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हम तो बाहर जाने पर कहीं भी खाने से पहले देख लेते हैं कि होटल में किसका फोटो या मूर्ति लगाए हुए है। गणेश,लक्ष्मी या शिवजी का फोटो रहता है तो मन में तसल्ली हो जाती है कि-भले चाहें गंदा-संदा खाना दे लेकिन धरम तो बचा रह जाता है। नहीं तो गलती से खा लिए चांद-सितारा वाला लोगों के यहां तो सब दिन का किया कराया हो गया गुड़-गोबर

नवादा(बिहार) के सड़ियल औऱ धूल-धक्कड़ वाले बस स्टैंड पर प्यास लगने की स्थिति में भी सामने वाली दूकान पर जूस न पीने की स्थिति में भैय्या की परेशानी को देखते हुए हमारे साथ के एक रिश्तेदार ने ये बात कही। भैय्या जूस का आर्डर लगभग देने ही वाले थे,दाम पूछने के बाद पॉच ग्लास तैयार करने कहते कि इसके पहले उन्हें मस्जिद के पीछे चांद-सितारा वाली तस्वीर पर नजर पड़ गयी और रहने दो बोलकर बाहर निकल लिए। मेरी बड़ी इच्छा हुई कि जाकर एक नहीं दो गिलास उस दूकान से जूस पिउं लेकिन कई बार आप दुनिया के लिए क्रांति मचाते हुए भी घरेलू स्तर पर कितने निरीह हो जाते हैं,ये मुझे ऐसे ही मौके पर समझ में आता है। भैय्या को पता था कि यहां ये कुछ न कुछ जरुर तमाशा करेगा औऱ अपने को मानवीय और हमें सांप्रदायिक साबित करने में दिमाग लगाएगा,मैं थोड़ी ही देर बैठा था कि उन्होंने कहा- ओटो वाला बड़ी मुश्किल से तैयार हुआ है, अब चलो जल्दी। रास्ते में कुछ वैष्णवी ज्ञान देने लगे।

जीजाजी के एक ही साथ चार बोतल किनले खरीद लेने से सबों की प्यास तो बुझ गयी थी,ओटो पर बात करने के अलावे कुछ किया ही नहीं जा सकता था इसलिए सारी बातें हिन्दू-मुस्लिम के होटलों औऱ खाने पीने की जगह पर आकर अटक गयी औऱ तब सब अपने-अपने हिसाब रहस्यों का उदघाटन करने लगे। कौन कितना समझदार( आप इसे कट्टर हिन्दू ही समझिए) है,साबित करने में जुट गए। मैं उन्हें नही जानता था कि वो हमारे कौन लगेंगे इसलिए कभी भैय्या तो कभी सर बोलता रहा। उन्होंने मुंह को थोड़ा ज्यादा बड़ा करते हुए(जब आप गूगल अर्थ पर क्लिक करते हैं तो लगेगा कि धरती खुलती चली जा रही है,वैसे ही) कहा- आपलोग जो फोटू देखकर हिन्दू-मुस्लमान होटलों की पहचान करते हैं न,कभी-कभी गच्चा खा जाइएगा। गए थे हम अबकी बार जम्मू। वहां क्या देखते हैं कि सब होटल में डेढ़-डेढ़,दो-दो फीट की काली, हनुमान, वैष्णो देवी का फोटो लगा हुआ है। घुस गए अंदर,अभी खाने का आर्डर देते कि देखे कि कोने में एक टुइंया( लोटे जैसा जिसमें पानी के लिए अलग से टोटी लगी रहती है) रखा हुआ है। हमको समझने में एक भी मिनट देर नहीं लगा कि गलत जगह आ गए हैं। तुरंत पत्नी को कोहनी से इशारा किए और बाहर हो लिए औऱ फिर तेजी से आगे बढ़ गए। अब जमाना गया कि आप फोटू से जान जाइएगा कि ये हिन्दू होटल है या मुस्लिम होटल। सब जान गया है कि लोग यही देखकर घुसता है। इसलिए बिजनेस के लिए भगवान बदल देने में उसको दू मिनट भी नहीं लगता है।

घर के लोगों या बाकी रिश्तेदारों के साथ बहुत की कम कहीं जाना होता है लेकिन जब कभी भी जाना होता है तो खाने को लेकर दोहरे स्तर की समस्या होती है। दिल्ली में रहते हुए,बाकी दोस्तों के साथ हम सिर्फ खाने-पीने की जगह खोजा करते हैं लेकिन रिश्तेदारों के साथ जाने पर पहले होटल नहीं हिन्दू होटल खोजना होता है। नॉनवेज मैं भई नहीं खाता लेकिन चाहे किसी भी होटल में वेज की व्यवस्था हो जाए तो खाने में दिक्कत नहीं होती। इसलिए दो-तीन बार करीम में जाकर मिक्स वेज खाया तो दोस्तों ने इसे गोयठा में घी सुखाना कहा। मेरे क्या किसी भी रुढ़ि और परंपरागत परिवारों के बीच रहनेवाले लोगों के लिए ये अनुभव नया नहीं है। खाने को लेकर धार्मिक कट्टरता अपने चरम पर होती है। लेकिन मैं इसकी ब्रांडिंग पर सोच रहा हूं। अपनी सर्किल कुछ इस तरह की है कि मैं अकेला हूं जो नॉनवेज नहीं खाता। जो लोग खाते हैं उनके बीच नॉनवेज को लेकर एक समझ है कि ये मुस्लिम रेस्तरां में ज्यादा बेहतर मिलता है। इसलिए वो उन्हीं दुकानों से लेना पसंद करते हैं। उनके लिए मुस्लिम रेस्तरां एक ब्रांड है लेकिन परिवारवालों के बीच घृणा,परहेज और नाम ले लेने पर उबकाई आ जाने की मजबूरी। मैं तो सोच-सोचकर परेशान हो गया कि इस जूसवाले को अगर दिनभर में अगर पचास गिलास जूस बेचने होंगे तो पचास मुसलमान ग्राहक ही आए,तभी बात बनेगी। अब इसके लिए बाजार में चहल-पहल और तेजी का क्या मतलब है। अपनी तरफ तो अभी भी कई चीजों की दुकानें खोलने की हिम्मत मुस्लिम समाज के लोग जुटा नहीं पाते। कई दुकानें तो मैंने बंद होते देखी है।

फिलहाल गंतव्य तक पहुंचने पर जो भायजी हमलोगों को लेने आए,उनसे भी इस बात की चर्चा की गयी। कहा कि आज तो बाल-बाल बचे। भैय्यी की तरफ इशारा करते हुए कि अगर ऐन मौके पर फोटू नहीं देख लेते तो सब गड़बड़ा जाता। भायजी थोड़े गंभीर हुए और सत्य का ज्ञान कराते हुए कहा- अब तो फोटू-फाटू बहुत पुरानी बात हो गयी है। आपलोग ऐसा किया कीजिए कि कहीं भी खाने जाइए औऱ आपको शक हो कि अपने समाज का होटल नहीं है तो फट से दुकानदार को बोलिए- हरि ओम। उसके बाद देखिए कि चेहरे पर क्या रिएक्शन होता है, उसी से ताड़ जाइए। एक-दो बार तो हरि ओम बोलते ही अस्सलाम बालेकुम बोल पड़ा औऱ हम खिसक गए। मेरे मन में एक सवाल आया कि पूछूं,अगर उसने राधे-राधे कह दिया तो फिर कैसे पहचानेंगे,कृष्ण भक्त को मुस्लिम प्रूफ करने का कोई लॉजिक बताइए भायजी।
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5 Response to 'कैसे पहचाने कि कौन हिन्दू होटल है,कौन मुसलमानों का होटल ?'
  1. Abhishek
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/07/blog-post.html?showComment=1246449014541#c2121439344582534367'> 1 जुलाई 2009 को 5:20 pm

    "कई बार आप दुनिया के लिए क्रांति मचाते हुए भी घरेलू स्तर पर कितने निरीह हो जाते हैं". बिलकुल सही बात कही.
    भाई खाने वाले तो कहीं भी खाएंगे, और ऐसे 'भय्या जी' एक से एक फिल्टर लगाते रहेंगे!

     

  2. राज भाटिय़ा
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/07/blog-post.html?showComment=1246455628319#c2867250880478121890'> 1 जुलाई 2009 को 7:10 pm

    अरे बाप रे हमने तो कई बार मुस्लिम दोस्तो के घर जा कर खुब पेट भर कर खाना खाया( उन्हे पता है कि हम मीट नही खाते)ओर उस दिन वो मीट बिलकुल नही बनाते, वो भी हमारे घर खूब खा कर जाते है, इस के आलवा हम ने उन लोगो के घर जाकर भी खुब ठंडा ठंडा पानी पीया जिन्हे लोग भंगी कहते है, तो क्या हमारा धर्म खत्म ?
    बहुत सुंदर लेख लिखा आप ने
    धन्यवाद

     

  3. Ratan Singh Shekhawat
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/07/blog-post.html?showComment=1246468409164#c6281938437695550840'> 1 जुलाई 2009 को 10:43 pm

    बहुत सुंदर हकीकत को बयां करता लेख

     

  4. Ashutosh
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/07/blog-post.html?showComment=1246503905721#c3430525824138337907'> 2 जुलाई 2009 को 8:35 am

    sidhi saral shabdo mein likhi bilkul sachi baat. shukriya

     

  5. विवेक सिंह
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/07/blog-post.html?showComment=1246521842366#c4213391109907573539'> 2 जुलाई 2009 को 1:34 pm

    सत्य कहा लिखा गया है !

     

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