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करोड़ो रेडियो लिस्नर (श्रोताओं) के दिलों पर राज करनेवाला AIR FM GOLD 106.4 आज खुद चंद लोगों की अफसरशाही और मनमानी का अड्डा बनकर रह गया है। कार्यक्रमों के प्रसारण का जो स्तर और भीतर की जो हालत है, उसे देखकर किसी के भी मन में ये सवाल जरूर उठेगा कि सूचना, मनोरंजन और जागरुकता के नाम पर देश के मेहनतकश लोगों के खून-पसीने की करोड़ों रुपये की कमाई को जिस तरह पानी में बहाया जा रहा है, उसके लिए कौन लोग जिम्मेदार हैं? इस माध्यम को कमजोर करने के जो कुचक्र रचे जा रहे हैं और देश के इस एफएम चैनल को कैसे किसी ऊटपटांग निर्देश जारी करनेवाले लोगों के हाथों सौंप दिया गया है, उनसे सवाल किये जाएं? हालात ये है कि संसद भवन के ठीक बगल में चलनेवाला ये चैनल अब धीरे-धीरे कबाड़खाना की शक्ल में तब्दील होता जा रहा है।

इसे चलाने के लिए करोड़ों रुपये के बजट तैयार किये जाते हैं, पैसे भी आवंटित होते हैं लेकिन लापरवाही और भीतरी गड़बड़ियों की वजह से करीब सालभर से प्रजेंटरों को कोई भुगतान नहीं किया जाता है, सही चीजों को हटाकर भारी ठेके देकर नयी गैरजरूरी चीजें लगायी जाती है, चालू हालत की चीजों को कबाड़खाने में डाल दिया जाता है। चीजों के रखरखाव का जो आलम है उसे देखते हुए किसी भी रेडियोप्रेमी का खून खौल जाए। दुर्लभ और कीमती रिकार्ड्स छतों पर फेंक दिये गये हैं जिसे कि कोई पूछनेवाला नहीं है। कुछ के पैकेट खोले तक नहीं गये और काफी कुछ कबाडियों के हाथों औने-पौने दामों पर बेच दिया गया। पूरे सिस्टम के डिजिटाइज हो जाने की वजह से पुरानी मशीनें और सामान म्यूजियम के नाम पर साइड कर दिये गये हैं जिसका कुछ भी मेंटेनेंस नहीं है।

शुरुआती दौर से जुड़े जिन लोगों ने इसे देश का नंबर वन एफएम चैनल बनाया, वो इस पूरी स्थिति को लेकर दुखी हैं। वो अभी भी दिन-रात इसकी बेहतरी के लिए काम करने को तैयार हैं। लेकिन भीतर का माहौल ऐसा है और इस किस्म की बदहाली है कि कोई चाहकर भी व्यक्तिगत स्तर पर बहुत कुछ नहीं कर सकता। इनके बीच लंबे समय से इन सब बातों को लेकर गहरा असंतोष रहा है। पिछले दिनों (17 फरवरी, 2010) AIR FM GOLD की बिगड़ती हालत और कार्यक्रमों के गिरते स्तर को लेकर रेडियो प्रजेंटरों ने इसकी शिकायत ऑल इंडिया के डायरेक्टर जेनरल से की थी। उस शिकायत पत्र में साफ कहा गया था कि इस चैनल को चलाने के लिए विज्ञापन की जो जरूरत है, उसे लेकर कोई मार्केट स्ट्रैटजी अपनाने के बजाय गलत हथकंडे अपनाये जा रहे हैं। ज्यादा से ज्यादा एसएमएस आधारित कार्यक्रमों को शामिल करने से कार्यक्रम की क्रिएटिविटी खत्म होती है।

इधर जिन कायक्रमों और जिंग्लस को शामिल किया गया है, वे एफएम गोल्ड की ब्रांड इमेज के अनुकूल नहीं है। लेकिन इस दिशा में किसी भी तरह की संतोषजनक कारवाई न होने की स्थिति में अब उन्होंने save fm gold movement का एलान किया है। इस कड़ी में 26 अप्रैल 2010 को एक बार फिर ऑल इंडिया रेडियो की डायरेक्टर जेनरल को शिकायत पत्र लिखकर बद से बदतर होती चैनल की स्थिति से अवगत कराने की कोशिश की है। फिलहाल वो अपनी सारी कारवाई संबंधित अधिकारियों और विभागों के प्रति शिकायत दर्ज करके कर रहे हैं फिर भी किसी भी तरह का सुधार नहीं होता है तो जल्द ही सड़कों पर उतर आएंगे और फिर ये आंदोलन सिर्फ प्रजेंटरों का न होकर हम सब रेडियोप्रमियों का होगा।

एफएम गोल्ड के भीतर जो भी गड़बड़ियां हैं, वो कोई एक स्तर पर नहीं है। इस संबंध में अगर आरटीआई डालें जाएं, तो संभव है कि आकाशवाणी के भीतर बड़े पैमाने पर घोटाले निकलकर सामने आएं जिसमें कि पैसे को लेकर भी घपले शामिल हो सकते हैं। इस बात की संभावना इसलिए भी जतायी जा रही है कि पिछले एक साल से करीब साठ एफएम गोल्ड के प्रजेंटरों, जो कि चैनल की आवाज हैं, जिनके कारण लोग चैनल से सीधे-सीधे जुड़ते हैं, उन्‍हें कोई भुगतान नहीं किया गया है। इस बात की शिकायत पर केंद्र के वित्तीय अधिकारी की तरफ से जवाब मिला कि उनका पैसा कॉमनवेल्थ के लिए लगा दिया गया है, इसलिए ऐसा हुआ है।

लेकिन मामला ये नहीं है। सूत्रों के अनुसार रेडियो प्रजेन्टरों के लिए दो करोड़ रुपये अलग से जारी किये गये हैं और कॉमनवेल्थ से आपकी पेमेंट का कोई संबंध ही नहीं है। उस काम के लिए अलग से 25 करोड़ रुपये आकाशवाणी को दिये गये हैं। ऐसे में सवाल उठते हैं कि एक ही संस्थान को लेकर दो अलग-अलग वर्जन क्या कहते हैं?

जारी है यहां तुगलकी फरमान
इन दिनों रेडियो प्रजेंटरों पर दबाव बनाकर एक ड्राफ्ट पर साइन करवाया जा रहा है, जिसमें ये लिखा है कि प्रजेंटर एक महीने में छह से ज्यादा किसी भी विभाग, चैनल में कार्यक्रम नहीं करेंगे। इस पर साइन करने का मतलब होगा कि प्रजेंटर अपनी मर्जी से छह से ज्यादा कार्यक्रम नहीं करना चाहते हैं जबकि ये छह कार्यक्रम करके भी उनका क्या होगा? एक कार्यक्रम के लिए उन्हें 1600 रुपये मिलने का प्रावधान है। पहले ये राशि लगभग इसकी आधी हुआ करती थी। बढ़ी हुई ये राशि उन्हें अभी मिली नहीं है। राजधानी या इंद्रप्रस्थ चैनल में ये राशि मात्र 400 रुपये है। अधिकांश लोगों को कम से कम तीन के बाद चार या पांच कार्यक्रम करने को मिलते हैं। अगर उन्हें 6 कार्यक्रम मिल भी गये तो कुल 9,600 रुपये बनते हैं। कुछ प्रजेंटर जो कि पार्टटाइम के तौर पर काम करते हैं, उन्हें छोड़ दें तो बाकी के जो पूरी तरह इस पर ही निर्भर हैं उन्हें अगर सालभर तक दस हजार के आसपास की ये रकम भी नहीं मिलती है तो उनकी हालत क्या होगी – इसका अंदाजा आप लगा सकते हैं।

इस पर भी साइन करवाने के पीछे की राजनीति ये है कि कोई भी व्यक्ति अगर कैजुअल स्टेटस पर 90 दिनों तक संस्थान में काम कर लेता है, तो परमानेंट होने की उसकी दावेदारी बढ़ जाती है। इसलिए पूरी कोशिश होती है कि ऐसी स्थिति आने ही न दिया जाए। कागजी तौर पर ऐसा कहीं नहीं लिखा है कि वो महीने में छह दिन ही कार्यक्रम देंगे। इस संबंध में जब एक प्रजेंटर ने साइन करने से ये कहते हुए मना कर दिया कि आप हमें लिखित तौर पर दिखाएं कि किस ऑफिशयल ऑर्डर के तहत ऐसा है, तो प्रोग्राम एग्जीक्यूटिव रीतू राजपूत का साफ कहना है कि अब हर बात के लिए फाइलें तो नहीं खोली जा सकती। वैसे भी आकाशवाणी से जुड़ते समय ही उसके कागजात में इतने क्लाउज पहले से शामिल होते हैं कि प्रजेंटर के हाथ-पैर पूरी तरह बंध चुके होते हैं। वो ज्यादा कुछ कर नहीं सकता। लेकिन उसके बाद पेक्स (प्रोग्राम एग्जीक्यूटिव) की मनमानी के बीच सर्वाइव करने का एक ही तरीका है कि वो महज एक चमचा बनकर रह जाए।

भाषा में बोल्‍ड हूं, इतना कायर हूं कि एफएम गोल्‍ड हूं

भाषा को लेकर आकाशवाणी सहित एफएम गोल्ड में ऊटपटांग प्रयोग जारी है। चैनल की पेक्स रीतू राजपूत का जबरदस्ती का हिंदी प्रेम स्टूडियो के भीतर चस्पाये निर्देशों से लेकर कार्यक्रम में प्रयोग किये जानेवाले शब्दों, संबोधनों में भी साफ तौर पर दिखाई देता है। यहां प्रजेंटरों के लिए सूत्रधार शब्द का प्रयोग किया जाता है और एसएमएस पैगाम हो जाता है। वैयाकरणिक तौर पर ये दोनों शब्द प्रयोग तो गलत हैं ही, दूसरी बात कि ये हिंदी को सहज बनाने के बजाय हास्यास्पद ज्यादा बनाते हैं।

भाषा को लेकर आकाशवाणी सहित चैनल के भीतर का एक और गड़बड़झाला है। ऑडिशन की लंबी प्रक्रियाओं के बाद, जिसमें कि तीन से चार लोग ही पास हो पाते हैं, वाणी सर्टिफिकेट कोर्स नाम से पांच दिनों की ट्रेनिंग दी जाती है। इस ट्रेनिंग के लिए पास हुए लोगों से पांच हजार रुपये लिये जाते हैं। कोर्स के पीछे का तर्क है कि वो इसमें भाषा-दक्षता, विशेषता और व्यावहारिक प्रयोग के बारे में जानकारी देंगे। लेकिन दिलचस्प है कि ये ट्रेनिंग सिर्फ हिंदी, अंग्रेजी और उर्दू के लोगों के लिए है। बाकी नेपाली, तमिल, मलयालम या दूसरी भारतीय भाषाओं के लिए नहीं है। विदेश प्रसारण सेवा में जो भाषाएं शामिल हैं, उनके लिए भी नहीं। वो बिना किसी तरह की रकम या ट्रेनिंग लिये प्रवेश पा जाते हैं। पिछले महीनों इस बात को लेकर काफी हंगामा भी हुआ जिसमें कि आकाशवाणी की विदेश प्रसारण सेवा ने नेपाली को विदेशी भाषा करार दे दिया।

बहरहाल, ऐसा इसलिए है कि इतनी बड़ी आकाशवाणी के पास इन भाषाओं की ट्रेनिंग देने की कोई व्यवस्था नहीं है। लेकिन इसका नतीजा पांच हजार देकर आये लोगों के बीच के असंतोष का पनपना है और ये भाषाई भेदभाव का मामला बनता है। वो पांच हजार में पांच दिन कोई गंभीर ट्रेनिंग के बजाय खाने-खिलाने के तौर पर काट देते हैं। अगर इस तरह पांच हजार लेकर एक कमाई का जरिया ही बनाना है तो फिर ये काम बाकी भाषाओं के साथ क्यों नहीं? पिछले दिनों से आकाशवाणी के भाषा संबंधी रवैये को लेकर संसदीय राजभाषा समिति जो भी जांच कर रही है जिसमें कि नेपाली और फ्रेंच विशेष रूप से शामिल हैं, इस कड़ी में बाकी के भाषाई सवाल शामिल किये जाते हैं तो कई और गड़बड़ियां सामने आने की गुंजाइश बनती है।

वो भूली दास्‍तां” उर्फ कंटेंट और पुराने रिकॉर्डर का कबाड़

कंटेंट के स्तर पर एफएम गोल्ड का बुरा हाल है। मैं पिछले तीन महीने से लगातार इस चैनल को आब्जर्व कर रहा हूं। इसमें कोई निराला की कविता तोड़ती पत्थर को सिनेमा के गीत से जोड़ दे रहा है तो कोई शिवरात्रि के मौके पर आदिम जमाने के क्लास नोट्स पढ़ने लग रहा है। अधिकांश विशेष अवसरों के कंटेंट बदलते नहीं है। मसलन होली, दीवाली से लेकर तमाम आर्थिक-राजनीतिक घटनाएं तेजी से बदल रहे हैं लेकिन प्रस्तुति के स्तर पर कोई प्रयोग नहीं है। दूसरी बात कि जो ब्रॉडकास्ट हो रहा है, उसके पीछे कंटेंट को लेकर अगर ऑथेंटिसिटी और अकाउंटेबिलिटी की बात की जाए तो चैनल के पास शायद ही कोई संतोषजनक जवाब हो। अखबारों की कतरनों के बूते बनायी जानेवाली अधिकांश स्क्रिप्ट के पीछे कोई रिसर्च नहीं है। इस कंटेंट से ही जुड़ा एक बड़ा सवाल बजनेवाले संगीत का भी है।

रेडियो प्रजेंटर के लिए ये भारी सिरदर्द का काम है कि वो जो भी ट्रैक बजाये, चाहे वो लिस्नर की फरमाइश पर ही क्यों न हो, उसे वो खुद मैनेज करे। म्यूजिक प्लेयर डिजिटाइज हो जाने की वजह से पुराने सारे रिकार्डर बेकाम के हो गये हैं। करोड़ों रुपये की धरोहर बेकार हो गयी जिसकी कोई खोज-खबर नहीं है। एआईआर ने उसे गंभीरता से न लेकर डिजीटल फार्म में नहीं बदलवाया। नतीजा एक बड़ा भारी संसाधन बेकार हो रहा है। अगर जो मटीरियल यहां मौजूद हैं, तो वो भी सरकारी टाइम-टेबल से ही मिलने हैं – जिसमें कि दस से पांच की ड्यूटी के बीच लंच ब्रेक भी शामिल है, बाबू के नहीं होने की भी कहानी है। कुल मिलाकर एफएम गोल्ड के स्टॉक का कोई सीधा लाभ न तो लिस्नर को मिल रहा है और न ही प्रजेंटर को कोई सुविधा मिल पा रही है। अब एफएम गोल्ड पर जो बजता है वो समझिए प्रजेंटर का अपना जुगाड़ है। वो घर से, बाजार से जहां से भी हो, सीडी लाये और एफएम गोल्ड पर बजाये। पहले ये पैनड्राइव में लाया करते लेकिन वायरस आ जाने का हवाला देकर ऐसा नहीं करने दिया जाता। ऐसे में ये सवाल जरूर उठता है कि तब कार्यक्रम को बेहतर बनाने में प्रोग्रामिग टीम की तरफ से क्या एफर्ट लगाये जा रहे हैं।

तकनीकी रूप से बात करें तो देशभर में चलनेवाले प्राइवेट एफएम चैनलों को प्रसारण सुविधा देने का काम स्वयं आकाशवाणी के ट्रांसमीटर से होता है। लेकिन ये बिडंबना देखिए कि निजी चैनलों के लिए जहां 20 किलोवाट का ट्रांसमीटर है वहां एफएम गोल्ड मात्र ढाई किलोवाट के ट्रांसमीटर पर चल रहा है। आधिकारिक रूप से इसे 5 किलोवाट पर चलाने का प्रावधान है। तकनीकी रूप से बहुत गहराई में न भी जाएं तो इतना तो समझ ही सकते हैं कि आकाशवाणी चैनलों जिसमें कि गोल्ड भी शामिल हैं, फ्रीक्वेंसी को लेकर एक-दूसरे पर जो चढ़ा-चढ़ी होती है, उसके पीछे इसी तरह की हरकतें जिम्मेदार हुआ करती होगी। एफएम गोल्ड डिजिटल फार्म में है फिर भी रेडियो सिटी या मिर्ची की तुलना में उसकी आवाज में स्पष्टता कम है।

पैसा न कौड़ी, बाजार में दौड़ा दौड़ी

और अंतिम बात कि माध्यम और प्रसारण का सारा खेल विज्ञापन का है, उसकी ब्रांडिंग और रेवेन्यू का है लेकिन एफएम गोल्ड की कहानी इस मामले में भी अलग है। चैनल को बेहतर विज्ञापन मिले इसके लिए कोई मार्केटिंग स्ट्रैटजी नहीं है। आकाशवाणी की साइट पर इसका कॉलम बुत्त पड़ा है, कहीं कोई अपडेट नहीं है। हैरानी की बात है कि जिस आकाशवाणी की ऑडियो रिसर्च यूनिट इसके सबसे ज्यादा सुने जाने का दावा करती है वही चैनल RAM (रेडियो ऑडिएंस मेजरमेंट) में शामिल नहीं है। ये RAM टेलीविजन रेटिंग प्वाइंट जारी करनेवाले TAM का ही भाई है, जो कि रेडियो के लिए रेवेन्यू खड़ा करने का पैमाना है। मामला साफ है कि इस चैनल को बाहर की दुनिया से कोई लेना-देना नहीं है। जो भी विज्ञापन आते हैं, वो सराकारी तोड़-जोड़ का नतीजा है, जनहित में जारी का प्रसाद है।

इन जनहित में भी क्या प्रसारित हो रहा है, इस पर बारीक नजर नहीं है। पिछले दिनों जेएनयू के प्रोफेसर चमनलाल ने कंडोम अपनाने के जनहित में जारी विज्ञापन पर जो लेख लिखा, उसे पढ़कर मामला और साफ हो जाता है। चैनल तुम्हारा वाला तो सिंकदर निकला, दिनभर में पंद्रह से बीस बार जरूर बोलता है लेकिन खुद ही कई मोर्चे पर लड़खड़ा रहा है।

और ये सब कुछ हो रहा है स्वनामधन्य कवि लक्ष्मीशंकर वाजपेयी की नाक के नीचे, जिनकी कविताओं की पंक्तियों से बीच-बीच में सरोकार, मानवता, नैतिकता जैसे शब्द उड़-उड़कर कवि सम्मेलनों की शोभा बढ़ाते हैं। वाजपेयी के कंधे पर रखकर छोड़े जानेवाले रितू राजपूत के निर्देशों पर गौर करें तो अंदाजा लग जाएगा कि कैसे देश के कभी इतने मशहूर रहे चैनल का सत्यानाश करने की कवायदें की जा रही है और ये महज चंद लोगों को खुश करने का अड्डा बनकर रह गया है, जहां देर रात महिला प्रजेंटर को घर से दो किलोमीटर पहले ही छोड़ दिया जाता है और वीमेन सेल चुप्प मार जाता है। भीतर बहुत बड़ा सडांध है, घपला है, धोखा है। ये सब हमें रेडियो लिस्नर की हैसियत से कंटेंट और प्रस्तुति के स्तर पर दिखाई देता है जबकि भीतरी तौर पर कहीं न कहीं ये भारी वित्तीय गड़बड़ी की मामला हो सकता है, शोषण और सांकेतिक हिंसा का मामला हो सकता है। ऐसे में, आज मजदूर दिवस है। हम हर साल इस मौके पर मजदूर आंदोलनों की जरूरतों, अधिकारों और उनके भविष्य को लेकर बात करते हैं। इन दिनों आकाशवाणी और न्यूज चैनलों के भीतर काम कर रहे कलाकारों, पत्रकारों, स्क्रिप्ट लेखकों से बात करके, उनकी जो हालत मैंने देखी है, मेरी आप सबसे अपील है कि देशभर के मजदूरों पर बात करने के क्रम में आज उन्हें भी शामिल कर लें
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9 Response to 'चंद लोगों की मनमानियों का अड्डा बना AIR FM GOLD 106.4'
  1. रंजन
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/05/air-fm-gold-1064.html?showComment=1272703598580#c2169013960734306299'> 1 मई 2010 को 2:16 pm

    मैंने आपका लेख नहीं पढ़ा... बहुत लंबा है..

    जब तक दिल्ली में था. FM Gold बहुत एन्जॉय किया.. सुबह ८.३० से ९.३० तक.. द्वारका से सीपी तक का सफर.. गाते गुनगुनाते (एक और कार्यक्रम का नाम भूल रहा हूँ,,) सुनते हुए ही कटता था. और वापसी में शाम ५-६ तक गजलों का प्रोग्राम भी बहुत अच्छा लगता था..

    हो सकता है की मेनेजमेंट में प्रोब्लम हो.. पर निजी FM चेनलों की भीड़ में गोल्ड एक ठंडी हवा का झोंका है...

     

  2. रंजन
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/05/air-fm-gold-1064.html?showComment=1272703631197#c349893188077260792'> 1 मई 2010 को 2:17 pm

    मैंने आपका लेख नहीं पढ़ा... बहुत लंबा है.. की जगह "मैंने आपका लेख पूरा नहीं पढ़ा... बहुत लंबा है.."

     

  3. honesty project democracy
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/05/air-fm-gold-1064.html?showComment=1272706089508#c251226524441824896'> 1 मई 2010 को 2:58 pm

    खोजी पत्रकारिता को ब्लोगिंग के जरिये जिन्दा कर, इस देश और समाज को बचाने के, इस प्रयास के लिए ,आपको बहुत-बहुत धन्यवाद / आज ब्लोगरों को पूरे देश में एकजुट कर खोजी पत्रकारिता के लिए प्रेरित और प्रशिक्षित करने की जरूरत है / इस बारे में गंभीरता से सोचिये /आपका सोच अत्यंत ही सराहनीय है /अच्छी वैचारिक,विश्लेष्णात्मक और खोजी जानकारी आधारित रचना के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद / आशा है आप इसी तरह ब्लॉग की सार्थकता को बढ़ाने का काम आगे भी ,अपनी अच्छी सोच के साथ करते रहेंगे / ब्लॉग हम सब के सार्थक सोच और ईमानदारी भरे प्रयास से ही एक सशक्त सामानांतर मिडिया के रूप में स्थापित हो सकता है और इस देश को भ्रष्ट और लूटेरों से बचा सकता है /आशा है आप अपनी ओर से इसके लिए हर संभव प्रयास जरूर करेंगे /हम आपको अपने इस पोस्ट http://honestyprojectrealdemocracy.blogspot.com/2010/04/blog-post_16.html पर देश हित में १०० शब्दों में अपने बहुमूल्य विचार और सुझाव रखने के लिए आमंत्रित करते हैं / उम्दा विचारों को हमने सम्मानित करने की व्यवस्था भी कर रखा है / पिछले हफ्ते अजित गुप्ता जी उम्दा विचारों के लिए सम्मानित की गयी हैं /vineetdu@gmail.com. पूरे देश को कैसे ब्लोगिंग के जरिये , खोजी पत्रकारिता के अहसास और उसके फायदे को बताया जाय / पूरे देश को कैसे एकजुट कर सरकार और व्यवस्था में बैठे लोगों को जनता के सच्चे हितों के लिए काम करने के लिए मजबूर किया जाय /

     

  4. विनीत कुमार
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/05/air-fm-gold-1064.html?showComment=1272717632450#c3454262195609931'> 1 मई 2010 को 6:10 pm

    शुक्रिया विनीत,

    मई दिवस पर शायद यह भी ग़ौर किया जाना चाहिए कि इस चैनल को बहुत सारे सुननेवाले
    असंगठित, कुटीर उद्योग/वर्कशॉप में काम करने वाले मज़दूर होते हैं - ग़ाज़ियाबाद,
    फ़रीदाबाद, बुलंदशहर से लेकर बिहार के किसी कोने तक. उनकी फ़रमाइशें सुनो, जो कि अक्सर
    पुराने क्लैसिक बन चुके गानों के लिए होती हैं, या उनका समर्पण सुनो तो ये बात साफ़ हो
    जाती है. कम-से-कम इस मामले में यह चैनल बाक़ियो से अलग है, कि इसका श्रोता वर्ग अब भी
    विविध है, सिर्फ़ मेट्रो का मध्यवर्ग नहीं है.
    ये बात मुझे तब समझ में आई थी जब शाम में निवेश-संबंधी मशविरे वाले कार्यक्रम के तहत एक
    आदमी ने जिज्ञासा की थी कि उसके पास बैंक ख़ाता नहीं है तो वह शेयर कैसे ख़रीद सकता है?
    ये सही है कि आम तौर पर यहाँ भी उथलापन आता जा रहा है. लोग फ़िल्मी गानों पर सवार
    होकर हिन्दी साहित्य का घटिया ट्यूटोरियल पढ़ते हुए, मुग़ल-ए-आज़म के किसी गीत को
    निराला की रचना बताते हैं! ये सब सही है, लेकिन यहीं पर इरफ़ान जैसे मँजे हुए प्रस्तोता भी
    हैं, जो फ़िल्म और संगीत के इतिहास में काफ़ी डूब कर नायाब मोती निकाल ले आते हैं, प्यार से
    बातें करते हैं, और उनको सुनने वाले भी हैं. और ये सब वो अपनी तरफ़ जुगाड़ लगाके करते हैं,
    रेडियो के सड़ रहे अभिलेखागार से उनको कोई मदद नहीं मिलती, जैसा कि उनके ब्लॉग से साफ़
    हो जाता है. जो कुछ अच्छा यहाँ बचा है, उसको बचाए जाने की ज़रूरत है, बल्कि और बेहतरी
    की ओर ले जाए जाने की ज़रूरत है. अपन लोग तो बाक़ी रसूख़दार लोगों से अपील ही कर सकते
    हैं कि वे आवाज़ से आवाज़ मिलाएँ, और सरकारी एफ़.एम. में सद्बुद्धि फैले कि वह अपनी
    लोकप्रिय ताक़त का यूँ बंटाढार न करे, लेकिन फिर भी अगर उन्होंने इसे निजी चैनलों के आगे
    निहत्था करके पछाड़ने का मन बना ही लिया है, तो क्या होगा! रेडियो को लेकर मेरा अपना
    तजुर्बा भी यही है कि वहाँ घुस के रिसर्च करना आसान नहीं है, इतिहास को झुठलाने की
    कोशिश करता हुआ गोपनीयता का अभेद्य दुर्ग है वह, जहाँ परिंदा भी पर नहीं मार सकता.
    रंग दे बसंती का हौलनाक संदेश यूँ ही नहीं था!

    रही प्रोफ़ेसर चमन लाल की बात, तो एक टिप्पणीकार - किसी 'धर्म' ने - मोहल्ला लाइव
    में उनको अच्छा टोका है. माफ़ करना मुझे कंडोम के उस विज्ञापन में कोई बुराई नहीं नज़र
    आती. काफ़ी होशियार विज्ञापन है वो, और इसको लेकर न लाल साहब को परेशान होने की
    ज़रूरत है, न प्रधानमंत्री को, जिनके नाम ख़त लिखा है उन्होंने.


    नीचे देखें

    रविकान्त

    धर्म said:

    चमनलाल जी,

    भारतीय संस्कृति उदार है? इससे बड़ा फ्रॉड कुछ भी नहीं हो सकता। हम एक अनैतिक और
    अविकसित समाज में हैं। यूरोपीय और अमेरिकी नैतिकता को हमारे देश में लागू कर पाना संभव
    नहीं है। हम अपने मंत्रियों, प्रधानमंत्रियों तक से नैतिक होने की अपेक्षा नहीं करते। हमारे
    मंदिर की नग्न यौन क्रीड़ारत, अप्राकृतिक मैथुनरत मूर्तियां, मंदिरों की देवदासियां,
    देवदासियों का ईश्वर से संसर्ग और वर्तमान समय में देश के हजारों मंदिरों में ईश्वर की संतानें,
    कुंभ मेले के दौरान कंडोम की बंपर सेल, राधा का पति और राधा-कृष्ण का रास, खीर खाने से
    बच्चे पैदा होना, देवता के आशीर्वाद से पुत्र का जन्म, आधुनिक समय में संतान प्राप्ति के लिए
    बाबाओं की स्पेशल पूजाएं, 2010 के स्वामी नित्यानंद, हजारों नित्यानंदों की बहुचर्चित स्पेशल
    पूजाएं, इच्छाधारी बाबा, बाबाओं का सेक्स रैकेट, बाबा की कृपा, गोद में बच्चा, पुत्र
    कामेष्टि यज्ञ, एकनिष्ठता का क्षद्म, नारायण दत्त तिवारी की नैतिकता, नैतिकता की
    अनैतिक संतानें। इस देश में प्रभुवर्ग की संस्कृति जारकर्म को सत्यापित और स्थापित करती है।
    इसलिए कृपया कंडोम के ऐड से विचलित न हों।

    http://mohallalive.com/2010/04/28/an-all-india-radio-advertisement-open-call-for-sexual-indulgence/

     

  5. अनूप शुक्ल
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/05/air-fm-gold-1064.html?showComment=1272771557006#c6171399166942477617'> 2 मई 2010 को 9:09 am

    अभी पढ़ा सुबह-सुबह। और बातों के अलावा यह बड़ी तकलीफ़देह बात लगी कि पुराने रिकार्ड रख-रखाव के अभाव में चौपट हो रहे हैं और प्रेजेन्टर को प्रस्तुति के लिये अपना जुगाड़ खुद करना होता है।

    घपला-घोटाला से ज्यादा परेशान करने वाली बात ऐसे संस्थानों का ऊल-जलूल ढंग से काम करना है। कभी किसी दिशा में भागते चले जायेंगे पांच मील और फ़िर उसकी उलटी दिशा में सात मील! सब कुछ गड्ड-मड्ड!

    बढ़िया रपट! बधाई!

     

  6. माणिक
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/05/air-fm-gold-1064.html?showComment=1272905528411#c8288773143956274574'> 3 मई 2010 को 10:22 pm

    I am also a Radio Presenter.aanand aa gayaa padh kar.
    manik
    अपनी माटी
    माणिकनामा

     

  7. अनवारुल हसन [AIR - FM RAINBOW 100.7 Lko]
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/05/air-fm-gold-1064.html?showComment=1273254709695#c8422295683294498694'> 7 मई 2010 को 11:21 pm

    मैं ऍफ़ ऍम रेनबो 100.7 लखनऊ से जुड़ा एक मज़दूर हूँ...लम्बे अरसे से आकाशवाणी से सम्बद्ध हूँ... जब ऍफ़ ऍम का जन्म भी नहीं हुआ था. मैंने रेडियो का सुनहरा कल भी देखा है और भविष्य के सपने संजोये अतीत की बुझती हुई आँखें भी...इस लिए इस हालत पे खून के आंसू बहाने के सिवाए और कुछ नहीं सूझता. सम्बंधित पेक्स कितनी दोषी हैं लखनऊ में बैठ कर मैं फैसला नहीं कर सकता पर कहीं न कहीं कुछ ग़लत हो रहा है जिसे तत्काल प्रभाव से ठीक किया जाना ज़रूरी है न सिर्फ़ दिल्ली बल्कि हर उस स्टेशन पर जहाँ पर भी असंतोष पांव पसार रहा है. वर्ना आकाशवाणी प्रतिभाओं की हत्या के पाप से स्वंम को कभी मुक्त नहीं कर पायेगा... सच बोलने का गुनाह करता रहा हूँ ... इस अपराध में मेरा सर क़लम कर दीजिये प्लीज़!
    http://anwarvoice.blogspot.com

     

  8. अजय कुमार झा
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/05/air-fm-gold-1064.html?showComment=1273281905360#c5828652823995947419'> 8 मई 2010 को 6:55 am

    इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

     

  9. indianrj
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/05/air-fm-gold-1064.html?showComment=1277197356483#c1970055469567978682'> 22 जून 2010 को 2:32 pm

    चैनलों की भीड़ में एफएम गोल्ड सबसे अच्छा लगता है. रेडियो मिर्ची और कभी कभी रेनबो भी. लेकिन एफएम गोल्ड की बात ही कुछ और है.

     

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