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फेसबुक के मामले में बात करते हुए देश के एक मशहूर टेलीविजन पत्रकार ने मुझसे कहा- मेरे ट्रेनी और इन्टर्न माइ फ्रैंड में करन जोहर को दोस्त बनाए हुए हैं। अब मैं ही उनसे महीने-दो महीने में बात करता हूं तो तुम सोचो कि करन जोहर से उसकी कितनी बात होती होगी..सब ऐसे ही हैं। होता ये है कि इंसान में इतनी सॉफ्टनेस तो होती ही है कि जब आप फ्रैंड रिक्वेस्ट भेजो तो वो एक्सेप्ट कर लेता है,उसका जाता ही क्या है,बस कन्फर्म पर क्लिक ही तो करनी होती है। नहीं तो फेसबुक की इस दोस्ती में रखा क्या है?

फेसबुक में नामचीन हस्तियों की ओर से अपनी फ्रैंड रिक्वेस्ट स्वीकार लिए जाने पर जो लोग इधर-उधर इतराते फिरते हैं, फुलकर कुप्पा हो जाते हैं,उनके उपर इससे शायद ही कोई बड़ा व्यंग्य हो। दोस्ती-यारी में यही बात हम अपने बीच इतराने वाले लोगों को कहते तो या तो मुंह फुला लेता,हमें दुनियाभर की दलीलें देता,खुन्नस खा जाता या फिर ये भी दावा करता कि ऐसे थोड़े ही देस्ती कर लिए हैं,पर्सनली जानते हैं हमको। फेसबुक क्या, जीके उऩके घर जाकर खाना भी खाए हैं हम। गोरगांव से जब भी यहां आते हैं तो हमको जरुर फोन करते हैं। इस मामले में आप कह सकते हैं कि नामचीन हस्तियों के साथ अपने नाम जुड़ने की छटपटाहट और उस दम पर अपनी औकात बताने की बेचैनी हमें फेसबुक पर उन लोगों से जुड़ने के लिए उकसाती है जो कि एक बार रिक्वेस्ट एक्सेप्ट कर लेने के बाद आपकी तरफ ताकते तक नहीं हैं। आप उन्हें ऑनलाइन देखते हैं,आपका मन करता है कि उन्हें छेड़ें,उनसे पूछे कि सर आप कैसे हैं। अभी दो शब्द टाइप करते हैं कि आपकी उंगलियां रुक जाती है-कहीं वो बुरा न मान जाएं,कहीं हमें हटा न दें,हमें चेप न समझ लें।
फेसबुक की दोस्ती को लेकर टेलीविजन पत्रकार ने जो कुछ भी कहा उस संबंध मैंने सिर्फ इतना ही कहा- इसलिए सर,मैं अपने फेसबुक पर केवल उन्हीं लोगों को शामिल करता हूं जिनको या तो मैं व्यक्तिगत तौर पर जानता हूं,जिनसे मेरी पहले कई बार बात हो चुकी है,जो किसी मोड़ पर आकर भूल गए औऱ अब फिर से यहां मिल गए,ऐसे लोगों को रिक्वेस्ट भेजता हूं जो मेरी पहुंच के हैं और जिनसे मंडी हाउस,मीरी रोड या मुंबई चौपाटी पर बात हो सकती है। ऐसे किसी लोगों से फेसबुक पर नहीं जुड़ता जो नाम को लेकर बहुत बड़े हैं लेकिन जिनसे मेरा कोई सरोकार नहीं रहा है या फिर लिखने-पढ़ने और शेयरिंग के स्तर पर कोई कोई साबका नहीं पड़ सकता है।

सच पूछिए तो व्यक्तिगत स्तर पर फेसबुक मेरे लिए नए-नए दोस्त बनाने से कहीं ज्यादा पुराने दोस्तों को खोजने की जगह ज्यादा है। वो दोस्त जो एम.ए के दौरान हमेशा हमारे संभावित अफेयर के बीच मठ्ठा डालने का काम करता रहा, वो दोस्त जो डिवेट जीतने पर बीस प्रतिशत की कमीशन के लिए सिर पर सवार हो जाता,वो दोस्त जो कभी भी मेरे बारे में पूछनेवाली लड़कियों को सही-सही नहीं बताता कि मैं कहां हूं। ये अलग बात है कि मेरे पूछने पर कि वो कहां गयी,कहता पहले प्रॉमिस करो कि हंसराज वाली से मेरे बारे में बात करोगे। उन दोस्तों को खोजने के लिए फेसबुक का इस्तेमाल करता हूं जो चैनल की नौकरी करने के दौरान बॉस औऱ प्रोड्यूसरों की मां-बहन एक साथ सुनी। पैसे और लड़कियों के बीच इज्जत बचाने के लिए शाम के चार बजे(जबकि लंचटाइम खत्म हो जाता,वीडियोकॉन टॉवर के ठीक नीचे के ढाबे में साथ खाते। उन दोस्तों को याद करने के लिए जिनके साथ तीन स्क्रिप्ट लिखने के बाद पंडीजी की दूकान पर सुनियोजित तरीके से गरियाने पहुंचते। इस बीच साथ काम करनेवाली लड़की पूछती-कोई पूछेगा कि कहां गए हो तुम औऱ राणा तो क्या कहूंगी तो क्या कहूंगी। मैं कहता- कह देना भड़ास निकालने गया है। शुरुआती दौर में चैनलों में नौकरी करते हुए खाने-पीने और छुट्टी से भी सबसे ज्यादा किसी चीज की जरुरत होती है तो वो है भड़ास निकालने की। मैं तो दो-तीन स्टोरी के बाद पन्द्रह मिनट के लिए ही सही भड़ास न निकाल लूं तो आगे का काम ही नहीं होता। कई लोगों की जरुरत एक लत बन जाती है जिसे कि फ्रस्टू समझा जाने लग जाते है। आज मैं उस राणा और उस लड़की को खोजने के लिए फेसबुक पर आता हूं। वो लड़की जो वैसे दिनभर में तीन-चार बार बैग लेकर उठती तो मैं हर बार पूछता-घर जा रही हो क्या औऱ वो झल्ला जाती- नहीं,घर नहीं जा रही,यार तुम बहुत ही कमीने हो,जब जानते हो फिर भी पूछते हो,बड़े बेशर्म हो।

आज फेसबुक पर उस लड़की को खोजता हूं जो खुद होटल अशोका से मैंगो फेस्ट में आम खाकर आती और उसकी स्क्रिप्ट लिखते हुए,स्वाद को बताने के लिए हिन्दी में शब्द खोजने पड़ते,वो लड़की जो सेटिंग से बाय-बाय करती हुई अपने ब्ऑयफ्रैंड के साथ हाथ हिलाती हुई निकल जाती और कहती- विनीत जरा देख लियो। इस छोटी-सी जिंदगी में इतने सारे लोग,इतनी सारी यादें हैं कि उन सबको याद करने लग जाओ,उन्हें खोजने लग जाओ तो लगेगा कि फेसबुक तो बड़ी कमतर चीज है। काश कोई ऐसी चीज होती जिसके सर्च बॉक्स में जाते और नाम के साथ संदर्भ और यादों को लिखते,कुछ इस तरह- हिन्दू कॉलेज कैंटीन की याद,झंडेवालान में समोसे का खोंमचा औऱ तभी धड़धड़ाकर रिम्मी, जसलीन, प्रियंका, दीपा, राणा,शंभू,रंजन,नागिन,विजयालक्ष्मी,रावण, अबू सलेम सबों के लिंक,स्टेटस औऱ मेल आइडी निकल आते। लेकिन फेसबुक पर ऐसा कुछ नहीं होता। अब बताइए,अगर इस तरह की कल्पना करें तो फेसबुक है कोई बड़ी चीजे,नहीं न।

फिर भी फेसबुक पर लोग-बाग मार किए जा रहे हैं। जीमेल खोलो तो टोकरी के भाव मेल पड़े होते हैं। फलां हैज ऑलसो कमेंटेड ऑन फलां,एक्स हैज कमेंटेड ऑन योर स्टेटस। शुरु-शुरु में तो मैं खोलकर पढ़ता था कि देखें किस पर किसने क्या कमेंट किया है। लेकिन अब स्थिति दूसरी है। जिस फलां पर कमेंट किया है चलो उसे तो मैं जानता हूं लेकिन जिसने किया है,उससे मेरा कोई मतलब नहीं है। अब क्यों पढूं,ऐसे दर्जनों कमेंट को जिससे ये पता करना मुश्किल हो जाए कि अपनी किस पुरानी दोस्ती औऱ संदर्भ को याद करके दोनों कमेंट-कमेंट खेल रहे हैं। आपको बहुत बेकार लगेगा ऐसे में। कई बार होता है कि आप किसी से मिलने जाते हैं। आप आपका दोस्त औऱ एक औऱ आपका दोस्त। अब स्थिति ये बनती है कि वो दोनों आपस में हांके जा रहे हैं औऱ आपको है कि बातचीत का सिर-पैर ही समझ नहीं आ रहा। ऐसी स्थिति में लगेगा कि आसपास से सांस लेने के लिए हवा गुजरनी बंद हो गयी है। मेरी मां इसके लिए उठल्लू शब्द का प्रयोग करती है। इसे आप उल्लू भी समझ सकते हैं। आप सोचिए,ऐसे कमेंट औऱ मेल को पढ़-पढ़कर क्यों उल्लू या उठल्लू बनने जाए।

इन दिनों फेसबुक को जिस रुप में लिया जा रहा है वो तुम्हारे दिमाग में क्या चल रहा है बताने से ज्यादा,दोस्ती के नाम पर किसी के वॉल पर कुछ लिख आने से ज्यादा ब्लॉग के विकल्प के रुप में इसे पॉपुलर करने में है। समय की कमी,पोस्ट न लिखने का आलस फेसबुक को अधिक पॉपुलर बना रहे हैं। जिस किसी को भी चर्चा में बने रहने की,अपना नाम लोगों के दिमाग में डाले रखने की आदत बन गयी है वो इन दोनों वजहों के होने के बावजूद नाम को लेकर कॉन्शस तो रहेगा ही। फेसबुक से बेहतर और अब ट्विटर से आसान कोई दूसरा माध्यम नहीं है। पूरी पोस्ट नहीं लिखना चाहते,कोई बात नहीं जो क्रक्स है उसे ही दो लाइन में लिख दो। बाकी उस पर चर्चा शुरु हो जाएगी। किसी भी मसले को लेकर यहां महौल बनाए जा सकते हैं औऱ उसका बतौर रेफरेंस इस्तेमाल किया जा सकता है जैसा कि रवीश कुमार ने एनडीटीवी इंडिया की स्टोरी के लिए किया भी और फेसबुक के लोगों का शुक्रिया भी अदा किया। फेसबुक की इस दो लाइन में भी आपको ब्लॉग करने का सुख मिलेगा।

टीवी पत्रकार से बातचीत करने के बाद मैंने अपने फेसबुक दोस्तों की लिस्ट पर एक बार फिर से गौर किया। लगभग सबों को किसी न किसी रुप में बातचीत की। कुछ के लिए स्क्रैप भेजे। चार-पांच दिन तक इंतजार किया औऱ उधर से किसी तरह का कोई जबाब न मिलने की स्थिति में उन्हें डिलीट करता गया। आंकड़े कमजोर तो होते चले गए लेकिन भीतर से भरा-भरा महसूस कर रहा हूं कि अब फेसबुक पर जो भी लोग हैं,उन्हें मैं कह सकता हूं कि मैं उन्हें जानता हूं,मेरी उनसे बात होती रहती है और वो मेरे ऐसे दोस्त हैं जिनसे मैं अपने मन की बात कर सकता हूं। अक्लमंद आदमी कह सकता है कि- क्यों डिलीट कर दिया तुमने बहुत सारे लोगों के नाम को,कुछ नहीं तो तुम्हारे स्टेटस पर कमेंट करने के काम आते। देखकर अच्छा लगता कि इतने सारे लोगों ने कमेंट किए हैं। नहीं भई,मेरे पास अभी समय की कमी नहीं पड़ी है,मैं ब्लॉग लिखकर ही खुश हूं और मुझमे इतनी ताकत कहां है कि दोस्ती करने आए लोगों से कहूं- ले लीजिए न आप मेरी एक पॉलिसी,उसके लिए कलेजा चाहिए।...
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10 Response to 'फेसबुक की दोस्ती में आखिर रखा क्या है ?'
  1. PD
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/07/blog-post_11.html?showComment=1247298501884#c3208012182902015166'> 11 जुलाई 2009 को 1:18 pm

    Facebook abhi tak mere liye bas dikhane ke hi dant hain.. :)

     

  2. जितेन्द़ भगत
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/07/blog-post_11.html?showComment=1247304703866#c964765498622475765'> 11 जुलाई 2009 को 3:01 pm

    यही चीज ब्लॉग के follower वाले वि‍कल्‍प में नजर आती है, समझ नहीं आता इसके होने-न होने से क्‍या फर्क पड़ता है।

     

  3. Rachna Singh
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/07/blog-post_11.html?showComment=1247306867643#c3528318881776757289'> 11 जुलाई 2009 को 3:37 pm

    i dont fel any social networking site is of any use , it smerely for people who have nothing else to do but socialise or show off the contacts . as far as hindi bloggers are concerned many still dont know how to add contacts , they would click all email addres in their address book on yahoo , gmail, hotmail so on so forth and this becomes a flowof spam .
    many times on my email address i get offers to see photos !!!!! what for when i dont even know the person . its just that my email happened to be in their address book

     

  4. बी एस पाबला
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/07/blog-post_11.html?showComment=1247308103447#c3501261255197558794'> 11 जुलाई 2009 को 3:58 pm

    ऑनलाईन ऐसी चीजें उन्हीं को ज़्यादा लुभाती हैं जिनका वास्तविक संसार छोटा सा है।

    लेख आपका विचारोत्तेजक है।
    लेखन शैली भी बढ़िया है।

     

  5. रंजन
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/07/blog-post_11.html?showComment=1247311077184#c3029324783829122199'> 11 जुलाई 2009 को 4:47 pm

    फेस बुक का पता नहीं लेकिन ओरकुट तो आजमाया है.. मेरा एक अजिज दोस्त १० साल से नहीं मिला.. उस समय तक इमेल इतना लोकप्रिय नहीं था.. एक दिन उसे ओरकुट पर ढुढा़.. वो मिला.. बात हुई और पता चला वो अभी हैदराबाद में है.. पिछले दिनों जब हैदराबाद गया तो उससे मिला बहुत अच्छा लगा.. अगर ओरकुट न होता तो पना नहीं कब कैसे मिलता....

    सिक्के संग्रह करने का शौक रखता हूँ.. एक कम्युनिटी में एक सज्जन मिले.. वो भी ये रुची रखते थे... गांधीधाम के है.. जब वहां जाना ्हुआ तो दो बार उनसे मिला बहुत ्कुछ उनसे सिखा और उन्हे भी अपने अनुभब बताये.. अच्छा लगा..

    सावधानी रखी जाये तो बहुत अच्छा माध्यम है..

     

  6. अल्पना वर्मा
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/07/blog-post_11.html?showComment=1247326303095#c5449108241473461849'> 11 जुलाई 2009 को 9:01 pm

    मेरा अभी तक तो इस साईट में अकाउंट नहीं है लेकिन इस की लोकप्रियता के चर्चे जरुर सुने हैं.
    जिस देश [UAE]में एक समय facebook साईट भी प्रतिबंधित थी वहां अब वह खुली हुई है और इसी site के ज़रिये..दुबई के शेख और इस देश के प्रधानमंत्री ने भी जून माह में अकाउंट खोला है..और एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए एक प्रश्न पर जनता की राय मांगी और उनकी राय पर बहुमत को देखते हुए...स्कूलों को ईद के बाद खोलने का सरकारी फैसला लिया गया..जिस पर पब्लिक स्कूलों को निर्णय लेने की छूट दी गयी..इस कदम को सभी वर्गों ने सराहा है...
    यह इस साईट की लोकप्रियता और विश्वसनीयता का एक प्रमाण है की एक बहुत बड़ा राजनेता जनता से सीधा संपर्क कर पा रहा है.
    हर विषय के अपने अच्छे बुरे पहलू होते हैं इस के भी हैं.
    मैं इस साईट को इस्तमाल नहीं करती मगर इसे सीधे नकार भी नहीं सकती.

     

  7. निशांत
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/07/blog-post_11.html?showComment=1247329560329#c872350906238470093'> 11 जुलाई 2009 को 9:56 pm

    सही कह रहे हैं आप. मैं तो यदा-कदा फेसबुक पर जाता हूँ और चंद मिनटों में लौट आता हूँ. कुछेक खोये दोस्तों को इसमें द्घोओंधा जा सकता है बशर्ते वे मेंबर हों.
    आपका ब्लौग कुछ बदला-बदला लग रहा है, अच्छे के लिए.
    ऊपर चल रही मार्की की स्पीड कुछ ज्यादा है.

     

  8. अनूप शुक्ल
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/07/blog-post_11.html?showComment=1247354169605#c6951036162500046012'> 12 जुलाई 2009 को 4:46 am

    फ़ेसबुक के बारे में काफ़ी लिख मारा। :)

     

  9. अजय कुमार झा
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/07/blog-post_11.html?showComment=1247375054990#c6287222191272074779'> 12 जुलाई 2009 को 10:34 am

    नहीं ..मेरे ख्याल से ऐसा नहीं है..ऐसा हम आप थोड़ी देर के लिए सोच सकते हैं..मगर मुझे लगता है फेसबुक और ऑरकुट की एक अलग ही दुनिया है..हमारे लिए तो ये एक विकल्प की तरह है ,...मगर बहुत से लोगों के लिए ये वैसा नहीं है..उनके लिए ब्लॉग्गिंग के मतलब बेमानी होंगे..आपना अच्छा प्रश्न उठाया...

     

  10. khwabgaah
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/07/blog-post_11.html?showComment=1248071492832#c206908801368907247'> 20 जुलाई 2009 को 12:01 pm

    dosto ka dayra bas itna hi bada ho ki hum dost aur uski dosti ko yaad na bhulein.
    anjule shyam maurya
    anjuleshyammaury@gmail.com

     

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