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि इस देश की राजनीति दरअसल उस फैमिली ड्रामेबाजी पैटर्न का विस्तृत रुप है जिसकी कायदे से नींव एकता कपूर ने आज से कोई दस साल पहले स्टार प्लस पर रख दी थी. फिल्म का बड़ा हिस्सा हमें कलर्स सीरियल की "लाडो न आना इस देश में" की अम्माजी और उनकी राजनीति की तरफ भी खींचकर ले जाता है. प्रोमो तो सबसे ज्यादा बिजली यानी अनुष्का शर्मा की अमेरिकी झंडे की बनी हॉट पैंट की बटन और ट्रांसपेरेंट टॉप से ढंकी देह के बीच जो स्पेस रह जाता है उस पर- देखो मगर प्यार से लिखा सबसे ज्यादा रिपीट हो रहे हैं. फिर कई बार लगता है कि प्रकाश झा की राजनीति की सुपर डीलक्स है. लगने को तो ये भी लगता है कि जिस बुर्जुआ बिच से लड़ने की सलाहियत फिल्म में दी जाती है, वहां शक्तिभोग आटा को किसानों का मसीहा न भी दिखाया जाता तो कुछ खास फर्क नहीं पड़ता. मन्डोला का हृदय परिवर्तन या शिफ्ट वाइज दो शख्स में जीने की अदा हिन्दी उपन्यासों के बीच एक लंबी रिवायत रही है. दूसरा कि अमीर घराने की बेटियां आमतौर पर वैसी होती नहीं जैसी कि आप-हम धारणा बना लेते हैं, वो बुद्धिजीवियों को पसंद और प्यार करनेवाली होती है, उन्हें चॉकलेटी नहीं रॉ लड़के भाते हैं और जनसरोकार की उसकी भावना को बहुत आगे तक ले जाती है. प्रोफेसर या नेता की बेटी हो तो कुछ ज्यादा ही.


यहां फिर आपको प्रकाश झा की राजनीति याद आएगी. शायद आप इस धारणा की तरफ भी बढ़े कि प्यार एक ऐसी खूबसूरत चीज है जो समतामूलक समाज स्थापित करने में गारे-सीमेंट का काम करती है. इसकी जोड़ सिर्फ दो व्यक्ति तक सीमित न होकर जब इसकी समाजीकरण होता है तो वो खुलकर स्थापित होता है. ऐसे में स्त्री-पुरुष संबंध नितांत वैयक्तिक न होकर एक आदर्श पंचायत की शक्ल ले सकते हैं.ये अलग बात है कि तमाशबीन और ताली बजानेवाले फिर भी वही सर्वहारा होगा जिसकी पूरी ट्रेनिंग बुर्जुआ के खिलाफ जाने और प्रतिरोध करने की रही है. इससे सीधे-सीधे ताल्लुक न रखनेवालों को ये अचंभा लग सकता है लेकिन इससे गुजरे लोगों के लिए शोध का विषय कि साहित्यिक रचनाओं की सिनेमा में प्रस्तुति किस तरह होती है, जैसे कि इन दिनों टेलीविजन पर ये बहस गर्म है कि सिनेमा में स्त्री छवि को किस तरह पेश किया जाता है. बहरहाल, अच्छा तो लगता ही है कि कैंपस की रैलियां, मंडी हाउस के नुक्कड नाटक खिसककर रुपहले पर्दे पर राज करने की मुद्रा में नजर आते हैं. फिल्म देखने के बाद अपनी आदत के अनुसार कुछ एफबी अपडेट्स किए हैं. साझा करना जरुरी लगा-

1.थोड़ी कचोट और अफसोस के साथ विशाल भारद्वाज आपका शुक्रिया. कुछ नहीं तो कम से कम देश में हक की लडाई और वामपंथी आंदोलनों को काफी हद तक सही संदर्भ में पेश करने के लिए. उम्मीद है कि कुछ दर्शक समझदारी के अपने शब्दकोष में आतंकवाद और वामपंथ को एक-दूसरे का पर्यायवाची देखने की खतरनाक कोशिश बंद कर देंगे. बस ये है कि बुर्जुआ बिच से लड़ने के लिए शक्तिभोग आटा को मसीहा के रुप में न भी दिखाते तो शायद काम चल जाता. प्रायोजक मात्र होने की वजह से उसे इस तरह पोट्रे करना सही नहीं लगा. आप भी जानते हैं कि शक्तिभोग की मदर कंपनी शक्ति टीवी के जरिए क्या करती आयी है ? दूसरा कि हर लाइन के बाद "बैनचो..-बैनचो.." का इस्तेमाल नहीं होता तो भी काम चल जाता. जब-जब इस गाली का इस्तेमाल हो रहा था और भारी शोर उठ रहे थे,तब-तब मैं इसे भीतर ही भीतर म्यूट करके अनुभव कर रहा था कि ये नहीं भी होते तो मर्द समाज का घिनौना रुप और भी सख्ती से पर्दे पर आप ही नजर आ रहा था. ऐसे में ये गालियां स्वाभाविक लगने के बजाय डेहली वेली सिन्ड्रोम की शिकार ज्यादा लगी. सिनेमा में स्त्री छवि को लेकर एक खास किस्म की सजगता दिखी लेकिन कई जगहों पर दुचित्तापन भी सामने आया.

बहरहाल,बात करने के कई बिन्दु हैं पर ये है कि हरियाणा के लोग आपकी इस फिल्म से खुश नजर आए. उन सिनेमाई चरित्रों औऱ परिवेश में खुद को तलाशते हुए काफी उत्साहित नजर आ रहे थे. कोई सर्वे के नतीजे तो नहीं है मेरे पास लेकिन हां बत्रा सिनेमा में देखकर तो ऐसा ही लगा बल्कि मुझे आज इस थिएटर में पूरबिया बहुत कम नजर आए. मेरे सपनों का लोकपाल,शीला दीक्षित मेरी गर्लफ्रैंड है, अनिल अंबानी- नीता अंबानी की जोड़ी है जैसे प्रयोग मीडिया स्टूडेंट की उस कॉपी की तरह लगी जो जनसंचार और सामाजिक विकास के पर्चे में उत्तर को संस्कृत के चर धातु से शुरु करके ट्विटर,फेसबुक तक ले जाता है ताकि हम जैसे मास्टरों को लगे कि बंदे को आसपास के समाज की भी ठीक-ठाक समझ है. नहीं तो इन जार्गन की खोह में जाने पर शायद और कई अर्थ उभरते.

इस छोटी सी टिप्पणी के साथ ये डिस्क्लेमर लगाना जरुरी है कि हमारे जिन मीडिया साथियों ने मानेसर,सिंगूर,नंदीग्राम पर पैकेज बनाए हैं, एक बार अर्काइव में जाकर अपनी पैकेज देखें और चाहें तो मिलान करके खुश हो सकते हैं. अपने उपर नाज कर सकते हैं. सोशल साइंस के शोधार्थी इसे बकवास करार दे सकते हैं और साहित्य के छात्रों के लिए प्रेमचंद के गोदान, कफन जैसी रचनाओं के कुछ पन्ने उखाड़कर मटरु की बिजली का मन डोला के आगे पंखे झलने की खुशफहमी हो सकती है. हमें तो ये सत्ता से हौले-हौले टकराती सी फिल्म लगी. थोड़ी कसक फिर भी रह गई- सत्ता के दलालों को,एक धक्का और दो जैसे नारे सुनने को नहीं मिले.

2. मटरु की बिजली का मन डोला में जितना शेक्सपीयर को पढ़ते हुए दिखाया गया है, उससे कहीं ज्यादा दर्शकों को रिकॉल कराने का इरादा ज्यादा है- भइया मैं ही हूं वो विशाल भारद्वाज जिसने ओथेलो को आधार बनाकर ओंकारा फिल्म बनायी थी, भूल गए ? निर्देशक अपनी रीसेल वैल्यू जेनरेट करना चाहता है. दूसरा कि हम जैसे आइटीसी के आशीर्वाद आटा उपभोग करनेवालों से एक अपील भी कि- इतना सरोकार-सरोकार चिल्लाते रहते हैं आपलोग. एक बार शक्तिभोग का आटा नहीं ट्राय कर सकते जो 300 किसान परिवार की जिंदगी बचाने के लिए प्रशासन के खिलाफ जाकर उनकी गेंहू खरीदना चाहता है ? मेरी मां देखेगी तो कहेगी- पहिले तो शक्तिभोग ही आता था, इ जब से बहू आयी है- आशीर्वाद..एतना कह रहा है विशाल तो एक बार बदलकर देखिए न. फिर से मंगवाकर देखो बहू शक्तिभोग.

3. कोलगेट,पेप्सोडेंट को भूलकर घर की महिलाएं सेन्सोडाइन की तरफ मुड जाए, इसके लिए सेन्सोडाइन ने बालिका वधू सीरियल(कलर्स) के जरिए इन्ट्री मारी. बसंत की दूसरी पत्नी गहना को दांतों में अक्सर तकलीफ रहती थी,ठंडी चीजें खाने के बाद कनकनी होती,लिहाजा एक एपीसोड में आनंदी ने सेन्सोडाइन थमा दिया. देश की लाखों महिला दर्शकों ने इस सेन्सोडाइन को देखा. उसके बाद गहना के दातों की तकलीफ कभी सामने नहीं आयी. ये अलग बात है कि गहना का चरित्र उसके बेटे के आगे बहुत गौण हो गया.

कल रात मटरु की बिजली का मन डोला जब देख रहा था तो बालिका वधू का वो एपीसोड बार-बार ध्यान में आ जा रहा था. सिनेमा,टीवी सीरियल और रियलिटी शो इन उत्पादों के कैसे शोरुम बनते हैं, इसे आप थोड़ी सी मेहनत से समझ सकते हैं. इस फिल्म के आने के बाद शक्तिभोग आटा जिस आक्रामक तरीके से ब्रांड को रिस्टैब्लिश करने में जुटा है, चिंता होती है कि अगर ये आटा नहीं होता तो विशाल भारद्वाज जैसे निर्देशक क्या करते ? आटे से खिसककर कपिला पशु आहार पर अटकते या फिर मन्डोला की बिल्डिंग बनती तो कामधेनु सरिया के भरोसे? हम जिसे संस्कृति और सिनेमा के नाम पर देख रहे हैं, वो क्या है.इस पर सोचने की जरुरत है.
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2 Response to 'मटरु की बिजली का मन्डोला: सत्ता को हौले-2 धक्का देती फिल्म'
  1. देवेन्द्र पाण्डेय
    http://taanabaana.blogspot.com/2013/01/blog-post_12.html?showComment=1357990084460#c5098973608983604515'> 12 जनवरी 2013 को 4:58 pm

    हा हा हा..मस्त समीक्षा।

     

  2. अनूप शुक्ल
    http://taanabaana.blogspot.com/2013/01/blog-post_12.html?showComment=1358137929512#c5224716396828693598'> 14 जनवरी 2013 को 10:02 am

    कल हम भी देख के आये। ऐसे ही है सब। इधर-उधर का माल जोड़कर गठबंधन सरकार!

     

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