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ये अपने रवीश ने सूर्यग्रहण के चक्कर में अपना क्या हाल बना रखा है? बिखरे हुए बाल, चेहरा उड़ा हुआ, आंखें ऐसी कि बेमन से खोल-बंद कर रहे हों, पलकों के उठने-गिरने में जबरदस्ती करनी पड़ रही हो, ताक़त लगानी पड़ रही हो। बोलने का उनका मन ही नहीं हो रहा। कभी हंसते हैं, कभी टेलीविजन प्रोफेसर बन कर ग्रहण के नाम पर पाखंड फैलानेवालों को रगेदते हैं। कभी अपने संवाददाता मनीष को गर्माते हैं। मेरी मां इसे हुरकुच्चा (जबरदस्ती) मारकर बोलना कहती है। यही हाल उधर इलाहाबाद के तट पर खड़े आजतक के एंकर और संवाददाता प्रतीक त्रिवेदी का है। बता रहे हैं कि अभी यहां स्वर्ग महसूस कर रहा हूं। जी न्यूज का संवाददाता प्रमोद बौला-सा इधर-उधर ताकते हुए बोले जा रहा है। वो समझ ही नहीं पा रहा कि नींद पर लगाम लगाये कि जुबान पर। न्यूज 24 का संवाददाता कुरुक्षेत्र की भीड़ में घुसे जा रहा है, निकलने के लिए नहीं बल्कि लोगों के बीच और गहरे धंसने के लिए। स्टूडियो से एंकर अखिलेश आनंद ने बोल दिया है कि कुरुक्षेत्र में हजारों की संख्या में लोग इस नजारे को देखने के लिए जुटे हैं, सरोवर में स्नान करने आए हैं, अब संवाददाता इस जुबान को सच करने में जुटा है। आजतक पर सोनिया सिंह और श्वेता सिंह की जोड़ी लगातार हमें बताये जा रही है कि हम आपके लिए जमीन से 41 हजार फीट की ऊंचाई से तस्वीरें लाकर दिखा रहे हैं, हम वहां विमान से गये। एनडीटीवी लगातार दो मिनट तक नीतीश कुमार को नताश कुमार फ्लैश चलाता रहा। IBN7 ने अपने एक संवाददाता के आगे डॉक्टर लगा दिया।

सब चैनल अफरा-तफरी में। रात से ही कैमरा सेट लगा रहे हैं। सरोवर, छत, नदी और अटारी वहीं से वो लाइव कवरेज देंगे, रिपोर्टर पीटीसी देगा। सब परेशान, सब रात-रातभर के जगे हुए। आंखों के नीचे डार्कनेस लिए हुए। सूर्यग्रहण के चक्कर में न तो दिनभर ठीक से खाया-पिया और न ही पूरी नींद ली, बदहजमी और गैस से परेशान होने पर भी दिन-रात काम में लगे रहे। इस रतजग्गा के बीच जो कुछ भी दिखाए जा रहे हैं, दोस्तों उसे टीआरपी के लिए, सब बाजार के लिए जैसे फार्मूलाबद्ध जुमलों का इस्तेमाल करने से पहले जरा सोचिए। आलोचना के दायरे को बढ़ाइए, भाषाई स्तर पर कुछ नये प्रयोग कीजिए औऱ अपने पत्रकारों से पूछिए किसके लिए करते हैं, आप ये सब। मत कीजिए, हम बिना ये सब देखे ही जी लेंगे, आप हलकान मत होइए प्लीज। हम देर रात खस का शर्बत और मैगी ले रहे होते हैं औऱ आप ट्राइपॉड पर सिर रख कर सुस्ताते हैं, हमे ज़रा भी अच्छा नहीं लगता।

किसके लिए करते हैं ये सब, हमारे जैसे देश के उन हजारों दर्शकों के लिए, जो आपके हर काम को बस टीआरपी-टीआरपी का खेल कहकर दिन-रात कोसते रहते हैं। उन लाखों दर्शकों के लिए, जिनके यहां टेलीविज़न नहीं है और आपके डर को मारो गोली देखने से पहले ही ज्योतिषियों की दुकान जा पहुंचा है, पंडितों को लार टपकाने की खुराक दे आया है। हां, किसके लिए सूर्य ग्रहण देखने के स्पेशल चश्मा के बारे में बता रहे हो, जिसकी आंखों की रोशनी चली गयी, उसके लिए या फिर उसके लिए, जो नज़र का चश्मा बनाने के लिए तीन पाव की जगह आधा किलो दूध घर में मंगाना शुरू कर दिया है। उस बूढ़े दर्शक के लिए जिसका बेटा पांच महीने पहले बल्लीमारान से सस्ता फ्रेम लाने का वादा करके गया, सो अभी लौटा ही नहीं।

यकीन मानिए, देश का कोई भी संवेदनशील ऑडिएंस टेलीविजन पर अपने इन पत्रकारों की ये दशा देखकर गिल्टी फील किये बिना नहीं रह सकेगा। वो इनसे एक ही सवाल करेगा कि हमें लाइव कवरेज दिखाने के लिए आपको इतनी मशक्कत करने की क्या ज़रूरत पड़ गयी? हम आपकी नींद और चैन हराम हो जाने की शर्तों पर सबसे तेज नहीं होना चाहते। भाड़ में जाए सूर्य ग्रहण के वक्त हीरे-सा दिखनेवाला छल्ला। जाने दीजिए 123 साल बाद दिखे तो दिखे ये अजूबा दृश्य। इसके पहले भी कई अजूबा हुए, हम नहीं देख पाए तो क्या जिंदा नहीं हैं, क्या कोई असर पड़ रहा है हमारी सेहत को। हम नहीं चाहते कि ख़बरों की आपाधापी में दिल के साफ टीवी पत्रकार अब दिमाग से भी साफ हो जाएं। आपलोग खाइए, पीजिए, कोशिश कीजिए कि ऑफिस ऑवर की ही ख़बरें हमें दिखाएं। ये रतजग्गा करके ख़बर दिखाने की कोई ज़रूरत नहीं है। हमें आपके बच्चों की ‘पापा, चाचा और भइया’ का इंतजार करती हुई नींदाई आंखें देखी नहीं जातीं। एक किस पर दुनिया लुटा देनेवाली आपकी पत्नी का रात-रातभर तक टीवी रूम और संकरी बालकनी के बीच का चक्कर लगाते रहना देखा नहीं जाता। आपको शायद पता नहीं कि आपके परिवार वालों की कितनी आह हमें लगती है। हमें ज़बरदस्ती बददुआ मत दिलवाइए। मेरे घर में पापा-भइया अक्सर दूकान से बहुत लेट आते हैं। मां कई बार थक-थक कर सो जाती है। नींद में बड़बड़ाती है – चमोकन जैसन सट जाता है गाहक सब, तब ई लोग भी क्या करे, छोड़कर कैसे आ जाए। न जाने कितने मासूम ग्राहकों को, जिनके होने से हमारी रोजी-रोटी है, मां की बददुआएं मिलती है। क्या पता, आपकी पत्नी और मां भी कुछ ऐसा ही कहती हो कि जब देखनेवाले का मन ही नहीं ऊबता है, तो आदमी को बाल-बच्चा, घर-परिवार तो सब झोंकना ही पड़ेगा न उसके आगे। आप हमारे लिए मत अपना परिवार झोंकिए।

आपको सच बताऊं, रात-रातभर जागकर जो आप बनारस, तारेगना, गया, लखनऊ और दुनिया जहान की तस्वीरें दिखा रहे हैं न, उसको एक-दो दिन में ही हम बिसर जाएंगे। जब तक आपकी उबासी भी खत्म नहीं होगी कि गरियाने के मुहावरे ईजाद कर लिए जाएंगे। अच्छी बात है कि आप हमें सतर्क कर रहे हैं कि इससे डरिए मत, मुकाबला कीजिए या फलां-फलां दान कीजिए। हर ब्राह्मण को महर्षि व्यास मानिए लेकिन 52 घंटे तक टीवी देखने के बाद भी पता नहीं क्यों मैं भीतर से उस तरह से भरा-भरा महसूस नहीं कर रहा जो कभी साइंस की एक कक्षा में या उपाध्यायजी के श्लोकों की व्याख्या में किया करता रहा। हम जानना चाहते हैं। दूसरी बात जब आप कोसी बाढ़ को लेकर कवरेज करते रहे, तो कई बार मुझे कुछ रिपोर्टरों को देखते हुए लगा कि मैं उन्हें ब्रेक के वक्त पानी पिलाऊं जैसा कि हमने मीडिया करियर के दौरान जिनके लिए लगा, किया, जब आप मुंबई बम विस्फोट जैसी घटना के लिए कवरेज कर रहे होते हैं, तो नास्तिक होने के बावजूद भी लगातार आपकी हिफाजत के लिए कविता, संदेश और एसएमएस के तौर पर कुछ शब्द व्यक्त होते रहे। लेकिन आज आप जिस तरह से हलकान हो रहे हैं, मेरे मन में एक ही सवाल उठ रहा है, अपने ऊपर ही शक हो रहा है कि ऐसे मौके पर हम संवेदना क्यों नहीं रख पा रहे, सिर्फ ग्लानि-बोध पैदा हो रहा है भीतर से जो कि हमने आपको इस हालत में लाकर छोड़ दिया। हम नंदीग्राम और लालगढ़ के बनते छोटे-छोटे संस्करण के आगे आपकी इस मेहनत को क्यों नहीं पचा पा रहे हैं? ये ग्लानि कुछ उसी तरह की है, जैसे कोई मां सुहाग की निशानी बेचकर बेटे की ज़‍िद में साइकिल खरीदती है। ये वैसा ही अपराध बोध है, जब हम अपने पिता की खाली जेब का हाल जाने बिना स्कूल की फीस मांग बैठते हैं। हम लाइव होने के चक्कर में, पसंद-नापसंद के फंदे में जकड़ कर आपको बहाये लिये जा रहे हैं, आप बहे जा रहे हैं। आप हमारे भीतर न्यूज सेंस पैदा कीजिए ताकि आपको एक घटना को लेकर पॉलिएशन न करना पड़ जाए। एक ही स्टूडियों में पंडित, वैज्ञानिक, ज्योतिषाचार्य और धर्मगुरुओं को बिठाने की नौबत न पड़ जाए। कल तक हमने आपको कोसा है कि आप बकवास दिखाते हैं, कूड़ा दिखाते हैं, आज आप हमें कोसिए, ऑफिस से फारिग होते ही घर जाकर पत्नी और बच्चों को भी साथ कर लीजिए और हम जैसे ऑडिएंस को समवेत कोसिए, गरिआइए कि हमने आपका जीना हराम कर दिया है, हम सुविधाभोगी हो गये हैं जो कमरे में बैठकर, बटरस्कॉच खाते हुए एक ही साथ भारत, जापान और प्रशांत महासागर पर सूर्यग्रहण को लेकर पड़नेवाले असर के बारे में जानना चाहते हैं। आप हमें गरिआइए तो सही, देखिए कि हम कैसे नहीं सुधरते हैं
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6 Response to 'भकुआए टीवी पत्रकार आज आप हमें गरिआइए'
  1. अनूप शुक्ल
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/07/blog-post_23.html?showComment=1248332193943#c2966018693837581014'> 23 जुलाई 2009 को 12:26 pm

    सुन्दर! अच्छा लिखा।

     

  2. निशाचर
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/07/blog-post_23.html?showComment=1248340292232#c6342842087245046181'> 23 जुलाई 2009 को 2:41 pm

    उम्दा पोस्ट............. बेचारे रिपोर्टरों के साथ हमें भी सहानुभूति है.......... सचमुच अगर वे हमारे लिए इतनी तकलीफ उठाते हैं तो हमें बेहद ग्लानि हो रही है. कसम खाते हैं अब से कभी भी इस तरह के प्रोग्राम की मांग नहीं करेंगे (बल्कि हम तो किसी भी तरह के प्रोग्राम की मांग नहीं करेंगे)..... भले ही इनकी गाली खानी पड़े..........

     

  3. भारतीय नागरिक - Indian Citizen
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/07/blog-post_23.html?showComment=1248351121499#c5407680652803480355'> 23 जुलाई 2009 को 5:42 pm

    बिल्कुल सही लिखा है मेरे प्रिय टीवी दर्शक. बेचारे टीवी रिपोर्टर.

     

  4. amlendu asthana
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/07/blog-post_23.html?showComment=1248360708656#c6389443894902650791'> 23 जुलाई 2009 को 8:21 pm

    sunder likha hai. sab ke sab bazaarbad ka hissa hain. kya karen TRP ka mamla hai.

     

  5. उसका सच
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/07/blog-post_23.html?showComment=1248714357193#c5751958979499808724'> 27 जुलाई 2009 को 10:35 pm

    फ्राइडे फीवर की सब माया है..विनीत भाई..नब्बे मन नब्बे

    बिखरे हुए बाल, चेहरा उड़ा हुआ, आंखें ऐसी कि बेमन से खोल-बंद कर रहे हों, पलकों के उठने-गिरने में जबरदस्ती करनी पड़ रही हो, ताक़त लगानी पड़ रही हो। बोलने का उनका मन ही नहीं हो रहा। कभी हंसते हैं, कभी टेलीविजन प्रोफेसर बन कर ग्रहण के नाम पर पाखंड फैलानेवालों को रगेदते हैं........

    और अलंकार हीं अलंकार..

     

  6. Abhishek
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/07/blog-post_23.html?showComment=1248884049409#c8969339040116630457'> 29 जुलाई 2009 को 9:44 pm

    आपसे सहमत होने को भी जी करता है और असहमत होने का भी! अब पडोसी ने अपनी दूकान १० बजे तक खोली, आप ११ बजे तक खोलने लगे. उसने १२ बजे तक बढा ली,तो आप ने २४ घंटे सेवा शुरू कर दी. अब दूकान खोली है तो ग्राहक आएँगे ही! दूरदर्शन को देख लीजिये, ठाठ से मन मर्जी प्रोग्रामिंग करता है. देखो या न देखो!

     

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