.

अपना रेडियो बचाओ अभियान शुरु

Posted On 10:27 am by विनीत कुमार |




आकाशवाणी के कबाड़खाने की शक्ल में बदलते जाने और एफ.एम.गोल्ड 106.4 में भारी गड़बड़ियों के खिलाफ रेडियो प्रजेन्टरों ने अपनी मुहिम तेज कर दी है। अगर उनकी बातों को समय रहते नहीं सुना गया तो वो देशभर में संबंधित जिम्मेदार अधिकारियों के विरोध में अभियान शुरु करेंगे। रेडियों प्रजेन्टरों ने आज,3 मई को प्रेस रिलीज जारी कर साफ कर दिया है कि अब वो आर-पार की लड़ाई लड़ने के मूड में हैं।..और इस काम को अंजाम देने के लिए न केवल रेडियो से जुड़े लोगों को शामि करेंगे बल्कि इस संघर्ष में देश के हर उस शख्स को शामिल करेंगे जो कि रेडियो को समाज का एक अनिवार्य माध्यम मानता है।
हमने इससे ठीक पहले की पोस्ट में विस्तार से बताया है कि आकाशवाणी के भीतर किस स्तर की घपलेबाजी है और वहां के लोगों का करीब सालभर से कोई भुगतान नहीं किया गया है। ऐसा होने के पीछे कोई आर्थिक मजबूरी होने के बजाय चंद लोगों की मनमानी है। यहां हम रेडियो प्रजेन्टरों की ओर से जारी प्रेस रिलीज को आपके सामने रख रहें। आपने भी अपनी जिंदगी के खूबसूरत लम्हें,तकलीफों के दिन,अकेलेपन से भरी शाम रेडियो के साथ बिताए हैं। ऐसे कई मौके पर जब जमाने ने आपका साथ छोड़ दिया तो इस रेडियो ने आपका साथ दिया। आज यही रेडियो लाचार है,इसे हमारी-आपकी जरुरत है। इसलिए जरुरी है कि हम अपने स्तर से लिखकर,चर्चा करके,हस्ताक्षर अभियान चलाकर आकाशवाणी के भीतर जो कुछ भी चल रहा है उसके प्रति असहमति दर्ज कराएं। अपना रेडियो बचाओ अभियान के स्वर को मजबूती दें-

रेडियो प्रजेन्टरों की ओर से जारी प्रेस रिलीजः-

नई दिल्ली । 3 मई २०१० । एफ एम सहित आकाशवाणी दिल्ली के विभिन्न चैनलों में काम करने वाले सैकड़ों उदघोषकों और कर्मियों में अधिकतर कलाकारों को पिछले ग्यारह महीनों से भुगतान नहीं किया गया है। कुछ तो ऐसे भी हैं जिन्हें इससे भी अधिक समय से पैसे नहीं मिले हैं।अपना रेडियो बचाओं अभियान का मानना है कि रेडियो के निजी चैनलों को फायदा पहुंचाने के उद्देश्य से आकाशवाणी की स्थिति बदत्तर बनाई जा रही है।

राजधानी में अपना रेडियो बचाओं अभियान में लगे श्रोताओं, कलाकारों व समाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि रेडियो की भी वैसी ही स्थिति बनाई जा रही है जैसा कि टेलीविजन के निजी चैनलों के लिए जगह बनाने के लिए वर्षों पूर्व दूरदर्शन की बनाई गई थी। निजी चैनलों के शुरू होने से पहले मैट्रों चैनल को सबसे ज्यादा लोकप्रिय बनाने की कोशिश की गई। उसके जरिये दर्शकों की रूचि को मसलन भाषा और विषय वस्तु आदि हर स्तर पर बदलने की पूरी कोशिश शुरू की गई। दूरदर्शन के कर्मचारियों की भी शिकायतें उन दिनों काफी बढ़ रही थी और उन पर ध्यान देने की जरूरत सरकार महसूस नहीं कर रही थी। इन दिनों रेडियों के पर्याय के रूप में एफएम चैनलों को जाना जाता है। खासतौर से मनोरंजन के लिए श्रोताओं की बड़ी तादाद एफ एम चैनलों के कार्यक्रमों को सुनती है। लेकिन आकाशवाणी के एम एम चैनलों की जो स्थिति है उसे देखकर आश्चर्य ही नहीं होता है बल्कि ये एक भरोसे के साथ कहा जा सकता है कि रेडियों के निजी चैनलों के विस्तार के लिए आकाशवाणी के आला अधिकारी काम कर रहे हैं। याद दिलाने की जरूरत नहीं होनी चाहिए कि टेलीविजन के निजी चैनलों की शुरूआत में दूरदर्शन को छोड़कर उसके कई बड़े अधिकारी निजी चैनलों की सेवा में उंची तनख्वाह पर चले गए थे।

एक तरफ तो रेडियो का तेजी से विस्तार हो रहा है और दूसरी तरफ आकाशवाणी पर वर्षों से नई नियुक्तियां नहीं हुईं हैं और यहाँ प्रोग्राम प्रजेंटेशन का काम आकस्मिक प्रस्तोता ही करते हैं। काम के घंटे अधिक और पारिश्रमिक कम, इस पर भी भुगतान में वर्ष भर की देरी । जबकि संसद की एक समिति ने आकाशवाणी में अस्थायी कलाकारों की बदतर स्थिति पर चिंता जाहिर करते हुए उनकी स्थायी नियुक्तियां करने की सिफारिश की थी।

रेडियो के सबसे लोकप्रिय एम एफ चैनलों के लिए काम करने वाले कलाकारों ने दो महीने के दौरान सम्बंधित उच्चाधिकारियों से मिलकर इन स्थितियों से अवगत कराया है लेकिन स्थितियां जस की तस हैं । "अपना रेडियो बचाओ " मंच के तत्वावधान में लगभग बीस सक्रिय प्रज़ेन्टरों का एक प्रतिनिधिमंडल आकाशवाणी महानिदेशक को पहले १७ फरवरी और फिर २६ अप्रेल २०१० को ज्ञापन दे चुका है । इस ज्ञापन में कार्यक्रमों के गिरते स्तर, भुगतान में अभूतपूर्व विलम्ब के और ध्यान दिलाया गया है और एफ़ एम गोल्ड चैनेल में चल रही गडबडियों के लिए एफ़ एम गोल्ड चैनल की कार्यक्रम अधिशासी MrsMmmmmmmmm Mrs. Ritu Rajput को जिम्मेवार बताया गया है। लम्बे समय तक यह चैनल देश के सर्वाधिक लोकप्रिय चैनेल्स में रहा है और इसके सूझबूझ से भरे मनोरंजक और ज्ञानवर्धक कार्यक्रम व्यापक जनहित का काम करते रहे हैं और श्रोताओं का जीवन प्रकाशित करते रहे हैं.

अपना रेडियो बचाओ मंच इस सन्दर्भ में सूचना और प्रसारण मंत्रालय से तत्काल हस्तक्षेप की मांग करता है और तुरंत भुगतान कर के कैजुअल प्रज़ेन्टरों के नियमितीकरण की प्रक्रिया आरम्भ करने की भी मांग करता है। साथ ही संसदीय समिति की सिफारिशों के आलोक में तत्काल कदम उठाने का आग्रह करता है। इस मंच के सदस्यों ने इस बात पर भी जोर दिया है कि आकाशवाणी को बर्बाद करने की जो साजिश चल रही है उसका पर्दापाश करने के लिए मंच राजधानी और देश के दूसरे शहरों में अभियान चलाएगा।
| edit post
6 Response to 'अपना रेडियो बचाओ अभियान शुरु'
  1. anjule shyam
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/05/blog-post.html?showComment=1272865476299#c932804408458992140'> 3 मई 2010 को 11:14 am

    ता नहीं ये सरकारी अधिकारी बचने के लिए बने हैं या बेच खाने के लिए बने हैं..सरकार तो एसी नीद में है कि खुद उसे ही पता नहीं वों कहाँ सोई पड़ी है..अगर ये सरका कुछ कर नहीं सकती तो कम से कम हाट तो सकती है जब उसके बस में कुछ है ही नहीं......

     

  2. काजल कुमार Kajal Kumar
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/05/blog-post.html?showComment=1272870095460#c1109775336567229152'> 3 मई 2010 को 12:31 pm

    मेरी आवाज़ भी आपके साथ है.

     

  3. RAJESH CHADDHA
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/05/blog-post.html?showComment=1272886415544#c4083905211932659360'> 3 मई 2010 को 5:03 pm

    रेडियो प्रेजेंटर'स के एक वर्क-शॉप में व्याख्यान देते हुए डॉ महावीर सिंह ने कहा था..... पीछे बंधे हैं हाथ और शर्त ये के सफ़र, किस से कहें की पांव का कांटा निकाल दे.

     

  4. RAJESH CHADDHA
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/05/blog-post.html?showComment=1272886506337#c4095467751660158710'> 3 मई 2010 को 5:05 pm

    रेडियो प्रेजेंटर'स के एक वर्क-शॉप में व्याख्यान देते हुए डॉ महावीर सिंह ने कहा था..... पीछे बंधे हैं हाथ और शर्त ये के सफ़र, किस से कहें की पांव का कांटा निकाल दे.

     

  5. ज़ाकिर अली ‘रजनीश’
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/05/blog-post.html?showComment=1273062667305#c8997711210038161857'> 5 मई 2010 को 6:01 pm

    प्रशंसनीय।

     

  6. निखिल आनन्द गिरि
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/05/blog-post.html?showComment=1275676492168#c1833667529105769843'> 5 जून 2010 को 12:04 am

    आकाशवाणी के मेरे अमुभव कुछ ऐसे थे..

    http://baithak.hindyugm.com/2009/01/blog-post_22.html

     

एक टिप्पणी भेजें