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गरीबों पर बात करना पाखंड है

Posted On 10:51 pm by विनीत कुमार |

माफ कीजिए, लेकिन सच कहूं जब भी कोई खाया,पिया और अघाया हुआ आदमी किसी सभा, सेमिनार में जाकर गरीबों, मजदूरों, किसानों और दलितों के लिए बिसुरने लग जाता है तो बहुत ही बेहूदा जान पड़ता है। हिन्दी से जुड़े कम से कम पच्चीस बड़ी हस्तियों के घर गया हूं। कोई भी फटेहाल नहीं है, सब सम्पन्न हैं, सबके घर में कोक, पेप्सी की बोतलें भरी रहतीं हैं। सबके डिनर टेबुल पर किवी सहित मौसमी फल सजे रहते हैं। कईयों के बाल-बच्चे नाश्ते में कार्नफेल्क्स प्रीफर करते हैं। बाथरुम में डव के साबुन होते हैं लेकिन सभा में ऐसे करते हैं जैसे भाई साहब ने कश्मीरी गेट के पास पड़े फटेहालों के साथ रात बिताकर सीधे यहीं चले आ रहे हैं।....घिन आने लगती है ऐसे लोगों से जो मलाई को भी थोड़ा और गाढ़ी करके खाने में विश्वास करते हैं लेकिन दुनिया और चेलों को संत की राह पर चलने का प्रवचन दिए फिरते हैं। मैं तो कभी-कभी सोचता हूं कि अगर देश में गरीब,मजदूर, दलित और बेजान स्त्रियां नहीं होती तो हिन्दी की दुनिया में कई लोग विद्वान होने और कहलाने से रह जाते। उनकी कमाई पर इन गरीबों का बड़ा हिस्सा है।
इधर फोन करके एक भाई ने संगोष्ठी में बुलाया कि आपको आना है और एक सत्र का संचालन भी करना है। मैंने हांमी भर दी। बोलने और लिखने का चस्का तो लगा हुआ है ही। पैसे की लत लगी नहीं है सो पता होने पर भी कुछ नहीं मिलेगा, फिर भी चला जाता हूं। दो-तीन बार देख चुका हूं, आयोजक बुलाते समय लंच के साथ फाइल-फोल्डर का हवाला देते हैं। कैर, मैं गया और संचालन की कमान संभाल ली। होना क्या था, वही बड़ी बातें, बड़े-बड़े शब्द और आदर्श का पुलिंदा। कुछ नहीं भी तो दुनिया इतनी तो देख-समझ चुका ही हूं कि पता चल जाता है कि बंदा किस एंगिल से बात कर रहा है। और सच कहूं, मैं क्या कोई भी मेरे उम्र के बंदे के सामने बात करोगे, उंचे-उंचे आदर्शों की, वो भी तब जब मेरे ही कॉलेज का पढ़ा मेरा साथी आठ-नौ लाख की पैकेज पर काम करा है। मुझे तुलना नहीं करनी चाहिए किसी से,मैंने अपनी इच्छा और सुविधा के हिसाब से रिसर्च को चुना है। तो भी कोई सदाव्रत का पाठ पढाने बैठ जाए, ऐसे समय में जब आप अपने गांव-कस्बे में जाकर बताओ कि पीएचडी कर रहा हूं तो एक कलम पढ़ी दादी भी पूछ बैठती है-वो सब तो ठीक है लेकिन बाबू मिलता कितना है। मतलब आपके विद्वान होने की सार्थकता तभी है जब आप कुछ कमा-धमा रहे हो। ऐसा नहीं है कि पैसा ही सबकुछ है लेकिन आपके स्टेटस का एक आधार पैसा तो जरुर है और आप और हम भाषण के अलावे असल जिंदगी में नकार नहीं सकते।
सो, लगे लोग बारी-बारी से उनलोगों को, उस प्रोफेशन को जिसमें बहुत पैसे मिलते हैं। हिन्दीवालों के हिसाब से जिस बंदे को वेतन बहुत अधिक मिलते हैं वो मानवीय नहीं रह जाता । ये अलग बात है कि यही साहब अपने कुलीग के सामने बताते नहीं थकते कि मेरे लड़के को अमेरिका की कम्पनी से आफर आया है और दुगने पैकेज पर जा रहा है।
थकाकथित ये विद्वान पहले से भी ये खेल करते आ रहे हैं कि मलाई केन्द्रित होकर काम करते रहे हैं। कऊ पैसे के रुप में तो कभी प्रभाव के रुप में और साहित्य के स्तर गरीबों, मजदूरों का पक्षधर बने रहे। हिन्दी के लोगों ने अपने समय की हर पीढ़ी को धन और स्टेटस के प्रभाव से दूर करने का काम किया है। इसलिए आज के इस उत्तर- आधुनिक दौर में भी जहां कि अपीयरेंस बहुत मायने रखते हैं, हिन्दी से जुड़ा व्यक्ति पैसे और साधन रहने पर भी तहस-नहस लुक में दिखता है। जिसे देखकर आपको सिर्फ दया, करुणा के अलावे कोई दूसरे भाव नहीं जगेंगे, जबकि बाकी विषयों के लोगों को हिकारत..ये हिन्दीवाले, पता नहीं कहां-कहां से आ जाते हैं। यहां ठीक-ठाक लुक में दिखने का मतलब है- आपको कहीं और की हवा का लगना जो कि आपकी सेहत और करियर दोनों ही लिहाज से घातक है। जब तक आप अभावग्रस्त दिखेंग नहीं लोग आपके उपर रहम खाकर सेट कैसे करेंगे। ऐसा महौल बनाने की लगातार कोशिश की- बहुत जरुरतमंद है, नीडी है, साल-छ महीने में कहीं कुछ नहीं हुआ तो मर जाएगा। मतलब यहां योग्यता नहीं फटेहाल होना या दिखना ही बड़ी योग्यता है। नई सर्ट या कपडे खरीदो भी तो मटमैले, स्लेटी या फिर बिस्कुट कलर की जो लगे ही नहीं कि नयी है, सालोभर एक सा दिखो- लाचार और दीन-हीन।
अब पैसे रहते भी दीन-हीन दिख रहे तो ख्याल आएगा ही गरीबों का, मजदूरों का। आप भले ही कभी उस महौल में जीने को मजबूर नहीं हुए लेकिन आप उनके जैसा हुलिया बनाकर, उस परिवेश को आढने की कोशिश करते हुए सोचने की कला तो सीख ही जाओगे। इसलिए मैं खीढकर अंत में चलते-चलते कह दिय-माफ करना साथियों, मैं सभा में बोलते वक्त अपने को उनलोगों के ज्यादा करीब पाता हूं जो बारह-बारह घंटे की नौकरी बजाकर आते हैं,मैं उनके बारे में लिखना, बोलना चाहता हूं। गरीबों, मजदूरों पर बोलना, मेरे लिए पाखंड ही होगा।
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4 Response to 'गरीबों पर बात करना पाखंड है'
  1. परमजीत सिहँ बाली
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/03/blog-post_20.html?showComment=1206038580000#c967294224565939714'> 21 मार्च 2008 को 12:13 am बजे

    विनीत जी,आपनें हकीकत बयां कर दी। लेख बहुत अच्छा लगा।

     

  2. vikas pandey
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/03/blog-post_20.html?showComment=1206039000000#c4251113387352070694'> 21 मार्च 2008 को 12:20 am बजे

    एकदम सटीक आकलन है आपका, दिल को छू लेने वाली बात कही है. इन नामुरादों (मैं यही कहना चाहता हू) के कारण ही आज ऐसी धारणा बन गयी है की हिन्दी मे कुछ करने से पहले आप को फटेहाल दिखना ही होगा. किसी को विद्वता से मतलब नही, आप कितने का पैकेज उठाते है बस यही एक पैमाना है. माफ़ कीजिएगा शायद कुछ ज़्यादा कह गया पर आप के इस लेख के कारण मुझे भी भाड़ास निकालने का मौका मिल गया.

     

  3. राज भाटिय़ा
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/03/blog-post_20.html?showComment=1206041340000#c2731611846507586442'> 21 मार्च 2008 को 12:59 am बजे

    गरीब,मजदूर, दलित मिंया यह कोरे चेक हे, बहुत ही कीमती,कुछ कमाने के लिये इन का सहारा लेते हे सब,चाहे वो हमारे नेता हो अभिनेता हो या फ़िर यह वेहया विश्वसुन्दरिया पहले पहल बात गरीबो की झोपडियओ की, ओर आप इतना सुन्दर लेख लिख कर इन के पेट पर कयो लात मार रहे हे.

     

  4. bhuvnesh sharma
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/03/blog-post_20.html?showComment=1206279480000#c7257980774105775073'> 23 मार्च 2008 को 7:08 pm बजे

    एकदम सही खिंचाई किये हो गुरू....बढि़या.

    वर्तनी की कई अशुद्धियां हो गईं शायद जल्‍दबाजी में......

     

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