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मजनूं का टीला की बस स्टॉप के आगे आज वो कैमरामैन शाहिद के साथ कोई पीटूसी करने नहीं आयी थी. ऐसे इलाके उसे जितने चीप लगते हैं, उतने ही अनसेफ भी और फिर अब यहां आकर वो पीटूसी भी करेगी तो किसके खिलाफ ? सामने बन रही दैत्याकार बिल्डिंगों के बिल्डर उनके चैनल का बड़ा क्लाइंट है. वो तो इसलिए आयी थी कि देर रात पड़ते रहे ओले और बारिश से सर्द होती दिल्ली ने अचानक उसे जीमेल बॉक्स की तरफ खींच लिया था. जिसे वो रोज हरी और लाल जली बत्ती के बीच मौजूद पाती, उसे कभी टोकना जरुरी नहीं समझा, इसे एक ओले शब्द को याद करके पोक कर दिया-

"क्यों वे नौटंकी" आज तो दिल्ली में जमाने बाद ओले पड़े हैं, तू पैकेज में फिर लिखेगा- दिल्ली में पड़ा ओला और हमने खाया छोला. चिरकुट बिहारी स्साले ओला नहीं ओले पड़ते हैं और छोला नहीं छोले खाते हैं..बत्तथ, कभी नहीं सुधरेगा तू. चल रहने दे, बड़ी देलहाइट बनती है.ऑफिस में वाउ-वाउ और मुकर्जीनगर पहुंचे नहीं कि ओह शिट कादो. रहने दे अपना दोहरापन मैथिल कहीं ही. ओए जो बोलना है बोल,मेरे इलाके पर मत अइओ. ओ रे दादा, इ तो अच्छी हिन्दी करने के फेर में अइयो,जइयो पर आ गयी. मकान-मालकिन की जुबान बोलने लगी. पंकज को पीटर बनाने की जब भी वो कोशिश करती, वो खुद अंजलि से ज्यादा एंजिलो जितनी दूर और फैटेंसी सी लगने लग जाती.

चैटबॉक्स पर बेतहाशा पुराने दिनों को याद सॉरी टाइप करने का सिलसिला जारी था. एक-दूसरे की टाइपिंग स्पीड की तारीफें..मैं तो खुश हूं कि तू हिन्दी में चैट करने लगी है. मैं भी खुश हूं बेटाजी कि न्यूजरुम में जो मातमी शक्ल लेकर घुसता था, जैसे कि बेला रोड़ से अभी किसी मुर्दे को फूंककर आया है, अब बात-बात पर स्माइली फेंक रहा है, स्साले तू मर्द था ही नहीं, सीढ़ी पर थोड़ा छुआ नहीं कि चेहरा कुदरुम फूल की तरह लाल और अब लौंडियाटिक चैंटिग करने लगा है. किससे सीखा बे ? किसी से नहीं और ये तुम बे-से में बात करोगी तो मैं चैटिंग बंद कर दूंगा,मैं उन लड़कों में से नहीं हो..उन लड़कों में से नहीं हूं तो किन लड़कों में से हो. सुनो अंजलि, ये मेरे उपर मटरु टाइप के डॉयलॉग मारोगी तो सच में मैं आगे चैट नहीं करुंगा. बाए.

अबे,सुन तो..बाए नहीं. इतने साल हो गए हमें मिले हुए. तुमने अपनी विद्वता झाड़ने के लिए टीवीवालों को कोसकर प्रिंट ज्वायन कर लिया, तेरी इन्क्रीमेंट पर इन्क्रीमेंट हो रही है, कितनी सारी पार्टी ड्यू है, मिल न..चल छोड़, तु पार्टी नहीं दे सकता तो मेरे से ही ले ले. मैं इन्टर्न थी अब एसोशिएट प्रोड्यूसर बन गई, आइ टेन ले लिया. आ जा, पार्टी देते.

पर..पर क्या, आ न. मैं तुझसे नाराज इसलिए हुई थी उस दिन कि मुझे लगा था तू मुझे लेकर इतना जो पजेसिव है, हर जगह और शख्स से मिलने के पहले टोका-टोकी करता था, लेडिज ट्वायलेट के आगे इंतजार में खड़ा रहता था तो लगा कि तू भी बाकी लोगों की तरह एक दिन कह देगा- सुनो न अंजलि.मैं तुम्हें सिर्फ दोस्त नहीं, मेरा मतलब है कि मैं तुम्हें लेकर सहज नहीं रह पा रहा टाइप से शुरु हो जाओगे और फिर दो-चार दिन की टाइम देकर स्पेशल पैकेज बनाने कह दोगे जबकि मेरे मन में सच कहूं तो तुमसे मिलने के बाद ही लगा कि लड़के भी अच्छे दोस्त हो सकते हैं..एक दिन लगा कि तू भी बाकियों की तरह मेरी हर बात में दखल देने लगा है तो साइड हो ली. तूझे जीमेल की हरी-लाल बत्ती के बीच डूबते-उतरते देखती रही तो चार साल हो गए, टोका नहीं. पर जब सामने की स्क्रीन पर ओले की टिक्कर चलती देखी तो रहा नहीं गया, पोक कर दिया, दैट्स इट. अब बोल, आ रहा है कल.

कल,कहां ? अबे कहां क्या, मजनूं का टीला. तुम मजाक कर रही हो, वहां क्या करेंगे ? वहां तो कुछ ढंग का वेज भी नहीं मिलता, सिर्फ बड़े-बड़े टुकड़े काटकर टांगे रखते हैं? अबे चिरकुट, हम पहले मजनूं का टीला चलेंगे, वहां तेरे साथ बस स्टॉप पर एक पिक खिंचवाएंगे, मम्मा को दिखाने के लिए नहीं, फेसबुक पर अपलोड़ करने के लिए- ओवरऑल माइ बेस्टफ्रेंड एस्टर्न के साथ..तू भूल गया,मैंने अपनी चैनल लाइफ की पहली पीटीसी यहीं की थी और तेरी असाइनमेंट की शिफ्ट थी. तू सिरदर्द का बहाना बनाकर निकला था और भागा-भागा मेरी कैब के पीछे आया था. मैं पीटूसी कर रही थी और तू उधर से अंगूठे उठाकर गुड गोइंग कर रहा था. ये हमारे हौसले की जमीन है और तब मैंने आधे घंटे के लिए ड्राइवर को टरकाकर शाहिद को भी एम्बेसी की अपनी पार्टी में शामिल किया था- हा हा मैं बन गई रिपोर्टर और तू भी बहुत खुश था. आज पीटूसी तो नहीं पर वहां से चलेंगे तेरा ऑलटाइम फेबरिट- एम्बेंसी, सिविल लाइंस. अब बहाने मत बना, आ जइयो टाइम पे..

अरे अंजलि, तुम्हारा नंबर तो दे दो, मैंने मेट्रो स्टेशन की उस लड़ाई के बाद डिलीट कर दी थी, तेरा जब तक नंबर रहेगा, खून खौलता रहेगा. 
अच्छा,तो तुझे गुस्सा भी आता है..गुड,गुड..मतलब है तेरे में फरवरी जितनी ही सही लेकिन है मर्दांनगी..तेरा तो नहीं बदला है न नंबर, मैंने सेव करा हुआ है, रुक लगाती हूं. नहीं मेरा वही नंबर है, नहीं बदला है.

सxचx कxहूंx तोxxxxx पिxxxछलेxxx पांचxxxx साल में तुम्हारे जाने के अलावे मेरे हिस्से में कुछ भी नहीं बदला, जो भी बदलाxxxx तो बस इसीxxxx अखबार की नौकरी के भीतर.
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1 Response to 'ओले,बारिश की किचकिच के बीच ए लैनल लप्रेक( दैट इज लघु प्रेम कथा)'
  1. दीपक बाबा
    http://taanabaana.blogspot.com/2013/01/blog-post_18.html?showComment=1358517494174#c3921368754309829063'> 18 जनवरी 2013 को 7:28 pm

    सर, संभलकर.... कहीं न कहीं प्रेस में सेंसर होते हुए भी आत्मीय पल छन कर बाहर आ जाते हैं :)

     

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