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हां जी सर कल्चर के खिलाफ लिखते हुए,जो हो रहा है उसे होने दो के प्रतिरोध में अपनी बेबाक राय देते हुए आज गाहे बगाहे ने 385 पोस्टों के साथ दो साल पूरे कर लिए। मुझे अच्छी तरह याद है आज से दो साल पहले 17 सितंबर की सुबह मैंने इस ब्लॉग की शुरुआत की।..और दिनों से बिल्कुल अलग तरह की सुबह। एक साल से लगातार मैं अपनी जुराब कैब या मेट्रो में बैठने पर पहनता, शर्ट के बटन घर की सीढ़ियों से उतरते हुए लगाता,सुबह साढ़े चार बजे उठने के वाबजूद भी ऑफिस पहुंचने पर लेट करार दे दिया जाता। बहुत ही व्यस्त और दिनभर घिसनेवाली दिनचर्या होती। इस बीच कहीं कोई सोशल लाइफ नहीं,किसी भी दोस्त या रिश्तेदार के फोन आने पर मैं थोड़ी देर में कॉल बैक करता हूं,कहना जैसे एक मुहावरा-सा बन गया। ऑफिस के फोन छोड़ बाकी कहीं से भी कोई फोन आने पर आपसे बाद में बात करता हूं कहना एक आदत सी बनती चली गयी। उस दिन को याद करता हूं तो ताज्जुब होता है कि कैसे इतनी मेहनत कर लेता,सुबह से लेकर रात के बारह-एक बजे तक नॉनस्टॉप स्टोरी लिखने,पैकेज कटाने,पचासों बार सीढ़ियों से चढ़ने-उतरने का काम। कैसे कर लिया मैंने एक साल तक ये सब कुछ। अब तो कोई एक बार से दो बार उपर-नीचे करा दे तो खुन्नस आ जाती है। बहरहाल,

ब्लॉग बनाने की सुबह बिल्कुल अलग किस्म की सुबह थी। हमें सुबह उठने की कोई जरुरत नहीं थी। लेकिन आदत के मुताबिक थोड़ी देर से ही छ बजे के करीब उट गया। दो घंटे तो इधर-उधर करके गुजार दिए लेकिन फिर समझ नहीं आया क्या करें? मीडिया के लिए काम करते हुए एक दिन मैंने यूजीसी की साइट देखी और पता चला कि मेरा यूजीसी जेआरएफ हो गया है। पहले के 15 दिन तो मैंने बहुत ही दुविधा में गुजारे। मुझे क्या करना चाहिए,मीडिया की नौकरी छोड़कर वापस रिसर्च की दुनिया में लौटना चाहिए या फिर मीडिया में ही बने रहना चाहिए। मीडिया में काम बहुत करने होते,पत्थर की तरह अपनी घिसाई हो रही थी लेकिन मीडिया की दुनिया छोड़ना मेरे लिए आसान नहीं था। मैंने शुरु से ही अपने को एक मीडियाक्रमी के तौर पर काम करने की कल्पना की। थोड़ी देर के लिए ही, कभी-कभी तो लगता कि बहुत मेहनत करनी पड़ती है लेकिन फिर ये सोचकर मन रम जाता कि कितनों को ऐसा मौका मिलता है कि कोर्स खत्म होने के दो दिन बाद ही,कम पैसे में ही सही नौकरी मिल जाए।.. इस दुविधा के बीच बाद में कुछ लोगों के सुझाव औऱ कुछ अपनी व्यक्तिगत समस्याओं की वजह से वापस अकादमिक क्षेत्र में जाने का मन बनाया। मार्निंग शिफ्ट के लिए मेरा दोस्त पहले ही जा चुका था। मैं अंत में इंटरनेट की शरण में गया। त्रिवेणी सभागार के एक कार्यक्रम में मिलने पर अविनाश ने मुझे बताया था कि आप कभी मोहल्ला देखें। उस समय मोहल्ला की बड़ी धूम थी। मैंने एकदम से मोहल्ला क्लिक किया,कुछ पोस्ट पढ़े और फिर खुद का अपना ब्लॉग बनाने में भिड़ गया। एक घंटे के भीतर मोटे तौर पर एक ब्लॉग बनकर तैयार था। जल्दीबाजी में मैंने एक पोस्ट लगायी और अपने कुछ करीबी दोस्तों को ब्लॉग का लिंक एसएमएस किया। दोस्तों ने ब्लॉग की सराहना की और फिर देखा कि मसीजीवी जिनसे कि पहले मेरा कोई परिचय नहीं था और राकेश सिंह जिन्हें मैं पहले जानता था,उन दोनों के शाम तक कमेंट भी आ गए हैं।

मैं लगभग रोज लिखता रहा। ये एक ऐसा दौर था जब काम के स्तर पर पूरी तरह बेराजगार था। ये अलग बात है कि जिस दिन से मैंने नौकरी छोड़ी,उसी दिन से ही फैलोशिप के पैसे जोड़कर मिलने की बात से पैसे को लेकर इत्मिनान हो गया। लेकिन सत्रह-अठारह घंटे की व्यस्तता के बीच अचानक ब्रेक आ जाने से ब्लॉगिंग करने के अलावे मेरे पास कोई दूसरा ठोस काम नहीं था। मेरी सारी किताबें डीयू हॉस्टल में दोस्तों की अलमारियों में पैक थी। पिछले सात महीने में मैंने कोर्स और हिन्दी साहित्य से जुड़ी एक भी किताबें नहीं पढ़ी थी। दस दिन के भीतर मैंने देखा कि लोगों ने रिस्पांस देने शुरु कर दिए हैं। मुझे भी मजा आने लगा। फिर मैंने मीडिया के अलावे कई दूसरे मसलों पर भी लिखना शुरु किया। जमकर लिखने लगा और फिर लिखने लगा तो लिखने लगा।
मेरे ब्लॉग की पंचलाइन है- जब हां जी सर,हां जी सर कल्चर में दम घुटने लगे और मन करे कहने का-कर लो जो करना है। इस एक लाइन को लेकर कई झमेले हुए जो कि अब भी जारी है। शुरुआती दौर में दोस्तों सहित मुझे पढ़नेवाले लोगों ने इसे महज फैशन के तौर पर लिया। वैसे भी जिस समय मैंने ब्लॉगिंग करनी शुरु की उस समय लोग अपने ब्लॉग का नाम और उसका परिचय कुछ इस तरह से दे रहे थे कि समझिए वो अपने मौजूदा हालत से बुरी तरह उबे हुए हैं और अब वो अपने को जिद्दी,अक्खड़,बिंदास,बेलौस और बेफ्रिक साबित करने पर आमादा हैं। लिंक भेजते हुए मोहल्ला के अविनाश को मैंने लिखा कि मैं हिन्दी और मीडिया समाज के बीच होनेवाली हलचलों के बारे में अलग तरीके से लिखना चाहता हूं। अविनाश ने कहा-अलग क्या लिखेंगे,हिन्दी की कुछ क्षणिकाएं ही पेश कर दीजिए तो बेहतर होगा। लेकिन मैं अपनी इस पंचलाइन को लेकर भीतर ही भीतर बहुत सीरियस रहा। मेरी लगातार कोशिश बनी रही कि मैं सचमुच उन मसलों पर लिखूं जो हां जी सर,हां जी सर कल्चर को बढ़ावा देते हैं।
नतीजा ये हुआ कि मैं धीरे-धीरे कई तरह के विवादों में उलझता चला गया। जनसत्ता पर लिखे जाने की शिकायत मेरे विभाग तक गयी,भड़ास पर लिखने पर उखाड़ लोगे क्या जैसे शब्द सुनने पड़े,कनकलता प्रकरण में.ये कौन लौंड़ा है,जरा मिलवइयो तो,निपटाना पड़ेगा उसे भी का संदेश मिला। साहित्य के मसलों पर लिखने पर पोस्ट के प्रिंटआउट निकालकर लोगों ने अपने बाबाओं को पेश किए,नमक मिर्ज लगाकर मेरे बारे में काफी कुछ कहा गया। नतीजा ये हुआ कि ऐसे बाबा ब्लॉगिंग की परिभाषा बदलने लग गए और ब्लॉगिंग को चैटिंग जैसी ही कोई घटिया और बाहियात चीज के तौर पर प्रचारित करने लगे। मीडिया के मसले पर लिखने पर,बेकार में टांग क्यों फंसाते हो,रिसर्च कर रहे हो चुपचाप रिसर्च करो जैसी चेतावनी भी मिली।
दूसरी तरफ लोगों का लगातार प्रोत्साहन मिला। थोड़ा संभलकर लिखने के साथ ही कई दोस्तों और मीडिया के बुजर्ग लोगों ने मेरे लिखे की लगातार तारीफ करके मेरा हौसला बढ़ाया। आज इसी का परिणाम है कि जिस मसले पर मैं(खासकर मीडिया से जुड़े)लिखता हूं,उनसे संबद्ध लोग सीधे मुझसे सम्पर्क करते हैं। कई बार खुश होकर,कई बार नाराज होकर लेकिन इस बात की सराहना करते हुए कि आप अच्छा काम कर रहे हैं। मीडिया में नौकरी करने के मुकाबले लिखने की वजह से लोग मुझे जानते हैं। दो साल की ब्लॉगिंग ने मुझे नयी पहचान दी है,आपलोगों ने लगातार प्यार दिया है। मेरी बातों को सीरियसली पढ़ने-समझने के लिए अपना समय दिया है। यही वजह है कि कई बार जब मैं विवादों से घिर जाता हूं,चारों तरफ से लोगों के सुझाव आने लग जाते हैं कि फिलहाल लिखना छोड़ दो, तब भी मैं लिखने से अपने को रोक नहीं पाता। इसे आप मेंटल डिस्ऑर्डर कहें या फिर कोई लत,आज मेरे लिए लिखने से ज्यादा चुनौती का काम है नहीं लिखना। आप हंसेंग लेकिन इस लगातार लिखने के काम ने मेरे भीतर एक भरोसा पैदा किया है कि मैं कहीं भी रहूं,कमा खा लूंगा।
इस मौके पर मैं अपने सारे ब्लॉगर साथियों,दोस्तों और अभिभावक के तौर पर मुझे लगातार सुझाव और नैतिक समर्थन देते आए लोगों का शुक्रिया अदा करना चाहता हूं। भाषा को लेकर मेरा थोड़ा मुंहफट अंदाज है जिसे मैं लगातार दुरुस्त करने की कोशिश में हूं। दोस्तों की राय का ख्याल है मुझे कि मैं बातों-बातों में बेकार ही लोगों की नजर पर आ रहा हूं,ऐसे मुद्दों पर लिखना छोड़ दूं। शायद उनकी ये राय मुझे मानी नहीं जाएगी,जब तक लिख रहा हूं,इसी अंदाज में लिखूंगा...हां जी सर कल्चर के खिलाफ। लिखने के लिए मैं कभी नहीं लिख सकता। अभी तक तो ठीक है,जिस दिन लगने लगेगा कि मैं ऐसा नहीं कर सकता,उस दिन मैं अपने ब्लॉग बंद कर देने की खुली घोषणा करुंगा। ब्लॉगिंग करने और टाइमपास करने करने के बीच के फर्क को मैं हमेशा बनाए रखना चाहता हूं। पढ़ने-लिखने के स्तर पर जिस दिन समझौते करने पड़ गए,उस दिन सबकुछ छोड़-छाड़कर चीकू बेचना,बल्ली मरान में धूप चश्मा बेचना ज्यादा पसंद करुंगा।
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21 Response to 'हां जी सर कल्चर के खिलाफ,गाहे बगाहे ने पूरे किए दो साल'
  1. avinash
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/09/blog-post_17.html?showComment=1253162484824#c8623551512195513968'> 17 सितंबर 2009 को 10:11 am

    क्‍या बात है... गुरु गुड़ चेला चीनी वाली कहावत जम कर उतरी है। हम तो ब्‍लॉगिंग से विदा हो गये, आपने कमाल कर दिया। हमारी शत-शत शुभकामनाएं।

     

  2. विनोद कुमार पांडेय
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/09/blog-post_17.html?showComment=1253163179482#c4956312121187784203'> 17 सितंबर 2009 को 10:22 am

    दो साल की उपलब्धि..गाहे बेगाहे और विनीत जी को ढेर सारी बधाई...

     

  3. chavanni chap
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/09/blog-post_17.html?showComment=1253164350669#c6253613342508225455'> 17 सितंबर 2009 को 10:42 am

    बधाई। इस एक शब्‍द में मेरी खुशी नहीं अट पा रही है। बेहतर काम की तारीफ होती ही है। अगर उसमें निहितार्थ न हो तो लोग मुरीद बनते हैं। आप का रास्‍ता सही है। आगे बढ़ें।

     

  4. पत्रकार
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/09/blog-post_17.html?showComment=1253164783373#c4913167689189932694'> 17 सितंबर 2009 को 10:49 am

    बहुत बधाई विनीत. गाहे-बगाहे के ३८५ वीं पोस्ट और दो साल पूरा होने पर ढेर सारी बधाई और शुभकामनाएं. कई लोकप्रिय ब्लॉग के डॉट.कॉम में तब्दील होने के बाद ब्लॉग्गिंग के भविष्य को लेकर एक चिंता की लकीर जरूर खिंची थी. ब्लॉग तो कई सारे बन रहे हैं और उनपर जमकर लिखा - पढ़ी भी हो रहा है. लेकिन कंटेंट के लेवल पर कम ही स्तरीय ब्लॉग है. ऐसे में गाहे - बगाहे पर पिछले दो सालों के दौरान विविध विषयों पर विनीत तुमने जो लिखा है , वह अपने आप में बेमिसाल और किसी इतिहास से कम नहीं है. तुम्हारे इस प्रयास ने ब्लोगिंग की ताकत को बढाया और उसे मजबूत किया है. आशा है गाहे - बगाहे का यह सफ़र ऐसे ही आगे भी जारी रहेगा और अगले साल - फिर अगले साल - और साल दर-साल यह सिलसिला चलता रहेगा.
    पुष्कर

     

  5. बी एस पाबला
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/09/blog-post_17.html?showComment=1253164818173#c7905578164082924850'> 17 सितंबर 2009 को 10:50 am

    सार्थक उपलब्धि
    बधाई व शुभकामनाएँ

    बी एस पाबला

     

  6. ajit
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/09/blog-post_17.html?showComment=1253168109200#c2940634197095299589'> 17 सितंबर 2009 को 11:45 am

    बहुत बढ़िया लिखा है विनीत आपने . आप चिंता मत करिए कि कौन आपके लिखने को किस तरह से लेता है . लेखन में ईमानदारी बनी रहे और जो बात दिल से निकले , उसे लिखते रहिए . मैं कुछ महीने पहले तक ब्लॉग की दुनिया में ताक -झांक नहीं कर पाता था लेकिन अब करता हूं . मुझे लगता है कि आप लिख भले ही ब्लॉग पर रहे हैं लेकिन बहुत विचारोत्तेजक लिख रहे हैं . मेरा तो ब्लॉग से परिचय ही तब हुआ था , जब अविनाश ने मेरी ही आरती उतरवा दी थी . चरित्र चित्रण करवा दिया था . तब ज्यादा संवेदनशील था . कुछ बुरा भी लगा था . अब लगता है ये सब होते रहना चाहिए . दूसरे लोग कई बार जब आईना दिखाते हैं तो लगता है अपने ही बनाए आईने में अपना चेहरा देखकर हम खामखा खुश हो रहे थे . आलोचनाओं की खिड़की को ब्लॉग ने दरवाजों में तब्दील कर दिया है . आप उन चंद ब्लॉगर्स में से हैं जो बहुत बढ़िया और गहराई के साथ लिख रहे हैं . कई लेख तो ऐसे हैं , जो अखबार में छपने वाले मठाधीशों के लेखों से ज्यादा गहराई लिए हुए है . आपके लेख कईयों पर भारी पड़ते हैं . विचार से स्तर पर . भाषा के स्तर पर . आलोचना के स्तर पर . तर्कों से निहत्था करने में आपका जवाब नहीं . मैं गाहे - बगाहे आपके ब्लॉग पर आता रहता हूं . यूं ही लिखते रहिए .
    मीडिया पर आपके लिखे लेख को मैं खास तौर से जरूर पढ़ता हूं . चाहे वो मुहल्ला पर हो या फिर आपके ब्लॉग पर .
    अजीत अंजुम

     

  7. राजीव तनेजा
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/09/blog-post_17.html?showComment=1253169318354#c3446240466294740182'> 17 सितंबर 2009 को 12:05 pm

    आपकी लेखनी मुझे प्रभावित करती है...

    ब्लॉगजगत में दो साल पूरे होने पर बहुत-बहुत बधाई...

     

  8. prabhat gopal
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/09/blog-post_17.html?showComment=1253169793388#c219644019036625647'> 17 सितंबर 2009 को 12:13 pm

    जिंदगी तो यूं ही निकल जाती है। वैसे ही समय के साथ दो साल कैसे निकल गये, ये आश्चर्य की बात नहीं। सोचनेवाली बात ये है कि इन दो सालों में तुमने कितना कुछ लिख डाला। ये उपलब्धि कोई छोटी चीज नहीं है और न ही रफ्तार को कम करनेवाली है। लगे रहो इंडिया की तर्ज पर बस लगे रहना है। विनीत सिर्फ ब्लागर नहीं, बल्कि एक बेहतर विचारक के रूप में जाना जाये, यही कामना है। हम तो एक साल से पढ़ते हुए तुम्हारे लेखन के कायल हो गये हैं। दो साल पूरे करने पर बधाई।

     

  9. रवीन्द्र रंजन
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/09/blog-post_17.html?showComment=1253175140225#c2414128319904309689'> 17 सितंबर 2009 को 1:42 pm

    स‌बसे पहले तो तहेदिल स‌े बधाई। स‌ोच रहा था कि विनीत हम स‌बकी बहुत क्लास लेता है। आज उसकी क्लास लगाऊंगा. लेकिन इस बार भी वैसा ही हुआ जैसा हर बार विनीत को पढ़ने के बाद महसूस होता है। वाकई कोई तो है जो बेखौफ होकर अपनी बात रखता है।
    दिनचर्या के बारें में पढ़कर रश्क भी होता है। काश हम भी स‌ुबह छह बजे जागते। लेकिन स‌बको स‌ब कुछ नहीं मिलता। जो निर्णय आपने लिया, वो बिल्कुल स‌ही था। इसका उदाहरण हम स‌बके स‌ामने है। कभी-कभी पढ़कर लगता है कि जैसे कोई हमारी ही बात कह रहा है।
    मैं तो आपका ब्लॉग बहुत स‌मय स‌े पढ़ रहा हूं। एक आत्मीय रिश्ता स‌ा कायम हो गया है। यहां पर ज्यादा स्पेस घेरना ठीक नहीं। बस इतना ही कहूंगा कि यूं ही जारी रहे ये स‌फर बढ़ता रहे कारवां...

     

  10. रंगनाथ सिंह
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/09/blog-post_17.html?showComment=1253177510129#c1885367360438802089'> 17 सितंबर 2009 को 2:21 pm

    बधाई हो। उम्मीद है गाहे-बगाहे दीर्घजीवी होगा।

     

  11. PD
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/09/blog-post_17.html?showComment=1253179202418#c2126459742894405178'> 17 सितंबर 2009 को 2:50 pm

    बधाई हो भाई.. आप खूब लिखें और "हां जी सर" कल्चर के ही खिलाफ लिखें.. वही तो पढ़ने यहां आते हैं हम.. :)

    हम तो अभी ध्यान दे रहे हैं कि आप तो मुझे बाबू साहेब बना दिये हैं.. :)

     

  12. PD
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/09/blog-post_17.html?showComment=1253179273762#c360185372580904896'> 17 सितंबर 2009 को 2:51 pm

    मुन्ना भैया(अविनाश) को इतने दिनों बाद किसी ब्लौग पर कमेंट करते देखना भी बढ़िया रहा.. चलिये आपके बहाने वो दिखे तो सही.. :)

     

  13. राकेश
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/09/blog-post_17.html?showComment=1253187722653#c3882329490453423280'> 17 सितंबर 2009 को 5:12 pm

    हम तो डेली बधाई देते हैं बंधु. अगर आज भी बधाइए देंगे तब शायद तुम्‍हारे लिए ये हमारा सही सम्‍मान नहीं होगा. आज इस ऐतिहासिक ओर ख़ुशी में विभोर कर देने वाले मौक़े पर तुम्‍हें देने के लिए शब्‍द नहीं है. बस यही कि तुम दीघार्यु बनो और ऐसे ही हां जी, हां जी कल्चर के लिखाफ़ कलम बुंलदी से चलाते रहो.

    शुभकामनाएं

     

  14. इरशाद अली
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/09/blog-post_17.html?showComment=1253191309383#c7857669372930291553'> 17 सितंबर 2009 को 6:11 pm

    मुझे लगता है विनित एक तुफान की मानिन्द है, और लोग सिर्फ उसे एक लिखने वाला ही समझ रहे है, बावलों ने शायद विचारांे के प्रस्फुटन को नही देखा है।

     

  15. अनूप शुक्ल
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/09/blog-post_17.html?showComment=1253194035054#c6440851760485229857'> 17 सितंबर 2009 को 6:57 pm

    बहुत अच्छा लगा इस सूचना से कि आपके दो साल हो गये। बहुत अच्छा लगता है आपका लिखा पढ़ना। जिन लोगों ने आपको लिखना बन्द कर लेने की सलाह दी है उनकी राय बेकार की है। हिन्दी ब्लाग जगत के कुछ बेबाक और बेहतरीन ब्लागों में से आपका ब्लाग है मेरी समझ में। लिखते रहें। आगे और कई साल पूरे करें।

     

  16. सुशील कुमार छौक्कर
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/09/blog-post_17.html?showComment=1253199209947#c3952709445115480085'> 17 सितंबर 2009 को 8:23 pm

    सबसे पहले तो बधाई स्वीकार कीजिए। और ऐसे ही तीखे रुप से जमकर लिखते रहिए विनीत भाई। आपका तीखा रुप पसंद आता है। हमारी शुभकामनाएं आपके साथ है।

     

  17. Sanjeet Tripathi
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/09/blog-post_17.html?showComment=1253204280387#c4547029288336378599'> 17 सितंबर 2009 को 9:48 pm

    भाई विनीत, आपको लिखना बंद करने की सलाह देने वालों को आपने आईना लिख कर ही दिखा दिया है। प्रारंभ से ही आपको पढ़ रहा हूं। तेवर यही बनाए रखिए क्योंकि यही आपकी पहचान बन चुकी है।

    शुभकामनाएं

     

  18. अविनाश वाचस्पति
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/09/blog-post_17.html?showComment=1253207996565#c2858536302873798203'> 17 सितंबर 2009 को 10:49 pm

    आप अपने दिल की दौलत (विचार)
    को यूं ही
    बेलौस होकर उड़ाते रहिए
    देखिए फिर कौन कौन
    उस उड़ान में उड़ जाता है
    और कौन साथ हो लेता है
    जो साथ नहीं होगा वो
    निश्‍चय ही एक दिन
    सड़ जाएगा।

    पर आपके दिल की दौलत
    यूं ही सच्‍चाई की वाहक बनी रहेगी।
    दो साल तो कुछ भी नहीं हैं
    हम तुम्‍हें अगले 50 साल तक
    यूं ही सक्रिय देखना चाहते हैं।

     

  19. सुजाता
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/09/blog-post_17.html?showComment=1253208507799#c7019405365044099655'> 17 सितंबर 2009 को 10:58 pm

    बहुत बहुत बधाई!और लिखें ,खूब लिखें!

     

  20. दिलीप मंडल
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/09/blog-post_17.html?showComment=1253210105602#c195639773783312720'> 17 सितंबर 2009 को 11:25 pm

    विनीत आपको शुभकामनाएं।

    जब मीडिया समीक्षा का मतलब प्रिंट के बारे में लेखन के तंग दायरे में कैद था तब आपने टीवी को पहली बार पड़ताल का निशाना बनाया। ये पायोनियरिंग वर्क है। आप समकालीन मीडिया समीक्षकों में अपनी जगह बनाने में कामयाब रहे हैं।

    टीवी की भाषिक संस्कृति पर आप मौलिक कार्य कर रहे हैं और इस कार्य का महत्व, उम्मीद है, कई साल तक बना रहेगा। खुदरा समीक्षामूलक लेखन के साथ स्थायी महत्व का काम करने की आपकी क्षमता की काश मैं भी नकल कर पाता।

    आपको फिर से ढेर सारी बधाई और जल्द ही आपकी एक शानदार किताब की उम्मीद और कामना के साथ,

    दिलीप मंडल

     

  21. गिरीन्द्र नाथ झा
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/09/blog-post_17.html?showComment=1253353698669#c1563436206865393434'> 19 सितंबर 2009 को 3:18 pm

    पहले बहुत-बहुत बधाई दो साल गाहे-बगाह के होने के। इन दो सालों में इस ब्लॉग ने हम जैस लोगों को भाषाई और आलोचनात्मक समझ के करीब लाने का प्रयास किया। इस ब्लॉग के बारे में मैं ज्यादा और कुछ नहीं कह सकता, क्यों कि इसे हमें और आगे बढ़ते देखना है। खूब दूर तक....

     

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