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आपने किसी टीचर को प्रपोज किया है?

Posted On 5:21 pm by विनीत कुमार |



पोस्ट की टाइटल पढ़ते ही आप मेरे नाम से मन ही मन गालियां भुनभुनाने लगें इसके पहले ही सफाई दे दूं कि इस तरह के घटिया विचार(समाज की ओर से लिया गया पदबंध)मेरे मन में आजतक कभी नहीं आया। पिछले डेढ़ घंटे से रेड एफएम 93.5 पर एक कॉन्टेस्ट चल रहा है जिसमें जॉकी की ओर से लगातार सवाल किया जा रहा है-क्या आपने किसी टीचर को प्रपोज किया है,अगर हां तो हमें फलां नंबर पर कॉल करके बताएं। मेरे हाथों में साबुन लगे हैं,कपड़े धोने जैसा बोरिंग काम कर रहा हूं,इसलिए रेडियो बजा रहा हूं। बिना रेडियो बजाए मैं कपड़े धो नहीं सकता। लेकिन दिक्कत है कि बार-बार मैं चैनल बदल नहीं सकता इसलिए शुरु से जो बज रहा है उसे बजने दे रहा हूं। कई लड़कों ने इस कॉन्टेस्ट में भाग लिया है। कुछ लड़कियां भी अपने अनुभव बता रही है,रेडियो जॉकी को अपना नाम बताए बिना सारी बातें बता दे रही है। एक लड़के ने बताया- एक दिन मैंने एक टीचर को कहा- मैम मुझे सिर में बहुत जोर से दर्द हो रहा है। मैम ने मेरे सिर गोद में ले लिए और सहलाने लगी। मैंने पांच मिनट बाद कहा-मैम आप मुझे बहुत अच्छी लगती हैं,आइ लव यू मैम। जॉकी ने उधर से सवाल किया- तब तो बहुत जूते पड़ेगे होंगे बेटे। लड़का हंसता है और फिर गाना बजने लग जाता है। जॉकी फिर से अपील करता है-आप हमें बताइए,क्या कभी आपने किसी टीचर को प्रपोज किया है।...ये है आज हैप्पी टीचर्स डे के मौके पर टीचर और स्टूडेंट के बीच बनते-बदलते नए संबंधों की तलाश,सर्वे या खोजबीन। मैंने यहां जान-बूझकर गुरु-शिष्य शब्द का प्रयोग नहीं किया,इससे संदर्भ पूरी तरह से बदल जाते हैं।

अब मैंने कपड़े धो लिए हैं। एक-एक करके अलगनी पर उसे फैला रहा हूं। अब मैंने रेड एफएम की जगह रेडियो सिटी 91.1 लगा दिया है। यहां है रेडियो जॉकी फबेहा। उसने हम ऑडिएंस के सामने शायरी की एक लाइन छोड़ दी है और हमें मिसरे पर मिसरा फेंकते रहने को कहा है। शायरी की लाइन है- उस टीचर की आंखों में है कैद है मेरा दिल। एक गाना बजता है- साथिया..मद्धि-मद्धिम तेरी भीगी हंसी। फबेहा सतर्क करती है- आप इसे ऐसे गाइए-टीचर,मद्धम,मद्धम तेरी.. रेडियो सिटी टीचर से अपने दिल की बात कह डालने के टिप्स बता रहा है।

अब मैंने सारे कपड़े अलगनी पर डाल दिए हैं,क्लिप भी लगा दिए हैं। अब कमरे के अंदर हूं। कुछ खाने का मन कर रहा है लेकिन इसके पहले रेडियो सिटी बदलकर ममा म्यओं 104.8 सुनना चाहता हूं। यहां टीचर अपना एक्सपीरियंस बता रही हैं। बच्चे कैसे पहले से कई गुना स्मार्ट हो गए हैं,ऐसे बहाने बनाते हैं कि आप चाहेंगे कि आपको भी ऐसे ही बच्चे मिलें। मैं कुछ दिनों के लिए बाहर चली गयी थी। वापस आयी तो पूछा-तुमलोग स्कूल क्यों नहीं आ रहे थे? उनका जबाब था- मैम आपके बिना हमारा बिल्कुल भी मन नहीं लग रहा था। फिर एक रोमैंटिक-सा गाना बजता है। अब मैंने चैनल बदलने के बजाए रेडियो की बैंड को ऐंठना शुरु कर दिया है जहां टीचर्स डे के नाम पर एक ही रंग-ढंग की बातें और कॉन्टेस्ट जारी है। चोर बजारी दो नयनों की के बाद ब्रेक और फिर एक सिग्नेचर..हैप्पी टीचर्स डे।

अब मैं पूरी तरह से इत्मिनान हो गया हूं। एक बॉल में स्प्राउट, प्लेट में दो मोनैको बिस्किट और सेब के चार टुकड़े मैंने तैयार कर लिए हैं। तकिए से झुककर अब मैं इसे भकोसने के मूड में हूं। कुछ पुरानी यादों और बातों के साथ। पहली बार में तो मुझे टीचर्स डे के नाम पर एफ एम चैनलों का ये रवैया बिल्कुल अटपटा नहीं लगता है। बहुत नैचुरल बात है यार,इसमें नया क्या है? यकीन नहीं होता तो एक बार मैं हूं न में कैमेस्ट्री की टीचर बनी लाल साड़ी में सुष्मिता को देख लो और उसके पीछे फुद्दू बने स्टूडेंट शाहरुख को। नहीं तो एक बार यूट्यूब पर जान तेरे नाम का ये गाना ही देख लो- माना की कॉलेज में पढ़ना चाहिए..रोमांस का भी एक पीरियड होना चाहिए,गाना देख लीजिए।। फिर अपने साथ भी तो कुछ इसी तरह का मामला बन गया था एक बार-
बेरोजगारी के उपर विजी होने और काम मिल जाने का पैबंद लगाने के चक्कर में मैंने दो साल लक्ष्मीनगर के एक इन्स्टीट्यूट में हिन्दी और कम्युनिकेशन स्किल की क्लासें ली हैं। बीएड और डाइट की तैयारी कर रहे बच्चों को मुझे रोज दो से तीन क्लासें देनी होती। पूरी 60-65 स्टूडेंट के बीच मात्र 3 से 4 लड़के होते। मेरे लिए यहां पढ़ाना बड़ा ही अलग किस्म का अनुभव रहा है। आप कह लीजिए कि यहां पढ़ाकर एक हद तक मैंने अपने को अपडेट किया है। खैर,एक लड़की अक्सर क्लास के बाद कुछ न कुछ पूछने आ जाती। सीढ़ियों से उतरते के क्रम में मैं उसे जितना बता पाता,बता देता। मैंने इस बात पर बहुत अधिक ध्यान नहीं दिया लेकिन चार-पांच दिनों बाद मैंने महसूस किया किया कि कुलीग और कुछ स्टूडेंट के बीच कहानियां बननी शुरु हो गयी है। रोज की तरह एक दिन वो क्लास शुरु होने के पहले मोबाईल नंबर मांगा। मैंने कहा-चलो देता हूं। क्लास में आते ही ब्लैकबोर्ड पर मैंने मोबाइल नंबर लिखा और कहा जिस किसी को भी कभी किसी चीज की जरुरत हो बेहिचक फोन करना। इस किसी चीज में भावुकतावश मैंने किताब,स्टडी मटीरियल की भी बातें जोड़ दी थी। क्लास खत्म होते ही वो लड़की तेजी से निकली और डपटते हुए अंदाज में कहा- सर, इट्स नॉट फेयर,आपको नंबर इस तरह पब्लिकली नहीं देने चाहिए। आपको पता नहीं है कि ये लड़कियां आपका कितना भेजा खाएगी। आपने मुझे चीट किया है। े ठीक नहीं है सर। उसके बाद उसने क्लास के बाहर आकर पूछना बंद कर दिया। मैने भी नोटिस नहीं ली। फिर मेरे क्लास में आना भी बंद कर दिया। अंतिम क्लास के एक दिन पहले उसकी एक दोस्त ने मुझे कहा-आपने उसे हर्ट किया है सर। आपको इस तरह से ब्लैकबोर्ड पर अपना नंबर नहीं लिखना चाहिए था। नंबर तो वो आपसे इसलिए मांग रही थी कि वो कोर्स के अलावे भी अपने मन की बात शेयर कर सके। मैं अवाक् था। मैंने कहा-अरे,मुझसे पढ़ाई के अलावे ऐसी कौन सी बातें शेयर करना चाह रही थी। उसकी दोस्त का जबाब था-आप डीयू से पढ़े,आप इतने भी अंजान नहीं हो,आप फ्लर्ट कर रहे हो।

शहरों में पढ़े रहे बच्चों के बीच स्टूडेंट औऱ टीचर का संबंध कस्बाई स्कूलों के टीचर-स्कूल संबंधों से बिल्कुल अलग है। गांव के स्कूलों पर कोई कमेंट नहीं कर सकता,कुछ नहीं जानता इस बारे में। लेकिन इतना जरुर कह सकता हूं कि स्टूडेंट के बीच छोटी-छोटी बातों को लेकर जिस तरह के इगो क्लैश करते हैं,एकाकीपन का एहसास होता है,अपने को किताबों और क्लासरुम के बीच इतना घिरा और फंसा पाता है कि उसके मन की कई चीजें कहीं भी निकलकर नहीं आने पाती। तारे जमीं की पूरी थीसिस इसी पर है। ऐसे में स्टूडेंट,टीचर को एक सिम्पैथी बॉक्स की तरह इस्तेमाल करना चाहते हैं जिसके भीतर अपने मन की बात,भावुकता,लड़कपन के सारे भाव उड़ेल देना चाहते हैं। ये भाव जाहिर तौर पर अफेयर और प्रपोज करने से अलग हैं। मुझे तो उस कोचिंग में अगले साल भी पढ़ाना था इसलिए मैंने इस भाव को नजरअंदाज करके किनाराकशी कर गया। हम उदात्त नहीं हो पाए। शायद यही वजह है कि हमारे और स्टूडेंट के बीच पलनेवाले भाव महज शेयरिंग की जरुरत के तौर पर नहीं बल्कि एफएम पर अफेयर और प्रपोज के तौर पर उभरकर सामने आ गए हैं। हम जैसे लोग एक हद तक इसके दोषी हैं जो दामन बचाने के चक्कर में लोगों के सोचने के मिजाज को बदल नहीं पाए और देखिए न,कैसे एकाएक इचक दाना,बिचक दाना,दाने उपर दाना अपने लिए आउटडेटेड हो गयी,हफीज मास्टर जैसे लाखों टीचर को आज कोई याद करनेवाला नहीं है। शब्दों का संस्कार देनेवाले पाठक सर अब याद नहीं आते। इतना तो छोड़िए..रट-रटकर क्यों टैंकर फुल,आंखे बंद तो डिब्बा गुल वाला टीचर भी प्रपोज करने की बात के बीच मजा किरकिरा करनेवाला लग जाता है। टीचर के बारे में जितना भी कहा जाए कम है लेकिन सब एफएम गोल्ड,रैनवो और लोकसभा टीवी चैनल के भरोसे छोड़कर सिर्फ इतना भर याद दिलाने की कोशिश-आपने कभी किसी टीचर को प्रपोज किया है,कैसा लगता है सुनकर और कैसा महसूस करते हैं जब बच्चे अपनी टीचर को लेकर सिर्फ इसी दिशा में सोचते हैं और हुमककर एफ एम चैनलों पर जबाब देते हैं?
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22 Response to 'आपने किसी टीचर को प्रपोज किया है?'
  1. संगीता पुरी
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/09/blog-post.html?showComment=1252152646121#c8797404876240013802'> 5 सितंबर 2009 को 5:40 pm

    टीचर्स डे के दिन ये कार्यक्रम .. चैनल जब अपना दायित्‍व ही भूल जाए .. तो क्‍या किया जा सकता है ?

     

  2. सतीश पंचम
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/09/blog-post.html?showComment=1252153553194#c4282562379457600894'> 5 सितंबर 2009 को 5:55 pm

    FM चैनल तो सारी नैतिकताएं ताक पर रख कर ही चलते हैं। यहां मुबई में भी मलिष्का नाम की एक RJ है जो बोल्डनेस के नाप पर न जाने क्या क्या परोसती रहती है। जाने अनजाने उसे भी झेलना पडता है कभी गानों के नाम पर तो कभी आप ही की तरह साबुन लगे हाथ के नाम पर ।

    बहुत उम्दा पोस्ट।

     

  3. Suresh Chiplunkar
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/09/blog-post.html?showComment=1252154119943#c4852387730411177284'> 5 सितंबर 2009 को 6:05 pm

    विनीत भाई, माना कि बजरंगी हुड़दंगी हैं, लेकिन ऐसे दो-चार चैनलों के जॉकियों को सरेआम ठुकाई की जाये (सिर्फ़ एक बार) तो मेरा पूर्ण समर्थन होगा… अगली बार से टीचर को भी "गुरु" बोलने लगेंगे… :)

     

  4. Dipti
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/09/blog-post.html?showComment=1252154959032#c6236224689231678473'> 5 सितंबर 2009 को 6:19 pm

    teachers se jude aise kai kisse school me mere samne se bhi guzare hai. mere school me ek teacher thi joi ki mere ek classmate ke ghar ke samne rahti thi unhone ek baar usse pucha tha ki aajkal chhatt par kyo nahi aate ho?

     

  5. महफूज़ अली
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/09/blog-post.html?showComment=1252157191774#c7465638653506650654'> 5 सितंबर 2009 को 6:56 pm

    waaqai mein channels apna daayitva bhool gaye hain......

    heading dekh ke socha ki koi gudgudaane wala lekh hoga ya phir koi vyang...... par aapke is lekh ne dimmag ko thodi der ke chintan mein bhej diya....

    par kya karen...... TV aur RADIO mein zyadatar log semi-literate hain.....

    yaani ki aadhe padhe likhe----- dishaaheen..... jinke paas koi naitikta nahih hai..... aur jinke paas hai.....wo gumnaam hain.... ye semi-lit=erate log jaise kuch patrakaar ..... INDIA TV sareekhe.....Film stars(pata nahin inko star kyun kaha jaata hai).....jinhe yeh nahi pata ki rashtra gaan aur rashtra geet mein kya difference hai..... aur kuch TV ke naalayak log jo aaj schedule (shedool)ko skedule bolte hain..... (bata doon ki schedule british english mein hota jisey hum indian english bhi kehte hain jabki skedule American eng mein bola jata hai joki wrong hai... ) jaise logon ne hi hamari sanskrtiti aur Y- generation ko bigaad ke rakha huahai..... bahut hi achcha lekh dil ko chhoo gaya....

     

  6. Vivek Rastogi
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/09/blog-post.html?showComment=1252158129217#c1903165509709288257'> 5 सितंबर 2009 को 7:12 pm

    विनीत जी - इस तरह के कई किस्से हम लाईव देख चुके हैं, कि या तो छात्र ने टीचर को प्रपोज किया या फ़िर टीचर ने छात्र को, और शादी भी कर ली। इससे गुरु शिष्य परंपरा को सही संदेश नहीं जाता है। और इन रेडियो जाकियों के लिये भी कोई सेंसर बोर्ड या रेग्यूलेटरी बॉडी होनी चाहिये।

     

  7. राकेश
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/09/blog-post.html?showComment=1252160394244#c4970884223548024218'> 5 सितंबर 2009 को 7:49 pm

    काहे जोकियो को पिटवाने पर तुले हो दोस्‍तों. मुझे तो लगता है सच को फेस करने की कूवत ही नहीं रही ज़माने में.
    भई, अपन तो स्‍कूल के ज़माने में कुछ मित्रों के साथ खैनी खाना सीख लिये थे और फिर मास्‍टरजी से उनकी डिबिया यह कह कर मांग लेते थे कि उनके लिए खैनी बना देंगे. बेचारे भोले मास्‍टर. एक चुटकी उनके लिए और पूरी हथेली भर अपने लिए, जो बाद में आठ-दस बार खायी जाती थी.
    मास्‍टरनी देखने का मौक़ा बहुत देर में मिला. ठीक से दिल्‍ली युनिवर्सिटी आने पर. हालांकि मैंने कोई सिरियस कोशिश नहीं की लेकिन मैं नैन-मटक्‍के की ऐसे किसी कोशिश को कुसंस्‍कार या सांस्‍कृतिक पतनशीलता नहीं मानता.
    अपनी राय तो ये है कि मास्‍टर और विद्यार्थी के बीच जितना सरल और सहज संबंध होगा, सीखने-सिखाने की प्रक्रिया उतनी ही आसान और होगी. आखिर ऐसा क्‍यों होना चाहिए कि हमेशा मास्‍टरों की दादागिरी ही चले कि स्‍टूडेंट को क्‍या पढ़ना है, कैसे पढ़ना है, कब पढ़ना है, कितना पढ़ना है ...? अपना मानना तो यही है हमेशा पारदर्शी और दोतरफ़ा प्रक्रिया अपने हित में होगा.
    जॉकी का अपने अध्‍यापका को प्रोपोज करने से मुताल्लिक सवाल का मेरे खयाल से मतलब ये तो नहीं ही है कि वो जॉकी विद्यार्थियों को अपने अध्‍यापकों को लोधी गार्डन या सफदरजंग का मकबरा टहलाने से वाबस्‍ता कोई ज्ञान बघार होगा.
    देवियों और सज्‍जनों से अपनी यही विनती है कि कृपया अपनी संस्‍कृति और अपने संस्‍कार को लेकर इतने सशंकितन न हों. अगर वाकई संस्‍कृति और संस्‍कार दमदार है तो कोई इसका कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता है. हमारा तो यही मानना है कि धैर्य, सहिष्‍णुता, अहिंसा और ज्ञान की भूख हमेशा से हमारी सांस्‍कृतिक विरासत रही है. कद्र और पालन करने में हर्ज नहीं होनी चाहिए.
    बहरहाल, अच्‍छे पोस्‍ट के लिए बधाई !

     

  8. दिलीप मंडल
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/09/blog-post.html?showComment=1252161442989#c3610749359123004239'> 5 सितंबर 2009 को 8:07 pm

    आपने अच्छा लिखा है विनीत। कंटेंट ही नहीं भाषा का प्रवाह भी सीखने लायक है। धन्यवाद।

    टिप्पणी करने वालों दोस्तों से निवेदन है कि हर बात को समस्या न मान लें। और दिल करे तो मान भी लें। राकेश जी की बातों पर भी एक बार सोच लें। ज्यादा डरना अच्छी बात नहीं है।

    हैपी टीचर्स डे दोस्तो।

     

  9. भूतनाथ
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/09/blog-post.html?showComment=1252169318468#c1455267457685907131'> 5 सितंबर 2009 को 10:18 pm

    ही-ही-ही-ही-ही-ही-ही-......इस पोस्ट को मैं भी गुरु-शिष्य समंध के रूप में नहीं ले रहा....दरअसल बेशक गुरु-शिष्य बेहद पवित्र है.....मगर गाहे-बगाहे इससे इतर कुछ बातें हो ही जाती है, और इस होने को सहजता के साथ ही लिया जाना चाहिए....क्योंकि ओवर-आल टीचर और स्टुडेंट नर और मादा ही हैं....कहीं कभी आकर्षण हो भी सकता है....ना हो तो अच्छा....मगर हो ही जाए तो.....??तो....तो....तो.....!!!

     

  10. गिरिजेश राव
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/09/blog-post.html?showComment=1252174601105#c4186339330176798324'> 5 सितंबर 2009 को 11:46 pm

    आज के पढ़े सारे लेखों में सर्वोत्तम लेख।
    मैं दिमाग में एकदम चुप्प हो गया हूँ। इतनी गहराई और संवेदना !

    बहुत कम दिखती है।

    सामान्यत: लेखों पर हास्य का पुट लिए टिप्पणी करने वाला 'लंठ' अभिभूत है आर्य ! कुछ कह नहीं पा रहा। आभार स्वीकार करें।

     

  11. Udan Tashtari
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/09/blog-post.html?showComment=1252195097271#c2910231707909380106'> 6 सितंबर 2009 को 5:28 am

    सामाजिक मूल्यों की ये दुर्दशा...कहीं न कहीं हम सभी जिम्मेदार हैं.

     

  12. अजय कुमार झा
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/09/blog-post.html?showComment=1252202994187#c7205277497367783424'> 6 सितंबर 2009 को 7:39 am

    अरे क्या विनीत भाई...ई ससुर रेडियो वालों..ऐफ़ ऐम वालों ..वो भी जो निजि खुले हुए हैं...उनमें अब यही सब तो रह गया है ..कहने और सुनाने को..बिल्कुल ठीक ध्यान दिलाया आपने...

     

  13. अनिल कान्त :
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/09/blog-post.html?showComment=1252213988060#c6438518124346923952'> 6 सितंबर 2009 को 10:43 am

    चैनल तो सारी नैतिकताएं ताक पर रख कर ही चलते हैं

     

  14. Anil Pusadkar
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/09/blog-post.html?showComment=1252217837635#c8695851191946312019'> 6 सितंबर 2009 को 11:47 am

    पता नही क्या-क्या बेचेंगे ये लोग्।

     

  15. पुरुषोत्तम कुमार
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/09/blog-post.html?showComment=1252219302169#c5122442271444560445'> 6 सितंबर 2009 को 12:11 pm

    गलत है या सही, कुतकॆ के रूप में ही सही बहस तो होगी। पर आपका लिखा एक-एक वाक्य सोचने को बाध्य करता है। बहुत अच्छा लिखा है आपने। वाकई प्रवाह इस कदर कि दम साधकर एक बार में (बिना कुछ और किए) पूरा पढ़ गया।

     

  16. अनूप शुक्ल
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/09/blog-post.html?showComment=1252219330085#c9020270247861634362'> 6 सितंबर 2009 को 12:12 pm

    रेडियो जाकी का शुक्रिया कि इस बहाने इत्ती रोचक पोस्ट पढ़ने को मिली।

     

  17. निशाचर
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/09/blog-post.html?showComment=1252221091623#c465691834735659255'> 6 सितंबर 2009 को 12:41 pm

    दरअसल मीडिया और प्रचार- प्रसार के ऐसे महत्त्वपूर्ण माध्यम जो समाज की दिशा तय करते हैं उन अपरिपक्व नौजवानों के हाथ पड़ गए हैं जो पैसे को ही सब कुछ समझते हैं और जैसा उनके मालिकान चाहते हैं, याने एन-केन-प्रकारेण पैसा बनाना, वे उसी पर अमल कर रहे है. पत्रकारिता या प्रसार माध्यमों के साथ जुडी हुई सामाजिक और नैतिक जिम्मेदारियों से या तो वे अनजान हैं या फिर उदासीन हैं. वास्तव में यह बन्दर के हाथ में उस्तरा आने वाली बात है...........वह खुद के साथ- साथ सारे समाज को चोटिल कर रहा है.

     

  18. Suresh Chiplunkar
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/09/blog-post.html?showComment=1252221133572#c4771588573982021822'> 6 सितंबर 2009 को 12:42 pm

    @ राकेश जी - "हमारा तो यही मानना है कि धैर्य, सहिष्‍णुता, अहिंसा और ज्ञान की भूख हमेशा से हमारी सांस्‍कृतिक विरासत रही है. कद्र और पालन करने में हर्ज नहीं होनी चाहिए…" तथा
    @ दिलीप मण्डल - "…हर बात को समस्या न मान लें। और दिल करे तो मान भी लें। राकेश जी की बातों पर भी एक बार सोच लें। ज्यादा डरना अच्छी बात नहीं है…"

    कल को यही छिछोरा/छिछोरी रेडियो जॉकी इसी बात को आगे बढ़ाते हुए रक्षाबन्धन के दिन सवाल पूछेगी "क्या आपने अपनी बहन के साथ सेक्स किया है?" तब सारी धर्म-संस्कृति-सहिष्णुता पिछवाड़े से बाहर निकल आयेगी…
    ऐसे लोग बातों से नहीं मानते मंडल जी… जब तक इन्हें यथोचित "भेंटपूजा" न दी जाये तब तक ये कचरा फ़ैलाते ही रहेंगे… सच का सामना करने का इतना ही शौक है तो और भी सामाजिक मुद्दे हैं…

     

  19. बी एस पाबला
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/09/blog-post.html?showComment=1252322499892#c5016587303796095923'> 7 सितंबर 2009 को 4:51 pm

    अरे! सुरेश जी की टिप्पणी के बाद शांति?

    वैसे विनीत की पोस्ट, अपने विषय को समेटे हुए बढ़िया

    एफ एम के बारे में तो !॰#$%%^&*

    बी एस पाबला

     

  20. जितेन्द़ भगत
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/09/blog-post.html?showComment=1252398262595#c8056733704195967840'> 8 सितंबर 2009 को 1:54 pm

    अच्‍छी प्रस्‍तुति‍।

     

  21. प्रवीण त्रिवेदी...प्राइमरी का मास्टर
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/09/blog-post.html?showComment=1252398931304#c7857697021656885994'> 8 सितंबर 2009 को 2:05 pm

    ..... हो सकता है की अधिकांश जिंदगी में आपका सामना अच्छे अध्यापकों से ना पडा हो ...पर इतने खराबों के बीच में आप एक अदद अच्छा शिक्षक ना पा सके तो शायद आप से भगवान रूठे रहे होंगे ? ज्यादा समय तो ना मिला लेकिन कुछ ब्लोग्स में फलां शिक्षक ने क्या क्या कुकर्म किए ...इसकी पूरी लिस्ट देख शिक्षक दिवस पर अच्छे आलेखों और संस्मरणों से प्रेरणा लेने का उत्साह काफूर होता नजर आया ...
    आदमी ने कुत्ते को काटा टाइप की ख़बरों पर अपनी निजी राय को आम राय न बनाएं!!

     

  22. RAJNISH PARIHAR
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/09/blog-post.html?showComment=1252636655724#c7223415913410719848'> 11 सितंबर 2009 को 8:07 am

    VERY NICE POST..

     

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