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हिंदी का मार्क्सवाद पर बात करते हुए युवा मार्क्सवादी आलोचक संजीव ने जब इसे जात्याभिमानी आलोचना नाम दिया तो राष्ट्रपति निवास (भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान) शिमला में मानो एक और ‘इतिहास’ दर्ज हो गया। संजीव ने मार्क्सवादी हिंदी आलोचना के बीच के अंतर्विरोधों को जिस विस्तार और तथ्यात्मक रूप से रखा उससे एकबारगी तो ताज्जुब जरूर हुआ कि स्वयं एक मार्क्सवादी इसके भीतर की गड़बड़ियों और मार्क्सवाद के नाम पर किये जानेवाले विचारात्मक और जातिवादी खेलों को कैसे हमारे सामने उघाड़ कर रख रहा है? इससे हिंदी साहित्य और समाज के बीच की जानेवाली साजिशों के नये सिरे से दर्शन होते हैं। दलित, जाति और वर्ण व्यवस्था को लेकर उठनेवाले सवालों को थोड़ा और विस्तार मिल जाता है।

पिछले दो दिनों से शिमला में हिंदी की आधुनिकता : एक पुनर्विचार (सितंबर 23 से 29) पर होनेवाली बहसों में ये बात बार-बार खुल कर सामने आ रही है कि आखिर दलित विमर्श हिंदी की मुख्यधारा का साहित्य क्यों नहीं बन पा रहा है? दलित के सवाल को एक गैरदलित उतनी तल्खी से क्यों नहीं उठाता? पत्रिकाओं को इस विमर्श के विस्तार के नाम पर अलग से विशेषांक क्यों निकाले जाते हैं? इसी दौरान शिमला में चल रही इस कार्यशाला में तुलसी, प्रेमचंद सहित हिंदी के उन तमाम नामचीन रचनाकारों और आलोचकों के नाम सामने आने लग जाते हैं, उनके प्रसंगों पर ज़ोरदार बहस होती है और उन्हें वर्ण-व्यवस्था का समर्थक और विरोधी मानने और न मानने के सबूत जुटाये जाते हैं। इन बहसों के बीच दिलचस्प बात है कि लगभग रोज विमल थोरात की ओर से नामवर सिंह के दलित विरोधी रवैयों को पुख्ता प्रमाण के तौर पर रखा जाता है। बहरहाल, नामवर सिंह बकौल विमल थोरात दलित साहित्य को इग्नू के पाठ्यक्रम में न आने देने के लिए एड़ी-चोटी एक कर देते हैं, इसे अपरिपक्व करार देते हैं, साहित्य के नाम पर ‘जूठन’ का नाम सुनते ही मैनेजर पांडेय जैसे आलोचक बौखलाहट में कुर्सी से गिर पड़ते हैं, निर्मला जैन जैसी तथाकथित प्रबुद्ध और वरिष्ठ आलोचक दलित विमर्श के साथ ही स्त्री विमर्श को बेमतलब करार देती हैं। थोरात ने इसी क्रम में अपना एक और संस्मरण सुनाते हुए कहा कि – ये वही मार्क्सवादी आलोचक नामवर सिंह हैं, जिन्होंने एमफिल के दौरान निर्धारित बीस सीटों की फाइनल लिस्ट आ जाने के बावजूद दस लोगों को ही कोर्स में शामिल किया। 11 वां मेरा नंबर था और मैं लिस्ट से कत्ल कर दी गयी। आपको जानकर हैरानी होगी कि ये एकेडमिक कौंसिल का नहीं बल्कि जनपक्षधरता का समर्थन करनेवाले नामवर सिंह का फैसला था। तत्कालीन वीसी केआर नारायणन की ओर से छह महीने गुज़र जाने के बाद क्लास ज्वायन करने का लेटर जब हमें मिला, तो व्यक्तिगत स्तर पर शिक्षा से वंचित करने का नामवर सिंह का रवैया हमारे सामने साफ हो गया।

संजीव का पर्चा और विमल थोरात का संस्मरण सुनते हुए हमें यह सब केवल हिंदी साहित्य की दुनिया के कारनामे और साज़‍िशें नहीं लगतीं बल्कि साहित्य को परंपरा के विकास के आधार पर पढ़ने-पढ़ाने के अभ्यस्त होने की तरह ही हम इन कारनामों को भी एक लंबी परंपरा का ही विस्तार मानने की स्थिति में अपने को खड़ा पाते हैं।

संजीव ने अपने पर्चे में कई ऐसी स्थापनाएं रखीं, जिनके आलोक में इन नामवरों की एक भरी-पूरी परंपरा दिखाई देती है। उन्होंने तदभव में छपे बजरंग बिहारी के उस लेख की चर्चा की है, जिसमें तर्कपूर्ण ढंग से स्थापित किया गया है कि ब्राह्मणों की ओर से इस्लाम का विरोध इसलिए नहीं किया गया कि वो यहां आकर हमारी संस्कृति को भ्रष्ट कर रहे हैं बल्कि उन्होंने इसका विरोध बहुत ही निजी स्वार्थ को साधने के एंजेंडे के तहत किया। इस्लाम के आने के 200-300 सालों तक कहीं कोई विरोध नहीं हुआ लेकिन जैसे ही उनकी सुविधाओं में कटौती की जाने लगी, वे विरोध पर उतर आये। इतना ही नहीं, ब्राह्मणों ने दलितों के शिक्षित होने पर आपत्ति जतायी और बादशाह की ओर से आदेश जारी करवाया कि उनके लिए शिक्षा व्यव्स्था रोक दी जाए।

संजीव का कहना रहा कि इन सबके बावजूद मार्क्सवादी आलोचकों के लिए उस दौरान लिखा जानेवाला ‘भक्तिकाव्य महान है, तुलसी महान हैं’ और सिर्फ महान ही नहीं बल्कि हर नामचीन आलोचकों और कवियों के प्रिय कवि तुलसीदास हैं। यहां पर ठहर कर हम सोचें तो संजीव ने मार्क्सवादी हिंदी आलोचना की जो व्याख्या की, उसमें एक स्पष्ट नज़रिया सामने आता है कि हम अक्सर प्रदत्त संस्कारों के साथ तालमेल बिठाने की कोशिश करते हैं इसलिए हम या तो तथ्यों को दबाते हैं या फिर उसे ज़बरदस्ती प्रगतिशील बताने की कोशिश करते हैं। तुलसीदास की व्याख्या करने के क्रम में रामविलास शर्मा सहित विश्वनाथ त्रिपाठी आदि की परंपरा वालों ने यही काम किया है। दूसरी ओर रांघेय राघव और शिवदान सिंह चौहान जैसे आलोचकों ने वास्तविक मार्क्सवादी आलोचना को विस्तार देने की कोशिश की तो उसे दबा दिया गया। उसका विस्तार आज हिंदी आलोचना में दिखाई नहीं देता। इतना ही नहीं, अपने दौर में रांघेय राघव को हाशिया पर धकेल दिया गया।

संजीव का मानना है कि हिंदी की पूरी मार्क्सवादी आलोचना, रामविलास शर्मा के अनुयायी के तौर पर आगे बढ़ी है। रामविलास शर्मा से आगे और अलग मार्क्सवादी आलोचना के विकास की संभावनाओं की तलाश नहीं की गयी। संजीव ने यहां तक कहा कि भले ही रामविलास शर्मा ने करीब 75 मौलिक किताबें लिख दी हों और जिसे सुन कर एक झटके में श्रद्धा पैदा होने की गुंजाइश बन जाती है लेकिन हिंदी जाति के नाम पर गौरव करने के जो औज़ार हिंदी समाज के पाठकों को उन्‍होंने थमाये, वो तार्किक नहीं हैं – इसे नवजागरण के संदर्भ में विशेष तौर पर देखा जा सकता है।

संजीव के पर्चे पर हस्तक्षेप करते हुए प्रमोद रंजन अरुण कमल की कविता दस जन की पंक्ति – फेंका है उन्होंने रोटी का टुकड़ा/और टूट पड़े गली के भूखे कुत्ते – की याद दिलाते हुए कहा कि सिर्फ रामविलास शर्मा आदि आलोचकों की ही नहीं बल्कि मौजूदा समय में रचनारत मार्क्सवादियों की प्रतिबद्धताओं की भी पड़ताल की जानी चाहिए। उन्होंने बताया कि अरुण कमल ने यह कविता यह कविता 1978 में उस समय लिखी जब उत्तर भारत में पहली बार समाज के कुछ पिछड़े सामाजिक समूहों के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गयी। ये गली के कुत्ते कौन हैं, आप समझ सकते हैं। इसी कविता में अरुण कमल की ही पंक्ति है – मारे गये दस जन/ मरेंगे और भी…/ बज रहा जोरों से ढोल/ बज रहा जोरों से ढोल/ ढोल… कौन हैं ये दस जन? मरेंगे और भी पर ध्यान देने पर पता चलता है कि वाग्जाल के भीतर यह दस जन नब्बे जनों के विरुद्ध एक रूपक है।

संजीव का पर्चा, विमल थोरात का मार्क्सवादी आलोचक नामवर सिंह को लेकर सुनाये गये संदर्भ और संस्मरण और प्रमोद रंजन की ओर से अरुण कमल की याद दिलायी जानेवाली कविता सचमुच मार्क्सवादी हिंदी आलोचना और रचना के बीच पसरे अंतर्विरोंधों को पेश करती है।
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4 Response to 'अन्तर्विरोधों के बीच फंसी मार्क्सवादी हिन्दी आलोचना,शिमला रिपोर्ट-3'
  1. Geetashree
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/09/blog-post_27.html?showComment=1254037062172#c4296516646066421740'> 27 सितंबर 2009 को 1:07 pm

    यही तो बिडंबना है हिंदी समाज की. दलित विमर्श को खारिज करने वाले गैर दलित है लेकिन स्त्री विमर्श को खारिज करने वालों निर्मला जैन सरीखी महिलाएं हैं। विरोध करने वालों को दलित होने का दर्द पता है ना स्त्री होने का। बिना भोगे कहां से आएगा अहसास। मुंह में चांदी चम्मच लेकर पैदा होने वाली जमात से क्या उम्मीद की जाए। हम सोचते हैं कि हमारे अलावा कोई और दुनिया एक्जीस्ट ही नहीं करती। मुठ्टी भर लोग तय करते है दशा दिशा। राजनीतिज्ञों की तरह हमारे विचारक भी खतरनाक हैं..

     

  2. तरुण गुप्ता
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/09/blog-post_27.html?showComment=1254459634548#c8914500637080857946'> 2 अक्तूबर 2009 को 10:30 am

    संजीव का मानना है कि हिंदी की पूरी मार्क्सवादी आलोचना, रामविलास शर्मा के अनुयायी के तौर पर आगे बढ़ी है। रामविलास शर्मा से आगे और अलग मार्क्सवादी आलोचना के विकास की संभावनाओं की तलाश नहीं की गयी l


    संजीव जी के ऐसा मानने में क्या आग्रह रहे होंगे ये आज की मार्क्सवादी आलोचना की गति और स्तिथि को देखने से समझ में आ जाता है. पर एक सवाल(या कहूं एक के बाद एक सवाल) अब भी आलोचना की चालू स्तिथि को देखने पर उठता है की यदि नामवर सिंह या अन्य आलोचक अपने टूल्स को अपने ढंग से स्थापित कर सके तो क्या इसमें उन लोगो की हिस्सेदारी बिलकुल भी नहीं थी जो आज मार्क्सवादी आलोचक(जिसकी विनीत कहते है) होने पर भी मार्क्सवादी आलोचना की पोल खोलने में तो नहीं हिचक रहे है (ये बहुत अच्छी बात है कमसे कम हम इतने ईमानदार तो है)जबकि ये भी सच है कि आज कि आलोचना में सुधार के लिए वो इनसे टक्कर लेने के लिए कुछ ख़ास कर नहीं रहे.
    हिंदी आलोचना के साथ एक दुर्भाग्य यह भी रहा है की जो आलोचक.. रामविलास शर्मा(वैसे सिर्फ उन्ही का नाम लेना ठीक नहीं है) से आगे और अलग आलोचना के विकास की संभावनाओं की तलाश कर रहे थे वो जल्द ही इस दुनिया से विदा हो गए वो चाहे मुक्तिबोध हो, साही हो, देवीशंकर अवस्थी(नयी कहानी की समीक्षा पर जिनका लोहा स्वय नामवर सिंह ने माना था) या फिर मलयज; ये वो लोग थे जो सिर्फ आलोचना की कमियाँ नहीं गिना रहे थे बल्कि हिंदी आलोचना की समकालीनता पर बल देते हुए हिंदी की अकादमिक और चलताऊ आलोचना से अलग एक नयी संभावना की तलाश भी कर रहे थे. मुझे लगता की अगर रामविलास शर्मा से आगे और अलग मार्क्सवादी आलोचना के विकास की संभावनाओं की तलाश नहीं की गयी तो इसमें बहुत हद तक कसूर उन लोगो का भी है जिन्हें समस्या तो पता है लेकिन वो उसका समाधान सिर्फ और सिर्फ समस्या गिनाने में ही देख रहे है.
    और अंत में ...
    जो भी हो शिमला में इस तरह की बहसों से , साहित्य की सभी विधाओ में कुछ न कुछ सृजनात्मक कार्यवाही ज़रूर हो रही , इसके लिए हम उनके आभारी है

     

  3. तरुण गुप्ता
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/09/blog-post_27.html?showComment=1255003699302#c5381995339086335971'> 8 अक्तूबर 2009 को 5:38 pm

    KAFI DIN HO GAYE KUCHH NAYA NAHI DALA

     

  4. शरद कोकास
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/09/blog-post_27.html?showComment=1255422510808#c50224502329086087'> 13 अक्तूबर 2009 को 1:58 pm

    विनीत जी शिमला से अनामिका जी से फोन पर बात चीत हुई थी । उन दिनो मै अपने ब्लोग पर उनके द्वारा सम्पादित संग्रह "कहती हैं औरते " से कवितायें दे रहा था । इस सम्मेलन की इतनी विस्त्रत रपट देख कर अच्छा लगा । आपको बधाई। इसे बुकमार्क कर लिया है फुर्सत से पढता हूँ ।

     

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