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बाजार का मीडिया और जैसा बाजार चाहे, वैसा मीडिया। बाजार का कोई सपना नहीं होता, बाजार मुनाफे से चलता है और वो किसी का नहीं होता। बाजार मीडिया को पूरी तरह नियंत्रित कर रहा है। बहसतलब 3 में “किसका मीडिया कैसा मीडिया” बहस का जो मुद्दा रखा गया, इस पर बात करते हुए मणिमाला की ये लाइन पूरी बहस के बीच सबसे ज्यादा असरदार रही। ये वो लाइन है, जिसके वक्ताओं के बदल जाने के वाबजूद बहस का एक बड़ा हिस्सा इसके आगे-पीछे चक्कर काटते हैं। इस लाइन को आप पूरी बहस के निष्कर्ष के तौर पर भी देख सकते हैं या फिर बहस का वो सिरा, जिसे लेकर सूत्रधार सहित कुल चारों वक्ता सहमत नजर आये। मीडिया को बाजार का हिस्सा मानने से हमारे कई भ्रम दूर होते हैं और इसके चरित्र को समझने में सुविधा होती है। शुरुआती वक्ता के तौर पर मणिमाला ने पूरी बहस को इसी दिशा में ले जाने की कोशिश की। हम मणिमाला की इस शानदार बात को आगे बढ़ाएं इससे पहले बहस की भूमिका किस तरह से तैयार होती है, थोड़ी चर्चा इस पर भी कर लें।
किसका मीडिया कैसा मीडिया ऐसा मसला है, जिस पर अंतहीन बहसें जारी रहने की संभावना है। कहीं से कुछ भी बोला जा सकता है। ऊपरी तौर पर एक विषय दिखते हुए भी इसके बहुत जल्द ही एब्सट्रेक्ट में बदल जाने की पूरी गुंजाइश दिखती है। इसके नाम पर पत्रकारिता के पक्ष में कसीदे पढ़े जा सकते हैं, उसके भ्रष्ट हो जाने पर मातमपुर्सी की जा सकती है या फिर बेहतर बनाने के नाम पर यूटोपिया रचा जा सकता है। संभवतः इन्हीं खतरों को ध्यान में रखते हुए आनंद प्रधान ने बहस की शुरुआत में ही जो एजेंडा हमारे सामने रखा – उससे एक तरह से साफ हो गया कि इसके भीतर वक्ता क्या बोलने जा रहे हैं और हमें क्या सुनने को मिलेगा?
वक्ता के तौर पर मंच पर बैठे पारांजॉय गुहा ठाकुरता, सुमित अवस्थी, दिलीप मंडल और मणिमाला के बोलने के ठीक पहले सूत्रधार आनंद प्रधान ने जो भूमिका रखी, उसमें जो सवाल उठाये, वो इसी बाजार के बीच पनप रहे मीडिया को लेकर उठाये गये सवाल थे। आनंद प्रधान ने इस बहस में तीन बिंदुओं पर बात करना जरूरी बताया। सबसे पहले तो ये कि मीडिया का सवाल ऑनरशिप के सवाल से अनिवार्य रूप से जुड़ा हुआ है। हमें हर हाल में इस बात की खोजबीन करनी होगी कि इस मीडिया पर किसका कंट्रोल है, किसके हाथ से ये संचालित है और इसके भीतर कितनी गुंजाइश रह गयी है? दूसरा बड़ा सवाल जनआंदोलनों को लेकर मीडिया का क्या रवैया है? आज आखिर ऐसा क्यों है कि देशभर में जितने भी छात्र आंदोलन होते हैं वो टेलीविजन से लेकर समाचारपत्रों तक के लिए बेगानी बात है, उसमें कहीं कोई मुद्दा मीडिया को दिखाई नहीं देता? इसी के साथ जुड़ा एक ये भी सवाल है कि आखिर क्या वजह है कि नब्बे के देशक में जो पत्रकार जनआंदोलनों की पृष्ठभूमि से आये थे, चाहे वो सीधे तौर पर किसी संगठन से या फिर छात्र आंदोलनों से जुड़े थे, उन्हें एक-एक करके साइडलाइन कर दिया जा रहा है? इन पत्रकारों को बाहर कर देने के साथ-साथ उनके मुद्दों की भी नोटिस नहीं ली जाने लगी। न्यूजरूम के भीतर स्त्री और दलित की मौजूदगी कितनी है, उनसे जुड़े कितने मुद्दे मीडिया की नोटिस में हैं? आज हेमचंद्र माओवादी करार दिया जाता है और इस पर मीडिया किसी भी तरह की खोजबीन या अफसोस जाहिर करने के बजाय उल्टे इसे सरकार के साथ जस्‍टीफाइ करने लग जाता है, ये हमारे सामने एक सवाल है। और तीसरा बड़ा सवाल है – विकल्प की बात। क्या हम मीडिया को इसी तरह कोसते रहेंगे या फिर इसे दुरुस्त करने जिसे कि आनंद प्रधान ने रिकवरी टर्म दिया, इस दिशा में भी कुछ काम कर पाएंगे, हमारे पास किस तरह के मॉडल हैं, किस तरह का खाका है, इस पर भी बात होनी चाहिए।
आनंद प्रधान की इस ठोस भूमिका के बाद ही मणिमाला ने मीडिया को बाजार का पहरुआ होनेवाली बात से बहस की शुरुआत की। मीडिया बाजार से अलग नहीं है और आगे की बहस में ये भी साफ हो गया कि वो न सिर्फ इसका पहरुआ है बल्कि उसका पर्याय भी है। मणिमाला ने पत्रकारिता और कभी हिंदी अकादमी में मीडिया टीचिंग के काम से मिले अनुभवों के आधार जो बातें हमारे सामने रखीं उससे थोड़ी-बहुत झलक इस बात की जरूर मिलती है कि ऐसा बिल्कुल भी नहीं है कि आज की मीडिया अगर बदतर हो गयी है तो ऐसा नहीं है कि पहले मीडिया का दामन बिल्कुल साफ था। पहले भी इसके भीतर कई तरह के झोल रहे हैं। लेकिन एक बात जो गौर करनेवाली है कि पहले इस मीडिया के भीतर एक स्ट्रक्चर हुआ करता था। संपादक नाम से एक संस्था हुआ करती थी जो किसी भी खबर को लेकर अपने संवाददाताओं को बैकअप देती थी कि हां ये खबर जानी चाहिए, ये खबर होनी चाहिए। आज वो बैकअप खत्म हो गया है। आज मीडिया का सबसे बड़ा दुर्भाग्य इसी बात को लेकर है। आज एक सपना है, ये सपना सरकार से लेकर तमाम पूंजीगत संस्थानों का है कि हम रात को दिन बना दें, कहीं भी रात को रात न रहने दें। लेकिन ऐसा करते हुए गांव के गांव ऐसे अंधेरे में धकेल दिये जा रहे हैं, जहां कभी भी सुबह नहीं आएगी। अफसोस मीडिया भी इसी रात को दिन बनाने में लगा हुआ है, उसे वो रात कभी दिखाई नहीं देती। मीडिया का कोई अलग से सपना नहीं है। वो इसी बाजार के साथ है। जिस तरह बाजार का कोई सपना नहीं होता सिर्फ मुनाफे की नीयत होती है आज मीडिया का भी वही हाल है। ऐसे में इसे मीडिया कहा भी जाए या नहीं, ये भी अपने आप में एक बड़ा सवाल है। मणिमाला की इस चिंता से जो सवाले उभरकर सामने आते हैं कि ऐसे में मीडिया को क्या जाए, इसके लिए अब छिटपुट तरीके से लॉबिइंग, पीआर और कुछ आगे जाकर दलाली जैसे शब्द इस्तेमाल में लाये जाने लगे हैं जो कि मीडिया के लिए एक खतरनाक स्थिति है।
इस पूरे मामले पर गौर करें तो अब मीडिया में खबर नहीं है। समाचार चैनलों ने जो समाचार चलाने के लाइसेंस ले रखे हैं, वहां समाचार नहीं है, उन समाचारों की ऑथेंटिसिटी नहीं है। वो धोनी की शादी में मीडिया के उस तमाशे को याद करती हैं, जहां होटल के ड्रांइंग रूम, सोफे और ऐसी ही जड़ चीजों के फुटेज दिखाकर हर चैनल हमें एक्सक्लूसिव स्टोरी परोस रहा होता है। तब हॉल में देखनेवालों के साथ-साथ बनानेवाले/दिखानेवाले भी ठहाके लगाने से अपने को रोक नहीं पाते, वक्ता के तौर पर आये आजतक के सुमित अवस्थी उसे फिर टीआरपी के फार्मूले से डिफाइन करने की कोशिश करते हैं। दरअसल समाचार चैनलों में खबरों के नहीं होने और बड़ी ही स्टीरियोटाइप की स्टोरी को बड़ी खबर बना देने का जो अफसोस मणिमाला कर रही हैं, वो मीडिया की सबसे बड़ी स्ट्रैटजी है कि इसे पूरी ताकत के साथ नॉनसीरियस माध्यम बनाया जाए।
आगे मणिमाला ने कहा कि यहां जब मीडिया की बात हो रही है, तो हमें मनोरंजन चैनलों पर भी बात करनी चाहिए। हमें कुछ भी दिखाया जाता और कहा जाता है कि जनता चाहती है। सवाल है कि जनता के पास च्वाइस कहां है? आप किसी भी चैनल पर चले जाइए, सब पर वही घिसे-पिटे कॉन्सेप्ट पर बने सीरियल, सब पर वही सास-बहू और सबने अपने-अपने लिए एक-एक भगवान चुन लिये हैं। टेलीविजन में कार्यक्रम को लेकर कोई वैरिएशन नहीं है।
इस पूरी बहस में मणिमाला ने जिस एक प्रसंग का जिक्र किया, उस पर गौर किया जाना जरूरी है। ये मीडिया के सच को समझने में मददगार साबित होंगे। मणिमाला ने हिंदी अकादमी के उन दिनों और उस घटना को याद करते हुए कहा जब वो वहां बतौर मीडिया फैकल्टी काम कर रही थीं। चुनाव के नतीजे सामने आये थे और जिसमें मीडिया ने जो अनुमान लगाये थे, वो सबके सब गलत थे। संस्थान में पढ़नेवाले मीडिया के बच्चों ने कहा कि ये सारे आंकड़े जिसे कि मीडिया ने दिखाया-बताया, उन्होंने ही तो इकठ्ठे किये थे। मणिमाला ने सवाल किया कि आपको बुरा नहीं लगा कि आपके नतीजे गलत निकले। बच्चों का जवाब था कि सच कौन बताता है, अब कोई थोड़े ही बताता है कि किस पार्टी को वोट देने जा रहे हैं। …तो आपने फिर क्या किया। बच्चों का जवाब होता है – खुद ही भर दिया। यही खुद ही भर देनेवाले आंकड़े मीडिया के न्यूजरूम तक जाते हैं जिसे कि दहाड़-दहाड़कर चैनल भविष्यवाणी में कन्वर्ट कर देते हैं। मणिमाला ने उन बच्चों के बीच फिर भी इस मीडिया में आने की वजहें जाननी चाही और जिसका कुल जमा निष्कर्ष है – ग्लैमर, रोजी-रोटी, मंत्रियों-रसूखदार लोगों से मिलने का मौका, सिलेब्रेटी के साथ वक्त गुजारने की गुंजाइश… आदि। आज बच्चे भी जानते हैं कि मीडिया में जाकर उन्हें क्या करना है?
शुरू से ही बहस का मिजाज कुछ इस तरह से बनता है कि हरेक वक्ता के बोलने के बाद आनंद प्रधान उनके वक्तव्य से निकले सवालों को छांटकर अलग करते हैं और अपने शब्दों में उसकी चर्चा करते हैं जिससे कि सामने बैठा ऑडिएंस उन सवालों पर एक बार फिर से गौर करे और फिर उन सवालों से जुड़े जो आगे सवाल बनते हैं, उन्हें आगे के वक्ता के लिए टॉस कर दें। इसमें आनंद प्रधान की खुद की भी राय शामिल रहती है। मणिमाला के बोले जाने के बाद उन्होंने कहा कि उन्हें इस बात से कतई दिक्कत नहीं है कि कोई अखबार या चैनल टेबलॉयड की शक्ल में क्यों है? ऐसा हमारे यहां क्या, अमेरिका सहित दूसरे देशों में भी है। लेकिन हमें अफसोस तब होता है, जब कोई क्वालिटी चैनल या अखबार टेबलॉयड बनने की तरफ बढ़ते चले जाते हैं। इंडिया टीवी कभी भी इस बात का दावा नहीं करता कि वो कोई क्वालिटी चैनल है लेकिन आजतक देश का सबसे नामी चैनल, जिस चैनल के साथ एसपी सिंह (सुरेंद्र प्रताप सिंह) का नाम जुड़ा हुआ है, उसके और इंडिया टीवी के बीच का फर्क मिटने लगा है, ऐसे में बहुत निराशा होती है, एक दर्शक के तौर पर समस्या होती है। ऐसे में मेरे कुछ दोस्तों ने सुझाव दिया कि प्रोफेशनलिज्म के जरिये मीडिया की समस्या को दूर किया जा सकता है (आनंद प्रधान और मोहल्लालाइव के मॉडरेटर ने फेसबुक के जरिए कुछ सुझाव और कमेंट देने की बात की थी, जिसमें कि कई तरह के विचार सामने आये)। लेकिन मैनचेस्नी ने प्रोफेशनलिज्म को लेकर विस्तार से चर्चा की है। उसने बताया कि मीडिया के इस रूप से किस तरह के खतरे सामने आएंगे, कॉरपोरेट मीडिया के क्या नफा-नुकसान हैं। (आनंद प्रधान ने मैनचेस्नी को लेकर थोड़ा विस्तार दिया। Robert Ww Mc Chesney की किताब का नाम the global media: the new missionaries of corporate capitalism है, जिसके कुछ हिस्से को पूंजीवाद और सूचना का युग नाम से हिंदी में ग्रंथशिल्पी ने प्रकाशित किया है।) उन खतरों में एक जो सबसे बड़ा खतरा है, वो ये कि कॉरपोरेट के मीडिया टेकओवर से पत्रकारों की सैलेरी तो जरूर पहले से कई गुणा बढ़ गयी लेकिन अखबारों और मीडिया में मैनेजमेंट के सामने पत्रकारों के विरोध करने की क्षमता धीरे-धीरे खत्म होने लग गयी। 15 हजार की नौकरी छोड़ना फिर भी आसान था लेकिन 15 लाख की नौकरी छोड़ना आसान नहीं रह गया। मैक्चेस्नी का कहना है कि इससे पत्रकारों के बीच दबाव बढ़ने लगे जबकि राजनीतिक खबरें घटने लग गयीं। इसी के साथ एक बड़ा सवाल पत्रकारों की जॉब सिक्यूरिटी का है। इस कमेंट के बाद बहस और जवाब के लिए वो सुमित अवस्थी की ओर टॉस करते हैं।
सुमित अवस्‍थी ने बहस और जवाब में जिन मुद्दों को उठाया, उन मुद्दों को हम पिछले ही दिनों उदयन शर्मा की याद में लॉबीइंग, पेड न्यूज और हिंदी पत्रकारिता के सवाल पर राजदीप सरदेसाई की जुबान से सुन चुके थे। राजदीप मीडिया से होने की वजह से एक निरीह सा ऑरा बनाते हुए वही बातें कह रहे थे, जिसे कि सुमित अवस्थी से बहसतलब में दोहरायी। इससे हम अंदाजा लगा सकते हैं कि खुद मीडिया के लोगों के बीच एक स्थिति बन रही है जो इस बात को सरेआम स्वीकार रहा है कि उसके भीतर से प्रतिरोध जिसके लिए कि उन्हें जाना जाता है, खत्म होता जा रहा है और उनके भीतर न कहने का माद्दा नहीं रह गया है। बहरहाल, सुमित अवस्थी ने आते ही कहा कि हम मानते हैं कि मीडिया बाजार का है। मीडिया जो क्रेडिट ले रहा है, वो अपने फायदे के लिए लेता है। लेकिन इसी मीडिया में वही बदलाव आये, जो बदलाव समाज में आये। आदिवासी की खबरें गायब हैं। 26 हजार ऐसे गांव हैं जहां कोई नेटवर्क नहीं है। उनमें से 60 प्रतिशत नक्सली प्रभावित क्षेत्र है। मीडिया क्यों इतना हद तक कॉमप्रोमाइज कर रहा है। आज एक भी संपादक ऐसा नहीं है जो ये कहे कि आज मैं इस्तीफा देता हूं, आज मैं खबर नहीं छापूंगा। मुझे ये कहते हुए मुश्किल का सामना करना पड़ता है कि हां आज हम कॉमप्रोमाइज करने लगे हैं। इसकी वजह मुनाफा है। इस मुनाफे की वजह से ही छोटी खबरों पर ध्यान नहीं दिया जाता। बेसिकली बात कनज्‍यूमरिज्म की आ जाती है। प्रीइंडीपेंडेंस इस देश के पास, मीडिया के पास एक मिशन था कि इस देश को आजाद कराना है, आज मीडिया में कोई मिशन नहीं है, मिशन की जरूरत है।
सुमित अवस्थी अपनी पूरी बातचीत को एक कॉन्फेशन मोड की तरफ ले जाते हैं। वो मणिमाला और आंनंद प्रधान की मीडिया से असहमतियों को सहजता से स्वीकार करते हैं। वो ये मानते हैं कि नहीं कहने की हिम्मत मीडिया के भीतर खत्म होती जा रही है। वो ये भी मानते हैं कि हम सब बड़ा बनना चाहते हैं। लेकिन कोशिश होनी चाहिए कि हम किसी को दबाकर न बढ़ें। हमें पहले अपने आप को बदलना होगा। चूंकि सुमित ये मानते हैं कि मीडिया के भीतर जो भी गड़बड़ियां हैं, उसका एक बड़ा हिस्सा खुद के भीतर की गड़बड़ियां है। इसलिए उन्हें इस बात का भरोसा है कि खुद के बदलने से स्थितियों में काफी हद तक बदलाव आएंगे। लेकिन मीडिया के भीतर की समस्या व्यक्तिगत स्तर की नहीं है, ये सांस्थानिक समस्या है और इसे व्यक्तिगत स्तर पर सुधर कर बदला नहीं जा सकता। इसी बात को लेकर दिलीप मंडल सुमित अवस्थी से पूरी तरह असहमत होते हैं, जिसकी चर्चा आगे।
सुमित अवस्थी को आजतक पर रात नौ बजे की बुलेटिन पढ़नी होती है, इसलिए वो बहस शुरू करने से पहले ही अपनी स्थिति साफ कर देते हैं। ऐसे में वक्ताओं के एक राउंड बोल देने के बाद बहस हो इससे पहले ही सुमित अवस्थी से सवाल-जवाब का दौर शुरू हो जाता है। इस सवाल-जवाब में पाणिनि आंनद (भूतपूर्व बीबीसी पत्रकार और फिलहाल सहारा समय) और राकेश कुमार सिंह (सामाजिक कार्यकर्ता) और भूपेन सिंह (मीडिया टीचर और पत्रकार) शामिल होते हैं। पाणिनि का सवाल है कि आखिर क्यों देश का कोई भी चैनल एक घंटे-दो घंटे या चार घंटे के लिए भी बीबीसी नहीं बन पाता है। अगर मीडिया पर बाजार का दबाव है, तो भी कुछ घंटे के लिए ऐसा तो किया ही जा सकता है। राकेश सवाल को मीडिया के रवैये तक ले जाते हैं और जो बात उन्होंने बाद में कही कि इस बहसतलब में किसी लाला को भी बिठाओ तब बात बनेगी, उसकी पूर्वपीठिका यहां रखते हैं। भूपेन ने सुमित अवस्थी से सीधा सवाल किया कि आप खुद को बदलने की बात कर रहे हैं और साथ में यह भी कह रहे हैं कि मुनाफा कमाना कोई बुरी बात नहीं है, ऐसे में आप किसको जस्‍टीफाइ कर रहे हैं, संस्थान को या फिर खुद को?
इन सवालों और कमेंट के जवाब में सुमित अवस्थी मीडिया प्रोफेशनल की तरह जवाब देने के बजाय एक सोशल एक्सपर्ट की तरह जवाब देने की कोशिश में नजर आये। सुमित का कहना रहा कि IIMC से मीडिया की पढ़ाई करनेवाला कोई भी बच्चा ये सोचकर मीडिया में नहीं आता कि उसे आगे जाकर करप्ट बनना है। उसके भीतर भी समाज को बदलने और खुद को बदलने की चाहत होती है। लेकिन स्थितियां ऐसी बनती हैं कि इसे कैरी नहीं कर पाता। उन सपनों को बहुत आगे तक ले नहीं जा पाता। यहां शोएब और धोनी की शादी की बात की गयी। मैं मानता हूं कि इस तरह दिखाया जाना गलत है लेकिन इस कमरे के बाहर भी एक हिंदुस्तान है। बाजार की मांग है। थोड़ा हंसते हुए टीआरपी की रिपोर्ट पर आते हैं कि आपको हैरानी होगी कि जिस समय ये स्टोरी चैनलों पर दिखायी गयी थी उस समय इसकी ही सबसे ज्यादा टीआरपी थी। सुमित घूम-फिर कर उसी फार्मूले पर आते हैं कि लोग देखते हैं, तो इसमें चैनल क्या करे? इसी समय मेरे मन में सवाल करने की तलब होती है कि पूछूं – माफ कीजिएगा सुमितजी, टीआरपी का सिस्टम दुरुस्त हो – इसके लिए मुझे आजतक की टीआरपी रैंकिंग गिरती चली जाए, इसके लिए बददुआएं मांगनी होगी। इस देश में कितने पीपल मीटर लगे हैं, आप उन बेचारों को वेवजह दोषी क्यों करार दे रहे हैं, जो ये जानते तक नहीं कि आपके कार्यक्रम देखने और न देखने का क्या असर होता है? एक बड़ी सच्चाई है जिसे कि प्रोचैनल तर्क देने के क्रम में किया जाता है कि साठ से सत्तर हजार की ऑडिएंस के लिए लोग शब्द का इस्‍तेमाल किया जाता है और तब ऐसा लगता है कि ये लोग देश की चालीस करोड़ की ऑडिएंस है। जो चैनल प्रधानमंत्री के लिए अपनी बूथपेटी बनाता है, क्या अपनी रैंकिंग गिर जाने पर ज्यादा से ज्यादा पीपल मीटर लगाने के पक्ष में सड़कों पर उतरा है या भविष्य में कभी उतरेगा? लेकिन माहौल थोड़ा हो-हो सा बन गया था सो नहीं पूछा और इसके थोड़ी ही देर बात सुमित अवस्थी जाने की विवशता जाहिर करते हैं। बहसतलब के पैनल का एक खंभा खिसक गया, जो कि गुलमोहर सभागार के भीतर के मौहाल को देखते हुए समझा जा सकता था कि अगर सुमित अवस्थी होते तो कई और सवालों और असहमतियों से घेरे जाते।
सुमित अवस्थी के चले जाने के बाद आनंद प्रधान दिलीप मंडल को बोलने के लिए जमीन तैयार करते हैं। एक बड़ा सवाल, हिंदी मीडिया के बारे में खासकर बात कर सकते हैं कि आरक्षण और राम जन्मभूमि के सवाल पर कैसे हमारा मीडिया बिल्कुल हिंदू मीडिया हो जाता है। पाकिस्तान के सवाल पर कैसे मीडिया हिंदी मीडिया और चैनल हिंदू चैनल हो जाते हैं। अंग्रेजी चैनल जिनकी छवि सरकार से सीधे टकराने की होती है वो भी ऐसे क्यों हो जाते हैं? दूसरे सामाजिक सवालों पर मीडिया का सवर्ण चरित्र क्यों हो जाता है? इन सारे सवालों के साथ दिलीप मंडल को आमंत्रित किया जाता है।
दिलीप मंडल बहस की शुरुआत बिना कोई लाग-लपेट के मीडिया के धंधे में बदल जाने के उस मंजर से करते हैं, जहां सवाल मीडिया के भीतर सरोकार के बचे रहने या नहीं रहने को लेकर नहीं है, सवाल है कि जिस मीडिया के भीतर कॉरपोरेट के करोड़ों रुपये लगे हैं, उसे दुगुने, तिगुने करने के क्या-क्या तरीके हो सकते हैं, कौन सी जुगतें भिड़ायी जा सकती हैं? मीडिया का पूरा चरित्र यहीं से तय होता है। दिलीप मंडल ने 15 जुलाई के सेंसेक्स बंद होने तक कुछ मीडिया घरानों की मार्केट कैपिटल की चर्चा की। आज सुबह 10:14 पर जब मैं उन घरानों की मार्केट कैपिटल देख रहा हूं तो मामूली फेरबदल के साथ वही है। सन टीवी नेटवर्क 17264.85 करोड़ रुपये, जी इनटरटेनमेंट 14718.62 करोड़ रुपये और जागरण प्रकाशन 3773.67 करोड़ रुपये। इसी तरह बाकी समूहों की भी हैसियत देखी जा सकती है। दिलीप मंडल मीडिया घरानों की करोड़ो रुपये में हैसियत बताने के बाद सीधा सवाल रखते हैं कि जिन लोगों को इतने करोड़ रुपये मैनेज करने होते हैं, आपको क्या लगता है कि वो क्या बात करते होगें? हम इसका जवाब सोचते हैं और बिना उनके बताये मन ही मन बुदबुदाते हैं, किसी भी मसले पर बात करते होंगे लेकिन मीडिया सरोकार की बात तो नहीं ही करते होंगे, जिसकी चर्चा और चिंता हम इस हॉल में बैठकर कर रहे हैं। दिलीप मंडल ने जब ये आंकड़े पेश किये, ठीक उसी समय दिनेश कुमार शुक्ल ने इनट्रप्‍ट किया और कहा कि मीडिया में पाखंड बढ़ा है। सब पाखंड है, दलाली के माध्यम से धनी बन गये। साहित्य से दूर हो गया मीडिया, शर्म आनी चाहिए। आप इस पर बहस क्यों नहीं कराते। आयोजक सहित कुछ ऑडिएंस उन्हें बताता है कि आप शायद नहीं आये हों, लेकिन बहसतलब एक में इस मुद्दे पर विस्तार से चर्चा हुई है। बहरहाल…
दिलीप मंडल ने हमें एक दिलचस्प जानकारी दी कि इन मीडिया घरानों की जब मीटिंग्स होती है, तो किस मीडिया हाउस में कौन लोग शामिल होते हैं – उन्होंने बाकायदा कॉरपोरेट के उन सीईओ के नाम लिये, जो बाजार को सीधे तौर पर प्रभावित करते हैं। इनकी विस्तार से चर्चा उनकी आनेवाली किताब में है। अब फिर वही सवाल कि ये कॉरपोरेट के साथ बैठकर मीडिया घराने किस मसले पर बात करते होंगे और क्या तय करते होंगे? दिलीप मंडल ने साफ तौर पर कहा कि मुझे अफसोस है कि ये सब कुछ समझने में थोड़ा वक्त जरूर लग गया कि मैं किसके लिए काम करता हूं – लेकिन कल अगर मैं फिर से मीडिया हाउस के साथ जुड़ता हूं तो कहीं कोई दुविधा नहीं रह जाएगी कि मैं क्या कर रहा हूं? मुझे लगता है कि किसका मीडिया और कैसा मीडिया पर बात करते हुए हम ऑनरशिप कैरेक्टर को बेहतर तरीके से समझने की जरूरत है। इसी क्रम में उन्‍होंने मराठी मीडिया सकाल के एमडी जो कि शरद पवार के भाई हैं, के उस बयान को शामिल किया जिसमें वो कहते हैं कि मैं खबर और विचार पाठकों बेचता हूं और अपने पाठक विज्ञापनदाताओं को दे देता हूं।
हम मुफ्त में एक चैनल देखते हैं और चाहते हैं कि आंध्रप्रदेश की गरीबी पर बात करें – क्यों करेंगे? दिल्ली और मुंबई में धंधा चल गया तो चैनल चल जाता है। ऑनरशिप का चरित्र ऐसा है कि वो प्रो-पीपुल हो ही नहीं सकता। बोर्ड में ऐसी चर्चा हो ही नहीं सकती कि कॉमरेड आजाद क्यों मर गये। दूसरा हिस्सा न्यूजरूम का है। अब न्यूजरूम में अस्सी के दशक के लोग बहुत कम हैं। अब न्यूजरूम के भीतर भी एक खास तरह के कैरेक्टर बन रहे हैं। स्टॉक होल्डर हो गये हैं। जिसमें एक सामाजिक स्ट्रक्चर भी है (दिलीप मंडल और प्रमोद रंजन ने मीडिया संस्थानों के भीतर के जातिगत समीकरण पर लगातार लिखा है। प्रमोद रंजन ने मीडिया में हिस्सेदारी पर किताब की शक्ल में एक रिपोर्ट भी प्रकाशित की है।) इस पर आज मैं बात नहीं कर रहा। न्यूजरूम के भीतर जो प्रभावी (आर्थिक तौर पर) हैं, वो हाउस के शेयर खरीदते हैं। हर आदमी प्रॉफिट चाहता है, इसलिए ये मीडियाकर्मी उस दिशा में सोचना शुरू कर देते हैं। पहले मालिक का हित होता था, अब उसमें उनके खुद का भी हक शामिल है, इसलिए भी मीडिया का चरित्र बदलता है।
तीसरी बात कि आज सरकार भी मीडिया के लिए कमाई का एक बड़ा जरिया है। अगर जनपक्ष की चिंता करनी है, तो उसे वैकल्पिक मीडिया की तरफ जाना होगा। जो राज्यसभा जाने की उम्मीद करते हैं, पांच साल तक जो किसी खास पार्टी के लिए लिखते हैं, काम करते हैं, उन्हें पेड न्यूज पर बात करते हुए किस रूप में देखा-समझा जाए? क्यों वहां भी कुछ हो रहा है क्या? क्या सब जगह सिर्फ पैसे की तरह की देखेंगे कि वो पेड न्यूज है या नहीं? दिलीप मंडल मॉनेटरी फायदे के साथ-साथ जिस मौके के फायदे की बात करते हैं और तब पेड न्यूज को पारिभाषित करते हैं, पेड न्यूज पर लगातार बोलनेवाले रामबहादुर राय ने इस पर अभी तक कोई बात नहीं की। कम से कम जितनी बार उन्हें मंच पर सुना, वहां तो नहीं ही। अभी वे 72 पेज की प्रेस काउंसिल की जिस रिपोर्ट की बात कर रहे हैं, वहां शायद हो, उम्मीद भर ही कर सकते हैं। पूरी बातचीत के बाद दिलीप मंडल का आखिरी वाक्य रहा – मुझे मीडिया स्ट्रक्चर में उम्मीद की कोई किरण दिखाई नहीं देती है। मैं वहां जाऊंगा भी, तो धोखे में नहीं रहूंगा।
दिलीप मंडल की बातचीत से जो कुछ निकलकर सामने आया उसे सवाल की शक्ल देते हुए आनंद प्रधान से पारांजॉय गुहा ठाकुरता के आगे बढ़ाया। उन्होंने कहा कि ठाकुरताजी के आगे सवाल ऑनरशिप का है। क्या प्रथम और दूसरे प्रेस आयोग ने जो कहा है, उसका पालन किया जा रहा है? क्या कीमतें वो सबकुछ होना चाहिए? हमने देखा कि कैसे बड़े अखबारों ने छोटे अखबारों को खत्म कर दिया। क्या हम ऑनरशिप के पैटर्न की चेंज की बात नहीं कर सकते। जर्नलिस्ट की जॉब सिक्यूरिटी का सवाल – इस पर भी बात होनी चाहिए। …ये क्यों नहीं उठाने जाने चाहिए? क्या विज्ञापन और खबर के बीच का जो अनुपात है उस पर बात नहीं होनी चाहिए। …इन सारे सवालों के साथ पारांजॉय गुहा ठाकुरता अपनी बात रखते हैं।
अमेरिका में क्रॉसमीडिया रिस्टिक्शन है यहां नहीं है। ये आश्चर्य का देश है। भारत में एक अकेला ही लोकतंत्र है, जहां रेडियो की खबरों पर पूरी तरह आकाशवाणी की मॉनोपॉली है। दूसरा सवाल कि मीडिया के लिए कम्पटीशन का क्या मतलब है? उन्होंने पूंजीवाद के पैटर्न को बताते हुए साबुन का उदाहरण दिया और बताया कि पूंजीवाद का तर्क है कि जितना ज्यादा कम्पटीशन बढेंगे, क्वालिटी में उतनी ही ज्यादा बढ़ोतरी होगी, सुधार होगा। मगर मीडिया का बाजार आश्चर्य का बाजार है। जितने चैनल बढ़े हैं उतने ही उनकी गुणवत्ता कम हुई है। अगर पूंजीवाद के तरीके पर भी भरोसा करें, तो हमें यहां उल्टा दिखता है। मिशन की जगह हम कमीशन की जगह पहुंच गये है। जरदारी ने कहा कि जर्नलिस्ट आर वर्स्ट दैन टेर्ररिस्ट। …मीडिया के भीतर भ्रष्टाचार व्यक्तिगत से बाहर आ गया है, अब ये इन्सटीट्यूशनलाइज हो गया। ये मीडिया नेट से शुरू हुआ। उन्होंने इस मीडिया नेट के पूरे पैटर्न की विस्तार से चर्चा की और बताया कि कैसे कोई सिलेब्रेटी के साथ चार-पांच लोगों के डिनर का आयोजन है, तो उसमें से एक मीडिया के भी बंदे को बुला लिया गया और फिर फुल पेज पर वो कवरेज हो गयी।
तीसरा स्तर है जो राजनीति और पॉलिटिकल न्यूज के बारे में। पाठक को खबर और विज्ञापन के बारे में पता ही नहीं है। मीडिया में चेकबुक में पैसे नहीं ले रहे हैं। कोई आयकर नहीं है। …इसलिए ये तीसरे स्तर का करप्शन हो गया। उन्होंने इस क्रम में अतुल अंजान के उस बयान को शामिल किया जिसमें उन्होंने कहा कि मीडिया वाला टेंटवालों की तरह हो गया है। जिस तरह टेंटवाले शादी और उत्सवों में कीमतें ज्यादा बढ़ा देते हैं, वही काम मीडिया चुनाव और ऐसे मौके पर किया करता है। लालजी टंडन का रेफरेंस दिया जो कि पेड न्यूज के दौरान काफी चर्चा में रहा और जागरण की साख पर भी कमोबेश बट्टा लगा लगा। पत्रकार की जो छवि है, वो छवि एकदम बदल गयी है। कुर्ता नहीं पहनते, झोला नहीं टांगते। पत्रकारों की छवि बदली है। अपने दो बार देश के प्रधानमंत्री के साथ गये विदेशी दौरे की चर्चा करते हुए और बाद में अपने संपादक विनोद मेहता के कहने पर उसे बाकायदा लेख की शक्ल देने पर ठाकुरता ने कहा कि वहां भी हमें क्या दिये जाते हैं? व्हिस्की, चॉकलेट, चीज, कपड़े और भी बहुत सारी चीजें। मेरे ये सब लिखने पर दोस्तों ने कहा कि ये सब क्यों लिख दिया? लेकिन सवाल है कि इसे भी तो हम विश्लेषण में शामिल करेंगे ही न। ये भी तो मीडिया के चरित्र को निर्धारित करता है।
जॉब सिक्यूरिटी पर ठाकुरता ने कहा कि नब्बे फीसदी पत्रकार सिर्फ पत्रकार नहीं हैं। उनका जीवन विज्ञापन लाने से जुड़ा हुआ है। ठाकुरता की इस बात को अगर हम गांव के परिप्रेक्ष्य से थोड़ा और आगे खिसकाकर ले जाएं, तो स्थिति ये है कि मीडिया इंडस्ट्री के भीतर पत्रकारों की एक बड़ी जमात है जो कि विज्ञापन जुटाने की शर्तों पर सर्वाइव कर रही है। टीआरपी धोखा है लोगों के साथ। करीब 15 से 16 करोड़ टेलीविजन सेट हैं। कुछ दिन पहले साढे सात हजार टीआरपी बक्से थे। अब बढ़कर बीस हजार हो गये। दिस टीआरपी सिस्टम इज टोटली हॉक्स। पूरे बिहार में एक भी पीपल मीटर नहीं हैं, जम्मू कश्मीर में नहीं है। (लेकिन केपीएमजी और वाटरकूपर्स के हवाले से जो नयी रिपोर्ट सामने आयी है, उसमें इस बात की चर्चा है कि बिहार के कुछ हिस्से में पीपल मीटर हैं और उत्तर प्रदेश के इलाके में भी)। गांव के लोग ट्रैक्टर चलानेवाली बैटरी निकालकर टीवी देखते हैं लेकिन वहां एक भी पीपल मीटर नहीं है। सवाल ये है कि तो फिर आप किसके लिए प्रोग्राम बना रहे हैं? ठाकुरता के इस अफसोस और सवाल का जवाब हम सकाल के एमडी के बयान के बीच से निकाल सकते हैं। गांव के लोगों में नहीं है पीपल मीटर तो सवाल है कि आप किसके लिए प्रोग्राम बना रहे हैं।
लेकिन इन सबके बावजूद ठाकुरता ने कहा कि वो दिलीप मंडल की तरह निराशावादी नहीं है, वो आशावादी हैं। इसलिए ये नहीं मानते कि मीडिया का भविष्य अंधकारमय है। इसमें अभी भी संभावनाएं हैं। इस देश में मान लीजिए 20-25 अखबार बिके हुए हैं, वो पैसे और प्रभाव में आकर खबरें छापते हैं लेकिन बाकी के अखबार तो चीजों को सामने ला रहे हैं न। उन्होंने इस मामले में कुछ उदाहरण भी पेश किये। एक बार फिर क्रॉस मीडिया रिस्टिक्शन्स की संभावना पर जोर देते हुए उन्होंने इस दिशा में काम किये जाने की जरूरत पर बल दिया लेकिन हां, ऑडिएंस के सुझाव पर ये भी कहा कि आंदोलन आप खड़े कीजिए, हम आपके साथ होंगे।
वक्ताओं की ओर से बहस का एक चक्र पूरा हो जाने के बाद ऑडिएंस की ओर से सवालों के बौछार शुरू हो गये। इस बीच सवाल पूछने को लेकर आपाधापी भी मची, कुछ हास-परिहास का भी दौर चला। एक-दो ने बेवड़े के अंदाज में सवाल से ज्यादा मसखरी भी कर दी। लेकिन जो भी सवाल आये उसे सरसरी तौर पर देखना जरूरी होगा। एक तो ये कि पाणिनि ने जब बार-बार बीबीसी को आदर्श स्थिति करार देने की कोशिश की तो राकेश कुमार सिंह सहित कई लोगों ने बीबीसी के उस रवैये पर सवाल खड़े किये, जहां 9/11 के बाद आंख मूंदकर भरोसा करनेवाला अंदाजा खत्म हो गया। यही बहस आगे चलकर पब्लिक ब्रॉडकास्टिंग तक गयी जिसे लेकर अरविंद दास ने सवाल किया कि इसे सवालों के घेरे में क्यों न लिया जाए? अरविंद के इस सवाल को मैंने और आगे ले जाना जरूरी समझा इसलिए दूरदर्शन के उस रवैये की बात कही, जहां कि घाटे की भरपाई के लिए शांति, स्वाभिमान, वक्त की रफ्तार और जुनून जैसे टीवी सीरियल लंबे समय तक खींचे गये। बातचीत का एक बड़ा हिस्सा वैकल्पिक मीडिया की जरूरतों पर आकर टिक गया।
मणिमाला मानती हैं कि मीडिया का ये रूप शुरू से रहा है और वो आज भी काम कर रहा है जबकि आनंद प्रधान मानते हैं कि ब्लॉग और इंटरनेट पर साइटों के आने की वजह से मीडिया को आईना दिखाने का काम ज्यादा हुआ है। उन्होंने उदयन शर्मा की याद में होनेवाले व्याख्यान में श्रवण गर्ग (भास्कर समूह) के उस बयान को शामिल किया, जिसमें उन्होंने कहा कि अब शर्म आने लगी है। आनंद प्रधान के मुताबिक ये शर्म ब्लॉग में मीडिया के प्रतिरोध में लगातार लिखने की वजह से हुआ है। समय के बढ़ने के साथ सवालों के साथ-साथ सुझावों की संख्या बढ़ती चली जाती है, जिसमें एक बुजुर्ग ऑडिएंस की तरफ से सवाल भी किया जाता है कि ऐसी बहस कराके हम क्या बदल लेंगे। असली सवाल है कि बिल्ली के गले में घंटी बांधे कौन? लेकिन हम बहस और सेमिनारों को इस वीहॉफ पर खारिज नहीं ही कर सकते कि इससे कुछ बदलता नहीं है। ये बदलता है भी या नहीं ये अलग मसला है लेकिन ये जरूर है कि बिना बहस और बातचीत के क्या बदलाव की जमीन तैयार करना संभव है?
वक्ता फाइनल वर्डिक्ट के तौर पर अपनी बातों का क्रक्स रखते हैं। सवालों और सुझावों के बाद आनंद प्रधान पूरी बातचीत को समेटते हैं और एक बार फिर मीडिया रिकवरी, जर्नलिस्ट यूनियन और जॉब सिक्यूरिटी की बात को दोहराते हैं। सबका शुक्रिया अदा करने के लिए यात्रा प्रकाशन की संपादक जो कि बहसतलब के आयोजकों में से हैं को मंच पर बुलाते हैं। नीता सबों का शुक्रिया इस बात से करती है कि आज जबकि शहर में दूसरे कई बड़े कार्यक्रमों का आयोजन हुआ है, प्रभाष जोशी की याद में बड़ा कार्यक्रम चल रहा है, आप सब यहां आये, इसके लिए बहुत-बहुत शुक्रिया। बहसतलब के लिए कमिटेड ऑडिएंस के बीच संतोष का भाव पैदा होता है। मंच पर बैठे सारे वक्ताओं का, खासकर पारांजॉय गुहा ठाकुरता का शुक्रिया कि बड़ी सहजता से हमारे निमंत्रण को स्वीकार किया। इसके साथ ही उन्होंने अगली 17 तारीख को फोटोग्राफी पर होनेवाली बहसतलब की भी अग्रिम सूचना दी।
हॉल के भीतर बहस का महौल बना ही रह जाता है। लेकिन समय समाप्ति की घोषणा और हॉल खाली करने की मजबूरी के बीच ऑडिएंस छोटे-छोटे समूहों में बंट जाता है। कुछ अपनी बातों को और जोर देकर कहने के लिए, कुछ असहमत होने के लिए और कुछ हां में हा मिलाने और मिलवाने के लिए।
मूलतः प्रकाशित- मोहल्लाlive
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1 Response to 'मीडिया पर बहसतलब-3,किसने क्या कहा?'
  1. राकेश
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/07/3.html?showComment=1279290302831#c4262457147001559175'> 16 जुलाई 2010 को 7:55 pm

    विनीत, तुमसे सार्वजनिक रूप से ईर्ष्‍या व्‍यक्‍त करता हूं. इतना और बेहतर न लिख पाने का मलाल हमेशा रहता है. तुम उस अवधारणा का घनघोर अपवाद हो जो ज्‍़यादा लिखने पर उल-जुलूल लिखने लगता है. इतनी ऑथेंटिसिटी के साथ लिखा कम ही मिलता है. लोग लिखते हुए झालमुढी बनाने लगते हैं. वहीं हो जाता है तेल.

    बढिया लिखे. एक भी महत्त्वपूर्ण बात न छूटने दिया. दरअसल, बहस कायदे से हो, इसके लिए तथ्‍यों का होना ज़रूरी है. सबसे पहले और एक्‍सक्‍लूसिव बनाने के चक्‍कर में मीडिया (तमाम प्रजातियों की) जिस तरह से ख़बरों की वाट लगाते हैं, उसका असरदार असर इन डॉटकॉमों पर दिखने लगा है. लगने लगा है कि लोकप्रियता के फिराक में ये बाज़ार के आगे खोलकर बिछ जाने को तैयार हो चले हैं.

    'किसी भी बहस की पूर्वपीठिका क्‍या होती है, शायद मैं जान नहीं पाया हूं या जो जाना है वो ग़लत है. मुझे लगता था/है कि किसी भी बहस में एक ही व्‍यक्ति चित और पट, दोनों की तरफ़दारी नहीं करेगा/ी. कम से कम आयोजकों का कोई न कोई पक्ष और नज़रिया ज़रूर होगा. न जाने क्‍यों, मुझे इस बार ज्‍़यादा ज़ोर से यह महसूस हुआ कि बहस में प्‍वायंट स्‍कोर करने वाली भावना ज्‍़यादा हावी रही. मुख्‍यधारा की मीडिया के बारे में सभागार में सुत्रधार से लेकर वक्‍ताओं और श्रोताओं तक ने जो चिंताएं व्‍यक्‍त की, जो सवाल उठाए क्‍या वो मीडिया की किसी और प्रजाति के संदर्भ में जायज़ नहीं होगा?

    मुख्‍यधारा के मीडिया से जो क़ायदे का काम न कर पाने का दर्द लिए बाहर हुए, या न्‍यूज़ रूम में घुसते ही जिनका माथा टनकने लगता है, या जिनको नोजिया और बदहज़मी की शिकायत होने लगती है; वे कम-से-कम बाहर आकर वैसी आब-ओ-हवा का निर्माण तो नहीं ही करेंगे जिससे पिंड छुड़ाकर वे आए हैं.

    कल सूत्रधार आनंद प्रधानजी ने सुमित अवस्‍थी को आमंत्रित करते हुए एसपी वाले आजतक के इंडिया टीवी के साथ क़दमताल करने पर अपनी निराशा व्‍यक्‍त किया था, पर उसके लिए सुमित को जिम्मेदार नहीं ठहराया था. बिल्‍कुल सही किया था. दिलीप मंडल और प्रॉन्‍जय गुहा ठकुराता को सुनने के बाद लगा कि सुमित की औक़ात तो इस पूरे खेल में एक प्‍यादा से ज्‍़यादा नहीं है. वहां तो बड़े-बड़े लाला और घाघ नौकरशाह अंगदी पांव जमाए जमे पड़े हैं. सूत्रधार महोदय के साथ-साथ मणिमाला तथा मंडल और ठकुराता मोशाय ने अपने-अपने ढंग से स्थिति में बदलाव के प्रति उम्‍मीद जतायी थी. विनीत की रपट में इसका विस्‍तार से उल्‍लेख है. लगभग चारो दिग्‍गजों ने वैकल्पिक मीडिया के प्रति उम्‍मीद जतायी. ये ज़रूर माना उन्‍होंने कि सायबर मीडिया की पहुंच फिलहाल सीमित है और निकट भविष्‍य में इसके दायरे में विस्‍तार की कोई संभावना नहीं है. फिर भी उम्‍मीद सायबर प्रजाति से ही है.

    यहां, जब सायबर जगत में देखता हूं तो लगता है टीवी वाले क्‍या लड़ेंगे! उनसे ज्‍़यादा टीआरपी तो इस ऑल्‍टरनेटिव मीडिया को चाहिए. वही तिकड़म, वही प्रपंच जोते जा रहे हैं जिसे छपासगंज और वाह्यप्रसारण वाहन वाले अभ्‍यास करते हैं. वश चले तो पट्टा भी चला दें ब्रेकिंग न्‍यूज़ का. टीकर-पीकर टाइप की चीज़ तो दिखने ही लगी है. काहे, आपको काहे एक्‍सक्‍लूसिव ख़बर की ज़रूरत पड़ने लगी? हम जो आपको दें वो और किसी को न दें, पर बताइए तो क्‍यों?

    बहरहाल, सवाल तो है ही कि मीडिया किसके पक्ष में काम करेगा, लोकतंत्र की मजबूती में इसकी कोई भूमिका अब होगी?

     

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