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"ख़बरों की ख़बरः क्यों और कितना जरुरी?" को लेकर प्रेस क्लब में गर्माहट का माहौल बना रहा। सलाह, नसीहतें और असहमति के बीच से जो भी कुछ निकलकर सामने आया,उसका लब्बोलुआब इतना है कि खबरों की खबर लिया जाना अनिवार्य है। न केवल अनिवार्य है बल्कि इस दिशा में,उन्हें दुरुस्त करने के लिए लगातार सक्रिय रहने की जरुरत है।
 बहस की शुरुआत न्यूज 24 के मैराथन एंकर सईद अंसारी से होती है। सईद अंसारी ने बमुश्किल दो मिनट बातें की होगी कि जनतंत्र के मॉडरेटर समरेन्द्र ने सवाल किया कि यहां सवाल-जबाब का भी प्रावधान है? मतलब ये कि सईद अंसारी ने जिस अंदाज में अपनी बात शुरु की,बहस की गुंजाइश तत्काल वहीं से बननी शुरु हो गयी। उन्होंने आते ही कहा कि खबरों की खबर जरुर,जरुर लेनी चाहिए लेकिन सवाल है कि क्या वेबसाइट,पोर्टल और इंटरनेट पर जो लोग लिख रहे हैं वे खबरों की खबर ले रहे हैं? वो खबरियों की खबर के पीछे उलझकर रह जा रहे हैं। वो इस मामले में उसी तरह से काम कर रहे हैं जिस तरह के काम न्यूज चैनल के लोग करते हैं। वो भी इस बात में ज्यादा दिलचस्पी लेते हैं कि किस चैनल के मीडियाकर्मी ने अपने बॉस को गाली दे दी,किस चैनल में किसका चक्कर किसके साछ चल रहा है,नोएडा फिल्म सीटी में किस चैनल के भीतर इश्किया चल रहा है? क्या ये खबरों की खबर है, वेबसाइट के लोगों को इस पर गंभीरता से विचार करने होंगे। सईद अंसारी के हिसाब से खबरों की खबर लेनेवाली वेबसाइट को न्यूज चैनल के डुप्लीकेट्स बनने से बचना चाहिए। आज न्यूज चैनल जिस बात के लिए बदनाम है,वही रास्ता उन्हें नहीं अख्तियार करना चाहिए। इसके बजाय

वेबसाइट को चाहिए कि वो न्यूज चैनलों ने खबरों में जो दिखाया है,उस पर बात करे। वो बताए कि अमित शाह को लेकर, किसी भी राजनीतिक घटना को लेकर जो खबरें चलायी है,वो इस तरह से नहीं है। उन्हें बताना चाहिए कि किसी खबर को किस चैनल ने किस तरह से दिखाया और उसे कैसे दिखाना चाहिए? न्यूज चैनलों की खबरों को मसालेदार और चटपटी बनाने के बजाय उन्हें ये देखना चाहिए कि चैनल में किसकी स्क्रिप्ट अच्छी है,कौन रन-डाउन पर बैठा है जिसके आए अभी दो साल ही हुए और बेहतरीन काम कर रहा है,किस चैनल का कैमरामैन सबों से हटकर काम कर रहा है? मीडिया की खबर का मतलब सिर्फ बड़े और नामचीन हस्तियों की बातों को छापना भर नहीं है,उनकी भी सुध लेनी चाहिए जो कि बहुत ही कम समय के अनुभव के साथ जबरदस्त तरीके से काम कर रहे हैं।

सईद अंसारी ने उस जरुरी बात की तरह इशारा किया जो कि इधर कुछ महीनों से वेबसाइट में तेजी से फैल रहा है कि-किसी एक-दो लोगों के फोन आ जाने पर खबरें हटा ली जाती है? सईद अंसारी ने सीधा सवाल किया कि वो कौन लोग हैं जिनके कहने पर आप खबरें हटा लेते हैं,क्यों हटा लेते हैं,आपके साथ ऐसी कौन सी मजबूरी होती है? आपको हर हाल में दबाबों से मुक्त होकर एक आजाद माध्यम के तौर पर काम करना चाहिए।
तीसरी बात जो उऩ्होंने जोर देकर कहा वो ये कि आप जो भी खबरें छापते हैं,उसकी ऑथेंटिसिटी क्या है? कोई जुनूनी पत्रकार नाम से आपको मेल करता है और आप उसे प्रकाशित कर देते हैं। बिना ये जाने कि इस खबर का दूसरा पक्ष क्या है? इस तरह से एकतरफा ढंग से खबरें छापना,बिना ये बताए कि किसने इसे लिखा है,सही नहीं है। आपको कम से कम एक लाइन में लिखना चाहिए कि हम व्यावसायिक प्रावधानों को लेकर इनका परिचय नहीं दे पा रहे हैं। इस तरह से बेनामी लोगों की बातों को छापने के पहले आपको खबरों की विश्वसनीयता पर विचार करने होंगे।
सईद अंसारी ने जो भी सवाल उठाए और जिस भी तरह की असहमति वेबसाइट को लेकर जतायी वो सारे सवाल देश के न्यूज चैनलों की ऑडिएंस भी करती है। न्यूज चैनलों को लेकर एक ऑडिएंस का जो दर्द,जो बेचैनी और  उसकी चिरकुटई को लेकर जो परेशानी ऑडिएंस को होती है,सईद अंसारी ने वो सबकुछ वेबसाइट को लेकर शेयर करने की कोशिश की जिस पर कि बाद में कई सवाल खड़े हुए।

सईद अंसारी के बाद, स्वतंत्र पत्रकार और सामाजिक विश्लेषक दिलीप मंडल ने इस मसले पर अपनी बात रखी। दिलीप मंडल साफ तौर पर कहा कि आज मीडिया का जो ढांचा है उसमें मीडिया वेबसाइट बहुत ही छोटे प्लेयर हैं। मीडिया साइट क्या चैनल और संस्थानों में भी जो लोग काम कर रहे हैं,डिसीजन मेकिंग में उनकी कोई बहुत हैसियत नहीं है। अगर आप अरुण पुरी और प्रणय राय को पत्रकार मानते हैं तो इनको छोड़कर बाकी मीडिया का कोई भी शख्स बोर्ड मीटिंग में नहीं बैठता। नहीं बैठते मतलब कि वो तय भी नहीं करते कि इसमें क्या होना चाहिए क्या नहीं। दिलीप मंडल ने मीडिया संस्थानों की इकॉनमी ताकतों की बात करते हुए विज्ञापन पॉलिसी पर बात की। उन्होंने बताया कि मीडिया के भीतर जो हम बड़ी-बड़ी बातें करते हैं,उसके भीतर का इकॉनमी सच कुछ और ही है। प्रॉक्टल एंड गेंबल का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि ये कंपनी उन मीडिया हाउसों को विज्ञापन नहीं देती जो कि क्रिटिकल इकॉनमी से जुड़ी खबरें करते हैं। इसी तरह बाकी कंपनियों की भी अपनी-अपनी बिजनेस स्ट्रैटजी है। दिलीप मंडल की इस बात से जो चीजें सामने आती है वो ये कि किसी न किसी रुप में लगभग सारे संस्थान इन कंपनियों की स्ट्रैटजी के सांचे में अपने को ढालने की कोशिश में होते हैं। ऐसे में मीडिया की बहुत सारी बातें बहुत पीछे चली जाती है। इसलिए
मीडिया वेबसाइट फिलहाल जो काम कर रहे हैं,उससे बहुत अधिक फर्क पड़नेवाला नहीं है। आज आप मानिए या न मानिए,मीडिया और इन्टरटेन्मेंट दोनों एक-दूसरे से गूंथे हुए हैं। केपीएमजी,प्राइसवाटर कूपर्स सहित दूसरे जितने भी रिपोर्ट आते हैं,उनमें दोनों को इसी कैटेगरी में शामिल किया जाता है। मैंने खुद भी देखा है कि बिजनेट साइस भी इन्हें इसी कैटेगरी में रखते हैं। ऐसे में मीडिया वेबसाइट के पास संभावनाएं बहुत हैं। वो अगर इस खेल को लोगों के सामने ला पाते हैं तो बड़ा काम कर सकेंगे। मीडिया इन्डस्ट्री के जो भी मॉडल हैं और उनके भीतर जो तोड़-जोड़ चलते रहते हैं,उसे शामिल किए जाने से एक अलग किस्म की चीज निकलकर सामने आएगी।
मीडिया के सवाल पर मैं दिलीप मंडल को लगातार सुनता आया हूं। उनके डिस्कोर्स के दरवाजे एथिक्स,कंटेंट और एडीटोरियल से न खुलकर जो कि ज्यादा आसान है,बिजनेस और इकॉनमी से खुलती है। ऐसा होने से वो उस लाचारी की तरह इशारा करते नजर आते हैं जहां एथिक्स एक भद्दा मजाक और एडीटोरियल बहुत ही निरीह की शक्ल में हमें दिखाई देने लगता है जबकि उनकी बातों की विश्वसनीयता कहीं अधिक बढ़ जाती है।  उनके हिसाब से मीडिया वेबसाइट बहुत कुछ कर सकते हैं, बस जरुरत इस बात की है कि वो मीडिया की इकॉनमी के खेल को गंभीरता से ले,उसे सामने लाने की कोशिश करे। सिर्फ एडीटोरियल पर टिककर बहुत कुछ निकाला नहीं जा सकता।
दिलीप मंडल ने मीडिया वेबसाइटों को ये साफ तौर पर बता कि आप जहां खड़े हैं,वहां की जमीन कैसी है? वर्तिका नंदा दिलीप मंडल के बाद अपनी बात रखती है। वर्तिका नंदा के बात करने का अंदाज एकदम जुदा है।  विमर्श की भाषा इतनी सरस हो सकती है,हैरानी होती है। अपराध पत्रकारिता पर किताब पढ़ते हुए और उन्हें बोलते हुए सुनने के बाद एक अलग किस्म की अनुभूति होती है। उनकी बातों में एक काव्यात्मक असर है जो साहित्य की संवेदना और मीडिया की तथ्यात्मक दृष्टिकोण से विकसित हुई है। बहुत ही सॉफ्ट अंदाज में अपनी बात की शुरुआत करती है-

एक कविता है- मोचीराम। उसकी चार पंक्तियां मुझे याद आती हैं-
सच कहूं बाबूजी
मेरी नजर में कोई इंसान न तो बड़ा है,छोटा
मेरी नजर में हर इंसान
एक जोड़ी जूता है
जो मरम्मत के लिए
मेरे सामने खड़ा है।..
जब ये कविता लिखी गयी थी,उस समय ये न्यूज चैनल्स नहीं आए थे लेकिन कविता की ये पंक्तियां इन चैनलों पर बिल्कुल फिट बैठती है। आज न्यूज चैनलों की,मीडिया की स्थिति कुछ वैसी ही है। वर्तिका नंदा जिस बात की तरफ इशारा कर रही थी उसका साफ मतलब है कि मीडिया ने चुनाव की समझदारी खो दी है। उसके सामने अच्छा और खराब के चुनने की काबिलियत खत्म हो गयी है। अगर काबिलियत बची भी है तो सिर्फ इस बात के लिए कि सबको एक सिरे से कैसे सेलेबल बनाया जाए। सबकुछ ताक पर रखकर सिर्फ और सिर्फ बेचने की काबिलियत आज की मीडिया की पहचान है। खबर है कि एक चैनल ने कॉमनवेल्थ के खिलाफ स्टोरी न दिखाने को लेकर लगभग समझौता ही कर लिया है। वर्तिका नंदा मीडिया के इस सच को वेबसाइट में भी आ जाने के प्रति शंका जाहिर करती है। मीडिया की आलोचना करनेवाले,उनकी खबर लेनेवाले भी कहीं यही सब तो नहीं करने लग गए? वो मीडियाखबर डॉट कॉम के मॉडरेटर पुष्कर पुष्प की तरह सवाल भरी निगाहों से देखती है,फिर कहती है- याद है पुष्कर,मैंने पहले भी आफसे पूछा था कि आप ये सब करते हुए,लिखते हुए अपनी मर्यादाओं का तो ख्याल कर रहे हैं न? यही सवाल मैं आज भी करना चाहती हूं। वर्तिका नंदा का ये सवाल सईद अंसारी के ऑथेंटिसिटी के सवाल के साथ जुड़ता है। आगे वो कहती हैं-
ऐसा बिल्कुल भी नहीं है कि खबरों की खबर लेनेवाले की खबर नहीं ली जानी चाहिए। ये बहुत ही जरुरी काम है। मीडिया संस्थानों के भीतर ऐसा बहुत कुछ घटित होता है जिसे कि लोगों के सामने आना चाहिए। पहले लोग मेल के जरिए अपनी बातें एक-दूसरे से शेयर करते थे। बाद में पता चला कि ये सब तो बॉस पढ़ लेते हैं तो फिर क्या करें? इन्हीं झंझटों के बीच कई विकल्प खुले। फिर वो अपनी एक कूलिग की छुट्टी मांगने का वाक्या शेयर करती है कि कैसे उसे एमए की परीक्षा देने के नाम पर छुट्टी नहीं मिलती जबकि दोबारा लंदन जाने के नाम पर दस दिनों की छुट्टी मिल जाती है। मीडिया चिलआउट को ज्यादा जेनुइन मानता है,बजाय इसके कि  किसी मीडियाकर्मी का दिमाग पढ़ने-लिखने की तरफ सक्रिय रहे।
वेबसाइट के लोग अगर मीडिया की खबर ले रहे है तो कहीं न कहीं उन्हें अपनी जिम्मेदारी तय करनी होगी। उन्हें देखना होगा कि वो जो कुछ लिख रहे हैं,उसका क्या असर हैं,उसके पीछे का क्या सच हो सकता है? 29 साल का एक नौजवान वेबसाइट बस इसलिए खोलना चाहता है कि वो कुछ लोगों को बजा देना चाहता है। ऐसे में तय करना होगा कि इसका इस्तेमाल किस दिशा की ओर किया जा रहा है? एक बिहार या पंजाब के शख्स को अगर इस बात से शिकायत है कि उसका बॉस उसके यहां के नहीं होने की वजह से उसे परेशान करता है तो इस खबर को छापने के पहले समझना होगा कि इस बात में कितनी सच्चाई है? कहीं ऐसा तो नहीं कि बॉस को इस समीकरण की कहीं कोई जानकारी नहीं। जरुरी सुझावों के साथ वो इस तरह के एफर्ट की सराहना करती हुई अपनी बात खत्म करती है।

रंजन जैदी के आने से थोड़ी देर के लिए माहौल अलग हो जाता है। थोड़ा-थोड़ा सूफियाना और बहुत ज्यादा उत्साहवर्धक। अब तक तीनों वक्ताओं के बोले जाने से जो जाने-अनजाने नसीहतों का रियाज चल रहा था,रंजन जैदी उसे भंग करते हैं। उन्हें इस बात पर फक्र होता है कि कोई तो है जो इस सब चीजों से लड़-भिड़ रहा है,डटकर मुकाबला कर रहा है। नहीं तो सब कुछ तो चलता ही रहता है। वो वेबसाइट के लोगों का हौसला बढ़ाते हुए कहते हैं कि कहीं कुछ भी लेकर डरने की बात नहीं है। बिना किसी समझौते के,बिना कोई भय के अपनी बात करनी चाहिए। इन सारी बातों के बीच कविता और शेर का दौर चलता रहता है। कविताओं की पंक्तियों को सुनते हुए मेरी तरह शायद बाकी लोगों को भी दिनकर की 'कुरुक्षेत्र' की याद जरुर आ रही होगी। गंभीर विमर्श के बीच कविता माहौल को थोड़ा हल्का करती है और हमें एहसास होता है- और भी हैं गम जमाने में। विषयों से हटकर बोलने के वाबजूद भी रंजन जैदी,अलग फ्लेवर में अपनी बात रखने के कारण ऑडिएंस के बीच अपनी पैठ बनाए रखते हैं। लेकिन चलते-चलते के अंदाज में ये जरुर कह जाते हैं कि हां मीडिया की खबर के नाम पर निजी जिंदगी को लेकर चर्चा नहीं होनी चाहिए। सबों की जिंदगी में कुछ न कुछ पर्सनल है,वेबसाइट को चाहिए कि वो इसे इग्नोर करे।

अजयनाथ झा हमारे जमाने के पुराने पत्रकार हैं। लंबे समय तक अंग्रेजी पत्रकारिता करने के बाद जब वो हिन्दी में लिखने पर विचार करते हैं तो बातचीत की शुरआत उस बिंदु से करते हैं जहां वो भाषाई स्तर पर लिखने में फर्क महसूस करते हैं। इसके बाद खबरों की खबर लिए जाने के मसले पर राजेन्द्र माथुर की कही हुई बात याद करते हैं कि मीडिया के लोगों को चाहिए कि दुनिया की मुठ्ठी खोल दे लेकिन अपनी मुठ्ठी कभी न खोले। अजयनाथ झा ने बहुत मौके पर ये बात कही। बल्कि इस पर अलग से बात होनी चाहिए। मेनस्ट्रीम मीडिया से जुड़े कई ऐसे लोग इस बात की दलील तो जरुर देते हैं कि जो लोग देखना/पढ़ना चाहते हैं,वहीं वो दिखाते हैं,लिखते हैं लेकिन क्या सच ऐसा ही है,इसकी टोह लेने का माद्दा,लोगों के बीच आकर बात करने की हैसियत उनमें नहीं है। ये लोग नहीं चाहते कि मीडिया के नाम पर जो खेल चल रहे हैं,वो लोगों के सामने खुलकर आ जाए। राजेनद्र माथुर ने मुठ्ठीवाली बात जिस संदर्भ में की थी,आज संभव है कि वो संदर्भ पूरी तरह बदल गए हों लेकिन ऐसा किया जाना सिर्फ प्रोफेशन की अनिवार्यता और मजबूरियों को लेकर नहीं है बल्कि इनमें कई ऐसे मामले हैं जो कि सीधे-सीधे नागरिक अधिकार,श्रमजीवी पत्रकार कानून और संवैधानिक प्रावधानों की धज्जियां उड़ाते नजर आते हैं। ऐसे मामलों का लोगों के सामने खुलकर सामने आना जरुरी है।
अजयनाथ झा ने पत्रकारों की पूरी की पूरी उस जमात की तरफ इशारा किया जो मौके से पत्रकार बन गए। उऩके भीतर पत्रकारिता का न तो वो जज्बा है और न ही वो कोई बदलाव की नीयत से काम कर रहे हैं। अजयनाथ झा की बात को समझें तो मौके से बन हुए पत्रकार क्या कर रहे हैं, ये सब हमारे सामने साफ है।

इस बीच दिलीप मंडल जरुरी काम से विदा लेते हैं औऱ ठीक उसी वक्त प्रभात शुंगलू आते हैं। हमारे अनुरोध पर वो भी इस मसले पर अपनी बात रखने के लिए तैयार हो जाते हैं।
प्रभात शुंगूल अपनी बात की शुरुआत सीधे-सीधे चैनलों की आलोचना से करते हैं। उनका मानना है कि मीडिया को अब दूकान कहना सही नहीं होगा,इसे आप मॉल कहिए। पत्रकारों का एक तबका ऐसा है जिसके पास बहुत पैसा आ गया है, दुनियाभर की सुविधाएं जुटा लिए हैं। ऐसे में उनके सोचने का तरीका भी बदल गया है।
प्रभात शुंगलू आते ही वक्ता के तौर पर बुलाए गए उन नामों के प्रति अपनी असहमति जताते हैं जो ऐसे मसले पर बोलने का अधिकार खो चुके हैं। उन्होंने कहा कि वो अपनी किताब के लोकार्पण के लिए पत्रकारों की तरफ नजर दौड़ते हैं। उन्हें एक भी ऐसा नाम दिखाई नहीं देता जो कि पूरा तरह निष्पक्ष हो। शुंगलू ने अपनी किताब का नाम रखा है- यहां मुखौटे बिकते हैं। मुझे लगता है कि किताब तो किताब, ये शीर्षक ही मीडिया इन्डस्ट्री के समझने में बहुत मददगार साबित होंगे। प्रभात शुंगलू ने जिस बेबाकी से अपनी बात रखी,मुझे उनकी आज से करीब सालभर पहले कही बात याद आ गयी कि न्यूजरुम नरक हो गया है। उन्होंने ये बात प्रेस क्लब के उसी हॉल में कहीं थी जहां कल कही। तब देश के तमाम बड़े चैनलों के एडीटर मौजूद थे और शुंगूल खुद भी खबर हर कीमत पर के लिए काम कर रहे थे। आज वो मीडिया इन्डस्ट्री से अपने को अलग कर लिया है।

लेकिन मीडिया और उसके लोगों की तीखी और जरुरी आलोचना करते हुए भी प्रभात शुंगलू वेबसाइट के हड़बड़ी में लिखे गए उस रवैये पर आपत्ति दर्ज करते हैं कि बिना मुझसे कंसेंट लिए लिखा जाता है कि इस्तीफा दे दिया। भाई,इस्तीफा दिया या फिर दिलाया गया,पूरी मामला क्या है इसकी छानबीन तो जरुरी है। मतलब ये कि वेबसाइट को न्यूज चैनलों की तरह ब्रेकिंग न्यूज की लग न लग जाए,इसके प्रति वो सचेत करते हैं।
प्रभात शुंगलू आखिरी वक्ता के तौर पर अपनी बात खत्म करते हैं। उसके बाद सवाल-जबाब का दौर शुरु होता है।
जनतंत्र डॉट कॉम के संपादक समरेन्द्र सईद अंसारी के बोलने के समय ही सवाल करना चाह रहे थे,अब वो एक्टिव होते हैं। समरेन्द्र ने साफ कहा कि आपके उपर भड़ास4मीडिया का असर इतना है कि आफ सारी वेबसाइट को इसी तरह से देख-समझ रहे हैं जबकि बाकी की साइट अलग काम कर रही है। उन्होंने श्रमजीवी पत्रकारों के वेतनमान को लेकर केंद्र सरकार की तरफ से बनाए गए वेज बोर्ड की दिल्ली में मंगलवार को हुई बैठक में जनसत्ता के पत्रकार अंबरीश कुमार ने देश भर के पत्रकारों की सामाजिक आर्थिक सुरक्षा का सवाल उठाया और बोर्ड ने इस सिलसिले ठोस कदम उठाने का संकेत भी दिया है है जैसी खबर शायद ही कहीं मिले,इस पर चर्चा हुई हो लेकिन वेबसाइट ने इसे छापा है। अखबार की चालीस हजार प्रति की सर्कुलेशन पर लाख रुपये वेतन पा रहे हैं पत्रकार,इस पर कौन बोल रहा है? उन्होंने सईद अंसारी की इस बात का कि आप किसके कहने पर खबरें हटा देते हैं के जबाब में कहा कि हमलोगों के पास पैसा उसी तरह से नहीं आता जिस तरह से राजीव शुक्ला के चैनल को आता है। दबाब की बात को मोहल्लालाइव के मॉडरेटर जो कि अभी-अभी आए ही थे,आगे बढ़ाते हुए कहा कि हमलोगों पर भी व्यक्तिगत स्तर के दबाब काम करते हैं। हम खबरों को हटाते हैं तो ये काम टेलीविजन में भी होता है। वहां भी कई खबर कवर होने के बाद नहीं चलायी जाती,एक बार चलाकर बंद कर दी जाती है। अखबार में भी गलत खबर छापकर माफी मांगी जाती है। इसलिए ये कहना कि वेबसाइट ऐसा करते हैं सही नहीं होगा। इसी क्रम में अविनाश ने बेनामी का समर्थन करते हुआ कि असल मसला है कि तथ्य के तौर पर चीजें सामने आ रही है या नहीं? यहां बहस थोड़ी और तल्ख होती है, प्रभात शुंगूल और सईद अंसारी थोड़े और गर्म होते हैं। प्रभात शुंगलू का चैनल के विरोध में स्वर और तेज होता है जबकि सईद अंसारी अपने पक्ष को दोबारा रखते हैं कि बेनामी लोग हमें नहीं तो कम से कम संपादक को तो बताएं कि वौ कौन हैं? इन्हीं मसलों के बीच कुछ और सवाल आते हैं।..
हॉल खाली करने का समय होने लग जाता है। प्रेस क्लब हॉल 6 बजे तक खाली करने का प्रेशर होता है। बहस की गुंजाईश बनी रहती है लेकिन लोग उठने लग जाते हैं। मंच संचालक के तौर पर मेरे आग्रह से लोग रुकते हैं। जब आपने हमें इतनी देर तक बर्दाश्त किया तो दो मिनट और बर्दाश्त करें। प्रमोद तिवारी को धन्यवाद ज्ञापन दे लेने दें।
प्रमोद तिवारी बहुत ही कम शब्दों में सबों का शुक्रिया अदा करते हैं। वो आज से तीन साल पहले उन पलों को याद करते हुए भावुक हो उठते हैं कि कैसे जब मीडिया मंत्र के पहले अंक का विमोचन किया जा रहा था, इसी हॉल में प्रभाष जोशी ने कहा था कि ये नन्हें शावक हैं,इन्हें कूदने-कुलांचे भरने का मौका दें,उनका हौसला बढ़ाएं। तीन साल में मीडिया मंत्र और दो साल में मीडियाखबर ने ये सफर तय किया है।..हम इसे मिल-जुलकर औऱ आगे ले जाएं।

खबरों की खबरः क्यों और कितना जरुरी? विषय पर परिचर्चा का आयोजन मीडिया खबर डॉट कॉम के दो साल पूरे होने के मौके पर किया गया। मीडियाखबर डॉट कॉम ने अपने आमंत्रण पत्र में लिखा था कि अपने हाथों कीजिए,अपनी वेबसाइट रिलांच। चार बजे क्लिक कीजिए मीडियाखबर डॉट कॉम। साढ़े तीन बजे से कार्यक्रम की शुरुआत होनी थी और चार बजे साइट रिलांच होना था,अपने नए रंग-रुप में. इसी बीज टेलीविजन के पत्रकारों ने लामंबदी कर ली और लिफ्ट में हैं,रास्ते में हैं,पांच मिनट में पहुंच रहे हैं करके अंत तक नहीं आए। उनके न आने से बातचीत में लेकिन कोई खास फर्क तो नहीं पड़ा लेकिन हां न आकर उन्होंने शिड्यूल को बेतरतीब जरुर कर दिया। बहरहाल,पहले से तय तक कि किसी बिग शॉट से साइट का विमोचन नहीं कराना है,एक नया प्रयोग था,इसलिए वक्ता सहित मौजूद लोगों ने साइट का विमोचन अपने हाथों किया. अपने-अपने घरों,ऑफिसों और डेस्क पर बैठे लोगों को चार बजने का इंतजार था,उन्हें और परेशान नहीं किया जा सकता था।
 दो साल के भीतर साइट ने जो काम किया,उसे लेकर लोगों की क्या प्रतिक्रिया है,इसे समझने में ये परिचर्चा मददगार साबित होगी। इस मौके पर मीडियाखबर डॉट कॉम के संपादक पुष्कर पुष्प ने अपने उन अनुभवों को साझा किया जो आज की कार्पोरेट मीडिया और भारी पूंजी से अपने को अलग काम करने से हासिल हुए। उन तनावों,झंझटों और दबाबों को हमारे सामने रखने की कोशिश की जिसे सुन-समझकर बिना बड़ी पूंजी के पत्रकारिता को जिंदा रखने की जद्दोजहद पर हमें नए सिरे से विचार करना जरुरी लगता है। लोगों का स्वागत करते हुए ज़ैन अवान ने शायद ठीक ही कहा कि हर किसी के भीतर सपने होते हैं और उन सपनों को सच्चाई में बदलने में बहुत सारी मुश्किलें आती है,यह भी उसी तरह का एक काम है। 


नोट- मंच संचालन करते हुए जितनी बातें मैं सुन-समझ सका,उसे आपसे साझा कर रहा हूं। संभव है इसमें वक्ता के बोले गए शब्दों से पोस्ट के शब्द हूबहू मेल न खाते हों लेकिन पूरी कोशिश रही है कि वक्तव्य की मूल भावना में रत्तभर भी फर्क न आने पाए।..
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2 Response to 'ख़बरों की ख़बर क्यों और कितना जरुरी?- जोरदार रही बहस'
  1. pratibha
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/07/blog-post_31.html?showComment=1280573585629#c6464124345218402440'> 31 जुलाई 2010 को 4:23 pm

    खबरों की खबर लेना तो जरूरी है. नसीहतें देने वाले लोग ये भूल गये हैं कि वेबसाइट या पोर्टल वाले लोग ये काम बिना किसी स्वार्थ के कर रहे हैं. इसका स्वागत होना ही चाहिए. एक आध पोर्टल के चलते पूरे वेब मीडिया की गंभीरता पर सवालिया निशान नहीं उठाया जा सकता. अच्छी रिपोर्ट विनीत.

     

  2. सतीश पंचम
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/07/blog-post_31.html?showComment=1280623565036#c5899356318960221817'> 1 अगस्त 2010 को 6:16 am

    पहले तो लगा कि इतनी लंबी रपट बाद में रख देता हूँ फुरसत के समय पढूँगा लेकिन शुरू होने के बाद पढ़ता गया। बहुत अच्छी रिपोर्ट है।

    यहां मैं एक चीज की ओर इशारा करना चाहूँगा कि मीडिया की दो मुंही प्रवृत्ति के लिए बहुत ज्यादा ढूँढ-ढाँढ की जरूरत नहीं है....अब यही देख लिजिए कि जिस कृपालु फृपालू के खिलाफ चैनल रात में खबरें चलाता है कि उस पर यह संगीन आरोप है...फलां मामला है....पता चला अगले दिन सुबह वही बंदा उसी चैनल पर प्रवचन दे रहा है....उसी तरह से रात में खबर होती है चैनल पर कि महाराज ने काला जादू पीला जादू का चक्कर चलाया और अगले दिन सुबह उसी चैनल के मुखारविंद से महाराज प्रवचन देते कह रहे हैं....हमें लालच नहीं करना चाहिए.....हमें जीवन नैया में सबकी सुननी चाहिए.....क्रोध नहीं करना चाहिए.....वगैरह वगैरह.....जबकि ऐसे चेहरों को देख सीधे ही मन कहता है... भो** के :)

    अब अगर इस तरह का मामला हो तो चैनल अपनी विश्वसनीयता खोएंगे ही.....चैनल पैसा पा जाने पर यह नहीं समझ पाते कि ऐसे लोग उनके प्लेटफार्म का इस्तेमाल अपनी इमेज सुधारने के लिए करते हैं.....जबकि रात में बताई खबर और सुबह दिखा चेहरा में जो विरोधाभास होता है उससे आम जनता में यह संदेश सीधा जाता है कि पैसा पहुँच गया है चैनल के पास....तभी तो प्रवचनकर्ता बाबा पर कोई खबर नहीं आ रही ।

     

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