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दुनिया की ख़बर लेनेवाली मीडिया और मीडिया संस्थानों की जब ख़बरें ली जाने लगती है,तब वो इसे बर्दाश्त नहीं कर पाते। वो नहीं चाहते कि लोकतंत्र की हिफाजत के नाम पर, ख़बरों की दुनिया के पीछे का जो खुल्ला-खेल फर्रुखाबादी चलाते आए हैं,वो सब लोगों के सामने आ जाए। दुनिया की ख़बरें कब्र से निकाल ली जाए लेकिन उनकी ख़बरें सामने आने के पहले ही कब्र में दफना दी जाए। शायद यही वजह है कि जिस समय एक एयरलाइंस में जितनी संख्या में लोगों को नौकरी से बेदखल किया जाता है,ठीक उसी समय उससे कहीं ज्यादा संख्या में एक मीडिया संस्थान के मीडियाकर्मी सड़कों पर आ जाते हैं। एयरलाइंस की खबर चौबीस घंटे से ज्यादा अबाध गति से चलती है लेकिन इन मीडियाकर्मियों की हालत पर कहीं एक लाइन भी कुछ दिखाया/बताया नहीं जाता। मीडिया और चैनलों की बाढ़ के बीच जहां छोटी से छोटी ख़बर के ब्रेकिंग न्यूज बनने की लगातार संभावना बनी रहती है,देश की हर लड़की,हर स्त्री एक पैकेज है की गुंजाईश में देखी-समझी जाती है,वहीं देश के सबसे तेज कहे जानेवाले चैनल की एक मीडियाकर्मी की देर रात काम की शिफ्ट से लौटने के दौरान हत्या कर दी जाती है और चैनल पर बारह घंटे तक कोई ख़बर नहीं आती। देश में हजारों ऐसे मीडियाकर्मी हैं जो एक मजदूर से भी ज्यादा बदतर जिंदगी जीने के लिए मजबूर हैं। उन बदतर स्थिति में जीनेवाले मजदूरों पर रवीश कुमार फिर भी कभी आधे घंटे की स्टोरी बना देते हैं लेकिन इन मीडियाकर्मियों की सुध लेनेवाला कोई नहीं है।..वो दुनिया के लिए ख़बर तो जरुर दिखा-बता सकते हैं लेकिन उन ख़बरों में वो खुद कहीं नहीं शामिल हैं। ये स्थिति ठीक उसी तरह की है जिस तरह से एक मजदूर दिन-रात रिबॉक और नाइकी के जूते बनाए और उसके खुद के पैरों की फटी विवाई जूते के जरिए एडवांस समाज बनने के उपर तमाचे जड़ दे।
ऐसे में मीडिया आलोचना के लिए जिन शब्दों का प्रयोग किया जाता है,जिस जार्गन के तहत उसकी बात की जाती है,वो पूरी तरह स्टैब्लिश करते हैं कि ये मीडिया के विरोध में,उसके खिलाफ सक्रिय होने की कोशिशें हैं।

जबकि सच बात तो ये है कि मीडिया आलोचना और ख़बरों की ख़बर दोनों एक चीज नहीं है। इस देश में मीडिया आलोचना की अब तक की जो परंपरा रही है उसमें या तो इसे विकासवादी माध्यम साबित करके सारी जिम्मेदारी इस पर लाद दी जाए या फिर इसे पूंजीवादी माध्यम बताकर इसे नेस्तनाबूद करने के दिशा में सोचा जाए या फिर( जो कि इन दिनों प्रचलन में है) फूहड़ बताकर किनाराकशी कर लिया जाए। ख़बरों की ख़बर में ये तीनों स्थितियां अलग है।

वर्चुअल स्पेस पर मीडिया को लेकर ख़बरों की ख़बर का जो दौर चल रहा है वो विश्लेषण या आलोचना से न केवल अलग है बल्कि उससे कहीं ज्यादा आगे की चीज है। यहां अगर आलोचना भी की जा रही है तो उसके पहले कंटेंट जेनरेट करने का काम ज्यादा जरुरी है। बल्कि मीडिया पर बात करने के लिए उसे लेकर गहरे विमर्श में घंसने के बजाय ज्यादा जरुरी काम है कि जो तथ्य आते हैं उन्हें हू बू हू लोगों के सामने रख दिए जाएं। ज्यादा से ज्यादा घटनाओं और कंटेंट को सामने रख देनेभर से ही कई स्थितियां साफ हो जाती है। खबरों की बाकी बीट के मुकाबले मीडिया में फिलहाल विश्लेषण का काम न भी हो,लोगों को सिर्फ ये बताया जाए कि कहां क्या हो रहा है,उसी से बहुत बड़ा काम हो जाएगा और हो भी रहा है। ऐसा होने से

ये बात बिल्कुल साफ हो जाएगी कि ख़बरों की ख़बर का मतलब ख़बर लेनेवाले को आलोचना की तरह खत्म करना नहीं है बल्कि इतनाभर बताना है कि लोकतंत्र को बचाने के नाम पर जिस मीडिया को आपने चंडूखाना बना दिया है,उसकी सारी ख़बरें रिस-रिसकर लोगों तक पहुंच रही है,आपकी एक-एक हरकत पर नजर रखी जा रही है। संस्थान के भीतर किस तरह की गड़बड़ियां चल रही है,कंटेंट को लेकर किस तरह के समझौते चल रहे हैं,ये सब लोगों के सामने आ रहे हैं। ऐसा होने से मीडिया आलोचना को मीडिया और उनसे जुड़े लोगों के खिलाफ समझा जाता रहा है,ख़बरों की ख़बर इस दिशा में उनके अधिकारों की वापसी की बात करता है। ये मीडिया के प्रति नफरत पैदा करने के बजाय समझदारी पैदा करता है।

इन सारे मसलों पर आज बात होनी है। आज शाम तीन बजे प्रेस क्लब ऑफ इंडिया,रायसीना रोड, नई दिल्ली में "ख़बरों की ख़बरः क्यों और कितना जरुरी?" पर एक परिचर्चा का आयोजन किया जा रहा है। ये परिचर्चा मीडियाखबर डॉट कॉम के दो साल पूरे होने के मौके पर आयोजित किया जा रहा है। मीडिया से जुड़े मसले में जिन्हें भी दिलचस्पी है,उऩके लिए ये एक जरुरी इवेंट है। मीडिया,खासतौर से टेलीविजन इन्डस्ट्री के नामचीन लोगों के साथ मीडिया विश्लेषक इसमें अपनी बात रखेंगे। हम सब उनसे सवाल-जबाब करेंगे।..

नोट- कार्यक्रम की पूरी डीटेल इमेज की शक्ल में मौजूद है,आप इस पर क्लिक करके देख सकते हैं।
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2 Response to 'ख़बरों की ख़बर क्यों और कितना जरुरी? प्रेस क्लब में बहस आज'
  1. neelima sukhija arora
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/07/blog-post_30.html?showComment=1280487794051#c1990441632228559260'> 30 जुलाई 2010 को 4:33 pm

    बहुत सटिक मुद्दा उठाए हैं, जो लोग दूसरों के फटे जूते दुनिया को दिखा रहे हैं , उन्हें अपने नंगे पैर क्यूं नहीं दिखते। जितना करप्शन (हर तरह का) मीडिया में है, वो दूसरे फील्ड्स से कम तो नहीं है।

     

  2. mukti
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/07/blog-post_30.html?showComment=1280514299041#c2093373344011768683'> 30 जुलाई 2010 को 11:54 pm

    सटीक.

     

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