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हिंदी लिटरेचर की दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक मंच कही जानेवाली पत्रिका हंस की संगोष्ठी में जो नजारा हमने देखा, उससे एक साथ कई चीजें तार-तार हो गयीं। इस संगोष्ठी को मैं अपनी याददाश्त बरकरार रहने तक लोकतंत्र के मूल्यों की सरेआम धज्जियां उड़ानेवाली संगोष्ठी के तौर पर याद रखूंगा। ये मैंने अपने अकादमिक जीवन में पहली बार देखा कि किसी संगोष्ठी में वक्ता अपनी बात कहने के तुरंत बाद ही दर्शकों की चिंता किये बगैर मंच से नीचे उतरकर फील्डिंग करने लग गये। मंच की कुर्सियां एक-एक करके खाली होने लग जाती हैं। मंच संचालक का मंच, उस पर स्थापित लोगों और माहौल से पकड़ फिसलकर चुप्पी की नाली में जा गिरती है। वो विश्वरंजन की स्टेपनी के तौर पर आये विभूति नारायण राय से लाख अपीलें करते हैं कि मंच पर बने रहें लेकिन हजारों छात्रों को अनुशासन का पाठ पढ़ानेवाले, फैकल्टी को ठोक-पीटकर अपने काम लायक बनानेवाले विभूति नारायण इसकी परवाह किये बगैर सीधे गेट की तरफ बढ़ते हैं। सभागार में बैठी ऑडिएंस इसे सीधा-सीधा अपना अपमान मानती है और हंगामा मच जाता है। उनकी सिर्फ इतनी ही मांग होती है कि हमने आपको इतनी देर तक बैठकर सुना, हमारे पास कुछ सवाल हैं, आप उन सवालों के जवाब दिये बगैर नहीं जा सकते। जाहिर है महीनों से महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय में जो कुछ भी चल रहा है, उसे लेकर कई सवाल बनते हैं



जिन ऑडिएंस ने अगस्त महीने के नया ज्ञानोदय में उनका इंटरव्यू पढ़ा होगा, वो सवाल करना चाह रहे होंगे कि आखिर आपने किस अधिकार से कह दिया कि हमारी लेखिकाओं में अपने को एक-दूसरे से ज्यादा से ज्यादा छिनाल साबित करने की होड़ है। उपन्यास का नाम ‘कितनी बिस्तरों पर कितना बार’ होना चाहिए, बताया। ये मसला पॉपुलरिटी स्टंट बोलकर नजरअंदाज करने का नहीं बल्कि उनसे जबाबतलब करने का है। ये मामला उनके इस्तीफे की मांग तक जा सकता है। सामूहिक तौर पर माफी मांगने पर जा सकता है। ये एक ऐसे विश्वविद्यालय के वीसी की भाषा कैसे हो सकती है, जहां वेब पर हिंदी के पन्ने तैयार करने के लाखों रूपये के ठेके दिये जाते हैं, हिंदी शब्दकोश के विस्तार के लिए दर्जनों आदमी काम पर लगाये जाते हैं, जहां एमए स्त्री अध्ययन का अलग से कोर्स चलाया जा रहा हो? इन सारे सवालों को अगर ये कहकर नकारा भी जाता कि सेमिनार में जो कहा है, उससे सवाल करें तो भी विभूति नारायण राय को इस सवाल का जवाब तो देना ही पड़ता कि आप स्टेट मशीनरी के कुचक्र को ताकतवर बताकर किसी न किसी रूप में उसको डीफेंड क्यों कर रहे हैं? उनसे ये सवाल तो किया ही जाता कि आप संगोष्ठी, अकादमिक और कोतवाली की भाषा के फर्क को किस रूप में लेते हैं? लेकिन विभूत नारायण ने किसी का मान नहीं रखा। न मंच का, न संचालक का, न हंस का। पूरी संगोष्ठी में प्रेमचंद सिर्फ बैनर पर ही छपा रह गया, किसी की जुबान से एक बार भी प्रेमचंद नहीं निकला। नहीं तो जिन मूल्यों को सहेजने की कोशिशें और दावे हंस के मंच से किया जाता रहा है, उन तमाम मूल्यों को ठोकर मारकर विभूति नारायण ने छितरा दिया – होरी के वंशजो, इसे तुम एक-एक करके चुनो, समेटो। इस पूरे रवैये से आप अंदाजा लगा सकते हैं कि किस माहौल के भीतर वर्धा विश्वविद्यालय की फैकल्टी काम करती है? ये सोचते हुए भी सिहरन होती है कि वहां के स्टूडेंट किस जम्‍हूरित के शिकार हैं, कैसे अपनी असहमति के स्वर को रख पाते होंगे? विश्वविद्यालय की जो कुछ खबरें अब तक हमारे सामने आयी हैं, हमारे भीतर एक उसी किस्म की बेचैनी पैदा होती है, आज विभूति नारायण को सुनते हुए ये बेचैनी और बढ़ गयी जो बेचैनी हमें मिर्चपुर में सुमन और उसके बाप को जिंदा जला देने की खबर से हुई थी। इस गहरी रात में, ये लाइन लिखते हुए मैं वर्धा के छात्रों से मिलने के लिए बेचैन हो रहा हूं। एक अकेला शख्स लोकतंत्र की ताकत पाकर किस हद तक अलोकतांत्रिक, अमर्यादित हो सकता है, इसका नमूना आज हमें लाइव देखने को मिला।

लोकतंत्र की धज्जियां तब भी भयानक स्तर पर उड़ायी गयीं, जब आलोक मेहता जैसा पत्रकार (जिनके पत्रकारीय कर्म को अगर पीआर, लॉबिइंग की परिभाषा के हिसाब से समझें तो वो इसके ज्यादा करीब होगी) हेमचंद्र पांडे के मामले में हत्या की अगली सुबह कहता है कि वो नई दुनिया के लिए काम नहीं करता था, उसका इससे कोई संबंध नहीं था – पता नहीं किस हैसियत से अपने को डीफेंड करने के लिए मंच पर काबिज होने की कोशिश करता है। स्वामी अग्निवेश ने जब माओवादियों और सरकार के बीच बातचीत की पहल के संदर्भ में अपनी बात शुरू की, तभी पत्रकार हेमचंद्र का नाम आया और उन्होंने नई दुनिया अखबार का नाम लिया कि उसके संपादक ने इससे अपना पल्ला झाड़ लिया। एक तरफ सेकंड लास्ट की सीट पर बैठे आलोक मेहता पर लोगों की नजर गयी और मोहल्लालाइव के मॉडरेटर ने कहा कि संपादक खुद यहां बैठे हैं, उन्हीं से पूछ लिया जाए। आलोक मेहता की तरफ से एक शख्स बोलने की अनुमति लेने की चीट लेकर राजेंद्र यादव के पास जाता है और उन्‍हें बोलने की अनुमति मिल जाती है।
आलोक मेहता तीन-चार मिनट तक दायें-बायें करते हैं। पीछे बैठे लोग उनसे मुद्दे यानी हेमचंद्र पर बात करने के लिए कहते हैं। (आलोक मेहता की वॉयस डिलीवरी आमतौर पर बहुत सॉफ्ट है। ये चैनल में सॉफ्ट स्टोरी या इंटरटेनमेंट की खबरों के लिए बहुत ही परफेक्ट है। मीडिया इंडस्ट्री में ऐसे पत्रकारों की पूरी की पूरी एक जमात है, जिनकी आवाज को ऐसी स्टोरी के वीओ (वॉयस ओवर) के लिए काम में लाया जा सकता है। बहरहाल…) ऑडिएंस के दबाब के बीच आलोक मेहता का स्वर अचानक से ऊंचा होने लग जाता है और धीरे-धीरे अंदाज के स्तर पर विभूति नारायण के स्वर के साथ एकाकार हो जाता है। ये कोई चैनल की बहस नहीं थी, जिससे कि आप एंकर पर तोहमत जड़कर मुक्त हो जाएं कि वो कहते ही हैं मामले को गर्म करने के लिए। ये एक विमर्श का मंच था, जिस पर कि इरा झा ने अपनी रिपोर्टिंग की बातें शेयर की, आदित्य निगम ने स्टेट लेजिटिमेसी की बात गंभीरतापूर्वक रखा, रामशरण जोशी अपनी क्षमता के अनुसार जितना बेहतर कर सकते थे, कोशिश की। लेकिन आलोक मेहता की आवाज अचानक से रामलीला मैदान की हो जाती है। अगर मैं गलत मिलान कर रहा हूं तो संभव है कि नई दुनिया के पत्रकार भाई इसे चैंबर में किसी पत्रकार से बात करने के अंदाज से इसका मिलान कर सकते हैं।
आलोक मेहता ने जो तर्क दिया वो न केवल कमजोर और लचर था बल्कि मनोहरश्याम जोशी, राजेंद्र माथुर की परंपरा से अपने को जोड़कर उनकी बराबरी में अपने को खड़ा करने की कोशिश की। कहा कि नाम बदलकर अगर हेमचंद्र ने लिखा तो वो इतने महान तो हैं नहीं कि पता कर लेते। उन्होंने अपने को इस बिना पर जस्‍टीफाइ करने की जबरदस्ती की कि ऐसा पहले भी हुआ है। ऑडिएंस का धैर्य कंट्रोल से बाहर होने को आया। वो सीधे-सीधे उनसे जबाब चाह रही थी। लेकिन जो आलोक मेहता दो मिनट बोलने का समय मांग रहे थे, उऩ्हें दो घंटे भी बोलने को दिया जाता तो भी कुछ न बोलते। गोल-मोल बातें करके बीच में अपने को बिग शॉट साबित करने की कोशिश आलोक मेहता की वाचन शैली का हिस्सा है। ऐसा करते हुए मैं दसियों बार देख चुका हूं। लेकिन पत्रकार बिरादरी के बीच शायद ही कोई सवाल कर पाता है। यही काम उन्होंने पिछले दिनों उदयन शर्मा की याद में हुई संगोष्ठी के मामले में किया। बात हो रही थी पेड न्यूज की और बयान दिया कि वो बिहार के मुजफ्फरपुर जैसी जगह में पत्रकारिता कर चुके हैं। उन्हें दोस्तों की नसीहतें याद आती, सुरक्षा को लेकर चौकस होने की बात करते कि उन्होंने मेले से लोहे की एक खुरपी खरीदी थी। बहरहाल…
अभी तक हमने किसी भी पत्रकार को इस तरह सार्वजनिक रूप से बेआबरू होते नहीं देखा है। ऑडिएंस के वाजिब गुस्से से आप इस बात का अंदाजा लगा सकते हैं कि सत्ता के गलियारों में चमकनेवाले सफल पत्रकार और होते हैं और जो लोगों के दिलों पर राज करते हैं, वो और ही पत्रकार होते हैं। ऐवाने गालिब जैसे भरे सभागार में हमें एक शख्स भी ऐसा नहीं मिला, जिसने ये कहा कि अरे बैठ जाइए, मेहता साहब को बोलने दीजिए। ये अलग बात है कि उसी सभागार में आलोक मेहता के कूल्हे के नीचे काम करनेवाले नई दुनिया के पत्रकार भी मौजूद थे और मीडिया की नामचीन हस्तियां भी। एक भी स्वर, एक भी हाथ आलोक मेहता के पक्ष में न सही, बोलने देने के आग्रह के लिए नहीं उठे। ये नजारा तत्काल कई चीजें एक साथ साफ कर देता है। आप इस घटना से अंदाजा लगा सकते हैं कि क्या स्थिति है? आलोक मेहता मंच से बार-बार कहते हैं कि मैं मानता हूं कि पत्रकारिता का पतन हुआ है। पीछे से आवाज आती है – पत्रकारिता का नहीं आपका पतन हुआ है। सत्ता के साथ टांग पर टांग चढ़ाकर पत्रकारिता करने से पत्रकार की हैसियत क्या रह जाती है, ये समझने के लिए इस घटना से बेहतर नमूना शायद ही कभी आपको देखने को मिले होंगे।
मंच संचालक ने कार्यक्रम शुरू होते ही सारे वक्ताओं से अनुरोध किया कि आपलोग अपनी बात संक्षेप में रखें ताकि सवाल-जबाब के लिए ज्यादा से ज्यादा समय मिल सके। विभूति नारायण ने भी ये कहते हुए कम बोला कि सवाल-जवाब के दौरान नयी बातें सामने आएगी लेकिन जब एक-एक करके वक्ता मंच से खिसकते चले गये तो सवाल किससे किया जाता?
यह एक गैरलोकतांत्रिक किस्म की संगोष्ठी थी, जिसमें कि एक बड़े पढ़ने-लिखनेवाले वर्ग का सीधा-सीधा अपमान हुआ। जिन मूल्यों, जिन फ्लेवर को बचाने के लिए इस तरह की संगोष्ठियां आयोजित की जाती हैं, वो इस गोष्ठी में बुरी तरह छितरा गया। राजेंद्र यादव की तरफ कैमरा बढ़ता है। वो उदासी से जवाब देते हैं – अब किसके लिए कर रहे हो, जिनका लेना था वो तो गए… “वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति” पर बात करने जुटे लोग बहुत कुछ खत्म हो जाने के बोध के साथ बाहर निकले।..
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9 Response to 'हंस संगोष्ठी में लगे नारे- विभूति,मेहता मुर्दाबाद! मुर्दाबाद,मुर्दाबाद!'
  1. pratibha
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/08/blog-post.html?showComment=1280659075550#c1766381711032844442'> 1 अगस्त 2010 को 4:07 pm

    hota hai shabo roj tamasha mere aage...

     

  2. अजय कुमार झा
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/08/blog-post.html?showComment=1280660395911#c6870426736547963897'> 1 अगस्त 2010 को 4:29 pm

    कमाल है कि इतने बडे पैमाने पर की जाने वाली ,न सिर्फ़ की जाने वाली बल्कि कर के दिखाई और जताई जाने वाली संगोष्ठी और इसके कर्ताधर्ताओं का नग्न सच ऐसा वीभत्स है । आपने सारा का सारा खाका खींच कर रख दिया । चलिए इतना तो शुक्र है कि आम जनमानस अभी सचेत है और सजग भी ,....

     

  3. निरुपम
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/08/blog-post.html?showComment=1280668540337#c6544280899889319788'> 1 अगस्त 2010 को 6:45 pm

    Vineet, bukhar ki vajah se goshthi mein na paane ka man mein bahut malaal tha.lekin apka post padh kar laga ki chalo, achchha hua... hindi ke vidwat samaaj ka yah chehra dekhne se bach gaye.apki bechain chinta svabhavik hai..aur poori ghatna ko lekar prakat kiye gaye apke samvedansheel vichar wajib. aap bloging ko jis tarah ke sarokaaron se jod rahe hain, uske liye dhanyawad aur badhaai ke yogya hain.

     

  4. माणिक
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/08/blog-post.html?showComment=1280683198044#c4043120153014061442'> 1 अगस्त 2010 को 10:49 pm

    saarthak bhaagidaari.likhane padhwaane kaa shukriya

     

  5. सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/08/blog-post.html?showComment=1280683956255#c1428926576333342224'> 1 अगस्त 2010 को 11:02 pm

    अब ऐसे मंच भी केवल दिखावटी साबित हो रहे हैं, यह जानकर बहुत क्षोभ हो रहा है।

     

  6. माणिक
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/08/blog-post.html?showComment=1280748668792#c8287055401093427129'> 2 अगस्त 2010 को 5:01 pm

    aapke blog ke kuchh option jo upar likhe hai kaam nahi kar rahe hain. aap jaise achhe lekhak ke liye ise theek karawaanaa jaruri lagataa hai. baaki aapaki ichha.

     

  7. Nand
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/08/blog-post.html?showComment=1280758383311#c2903297025492503141'> 2 अगस्त 2010 को 7:43 pm

    इस शानदार और बेबाक रिपोर्टिंग के लिए बधाई। बस इतना ही कहना है कि इसमें हिन्‍दी समाज या भाषा का कोई दोष नहीं है, जो लोग व्‍यक्तिगत महत्‍वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए पत्रिकाएं निकालते हैं या गोष्ठियां आयोजित करवाते हैं, उनकी कलई धीरे-धीरे खुल रही है, यह अच्‍छा संकेत है। - नंद भारद्वाज

     

  8. सुशीला पुरी
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/08/blog-post.html?showComment=1280814145963#c3166406836963301794'> 3 अगस्त 2010 को 11:12 am

    नया ज्ञानोदय के अगस्त अंक मे साक्षातकार के दौरान बी एन राय साहब ने जो कुछ अपने पूर्वाग्रहों या दुराग्रहों के वशीभूत होकर कहा उसपर कुछ कहने से पहले मै उस पत्रिका के संपादक रवीद्र कालिया जी से पूछना चाहती हूँ कि- संपादन का मतलब क्या होता है ? नया ज्ञानोदय पत्रिका की मै नियमित पाठिका हूँ और उस पत्रिका के मंच से यदि विभूति नारायण राय जी ने 'लेखिकाओं'को लेकर इतनी अशोभनीय भाषा का प्रयोग किया तो उसको पत्रिका मे जगह देने का औचित्य ही क्या था ? विभूति जी का 'शहर मे कर्फ्यू ' , 'तबादला',और ' घर ' मैंने भी पढ़ा है और उस आधार पर मै उनसे ऐसी उम्मीद नहीं रखती थी ,अब यदि ऐसा उन्होने कहा है तो इसकी जवाबदेही भी उनकी है ,और उनको इससे बजाय मुँह चुराने के ,अपनी बात रखनी चाहिए । सभी सम्मानित बड़ी लेखिकाओं से मेरा अनुरोध है कि बी एन राय के अशोभनीय वक्तव्य के जवाब मे पदमा राय जी और ममता कालिया जी का नाम लेकर कुछ सवाल -जवाब करना बेहद शर्मनाक है और हिन्दी साहित्य की गरिमा को मिट्टी मे मिलाने जैसा है । 'हंस' की वार्षिक गोष्ठी मे ऐसे अनर्गल और अशोभनीय बातों का उठना हम सभी हिन्दी भाषी लोगो के लिए तकलीफदेह और शर्म से चुल्लू भर पानी मे डूब मरने जैसी स्थिति है

     

  9. gentle man.
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/08/blog-post.html?showComment=1280817561171#c798065320740042500'> 3 अगस्त 2010 को 12:09 pm

    ray sahab ko is baat ki chinta to hai shayad ki likhne ke pahle kalam par condom chadha liya jaye,par bolne ke pahle apne muh par bhi kuchh aisa hi chadha liya hota to kitna achha hota.hans ki ghosthi se naya jhyanoday ke bayan tak ve ninda ke patra hain.

     

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